Bruhadaranyaka/C5/S4: Difference between revisions
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{{AuthorNote| text = ॥ इति बृहद्भाष्ये सप्तमाध्याये चतुर्थं ब्राह्मणम् ॥ ४ ॥}} | |||
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प्रजापतिरिति ब्रह्मा वेदेषूक्तो ह्यमुख्यतः । | |||
यस्मिन्नूषुर्ब्रह्मचर्यं देवासुरनरोऽब्जजे ॥ | |||
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हृतिसद्दानयानेभ्यः सत्यं सद्गुणरूपतः । | |||
यत्तद्धृदयमित्युक्तं ब्रह्म तत्सत्यतामगात् ॥ | |||
सत्यत्वं सदनीयत्वमासाद्यं यन्मुमुक्षुभिः । | |||
एवं तद्ब्रह्म यो वेद स हि लोकानिमांजयेत् ॥ | |||
एतल्लोकजयो नाम धर्मज्ञानादिपूर्णता । | |||
जित एव ह्यसौ लोको यदा वेद जनार्दनम् ॥ इति गुणपरमे ॥ | |||
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Revision as of 05:36, 8 April 2026
चतुर्थं ब्राह्मणम्
तद्धैतदेतदेव तदास सत्यमेव स यो हैतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति जयतीमांल्लोकान् जित इन्वसावसद्य एवमेतं महद्यक्षं प्रथमजं वेद सत्यं ब्रह्मेति सत्यं ह्येव ब्रह्म ॥
ततत्वादेकरूपत्वात् तत्परं ब्रह्म कीर्तितम् ।
तदेव तादृशं प्रोक्तं नैवान्यत् तादृशं क्वचित् ॥तदेतत् सत्यमेवासीद्वासुदेवाख्यमव्ययम् ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
तदेव हि तत् । तन्नारायणाख्यं परं ब्रह्मैतदेव सत्यं वासुदेवाख्यमासीदित्यर्थः ॥
स्वस्मात् स्वयं समुत्पन्नो वासुदेवात्मना प्रभुः ।
सत्यं ब्रह्मेति यो वेद महायाज्यं तु तं परम् ॥प्राप्नोत्येव हि तल्लोकांजीवन्नप्युत्तमो भवेत् । इति प्रध्याने ॥
स्वभागहरणाद्दानात् फलानां यापनान्नृणाम् ।
हृदयं भगवान् विष्णुः सत्यं तद्गुणरूपतः ॥ इति सत्तत्त्वे ॥
प्रजापतिरिति ब्रह्मा वेदेषूक्तो ह्यमुख्यतः ।
यस्मिन्नूषुर्ब्रह्मचर्यं देवासुरनरोऽब्जजे ॥
एष वै भगवान् विष्णुर्मुख्यतस्तु प्रजापतिः ।
यज्ज्ञानान्मुक्तिमायान्ति स्वर्गाख्यां हृदयं च सः ॥
हृतिसद्दानयानेभ्यः सत्यं सद्गुणरूपतः ।
यत्तद्धृदयमित्युक्तं ब्रह्म तत्सत्यतामगात् ॥
सत्यत्वं सदनीयत्वमासाद्यं यन्मुमुक्षुभिः ।
एवं तद्ब्रह्म यो वेद स हि लोकानिमांजयेत् ॥
एतल्लोकजयो नाम धर्मज्ञानादिपूर्णता ।
जित एव ह्यसौ लोको यदा वेद जनार्दनम् ॥ इति गुणपरमे ॥परलोको जित एवाभवदित्यर्थः ॥