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Bruhadaranyaka/C2/S5: Difference between revisions

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== मधुब्राह्मणम् ==
== मधुब्राह्मणम् ==
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| verse_line1  = इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १ ॥
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| verse_line1  = अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् वायौ तेजोमयोमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ४ ॥
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| verse_line1  = अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् आदित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ५ ॥
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| verse_line1  = अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ७ ॥
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| verse_line1  = इयं विद्युत् सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ८ ॥
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| verse_line1  = अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिंस्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ९ ॥
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| verse_line1  = अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १० ॥
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| verse_line1  = स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिस्सर्वेषां भूतानां राजा ।
| verse_line2  = तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥
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| verse_line1  = इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।
| verse_line2  = तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वन्नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।
| verse_line3  = दध्यङ् ह यन्मध्वाथर्वणो वामश्वस्य शीर्ष्णा प्र यदीमुवाचेति ॥ १६ ॥
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| verse_line1  = इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।
| verse_line2  = तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।
| verse_line3  = दध्यङ् ह वा मधु प्रवोचदृतायं त्वाष्ट्रं यद्दस्रावपि कक्ष्यं वामिति ॥ १७ ॥
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| verse_line1  = इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।
| verse_line2  = दपुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरस्स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ॥
| verse_line3  = इति स वा अयं पुरुषः सर्वासु पूर्षु पुरि शयो नैनेन किञ्चनानावृतं नैनेन किञ्चनासंवृतम् ॥ १८ ॥
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| verse_line1  = इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।
| verse_line2  = तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।
| verse_line3  = रूपं रूपं प्रतिरूपो बभूव तदस्य रूपं प्रतिचक्षणाय । इन्द्रो मायाभिः पुरुरूप ईयते युक्ता ह्यस्य हरयः शता दश ॥
| verse_line4  = इत्ययं वै हरयोऽयं वै दश च सहस्राणि बहूनि चानन्तानि च तदेतद्ब्रह्मापूर्वमनपरमनन्तरमबाह्यमयमात्मा ब्रह्म सर्वानुभूरित्यनुशासनम् ॥ १९ ॥
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{{AuthorNote| text = ॥  इति मधुब्राह्मणम् ॥}}
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| verse_id = BR_C02_S05_V19
| id      = BR_C02_S05_V19_B01
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
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भगवतो रूपं रूपं प्रति जीवाख्यः प्रतिबिम्बो बभूव । बभूवेति सदेव सोम्येदमग्र आसीदितिवदनादित्वार्थे ।
}}
{{Commentary
| verse_id = BR_C02_S05_V19
| id      = BR_C02_S05_V19_B01
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
सुखदा सर्वभूतानां पृथ्वी मधुवदुच्यते ।
              पृथिव्याश्चैव भूतानि तथा सर्वाश्च देवताः ॥
              पृथिव्यादिषु देवेषु शरीरादिषु च स्थितः ।
              एक एव परो विष्णुर्हयशीर्षस्वरूपधृक् ॥
              अनन्ततेजा नित्यश्च स एव ब्रह्म सर्वगम् ।
              तदेव गुणपूर्णत्वाद् ब्रह्म सर्वमनूनतः ॥
              आत्मनामा परो विष्णुः सर्वगो यः प्रकीर्तितः ।
              स एव हयशीर्षाख्यस्त्वधिदैवादिषु स्थितः ॥
              अराणामाश्रयो यद्वद् बहिरन्तः प्रतिष्ठितौ ।
              नाभिनेमी तथा विष्णुर्जीवानामाश्रयः स्थितः ॥
              स एव दशधा प्रोक्तो विष्णुर्मत्स्यादिरूपकः ।
              शतं नारायणाद्यात्मा विश्वाद्यात्मा सहस्रकः ॥
              परादिरूपो बहुधा सोऽनन्तात्माऽजितादिकः ।
              भूताख्यः सर्वजीवानां विरिञ्चानां च सर्वशः ॥
              आत्मनाम्नां स एवैको राजाधिपतिरेव च ।
              स्वामित्वाद्राजशब्दोऽयमाधिक्यात् पालनात् तथा ॥
              अधिपश्चेति सम्प्रोक्तः पुरुषः पुरुषस्थितेः ।
              पुराख्येष्वेव देहेषु हृत्पुर्यपि वसत्यसौ ॥
              नानेन किञ्चिदव्याप्तं नानेनाच्छादितं न च ।
              नैवास्मात् पूर्वकं किञ्चिन्नैवास्मादपरं तथा ॥
              सर्वस्माद् बाह्यतश्चासौ सर्वस्मादन्तरस्तथा ।
              व्याप्तेरात्मेति सप्रोक्तो ब्रह्मेति गुणपूर्तितः ॥
              स सर्वस्यापरोक्षज्ञ इति वेदानुशासनम् ।
              विरिञ्चस्त्वात्मशब्दोक्तो मानुषं मनुरुच्यते ॥
              सत्यं च स्तनयित्नुश्च वायो रूपान्तरे स्मृते ।
              एत एव स्वरे सत्ये जीवे चाध्यात्मसंस्थिताः ॥
              तेषां नियामको विष्णुस्तत्र तत्रैव संस्थितः ।
              जीवे स्थितस्त्वात्मनामा सौवरः स्वरगः स्मृतः ॥
              सत्यगः सात्यनामासौ धर्मगो धार्म एव च ।
              मनोः स्वायम्भुवस्याख्या मानुषेत्येव देहिषु ॥
              बहिश्च तद्गतो विष्णुर्मानुषेत्येव कीर्त्यते ।
              प्रातिश्रुत्क इति श्रोत्रे तैजसो विद्युति स्थितः ॥
              इति नानाविधैर्नामसमूहैर्विष्णुरिज्यते ।
              दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामेतां विद्यामदात् पुरा ॥
              हयग्रीवब्रह्मविद्येत्येषा ब्रह्मादिभिर्धृता ॥ इति ।
}}
{{Commentary
| verse_id = BR_C02_S05_V19
| id      = BR_C02_S05_V19_B01
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
प्रत्यैरयतं प्रतिसमधत्तम् । ऋतायन् सत्यं कुर्वन् । कक्ष्यं नारायणकवचम् । त्वाष्ट्रं त्वष्टुः पुत्रेण विश्वरूपेणेन्द्रायोक्तम् ।
}}
{{AuthorNote| text = ॥  इति मधुब्राह्मणम् ॥}}




[[Category:Bruhadaranyaka]]
[[Category:Bruhadaranyaka]]

Revision as of 05:36, 8 April 2026

मधुब्राह्मणम्

इयं पृथिवी सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै पृथिव्यै सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां पृथिव्यां तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शारीरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १ ॥


इमा आपः सर्वेषां भूतानां मध्वासामपां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमास्वप्सु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं रेतसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ २ ॥


अयमग्निः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याग्नेः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नग्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं वाङ्मयस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ३ ॥


अयं वायुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य वायोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् वायौ तेजोमयोमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं प्राणस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ४ ॥


अयमादित्यः सर्वेषां भूतानां मध्वस्यादित्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् आदित्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं चाक्षुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ५ ॥


इमा दिशः सर्वेषां भूतानां मध्वासां दिशां सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमासु दिक्षु तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं श्रौत्रः प्रातिश्रुत्कस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ६ ॥


अयं चन्द्रः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य चन्द्रस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ७ ॥


इयं विद्युत् सर्वेषां भूतानां मध्वस्यै विद्युतः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्यां विद्युति तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं तैजसस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ८ ॥


अयं स्तनयित्नुः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य स्तनयित्नोः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिंस्तनयित्नौ तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं शाब्दः सौवरस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ९ ॥


अयमाकाशः सर्वेषां भूतानां मध्वस्याकाशस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नाकाशे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं हृद्याकाशस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १० ॥


अयं धर्मः सर्वेषां भूतानां मध्वस्य धर्मस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् धर्मे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं धार्मस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ ११ ॥


इदं सत्यं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य सत्यस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् सत्ये तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं सात्यस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १२ ॥


इदं मानुषं सर्वेषां भूतानां मध्वस्य मानुषस्य सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन् मानुषे तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं मानुषस्तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १३ ॥


अयं आत्मा सर्वेषां भूतानां मध्वस्यात्मनः सर्वाणि भूतानि मधु यश्चायमस्मिन्नात्मनि तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषो यश्चायमध्यात्मं आत्मा तेजोमयोऽमृतमयः पुरुषोऽयमेव स योऽयमात्मेदममृतमिदं ब्रह्मेदं सर्वम् ॥ १४ ॥


स वा अयमात्मा सर्वेषां भूतानामधिपतिस्सर्वेषां भूतानां राजा ।तद्यथा रथनाभौ च रथनेमौ चाराः सर्वे समर्पिताः एवमेवास्मिन्नात्मनि सर्वाणि भूतानि सर्व एत आत्मानः समर्पिताः ॥ १५ ॥


इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् तद्वन्नरा सनये दंस उग्रमाविष्कृणोमि तन्यतुर्न वृष्टिम् ।


इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् आथर्वणायाश्विना दधीचेऽश्व्यं शिरः प्रत्यैरयतम् ।


इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।दपुरश्चक्रे द्विपदः पुरश्चक्रे चतुष्पदः । पुरस्स पक्षी भूत्वा पुरः पुरुष आविशत् ॥


इदं वैतन्मधु दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामुवाच ।तदेतदृषिः पश्यन्नवोचत् ।


Template:AuthorNote

भगवतो रूपं रूपं प्रति जीवाख्यः प्रतिबिम्बो बभूव । बभूवेति सदेव सोम्येदमग्र आसीदितिवदनादित्वार्थे ।
सुखदा सर्वभूतानां पृथ्वी मधुवदुच्यते ।
             पृथिव्याश्चैव भूतानि तथा सर्वाश्च देवताः ॥
             पृथिव्यादिषु देवेषु शरीरादिषु च स्थितः ।
             एक एव परो विष्णुर्हयशीर्षस्वरूपधृक् ॥
             अनन्ततेजा नित्यश्च स एव ब्रह्म सर्वगम् ।
             तदेव गुणपूर्णत्वाद् ब्रह्म सर्वमनूनतः ॥
             आत्मनामा परो विष्णुः सर्वगो यः प्रकीर्तितः ।
             स एव हयशीर्षाख्यस्त्वधिदैवादिषु स्थितः ॥
             अराणामाश्रयो यद्वद् बहिरन्तः प्रतिष्ठितौ ।
             नाभिनेमी तथा विष्णुर्जीवानामाश्रयः स्थितः ॥
             स एव दशधा प्रोक्तो विष्णुर्मत्स्यादिरूपकः ।
             शतं नारायणाद्यात्मा विश्वाद्यात्मा सहस्रकः ॥
             परादिरूपो बहुधा सोऽनन्तात्माऽजितादिकः ।
             भूताख्यः सर्वजीवानां विरिञ्चानां च सर्वशः ॥
             आत्मनाम्नां स एवैको राजाधिपतिरेव च ।
             स्वामित्वाद्राजशब्दोऽयमाधिक्यात् पालनात् तथा ॥
             अधिपश्चेति सम्प्रोक्तः पुरुषः पुरुषस्थितेः ।
             पुराख्येष्वेव देहेषु हृत्पुर्यपि वसत्यसौ ॥
             नानेन किञ्चिदव्याप्तं नानेनाच्छादितं न च ।
             नैवास्मात् पूर्वकं किञ्चिन्नैवास्मादपरं तथा ॥
             सर्वस्माद् बाह्यतश्चासौ सर्वस्मादन्तरस्तथा ।
             व्याप्तेरात्मेति सप्रोक्तो ब्रह्मेति गुणपूर्तितः ॥
             स सर्वस्यापरोक्षज्ञ इति वेदानुशासनम् ।
             विरिञ्चस्त्वात्मशब्दोक्तो मानुषं मनुरुच्यते ॥
             सत्यं च स्तनयित्नुश्च वायो रूपान्तरे स्मृते ।
             एत एव स्वरे सत्ये जीवे चाध्यात्मसंस्थिताः ॥
             तेषां नियामको विष्णुस्तत्र तत्रैव संस्थितः ।
             जीवे स्थितस्त्वात्मनामा सौवरः स्वरगः स्मृतः ॥
             सत्यगः सात्यनामासौ धर्मगो धार्म एव च ।
             मनोः स्वायम्भुवस्याख्या मानुषेत्येव देहिषु ॥
             बहिश्च तद्गतो विष्णुर्मानुषेत्येव कीर्त्यते ।
             प्रातिश्रुत्क इति श्रोत्रे तैजसो विद्युति स्थितः ॥
             इति नानाविधैर्नामसमूहैर्विष्णुरिज्यते ।
             दध्यङ्ग्ङाथर्वणोऽश्विभ्यामेतां विद्यामदात् पुरा ॥
हयग्रीवब्रह्मविद्येत्येषा ब्रह्मादिभिर्धृता ॥ इति ।
प्रत्यैरयतं प्रतिसमधत्तम् । ऋतायन् सत्यं कुर्वन् । कक्ष्यं नारायणकवचम् । त्वाष्ट्रं त्वष्टुः पुत्रेण विश्वरूपेणेन्द्रायोक्तम् ।

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