Bruhadaranyaka/C2/S4: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== मैत्रेयीब्राह्मणम् == | == मैत्रेयीब्राह्मणम् == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V01 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V02 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V03 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V04 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V05 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति । | |||
| verse_line2 = न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति । | |||
| verse_line3 = न वा अरे पुत्राणां कामाय पुत्राः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय पुत्राः प्रिया भवन्ति । | |||
| verse_line4 = न वा अरे वित्तस्य कामाय वित्तं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय वित्तं प्रियं भवति । | |||
| verse_line5 = न वा अरे ब्रह्मणः कामाय ब्रह्म प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय ब्रह्म प्रियं भवति । | |||
| verse_line6 = न वा ओ अरेक्षत्रस्य कामाय क्षत्रं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय क्षत्रं प्रियं भवति । | |||
| verse_line7 = न वा अरे लोकानां कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति, आत्मनस्तु कामाय लोकाः प्रिया भवन्ति । | |||
| verse_line8 = न वा अरे देवानां कामाय देवाः प्रिया भवन्त्यात्मनस्तु कामाय देवाः प्रियाः भवन्ति । | |||
| verse_line9 = न वा अरे भूतानां कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्त्यात्मनस्तु कामाय भूतानि प्रियाणि भवन्ति । | |||
| verse_line10 = न वा अरे सर्वस्य कामाय सर्वं प्रियं भवत्यात्मनस्तु कामाय सर्वं प्रियं भवति । | |||
| verse_line11 = आत्मा वा अरे द्रष्टव्यः श्रोतव्यो मन्तव्यो निदिध्यासितव्यो मैत्रेय्यात्मनो वा अरे दर्शनेन श्रवणेन मत्या विज्ञानेनेदं सर्वं विदितम् ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V05 | |||
| id = BR_C02_S04_V05_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
आत्मा नारायणः । तस्यैव हि कामेन पत्यादिः प्रियो भवति । न हि पत्यादीनां जायादीनामहं प्रियः स्यामिति कामनामात्रेण प्रियत्वं भवति । भगवदिच्छ्यैव हि तद्भवति । अन्यथा जायार्थे पत्यर्थे इत्येव स्यात् । प्राधान्यादिदं सर्वं विदितम् । सर्वकारणत्वाच्च सर्वप्राधान्यं भगवतः । प्राधान्याप्राधान्ययोरपि स एव हि हेतुः । | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V06 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः । | |||
| verse_line2 = योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । भूतानि तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V06 | |||
| id = BR_C02_S04_V06_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद भगवदधीनत्वेन न वेद, । तदनाश्रितत्वेन स्थानान्तरे च वेद । परादात् परतो लोकालोकस्यान्धे तमसि । इदं ब्रह्मादिकम् । यदयमात्मा । यत्रायमात्मा । अन्यत्र परिज्ञाने दोषोक्तेस्तत्र परिज्ञानं ह्युक्तं भवति । अन्यथा अन्यदात्मनो ब्रह्म वेदेति स्यात् । यदित्यव्ययत्वाद् यत्रेत्यपि भवति । यथा यस्मादित्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति च सूत्रम् । | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V07 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V08 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V09 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V09 | |||
| id = BR_C02_S04_V09_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
दुन्दुभ्याघातादिदृष्टान्तोऽपि तदधीनत्वं तत्कारणत्वं च ज्ञापयति । न हि दुन्दुभ्यादिरेव तच्छब्दः । न च तदुपादानम् । स्थानान्तरे तदुपलम्भात् । न ह्युपादानादुपादेयं स्थानान्तरे भवति । शब्दो हि स्थानान्तरे गत्वा प्रतिश्रुतित्वमप्युपैति । भगवदिच्छाया दृष्टान्तो दुन्दुभ्यादिः । न हि दुन्दुभिं पश्यन् पुरुषो दुन्दुभ्याघाते मुरजशब्दोऽयमिति गृह्णाति । एवं भगवन्तं जानन्नन्याधीनं जगदिति गृह्णाति । किन्तु भगवदिच्छाधीनमित्येव । | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V10 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V11 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V11 | |||
| id = BR_C02_S04_V11_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
तदेव दर्शयति स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेः स यथा सर्वासामपामित्यादिना ॥ न ह्यग्निरेव धूमः । न चाप एव समुद्रः । न ह्यपामाप एवाश्रयः । किन्तु वरुणोऽपां खातो वा । स एव च समुद्र इत्युच्यते । | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V12 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V12 | |||
| id = BR_C02_S04_V12_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
एवमेव सैन्धवखिल्यस्य विलीनस्य समस्ताम्भसश्च वरुणोऽपां खातो वा समुद्राख्य आश्रयः । वरुणवदपां खातवद्वाऽनन्तोऽपारो भगवान् जीव एव विज्ञानघनाख्यो भूतसम्बन्धाज्जातः संस्तल्लयमनु भगवन्तमाप्नोति । समुद्रे प्रास्तसैन्धवखिल्यवत् । समुद्रजलस्थानीया मुक्ताः बहव एकस्वभावाः । बहवो हि जलपरमाणवः । सामुद्रजलमेकाश्रयम् । | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V13 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीति | |||
| verse_line2 = स होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V14 | |||
| document_id = BR | |||
| chapter_id = BR_C02 | |||
| section_id = BR_C02_S04 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = यत्र हि द्वैतमिव भवति । | |||
| verse_line2 = तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति । | |||
| verse_line3 = तदितर इतरं शृणोति । | |||
| verse_line4 = तदितर इतरमभिवदति । | |||
| verse_line5 = तदितर इतरं मनुते । | |||
| verse_line6 = तदितर इतरं विजानाति । | |||
| verse_line7 = यत्र वा अस्य सर्वमात्मैवाभूत् तत्केन कं जिघ्रेत्। | |||
| verse_line8 = केन कं पश्येत् केन कं शृणुयात् । | |||
| verse_line9 = तत् केन कमभिवदेत् तत् केन कं मन्वीत । | |||
| verse_line10 = तत् केन कं विजानीयाद्येनेदं सर्वं विजानाति । | |||
| verse_line11 = तं केन विजानीयाद् विज्ञातारमरे केन विजानीयादिति ॥ १४ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति मैत्रेयीब्राह्मणम् ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V14 | |||
| id = BR_C02_S04_V14_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
मुक्तानां सञ्ज्ञाप्यन्यैर्न ज्ञायते शास्त्रं विना । सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्त्वा अलं वा ओ इदं विज्ञानायेत्युक्तेर्न विजानातीत्युक्ते प्रतिज्ञाविरोधः । न च सर्वाज्ञानं पुरुषार्थः । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V14 | |||
| id = BR_C02_S04_V14_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ॥ इति च । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V14 | |||
| id = BR_C02_S04_V14_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
नानात्वेनाभिसम्बन्धास्तदा तत्कालभाविना । | |||
संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ॥ | |||
प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते । | |||
आनन्देन विना चैव भोगेन विषयेण च ॥ | |||
सर्वे ते ब्रह्मणस्तुल्या आधिपत्येन चैव हि ॥ इति वायुप्रोक्ते । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V14 | |||
| id = BR_C02_S04_V14_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
इवशब्दस्त्वस्वातन्त्र्यार्थे । न हि तदधीनं पृथगित्येवोच्यते । तस्मादमुक्तैर्न ज्ञायते इति सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्तम् । | |||
पतिर्जाया प्रिया नैव स्वेच्छया तु भविष्यति । | |||
विष्णोरिच्छाबलेनैव स्वयं च स्वप्रियो भवेत् ॥ | |||
विष्णोरिच्छावशेनैव हन्ति ह्यात्मानमात्मना । | |||
स्वात्मानमप्रियं कृत्वा निरये पातयत्यपि ॥ | |||
प्राधान्येन हरेर्ज्ञानात् सर्वं विदितवद्भवेत् । | |||
ब्रह्मजात्यात्मकं वेत्ति नैव विष्णुवशं हि यः ॥ | |||
ब्रह्माणं तं ततो ब्रह्मा पातयेत् तमसि ध्रुवम् । | |||
एवं क्षत्रात्मको वायुर्वित्तरूपश्च वित्तपः ॥ | |||
पञ्चभूतानि विश्वे च देवा लोकाभिमानिनः । | |||
सर्वाभिमानिनो देवी मूलप्रकृतिरेव च ॥ | |||
सर्वं विष्णौ स्थितं विष्णोर्जातं विष्णोर्वशे सदा । | |||
शङ्खशब्दो यथा शङ्खदेवतावशगः स्थितः ॥ | |||
तस्माद्वेदाः समुत्पन्ना विद्याख्या मूलिका श्रुतिः । | |||
सर्वोपनिषदश्चैव पञ्चरात्राख्यसंहिताः ॥ | |||
ब्रह्मसूत्राणि वेदानां व्याख्यास्तासां च विस्तरः । | |||
सर्वमेतज्जगच्चैव निःसृतं तुरगाननात् ॥ | |||
वरुणस्य वशे यद्वदाप एवं वशे हरेः । | |||
सर्वे बद्धाश्च मुक्ताश्च तारतम्यात्मना स्थिताः ॥ | |||
यदि मुक्तस्य विज्ञानं गन्धादिविषये न चेत् । | |||
तथैव भगवद्रूपे स्वरूपे च परस्परम् ॥ | |||
एवमज्ञानरूपां तां मुक्तिं को नाम वाञ्छति । | |||
तस्माद्विष्णोर्वशे सर्वे यथेष्टमुपभोगिनः ॥ | |||
मुक्ताः सदा तारतम्यात् तिष्ठन्त्याब्रह्मणोऽखिलाः ॥ इति हयग्रीवसंहितायाम् । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BR_C02_S04_V14 | |||
| id = BR_C02_S04_V14_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
सर्गे सर्गे तु यो नैव शब्दतोऽप्यन्यथा भवेत् । | |||
श्रुत्याख्यः स तु विज्ञेय इतिहासादिरर्थतः ॥ | |||
भगवद्दृष्टमेवान्यैर्ब्रह्माद्यैर्दृश्यते यदि । | |||
ऋषिभेदस्तु तत्र स्याद्वेदो नाविष्णुनिर्गतः ॥ | |||
वेद इत्येव विष्णूक्तस्तपसा दृश्यते परैः ॥ इति च ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bruhadaranyaka]] | [[Category:Bruhadaranyaka]] | ||
Revision as of 05:36, 8 April 2026
मैत्रेयीब्राह्मणम्
मैत्रेयीति होवाच याज्ञवल्क्यः । उद्यास्यन् वा ओऽहमस्मात् स्थानादस्मि हन्त तेऽनया कात्यायन्याऽन्तं करवाणीति ॥ १ ॥
सा होवाच मैत्रेयी । यन्नु म इयं भगोः सर्वा पृथिवी वित्तेन पूर्णा स्यात् कथं तेनामृता स्यामिति । नेति होवाच । याज्ञवल्क्यो यथैवोपकरणवतां जीवितं तथैव ते जीवितं स्याद् , अमृतत्वस्य नाशाऽस्ति वित्तेनेति ॥ २ ॥
सा होवाच । मैत्रेयी येनाहं नामृता स्यां किमहं तेन कुर्यां, यदेव भगवान् वेद तदेव मे ब्रूहीति ॥ ३ ॥
स होवाच याज्ञवल्क्यः । प्रिया बतारे नः सती प्रियं भाषस एह्यास्व व्याख्यास्यामि । ते व्याचक्षाणस्य तु मे निदिध्यासस्वेति ॥ ४ ॥
स होवाच न वा अरे पत्युः कामाय पतिः प्रियो भवत्यात्मनस्तु कामाय पतिः प्रियो भवति ।न वा अरे जायायै कामाय जाया प्रिया भवत्यात्मनस्तु कामाय जाया प्रिया भवति ।
आत्मा नारायणः । तस्यैव हि कामेन पत्यादिः प्रियो भवति । न हि पत्यादीनां जायादीनामहं प्रियः स्यामिति कामनामात्रेण प्रियत्वं भवति । भगवदिच्छ्यैव हि तद्भवति । अन्यथा जायार्थे पत्यर्थे इत्येव स्यात् । प्राधान्यादिदं सर्वं विदितम् । सर्वकारणत्वाच्च सर्वप्राधान्यं भगवतः । प्राधान्याप्राधान्ययोरपि स एव हि हेतुः ।
ब्रह्म तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद क्षत्रं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो क्षत्रं वेद लोकास्तं परादुर् योऽन्यत्रात्मनो लोकान् वेद देवाः तं परादुः ।योऽन्यत्रात्मनो देवान् वेद । भूतानि तं परादुः योऽन्यत्रात्मनो भूतानि वेद सर्वं तं परादाद् योऽन्यत्रात्मनो सर्वं वेद इदं ब्रह्म इदं क्षत्रमिमे लोका इमे देवा इमानि भूतानि इदं सर्वं यदयमात्मा ॥ ६ ॥
अन्यत्रात्मनो ब्रह्म वेद भगवदधीनत्वेन न वेद, । तदनाश्रितत्वेन स्थानान्तरे च वेद । परादात् परतो लोकालोकस्यान्धे तमसि । इदं ब्रह्मादिकम् । यदयमात्मा । यत्रायमात्मा । अन्यत्र परिज्ञाने दोषोक्तेस्तत्र परिज्ञानं ह्युक्तं भवति । अन्यथा अन्यदात्मनो ब्रह्म वेदेति स्यात् । यदित्यव्ययत्वाद् यत्रेत्यपि भवति । यथा यस्मादित्यर्थे । सप्तसु प्रथमा इति च सूत्रम् ।
स यथा दुन्दुभेर्हन्यमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय दुन्दुभेस्तु ग्रहणेन दुन्दुभ्याघातस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ७ ॥
स यथा शङ्खस्य ध्मायमानस्य न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय शङ्खस्य तु ग्रहणेन शङ्खध्मस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ८ ॥
स यथा वीणायै वाद्यमानायै न बाह्याञ्च्छब्दाञ्च्छक्नुयाद् ग्रहणाय वीणायै तु ग्रहणेन वीणावादस्य वा शब्दो गृहीतः ॥ ९ ॥
दुन्दुभ्याघातादिदृष्टान्तोऽपि तदधीनत्वं तत्कारणत्वं च ज्ञापयति । न हि दुन्दुभ्यादिरेव तच्छब्दः । न च तदुपादानम् । स्थानान्तरे तदुपलम्भात् । न ह्युपादानादुपादेयं स्थानान्तरे भवति । शब्दो हि स्थानान्तरे गत्वा प्रतिश्रुतित्वमप्युपैति । भगवदिच्छाया दृष्टान्तो दुन्दुभ्यादिः । न हि दुन्दुभिं पश्यन् पुरुषो दुन्दुभ्याघाते मुरजशब्दोऽयमिति गृह्णाति । एवं भगवन्तं जानन्नन्याधीनं जगदिति गृह्णाति । किन्तु भगवदिच्छाधीनमित्येव ।
स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेरभ्याहितात् पृथग्धूमा विनिश्चरन्त्येवं वा ओऽस्य महतो भूतस्य निःश्वसितमेदद्यदृग्वेदो यजुर्वेदः सामवेदोऽथर्वाङ्गिरस इतिहासः पुराणं विद्या उपनिषदः श्लोकाः सूत्राण्यनुव्याख्यानानि व्याख्यानान्यस्यैवैतानि निःश्वसितानि ॥ १० ॥
स यथा सर्वासामपां समुद्र एकायतनमेवं सर्वेषां स्पर्शानां त्वगेकायनमेवं सर्वेषां रसानां जिह्वैकायनमेवं सर्वेषां गन्धानां नासिकैकायनमेवं सर्वेषां रूपाणां चक्षुरेकायनमेवं सर्वेषां शब्दानां श्रोत्रमेकायनमेवं सर्वेषां सङ्कल्पानां मन एकायनमेवं सर्वासां विद्यानां हृदयमेकायनमेवं सर्वेषां कर्मणां हस्तावेकायनमेवं सर्वेषामानन्दानामुपस्थ एकायनमेवं सर्वेषां विसर्गाणां पायुरेकायनमेवं सर्वेषामध्वानां पादावेकायनमेवं सर्वेषां वेदानां वागेकायनमेवम् ॥ ११ ॥
तदेव दर्शयति स यथाऽऽर्द्रैधाग्नेः स यथा सर्वासामपामित्यादिना ॥ न ह्यग्निरेव धूमः । न चाप एव समुद्रः । न ह्यपामाप एवाश्रयः । किन्तु वरुणोऽपां खातो वा । स एव च समुद्र इत्युच्यते ।
स यथा सैन्धवखिल्य उदके प्रास्त उदकमेवानुविलीयेत न हास्योद्ग्रहणायैव स्याद्यतो यतस्त्वाददीत लवणमेवैवं वा ओ इदं महद्भूतमनन्तमपारं विज्ञानघन एवैतेभ्यो भूतेभ्यः समुत्थाय तान्येवानुविनश्यति न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीत्यरे ब्रवीमीति होवाच याज्ञवल्क्यः ॥ १२ ॥
एवमेव सैन्धवखिल्यस्य विलीनस्य समस्ताम्भसश्च वरुणोऽपां खातो वा समुद्राख्य आश्रयः । वरुणवदपां खातवद्वाऽनन्तोऽपारो भगवान् जीव एव विज्ञानघनाख्यो भूतसम्बन्धाज्जातः संस्तल्लयमनु भगवन्तमाप्नोति । समुद्रे प्रास्तसैन्धवखिल्यवत् । समुद्रजलस्थानीया मुक्ताः बहव एकस्वभावाः । बहवो हि जलपरमाणवः । सामुद्रजलमेकाश्रयम् ।
सा होवाच मैत्रेय्यत्रैव मा भगवानमूमुहन्न प्रेत्य सञ्ज्ञास्तीतिस होवाच न वा ओ अहं मोहं ब्रवीम्यलं वा अर इदं विज्ञानाय ॥ १३ ॥
यत्र हि द्वैतमिव भवति ।तदितर इतरं जिघ्रति तदितर इतरं पश्यति ।
मुक्तानां सञ्ज्ञाप्यन्यैर्न ज्ञायते शास्त्रं विना । सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्त्वा अलं वा ओ इदं विज्ञानायेत्युक्तेर्न विजानातीत्युक्ते प्रतिज्ञाविरोधः । न च सर्वाज्ञानं पुरुषार्थः ।
मग्नस्य हि परेज्ञाने किं न दुःखतरं भवेत् ॥ इति च ।
नानात्वेनाभिसम्बन्धास्तदा तत्कालभाविना ।
संयोगः प्रकृतेर्नैषां मुक्तानां तत्त्वदर्शनात् ॥
प्रवर्तति पुनः सर्गे तेषां सा न प्रवर्तते ।
आनन्देन विना चैव भोगेन विषयेण च ॥
सर्वे ते ब्रह्मणस्तुल्या आधिपत्येन चैव हि ॥ इति वायुप्रोक्ते ।इवशब्दस्त्वस्वातन्त्र्यार्थे । न हि तदधीनं पृथगित्येवोच्यते । तस्मादमुक्तैर्न ज्ञायते इति सञ्ज्ञा नास्तीत्युक्तम् ।
पतिर्जाया प्रिया नैव स्वेच्छया तु भविष्यति ।
विष्णोरिच्छाबलेनैव स्वयं च स्वप्रियो भवेत् ॥
विष्णोरिच्छावशेनैव हन्ति ह्यात्मानमात्मना ।
स्वात्मानमप्रियं कृत्वा निरये पातयत्यपि ॥
प्राधान्येन हरेर्ज्ञानात् सर्वं विदितवद्भवेत् ।
ब्रह्मजात्यात्मकं वेत्ति नैव विष्णुवशं हि यः ॥
ब्रह्माणं तं ततो ब्रह्मा पातयेत् तमसि ध्रुवम् ।
एवं क्षत्रात्मको वायुर्वित्तरूपश्च वित्तपः ॥
पञ्चभूतानि विश्वे च देवा लोकाभिमानिनः ।
सर्वाभिमानिनो देवी मूलप्रकृतिरेव च ॥
सर्वं विष्णौ स्थितं विष्णोर्जातं विष्णोर्वशे सदा ।
शङ्खशब्दो यथा शङ्खदेवतावशगः स्थितः ॥
तस्माद्वेदाः समुत्पन्ना विद्याख्या मूलिका श्रुतिः ।
सर्वोपनिषदश्चैव पञ्चरात्राख्यसंहिताः ॥
ब्रह्मसूत्राणि वेदानां व्याख्यास्तासां च विस्तरः ।
सर्वमेतज्जगच्चैव निःसृतं तुरगाननात् ॥
वरुणस्य वशे यद्वदाप एवं वशे हरेः ।
सर्वे बद्धाश्च मुक्ताश्च तारतम्यात्मना स्थिताः ॥
यदि मुक्तस्य विज्ञानं गन्धादिविषये न चेत् ।
तथैव भगवद्रूपे स्वरूपे च परस्परम् ॥
एवमज्ञानरूपां तां मुक्तिं को नाम वाञ्छति ।
तस्माद्विष्णोर्वशे सर्वे यथेष्टमुपभोगिनः ॥
मुक्ताः सदा तारतम्यात् तिष्ठन्त्याब्रह्मणोऽखिलाः ॥ इति हयग्रीवसंहितायाम् ।सर्गे सर्गे तु यो नैव शब्दतोऽप्यन्यथा भवेत् ।
श्रुत्याख्यः स तु विज्ञेय इतिहासादिरर्थतः ॥
भगवद्दृष्टमेवान्यैर्ब्रह्माद्यैर्दृश्यते यदि ।
ऋषिभेदस्तु तत्र स्याद्वेदो नाविष्णुनिर्गतः ॥
वेद इत्येव विष्णूक्तस्तपसा दृश्यते परैः ॥ इति च ॥