Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S25: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== पञ्चविंशोऽध्यायः == | == पञ्चविंशोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V04 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| section_id = BTN_C10_S25 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V04 | |||
| id = BTN_C10_S25_V04_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
विशुद्धसत्वं विगतशुद्धसत्वम् । यस्मात्त्रिगुणसम्बन्धस्त्वयि न विद्यते । यत्राग्रहणमनुबद्धम् । तपोमयं ज्ञानात्मकम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V05 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| section_id = BTN_C10_S25 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः । | |||
| verse_line2 = अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V05 | |||
| id = BTN_C10_S25_V05_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
पुनर्गुणसंप्रवाहस्य कारणत्वात्तद्धेतवः ॥ ५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V06 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| section_id = BTN_C10_S25 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशो | |||
| verse_line2 = दुरत्ययः काल उपात्तदण्डः । | |||
| verse_line3 = हिताय चेच्छातनुभिः समीहसे | |||
| verse_line4 = मानं विधुन्वन् जगदीशमानिनाम् ॥ ६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V07 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| section_id = BTN_C10_S25 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V07 | |||
| id = BTN_C10_S25_V07_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'असतां च सतां चैव हरिरेवानुशासकः ।सतां तु श्रेयसे सैव ह्यनुशास्तिर्भविष्यति ॥असतां विपरीताय लङ्घयित्वाऽनुशासनम्''॥ इत्याग्नेये ॥ ६-७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V11 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C10 | |||
| section_id = BTN_C10_S25 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये । | |||
| verse_line2 = सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे पञ्चविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C10_S25_V11 | |||
| id = BTN_C10_S25_V11_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'आवेशो वसुदेवादौ देहादानं हरेः स्मृतम् ।देहादानं तदन्येषां जन्मेति कवयो विदुः ।तथाप्यसुरमोहाय ग्रन्थेषु बहुधैव तु''॥ इति पाद्मे ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:35, 8 April 2026
पञ्चविंशोऽध्यायः
इन्द्र उवाच– विशुद्धसत्त्वं तव धाम शान्तं तपोमयं ध्वस्तरजस्तमस्कम् । मायामयोऽयं गुणसम्प्रवाहो न विद्यते तेऽग्रहणानुबन्धः ॥ ४ ॥
विशुद्धसत्वं विगतशुद्धसत्वम् । यस्मात्त्रिगुणसम्बन्धस्त्वयि न विद्यते । यत्राग्रहणमनुबद्धम् । तपोमयं ज्ञानात्मकम् ॥ ४ ॥
कुतो नु तद्धेतव ईश मन्युलोभादयो येऽबुधलिङ्गभावाः ।अथापि दण्डं भगवान् बिभर्ति धर्मस्य गुप्त्यै खलनिग्रहाय ॥ ५ ॥
पुनर्गुणसंप्रवाहस्य कारणत्वात्तद्धेतवः ॥ ५ ॥
पिता गुरुस्त्वं जगतामधीशोदुरत्ययः काल उपात्तदण्डः ।
येऽस्मद्विधाः स्युर्जगदीशमानिन- स्त्वां वीक्ष्य कालेऽभयमाशु तं मदम् । हित्वाऽऽर्यमार्गं प्रभजन्त्यपस्मया- ईहा खलानामपि तेऽनुशासनम् ॥ ७ ॥
'असतां च सतां चैव हरिरेवानुशासकः ।सतां तु श्रेयसे सैव ह्यनुशास्तिर्भविष्यति ॥असतां विपरीताय लङ्घयित्वाऽनुशासनम्॥ इत्याग्नेये ॥ ६-७ ॥
स्वच्छन्दोपात्तदेहाय विशुद्धज्ञानमूर्तये ।सर्वस्मै सर्वबीजाय सर्वभूतात्मने नमः ॥ ११ ॥
'आवेशो वसुदेवादौ देहादानं हरेः स्मृतम् ।देहादानं तदन्येषां जन्मेति कवयो विदुः ।तथाप्यसुरमोहाय ग्रन्थेषु बहुधैव तु॥ इति पाद्मे ॥ ११ ॥