Bhagavatatatparyanirnaya/C10/S14: Difference between revisions
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== चतुर्दशोऽध्यायः == | == चतुर्दशोऽध्यायः == | ||
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'दण्डोऽपि भगवच्चीर्णो ममैषोऽनुग्रहः स्मृतः ।इति भक्त्या चिन्तयतां शुभकारी भवत्यलम् ।तत्रापि कुर्वतां द्वेषं तमः प्राप्त्यै तथा भवेत्''॥ इति च ॥ ३४ ॥ | |||
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'अपुनर्भवमात्रात्तु हरिसामीप्यमुत्तमम् ।तत्रापि स्पर्शयोग्यत्वं यथा वेदविदो विदुः''॥ इति पाद्मे ॥ ३७ ॥ | |||
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भूताय सर्वदा विद्यमानाय ॥ ३९ ॥ | |||
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कालनाभाय कालाश्रयाय ।'विश्वस्य तदधीनत्वाद्विश्वं विष्णुरुदीर्यते ।मूलहेतुत्वतो हेतुः कर्ता प्रातिस्विकं कृतेः''॥ इत्याग्नेये ॥ ४१ ॥ | |||
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गुणप्रदीपाय गुणज्ञापकाय । गुणात्मस्थोदयाय गुणात्मिका प्रकृतिः तस्यां स्थित उदयस्वरूपो हरिः ॥ ४६ ॥ | |||
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अविश्वाय जीवेभ्योऽन्यस्मै ।'शरीरेषु प्रविष्टत्वाद्विश्वो जीव उदीर्यते ।जीवस्य तदधीनत्वाद्विश्वो विष्णुरिति स्मृतः ।तस्योत्पत्त्यादिहेतुत्वाद्विश्वहेतुश्च कीर्त्यते''॥ इति मात्स्ये ॥ ४८ ॥ | |||
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'हरेः स्वरूपशक्तिर्या कालशक्तिरुदीर्यते ।सदा सर्वगुणात्मत्वाद्दुर्गा वाप्यवरा ततः ॥सर्वसंहारकारित्वाद्वायुः सर्वस्य जीवनात् ।कालाभिमानिनावेतौ दुर्गा वायुश्च कीर्तितातौ''॥ इति प्रकाशंहितायाम् ॥ ४९ ॥ | |||
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| verse_line3 = शान्ताः प्रियास्ते ह्यधुनाऽवितुः सतां | |||
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'अन्तःप्रियं बहिश्चेति द्विधा प्रियमुदाहृतम् ।अन्तःप्रिया हरेः सन्तः सर्वं चापि बहिः प्रियम् ॥असन्तश्चापि संहार ईषदन्तःप्रिया इव ।तदपेक्षया तथा सन्तो विशेषान्तःप्रिया स्थिता''॥ इति षाड्गुण्ये ।'सुखान्तं प्राप्नुयुर्यस्माद्देवाः शान्ता उदाहृताः ।अशान्ता मानुषाः प्रोक्ता विमूढा आसुरा मताः ॥"इति प्रकाशसंहितायाम् ।कर्मपरीप्सया कर्मप्रवर्तनार्थम् । सर्वशरीरेषु स्थातुः । ईहतः प्राणस्य सकाशात् । प्राणसकाशाद्धि कर्म प्रवर्तनमिच्छति भगवान् ।'वायोः सकाशाज्जगतः प्रवृत्तिं कारयत्यजः ।प्राणप्राणमतः प्राहुर्विष्णुं वायोरपि प्रभुम्''॥ इति च ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् । | |||
| verse_line2 = नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये दशमस्कन्धे चतुर्दशोऽध्यायः ॥}} | |||
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धातुर्गुणविसर्जनम् । हिरण्यगर्भसकाशाद्गुणभूता सृष्टिरस्य जगतः । प्राधान्येन विष्णोरेव ।'विष्णुः प्रधानतः स्रष्टा गुणस्रष्टा चतुर्मुखः''। इति नारदीये ॥५७॥ | |||
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Revision as of 05:35, 8 April 2026
चतुर्दशोऽध्यायः
अनुग्रहोऽयं भवता कृतो हि नोदण्डोऽसतां ते खलु कल्मषापहः ।
'दण्डोऽपि भगवच्चीर्णो ममैषोऽनुग्रहः स्मृतः ।इति भक्त्या चिन्तयतां शुभकारी भवत्यलम् ।तत्रापि कुर्वतां द्वेषं तमः प्राप्त्यै तथा भवेत्॥ इति च ॥ ३४ ॥
न नाकपृष्ठं न च पारमेष्ठ्यंन सार्वभौमं न रसाधिपत्यम् ।
'अपुनर्भवमात्रात्तु हरिसामीप्यमुत्तमम् ।तत्रापि स्पर्शयोग्यत्वं यथा वेदविदो विदुः॥ इति पाद्मे ॥ ३७ ॥
नमस्तुभ्यं भगवते पुरुषाय महात्मने ।भूतावासाय भूताय पराय परमात्मने ॥ ३९ ॥
भूताय सर्वदा विद्यमानाय ॥ ३९ ॥
ज्ञानविज्ञाननिधये ब्रह्मणेऽनन्तशक्तये ।अगुणायाविकाराय नमस्तेऽप्राकृताय च ॥ ४० ॥
अप्राकृताय ॥ ४० ॥
कालाय कालनाभाय कालावयवसाक्षिणे ।विश्वाय तदुपद्रष्टे्रे तत्कर्त्रे विश्वहेतवे ॥ ४१ ॥
कालनाभाय कालाश्रयाय ।'विश्वस्य तदधीनत्वाद्विश्वं विष्णुरुदीर्यते ।मूलहेतुत्वतो हेतुः कर्ता प्रातिस्विकं कृतेः॥ इत्याग्नेये ॥ ४१ ॥
नमो गुणप्रदीपाय गुणात्मस्थोदयाय च ।गुणप्रत्युपलक्ष्याय गुणद्रष्टे्र स्वसंविदे ॥ ४६ ॥
गुणप्रदीपाय गुणज्ञापकाय । गुणात्मस्थोदयाय गुणात्मिका प्रकृतिः तस्यां स्थित उदयस्वरूपो हरिः ॥ ४६ ॥
परावरगतिज्ञाय सर्वाध्यक्षाय ते नमः ।अविश्वाय च विश्वाय तद्द्रष्ट्रे विश्वहेतवे ॥ ४८ ॥
अविश्वाय जीवेभ्योऽन्यस्मै ।'शरीरेषु प्रविष्टत्वाद्विश्वो जीव उदीर्यते ।जीवस्य तदधीनत्वाद्विश्वो विष्णुरिति स्मृतः ।तस्योत्पत्त्यादिहेतुत्वाद्विश्वहेतुश्च कीर्त्यते॥ इति मात्स्ये ॥ ४८ ॥
त्वं ह्यस्य जन्मस्थितिसंयमान् विभोगुणैरनीहोऽकृतकालशक्तिधृक् ।
'हरेः स्वरूपशक्तिर्या कालशक्तिरुदीर्यते ।सदा सर्वगुणात्मत्वाद्दुर्गा वाप्यवरा ततः ॥सर्वसंहारकारित्वाद्वायुः सर्वस्य जीवनात् ।कालाभिमानिनावेतौ दुर्गा वायुश्च कीर्तितातौ॥ इति प्रकाशंहितायाम् ॥ ४९ ॥
तस्यैव तेऽमूस्तनवस्त्रिलोक्यांशान्ता अशान्ता उत मूढयोनयः ।
'अन्तःप्रियं बहिश्चेति द्विधा प्रियमुदाहृतम् ।अन्तःप्रिया हरेः सन्तः सर्वं चापि बहिः प्रियम् ॥असन्तश्चापि संहार ईषदन्तःप्रिया इव ।तदपेक्षया तथा सन्तो विशेषान्तःप्रिया स्थिता॥ इति षाड्गुण्ये ।'सुखान्तं प्राप्नुयुर्यस्माद्देवाः शान्ता उदाहृताः ।अशान्ता मानुषाः प्रोक्ता विमूढा आसुरा मताः ॥"इति प्रकाशसंहितायाम् ।कर्मपरीप्सया कर्मप्रवर्तनार्थम् । सर्वशरीरेषु स्थातुः । ईहतः प्राणस्य सकाशात् । प्राणसकाशाद्धि कर्म प्रवर्तनमिच्छति भगवान् ।'वायोः सकाशाज्जगतः प्रवृत्तिं कारयत्यजः ।प्राणप्राणमतः प्राहुर्विष्णुं वायोरपि प्रभुम्॥ इति च ॥ ५० ॥
त्वया सृष्टमिदं विश्वं धातुर्गुणविसर्जनम् ।नानास्वभाववीर्यौजोयोनिबीजाशयाकृति ॥ ५७ ॥
धातुर्गुणविसर्जनम् । हिरण्यगर्भसकाशाद्गुणभूता सृष्टिरस्य जगतः । प्राधान्येन विष्णोरेव ।'विष्णुः प्रधानतः स्रष्टा गुणस्रष्टा चतुर्मुखः। इति नारदीये ॥५७॥