Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S10: Difference between revisions
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'मधुकैटभौ भक्त्यभावादूरौ भगवतो मृतौ ।तम एव क्रमादाप्तौ भक्त्या चैद्यो हरिं ययौ''॥ २३ ॥ | |||
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'यथा हिरण्यकस्यादादन्तःस्थितहरीरितः ।तथा नादात्तदन्यस्य ब्रह्मा दैत्यस्य कस्यचित्''॥ इति च ॥ ३१ ॥ | |||
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'पौण्ड्रके नरके चैव साल्वे कंसे च रुग्मिणि ।आविष्टास्तु हरेर्भक्तास्तद्भक्त्या हरिमीयिरे ।असुरास्तु स्वयं ते तु महातमसि पातिताः''॥ इति च ।तदात्मानस्तत्राविष्टास्तद्भक्ताः । वैरोपसर्जनेनानुबन्धेनेत्यन्वयः ॥ ४० ॥ | |||
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भगवान्येन गम्यत इत्यनेन भागवतधर्मेणैव भगवान् गम्यते न द्वेषादि-नेत्युपसंह्रियते ॥ वृत्तानुकथनं च तदर्थत्वेनैव ॥ज्ञानस्य विशेषा याथात्म्यादयः ।'भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च नवकः श्रवणादिकः ।धर्मो भागवतः प्रोक्तस्तद्भक्तेषु तथा नव''॥ इति तन्त्रसारे ॥ ४३-४६ ॥ | |||
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| verse_line1 = स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यं | |||
| verse_line2 = कैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः । | |||
| verse_line3 = प्रियः सुहृद् वः खलु मातुलेय | |||
| verse_line4 = आत्माऽर्हणीयो विधिकृद् गुरुश्च ॥ ५० ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥}} | |||
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निर्वाणसुखं अशरीरसुखम् । 'एतद्बाणमवष्टभ्य''॥ इति श्रुतेः ॥ ५० ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
दशमोऽध्यायः
श्रीभगवानुवाच– त्रिः सप्तभिः पिता पूतः पितृभिः सह तेऽनघ । यत् साधोऽस्य कुले जातो भवान् वै कुलपावनः ॥ १९ ॥
जन्मान्तरपितृभिस्त्रिसप्तभिः ॥ १९ ॥
भवन्ति पुरुषा लोके मद्भक्तास्त्वामनुव्रताः ।भवान् मे खलु भक्तानां सर्वेषां प्रतिरूपधृक् ॥ २२ ॥
'ऋते तु तात्विकान्देवान्नारदादींस्तथैव च ।प्रह्लादादुत्तमः को नु विष्णुभक्तौ जगत्रये। इति स्कान्दे ॥ २२ ॥
कुरु ते प्रेतकार्याणि पितुः पूतस्य सर्वशः ।मदङ्गस्पर्शनेनाङ्ग लोकान् यास्यति सुप्रजाः ॥ २३ ॥
'मधुकैटभौ भक्त्यभावादूरौ भगवतो मृतौ ।तम एव क्रमादाप्तौ भक्त्या चैद्यो हरिं ययौ॥ २३ ॥
श्रीभगवानुवाच– मैवंविधोऽसुराणां ते प्रदेयः पद्मसम्भव । वरः क्रूरनिसर्गाणामहीनाममृतं यथा ॥ ३१ ॥
'यथा हिरण्यकस्यादादन्तःस्थितहरीरितः ।तथा नादात्तदन्यस्य ब्रह्मा दैत्यस्य कस्यचित्॥ इति च ॥ ३१ ॥
एनः पूर्वकृतं यत् तद् राजानः कृष्णवैरिणः ।जहुस्तेऽन्ते तदात्मानः कीटाः पेशस्कृतो यथा ॥ ४० ॥
'पौण्ड्रके नरके चैव साल्वे कंसे च रुग्मिणि ।आविष्टास्तु हरेर्भक्तास्तद्भक्त्या हरिमीयिरे ।असुरास्तु स्वयं ते तु महातमसि पातिताः॥ इति च ।तदात्मानस्तत्राविष्टास्तद्भक्ताः । वैरोपसर्जनेनानुबन्धेनेत्यन्वयः ॥ ४० ॥
एषा ब्रह्मण्यदेवस्य कृष्णस्य च महात्मनः ।अवतारकथा पुण्या वधो यत्रादिदैत्ययोः ॥ ४३ ॥
प्रह्लादस्यानुचरितं महाभागवतस्य च ।भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च याथात्म्यं चास्य वै हरेः ॥ ४४ ॥
सर्गस्थित्यप्ययेशस्य गुणकर्मानुवर्णनम् ।परावरेषां स्थानानां कालेन व्यत्ययो महान् ॥ ४५ ॥
धर्मो भागवतानां च भगवान् येन गम्यते ।आख्यानेऽस्मिन् समाख्यातमाध्यात्मिकमशेषतः ॥ ४६ ॥
भगवान्येन गम्यत इत्यनेन भागवतधर्मेणैव भगवान् गम्यते न द्वेषादि-नेत्युपसंह्रियते ॥ वृत्तानुकथनं च तदर्थत्वेनैव ॥ज्ञानस्य विशेषा याथात्म्यादयः ।'भक्तिर्ज्ञानं विरक्तिश्च नवकः श्रवणादिकः ।धर्मो भागवतः प्रोक्तस्तद्भक्तेषु तथा नव॥ इति तन्त्रसारे ॥ ४३-४६ ॥
स वा अयं ब्रह्म महद् विमृग्यंकैवल्यनिर्वाणसुखानुभूतिः ।
निर्वाणसुखं अशरीरसुखम् । 'एतद्बाणमवष्टभ्य॥ इति श्रुतेः ॥ ५० ॥