Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S9: Difference between revisions
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== नवमोऽध्यायः == | == नवमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् । | |||
| verse_line2 = अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके । | |||
| verse_line2 = तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥ | |||
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'अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वादन्यैः साधारणैर्जनैः ।नृसिंहं शङ्कितेव श्रीर्लोकमोहाय नो ययौ ॥प्रह्लादे चैव वात्सल्यदर्शनाय हरेरपि ।ज्ञात्वा मनस्तथा ब्रह्मा प्रह्लादं प्रेषयत्तदा ॥एकत्रैकस्य वात्सल्यं विशेषाद्दर्शयेद्धरिः ।अवरस्यापि मोहाय क्रमेणैवापि वत्सलः''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २-३ ॥ | |||
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| verse_line1 = विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ- | |||
| verse_line2 = पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् । | |||
| verse_line3 = मन्ये तदर्पितमनोवचनात्मगेह- | |||
| verse_line4 = प्राणः पुनाति सकलं न तु भूरिमानः ॥ १० ॥ | |||
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द्विषड्गुणयुतात् ।'ज्ञानं च सत्यं च दमः शमश्चह्यमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षाऽनसूया ॥दानं च यज्ञश्च चमहाव्रता द्वादश ब्राह्मणस्य''॥ इति भारते ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्य | |||
| verse_line2 = यस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा । | |||
| verse_line3 = भावं करोति विकरोति पृथक् स्वभावः | |||
| verse_line4 = सञ्चोदितस्तदखिलं भवतः स्वरूपम् ॥ २० ॥ | |||
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'कर्तृकर्मक्रियादीनां सत्ता वृत्तिस्तथैव च ।विष्ण्वधीनं यतः सर्वं सर्वरूपस्तदुच्यते''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २० ॥ | |||
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| verse_line1 = माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयः | |||
| verse_line2 = कालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः । | |||
| verse_line3 = छन्दोमयं यदजयार्पितषोडशारं | |||
| verse_line4 = संसारचक्रमज कोऽतितरेत्त्वदन्यः ॥ २१ ॥ | |||
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दशेन्द्रियप्राणमनोऽरम् । मूलं मन एव संसारचक्रस्य ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन् | |||
| verse_line2 = जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा । | |||
| verse_line3 = न ब्रह्मणो न तु भवस्य न वै रमाया | |||
| verse_line4 = यन्मेऽर्पितः शिरसि पद्मकरप्रसादः ॥ २६ ॥ | |||
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रमादीनामिदानीं नार्पितः ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात् | |||
| verse_line2 = जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथाऽपि । | |||
| verse_line3 = संसेवया सुरतरोरिव ते प्रसादः | |||
| verse_line4 = सेवानुरूप उदयो न परावरत्वम् ॥ २७ ॥ | |||
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रमादीनामधिकोदयोऽपि सेवाधिकत्वादेव ॥'श्रीब्रह्मब्राह्मीवीन्द्रादित्रिकतत्स्त्रीपुरुष्टुताः ।तदन्ये च क्रमादेव सदा मुक्तौ सृतावपि ।हरिभक्तौ च तज्ज्ञाने सुखे च नियमेन तु ।परतः स्वतः कर्मतो वा न कथञ्चित्तदन्यथा''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्यो | |||
| verse_line2 = माया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था । | |||
| verse_line3 = यद् यस्य जन्मनिधनं स्थितिरीक्षणं च | |||
| verse_line4 = तद् वै तदेव खलु कालवदुष्टितर्वोः ॥ ३१ ॥ | |||
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यथा वृक्षश्च वृक्षदाहश्च दैवकालाधीनत्वाद्दैवं कालश्चेत्युच्यते एवं त्वदधीनत्वात्सर्वस्य सर्वं त्वमित्युच्यसे, स्वतस्तद्भिन्नोऽपि ॥ अहं चान्यश्च परमेश्वर एवेत्यपार्था भ्रान्तिः । तदधीनत्वादेव स इत्युच्यते । न स्वरूपत्वादित्यर्थः ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्ये | |||
| verse_line2 = शेषासनो निजसुखानुभवो निरीहः । | |||
| verse_line3 = योगेन मीलितदृगात्मनि वीतनिद्र- | |||
| verse_line4 = स्तुर्यस्थितो ननु तमोऽनुगुणांश्च युंक्षे ॥ ३२ ॥ | |||
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तुर्यः स्थितः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्या | |||
| verse_line2 = सञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् । | |||
| verse_line3 = अम्भस्यनन्तशयनाद्विरमत्समाधेः | |||
| verse_line4 = नाभेरभूत् स्वकणिकाद्वटवन्महाब्जम् ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान- | |||
| verse_line2 = स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् । | |||
| verse_line3 = नाविन्ददब्दशतमप्सु निमज्जमानो | |||
| verse_line4 = जातेऽङ्कुरे कथमिहोपलभेत बीजम् ॥ ३४ ॥ | |||
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जगदात्मकमब्जमपि भगवद्वशत्वात्तद्वपुः ।'स्थावराणां तु सर्वेषां देवता याऽभिमानिनी ।विशेषाद्वटबीजे च साऽश्वत्थे च व्यवस्थिता ॥अदृश्या कणिका नाम सा वृक्षान्व्यञ्जयत्यपि ।अतो बीजमिति प्रोक्ता सा जातेऽप्यङ्कुरे स्थिता ॥एवं हरिः कारणेषु स्थितः कार्यजनेरनु ।कार्याण्यनुप्रविष्टः सन् प्रथमं तत्र दृश्यते''॥ इति च ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जं | |||
| verse_line2 = कालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः । | |||
| verse_line3 = त्वामात्मनीश भुवि गन्धमिवातिसूक्ष्मं | |||
| verse_line4 = भूतेन्द्रियाशयमये विततं ददर्श ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु- | |||
| verse_line2 = नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् । | |||
| verse_line3 = मायामयं सदुपलक्षणसन्निवेशं | |||
| verse_line4 = दृष्ट्वा महापुरुषमाप मुदं विरिञ्चः ॥ ३६ ॥ | |||
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'गन्धाख्या देवता यद्वत्पृथिवीं व्याप्य तिष्ठति ।एवं व्याप्तं जगद्विष्णुं ब्रह्माऽऽत्मस्थं ददर्श ह''॥ इति च ।मायामयं ज्ञानस्वरूपम् । सदुपलक्षणसन्निवेशं आनन्दादिलक्षण-समुदायरूपम् ॥ ३६ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामा | |||
| verse_line2 = मौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः । | |||
| verse_line3 = नैतान् विहाय कृपणान् विमुमुक्ष एको | |||
| verse_line4 = नान्यं त्वदस्य शरणं भ्रमतोऽनुपश्ये ॥ ४४ ॥ | |||
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प्रायेण देवमुनयः ।'आश्रितेषु कृपा कार्या विशेषात्तात्विकैः सुरैः ।मुनिभिश्च तथा कैश्चित्कैश्चित्कार्याऽखिलेष्वपि ॥तथापि तात्विकसुरकृपाविषयतां गताः ।एत एव विमुच्यन्ते तदन्ये न कथञ्चन''॥ इति च ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_line1 = रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टे | |||
| verse_line2 = बीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य । | |||
| verse_line3 = युक्ताः समक्षमुभयत्र विचिन्वते त्वां | |||
| verse_line4 = योगेन वह्निमिव दारुषु नान्यतः स्यात् ॥ ४७ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥}} | |||
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कार्यकारणरूपे तद्वशत्वापेक्षया साक्षात् स्वरूपापेक्षया स्वरूपादन्यद्रूपं न ॥ ४७ ॥ | |||
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[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
नवमोऽध्यायः
साक्षाच्छ्रीः प्रेषिता देवैर्दृष्ट्वा तन्महदद्भुतम् ।अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वात् सा नोपेयाय शङ्किता ॥ २ ॥
प्रह्लादं प्रेषयामास ब्रह्माऽवस्थितमन्तिके ।तात प्रशमयोपेहि स्वपित्रे कुपितं प्रभुम् ॥ ३ ॥
'अदृष्टाश्रुतपूर्वत्वादन्यैः साधारणैर्जनैः ।नृसिंहं शङ्कितेव श्रीर्लोकमोहाय नो ययौ ॥प्रह्लादे चैव वात्सल्यदर्शनाय हरेरपि ।ज्ञात्वा मनस्तथा ब्रह्मा प्रह्लादं प्रेषयत्तदा ॥एकत्रैकस्य वात्सल्यं विशेषाद्दर्शयेद्धरिः ।अवरस्यापि मोहाय क्रमेणैवापि वत्सलः॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २-३ ॥
विप्राद् द्विषड्गुणयुतादरविन्दनाभ-पादारविन्दविमुखाच्छ्वपचं वरिष्ठम् ।
द्विषड्गुणयुतात् ।'ज्ञानं च सत्यं च दमः शमश्चह्यमात्सर्यं ह्रीस्तितिक्षाऽनसूया ॥दानं च यज्ञश्च चमहाव्रता द्वादश ब्राह्मणस्य॥ इति भारते ॥ १० ॥
यस्मिन् यतो येन च यर्हि यस्ययस्मै यथा यमुत यस्त्वपरः परो वा ।
'कर्तृकर्मक्रियादीनां सत्ता वृत्तिस्तथैव च ।विष्ण्वधीनं यतः सर्वं सर्वरूपस्तदुच्यते॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २० ॥
माया मनः सृजति कर्ममयं बलीयःकालेन चोदितगुणानुमतेन पुंसः ।
दशेन्द्रियप्राणमनोऽरम् । मूलं मन एव संसारचक्रस्य ॥ २१ ॥
क्वाहं रजःप्रभव ईश तमोऽधिकेऽस्मिन्जातः सुरेतरकुले क्व तवानुकम्पा ।
रमादीनामिदानीं नार्पितः ॥ २६ ॥
नैषा परावरमतिर्भवतो ननु स्यात्जन्तोर्यथाऽऽत्मसुहृदो जगतस्तथाऽपि ।
रमादीनामधिकोदयोऽपि सेवाधिकत्वादेव ॥'श्रीब्रह्मब्राह्मीवीन्द्रादित्रिकतत्स्त्रीपुरुष्टुताः ।तदन्ये च क्रमादेव सदा मुक्तौ सृतावपि ।हरिभक्तौ च तज्ज्ञाने सुखे च नियमेन तु ।परतः स्वतः कर्मतो वा न कथञ्चित्तदन्यथा॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २७ ॥
त्वं वा इदं सदसदीश भवांस्ततोऽन्योमाया यदात्मपरबुद्धिरियं ह्यपार्था ।
यथा वृक्षश्च वृक्षदाहश्च दैवकालाधीनत्वाद्दैवं कालश्चेत्युच्यते एवं त्वदधीनत्वात्सर्वस्य सर्वं त्वमित्युच्यसे, स्वतस्तद्भिन्नोऽपि ॥ अहं चान्यश्च परमेश्वर एवेत्यपार्था भ्रान्तिः । तदधीनत्वादेव स इत्युच्यते । न स्वरूपत्वादित्यर्थः ॥ ३१ ॥
न्यस्येदमात्मनि जगद् विलयाम्बुमध्येशेषासनो निजसुखानुभवो निरीहः ।
तुर्यः स्थितः ॥ ३२ ॥
तस्यैव ते वपुरिदं निजकालशक्त्यासञ्चोदितं प्रकृतिधर्मिण आत्मगूढम् ।
तत्सम्भवः कविरतोऽन्यदपश्यमान-स्त्वां बीजमात्मनि ततं स बहिर्विचिन्वन् ।
जगदात्मकमब्जमपि भगवद्वशत्वात्तद्वपुः ।'स्थावराणां तु सर्वेषां देवता याऽभिमानिनी ।विशेषाद्वटबीजे च साऽश्वत्थे च व्यवस्थिता ॥अदृश्या कणिका नाम सा वृक्षान्व्यञ्जयत्यपि ।अतो बीजमिति प्रोक्ता सा जातेऽप्यङ्कुरे स्थिता ॥एवं हरिः कारणेषु स्थितः कार्यजनेरनु ।कार्याण्यनुप्रविष्टः सन् प्रथमं तत्र दृश्यते॥ इति च ॥ ३३ ॥
स त्वात्मयोनिरतिविस्मित आश्रितोऽब्जंकालेन तीव्रतपसा परिशुद्धभावः ।
एवं सहस्रवदनाङ्घ्रिशिरःकरोरु-नासास्यकर्णनयनाभरणायुधाढ्यम् ।
'गन्धाख्या देवता यद्वत्पृथिवीं व्याप्य तिष्ठति ।एवं व्याप्तं जगद्विष्णुं ब्रह्माऽऽत्मस्थं ददर्श ह॥ इति च ।मायामयं ज्ञानस्वरूपम् । सदुपलक्षणसन्निवेशं आनन्दादिलक्षण-समुदायरूपम् ॥ ३६ ॥
प्रायेण देवमुनयः स्वविमुक्तिकामामौनं चरन्ति विजने न परार्थनिष्ठाः ।
प्रायेण देवमुनयः ।'आश्रितेषु कृपा कार्या विशेषात्तात्विकैः सुरैः ।मुनिभिश्च तथा कैश्चित्कैश्चित्कार्याऽखिलेष्वपि ॥तथापि तात्विकसुरकृपाविषयतां गताः ।एत एव विमुच्यन्ते तदन्ये न कथञ्चन॥ इति च ॥ ४४ ॥
रूपे इमे सदसती तव वेददृष्टेबीजाङ्कुराविव न चान्यदरूपकस्य ।
कार्यकारणरूपे तद्वशत्वापेक्षया साक्षात् स्वरूपापेक्षया स्वरूपादन्यद्रूपं न ॥ ४७ ॥