Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S7: Difference between revisions
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== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
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'षडि्वकाराः शरीरस्य न विष्णोस्तद्गतस्य तु ।तदधीनं शरीरं च ज्ञात्वा तन्ममतां त्यजेत्''॥ इति च ॥हेतुत्वाद्विष्ण्वधीनत्वं शरीरस्य ॥ १८ ॥ | |||
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| verse_line2 = विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥ | |||
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'अभिमान्यपेक्षया विष्णुः पञ्चविंश इति स्मृतः ।जडव्यपेक्षया जीवः सम्यग्ज्ञेयो हरिः स्मृतः''॥ इति च ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः । | |||
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बुद्धेः जीवस्य ।'सत्वबुद्ध्यादिशब्दैस्तु जीवोऽपि क्वचिदीर्यते ।जाग्रदाद्याः कर्म चैव सुखदुःखे च तस्य हि ।जाग्रदादेः परो द्रष्टा सुखनिष्ठो हरिः स्मृतः ॥ २५ ॥ | |||
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'स जीवेन सह स्थानात्तत्स्वरूपः प्रदृश्यते ।अज्ञदृष्ट्या न ज्ञदृष्ट्या यथा गन्धयुतोऽनिलः ॥ २६ ॥ | |||
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अदृष्टेर्जीवपरयोर्भेदस्याप्नोति संसृतिम् ।अभेदनिश्चयाद्याति तमो नास्त्यत्र संशयः''॥ इति च ॥बुद्धिभेदैः जीवानां तारतम्यज्ञापकैः ।'दुःखरूपोऽपि संसारो बुद्धिपूर्वमवाप्यते ।यथा स्वप्ने शिरश्छेदं स्वयं कृत्वाऽऽत्मनोऽवशः ॥ततो दुःखमवाप्येत तथा जागरितेऽपि तु ।जानन्नप्यात्मनो दुःखमवशस्तु प्रवर्तते''इति च ॥ २७ ॥ | |||
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धियः प्रवाहस्योपरमः परमेश्वरे रमणम् ॥ | |||
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| verse_line2 = यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस- | |||
| verse_line2 = त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् । | |||
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| verse_line4 = भक्तिप्रयोगेण समेत्यधोक्षजम् ॥ ३७ ॥ | |||
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तद्भावभावः तद्यथास्वरूपम् भक्तिः ॥'केचिद्भक्ता विनृत्यन्ति गायन्ति च यथेप्सितम् ।केचित्तूष्णीं जपन्त्येव केचिच्चोभयकारिणः''॥ इति च ॥ ३५-३७ ॥ | |||
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ब्रह्मनिर्वाणसुखं ब्रह्मनिमित्तनिर्वाणसुखम् ॥ ३८ ॥ | |||
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अशेषदेहिनां सामान्यतो हृदिस्थत्वेन ॥ ३९ ॥ | |||
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'अप्रयत्नेन करणमनीहा प्रोच्यते बुधैः''॥ इति च ॥ ४९ ॥ | |||
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'व्यञ्जनाज्जगतो विष्णुर्बीजं न परिणामतः''। इति च ॥ ५० ॥ | |||
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| verse_line1 = दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः । | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥}} | |||
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अच्युततां च्युतिवर्जनम् ॥ | |||
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[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
सप्तमोऽध्यायः
जन्माद्याः षडिमे भावा दृष्टा देहस्य नात्मनः ।फलानामिव वृक्षस्य कालेनेश्वरमूर्तिना ॥ १८ ॥
'षडि्वकाराः शरीरस्य न विष्णोस्तद्गतस्य तु ।तदधीनं शरीरं च ज्ञात्वा तन्ममतां त्यजेत्॥ इति च ॥हेतुत्वाद्विष्ण्वधीनत्वं शरीरस्य ॥ १८ ॥
अष्टौ प्रकृतयः प्रोक्तास्त्रय एव हि तद्गुणाः ।विकाराः षोडशाचार्यैः पुमानेकः समन्वयात् ॥ २२ ॥
'अभिमान्यपेक्षया विष्णुः पञ्चविंश इति स्मृतः ।जडव्यपेक्षया जीवः सम्यग्ज्ञेयो हरिः स्मृतः॥ इति च ॥ २२ ॥
बुद्धेर्जागरणं स्वप्नः सुषुप्तिरिति वृत्तयः ।ता येनैवानुभूयन्ते सोऽध्यक्षः पुरुषः परः ॥ २५ ॥
बुद्धेः जीवस्य ।'सत्वबुद्ध्यादिशब्दैस्तु जीवोऽपि क्वचिदीर्यते ।जाग्रदाद्याः कर्म चैव सुखदुःखे च तस्य हि ।जाग्रदादेः परो द्रष्टा सुखनिष्ठो हरिः स्मृतः ॥ २५ ॥
एभिस्त्रिवर्णैः पर्यस्तैर्बुद्धिभेदैः क्रियोद्भवैः ।सरूपमात्मनो धत्ते गन्धैर्वायुरिवान्वयात् ॥ २६ ॥
'स जीवेन सह स्थानात्तत्स्वरूपः प्रदृश्यते ।अज्ञदृष्ट्या न ज्ञदृष्ट्या यथा गन्धयुतोऽनिलः ॥ २६ ॥
एतद्द्वारो हि संसारो गुणकर्मनिबन्धनः ।अज्ञानमूलोऽपार्थोऽपि पुंसः स्वप्न इवाप्यते ॥ २७ ॥
अदृष्टेर्जीवपरयोर्भेदस्याप्नोति संसृतिम् ।अभेदनिश्चयाद्याति तमो नास्त्यत्र संशयः॥ इति च ॥बुद्धिभेदैः जीवानां तारतम्यज्ञापकैः ।'दुःखरूपोऽपि संसारो बुद्धिपूर्वमवाप्यते ।यथा स्वप्ने शिरश्छेदं स्वयं कृत्वाऽऽत्मनोऽवशः ॥ततो दुःखमवाप्येत तथा जागरितेऽपि तु ।जानन्नप्यात्मनो दुःखमवशस्तु प्रवर्ततेइति च ॥ २७ ॥
तस्माद् भवद्भिः कर्तव्यः कर्मणां त्रिगुणात्मनाम् ।बीजनिर्हरणे योगः प्रवाहोपरमो धियः ॥ २९ ॥
धियः प्रवाहस्योपरमः परमेश्वरे रमणम् ॥
निशम्य कर्माणि गुणानतुल्यान् वीर्याणि लीलातनुभिः कृतानि ।यदाऽऽतिहर्षोत्पुलकाश्रुगद्गदः प्रोत्कण्ठ उद्गायति रौति नृत्यति॥ ३५ ॥
यदा ग्रहग्रस्त इव क्वचिद्धस-त्याक्रन्दते ध्यायति वन्दते जनम् ।
तदा पुमान् मुक्तसमस्तबन्धन-स्तद्भावभावानुकृताशयाकृतिः ।
तद्भावभावः तद्यथास्वरूपम् भक्तिः ॥'केचिद्भक्ता विनृत्यन्ति गायन्ति च यथेप्सितम् ।केचित्तूष्णीं जपन्त्येव केचिच्चोभयकारिणः॥ इति च ॥ ३५-३७ ॥
अधोक्षजालापमिहाशुभात्मनःशरीरिणः संसृतिचक्रशातनम् ।
ब्रह्मनिर्वाणसुखं ब्रह्मनिमित्तनिर्वाणसुखम् ॥ ३८ ॥
कोऽतिप्रयासोऽसुरबालका हरे-रुपासने स्वे हृदि छिद्रवत् सतः ।
अशेषदेहिनां सामान्यतो हृदिस्थत्वेन ॥ ३९ ॥
तस्मादर्थाश्च कामाश्च धर्माश्च यदपाश्रयाः ।भजतानीहयाऽऽत्मानमनीहं हरिमीश्वरम् ॥ ४९ ॥
'अप्रयत्नेन करणमनीहा प्रोच्यते बुधैः॥ इति च ॥ ४९ ॥
सर्वेषामपि भूतानां हरिरात्मेश्वरः प्रियः ।भूतैर्महद्भिः स्वकृतैः कृतानां बीजसंज्ञितः ॥ ५० ॥
'व्यञ्जनाज्जगतो विष्णुर्बीजं न परिणामतः। इति च ॥ ५० ॥
दैतेया यक्षरक्षांसि स्त्रियः शूद्रा व्रजौकसः ।खगा मृगाः पापजीवाः सन्ति ह्यच्युततां गताः ॥ ५५ ॥
अच्युततां च्युतिवर्जनम् ॥