Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S2: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== द्वितीयोऽध्यायः == | == द्वितीयोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V10 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् । | |||
| verse_line2 = सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानकान् ॥ १० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V11 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् । देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V11 | |||
| id = BTN_C07_S02_V11_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'विप्रयज्ञादिमूलं तु हरिरित्यासुरं मतम् ।हरिरेव हि सर्वस्य मूलं सम्यङ्मतो नृप''॥ इति ब्राह्मे ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V22 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः । | |||
| verse_line2 = धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V22 | |||
| id = BTN_C07_S02_V22_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गम् । जीवमनआदीनामाधारं ब्रह्म ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V23 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव । | |||
| verse_line2 = चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V24 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् । | |||
| verse_line2 = याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V24 | |||
| id = BTN_C07_S24_V24_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
लिङ्गवानिव – जीव इव ।'असमं समतामेति भ्रान्तिदृष्ट्यैव केवलम् ।जीवेन ब्रह्म न समं तत्त्वदृष्ट्या कथञ्चन''॥ इति षाड्गुण्ये ॥'यथोदचलनाद् वृक्षप्रतिबिम्बप्रचालनात् ।तटस्थवृक्षचलनं कल्पयेदबुधो नरः ॥तथा मनसिजैर्दोषैराभासे दूषिते नरे ।आभासिनो ब्रह्मणश्च दोषमज्ञः प्रकल्पयेत् ॥आत्मनश्चक्षुषो भ्रान्त्या यथा पश्येद्भ्रमं भुवः ।तथैव स्वात्मनो दोषाद्दोषवद्ब्रह्म पश्यति''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥२३-२४॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V26 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः । | |||
| verse_line2 = अविवेकश्च चिन्ता च विवेकस्मृतिरेव च ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V26 | |||
| id = BTN_C07_S02_V26_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
विवेकस्मृतिः अविवेकिन एव विवेकित्वभ्रान्तिः ।'अन्तर्हिरण्यकादीनां भक्तिरस्त्येव केशवे ।असुरावेशतस्त्वन्यान् हरिस्तोतृन्द्विषन्ति च''॥ इति पाद्मे ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V37 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V37 | |||
| id = BTN_C07_S02_V37_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
यत्रोद्भवस्तत्र गतं अदर्शनं गतम् ।'अदर्शनादिहायातः पुनश्चादर्शनं गतः''इति भारते ॥ ३७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V41 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि- | |||
| verse_line2 = र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः । | |||
| verse_line3 = न तत्र हात्मा प्रकृतावपि स्थित- | |||
| verse_line4 = स्तस्या गुणैरन्यतमो निबध्यते ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V41 | |||
| id = BTN_C07_S02_V41_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अन्यतम आत्मा परमात्मा ।'सुविरुद्धस्वरूपत्वाज्जीवादन्यतमो हरिः''॥ इति वामने ॥भगवन्माहात्म्यकथनेन सर्वस्य तद्वशत्वात्स एव भजनीयो न शोकेन प्रयोजनम् । इति फलितार्थः ॥ ४१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V43 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयते | |||
| verse_line2 = यथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः । | |||
| verse_line3 = यथा नभः सर्वगतं न सज्जते | |||
| verse_line4 = तथा गुणैः सर्वगुणाश्रयः परः ॥ ४३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V43 | |||
| id = BTN_C07_S02_V43_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'देहदारुगतौ प्राणवह्नी सर्वगतं नभः ।देहादिभ्यो यथा भिन्ना न लिप्यन्ते च तद्गुणैः ।तथा जीवगतो विष्णुर्जीवाद्भिन्नो न तद्गुणैः''॥ इति च ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V44 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ । | |||
| verse_line2 = यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V45 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः । | |||
| verse_line2 = यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V46 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः । | |||
| verse_line2 = भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V47 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः । | |||
| verse_line2 = ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V48 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः । | |||
| verse_line2 = यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V48 | |||
| id = BTN_C07_S02_V48_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
इन्द्रियवान् जीवः । भजत्युत्सृजति ह्यन्यः परमात्मा । स एव श्रोताऽनुवक्ता च ।'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता स योऽतोऽश्रुतः''। इत्यादेः ॥मुख्यप्राणोऽपि स्वतो न श्रोता किमु जीव इति । अयं ननु सुयज्ञ इत्याक्षेपः । यश्च सुयज्ञः सोऽपि स्वतः श्रोतुं वक्तुं न च शक्तः । अतस्तस्यानुशोकेन किमित्यर्थः ।'अन्यो जीवोऽचितो देहात्तद्वशो देह उच्यते ।पश्यामीत्यभिमानोऽस्य चक्षुराद्यभिमानवान् ॥न तद्वशाश्चक्षुराद्या न दृष्ट्यादौ स ईश्वरः ।चक्षुराद्या मनो जीवो दृष्ट्यादिश्चापि यद्वशे ॥स प्राण इति विज्ञेयो ज्ञाता मन्ता च स प्रभुः ।तस्यापि ज्ञातृमन्तृत्वं न स्वतः शक्यते क्वचित् ॥यस्तस्य ज्ञातृमन्तृत्वदाता स भगवान्हरिः ।स्वतो ज्ञाता च मन्ता च द्रष्टा श्रोता च केशवः ॥ज्ञानादिदो न तस्यान्यः सर्वस्य ज्ञानदो हरिः ।स देहान्भजते विष्णुः स्वेच्छयैवोत्सृजत्यपि ॥यावद्देहस्थितो विष्णुस्तावज्जीवो विपर्ययः ।तावत् क्लेशादयश्चास्य वृथा चेन्द्रियवृत्तयः ॥यदोत्सृजति देहं स हरिः सर्वात्मना विभुः ।तदा तदभिमानी तु जीवो मुच्येत संसृतेः ॥अतिभिन्नस्वरूपौ तौ जीवेशावेकदेहगौ ।देहाभिमानी त्वेकोऽत्र न मानी मानदः परः''॥ इति गारुडे ।'इन्द्रियाद्यभिमानेन तद्वान् जीव उदीर्यते ।अतन्मानाद्धरिः प्रोक्तस्त्वदेहोऽनिन्द्रियस्तथा ॥जीवानभिमते देहे न विष्णुर्जीवति स्थितः ।अतश्चादेह उद्दिष्टः परमात्मा सनातनः''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ।स चान्यः श्रोतुर्वक्तुश्चेति चशब्दः ॥लिङ्गान् भूतेन्द्रियमनोरूपान् ।'लिङ्गं स्वरूपमुद्दिष्टं लिङ्गं ज्ञापकमेव च''। इति शब्दनिर्णये ॥आत्मा परमात्मा । कर्मनिबन्धनो जीवः । ततः परमात्मनो विपरीतः ॥ मृषा वृथा । स्वप्नदृष्टवित्तादिवत् ।'लेपाभिमानी जीवस्तु स्वरूपानुभवी न च ।मुक्तेः प्राक्तेन मान्युक्तो न मानी विष्णुरुच्यते ॥सर्वं ममेति पश्यन्नप्यलेपाभिमतिर्यतः ।सम्यक्स्वरूपानुभवात्स्वतन्त्रत्वाददोषतः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥४४-४८॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V58 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = हिरण्यकशिपुरुवाच– | |||
| verse_line2 = बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः । | |||
| verse_line3 = ज्ञातयो मेनिरे सर्वमनित्यमयथोत्थितम् ॥ ५८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V58 | |||
| id = BTN_C07_S02_V58_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अहं ममाभिमानादि त्वयथोत्थमनित्यकम् ।महदादि यथोत्थं च नित्या चापि यथोत्थिता ॥अस्वतन्त्रैव प्रकृतिः स्वतन्त्रो नित्य एव च ।यथार्थभूतश्च पर एक एव जनार्दनः''॥ इति च ॥ ५८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V60 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C07 | |||
| section_id = BTN_C07_S02 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च । | |||
| verse_line2 = स्वपराभिनिवेशेन विनाऽज्ञानेन देहिनः ॥ ६० ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S02_V60 | |||
| id = BTN_C07_S02_V60_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'क आत्मा कः परः''इति देहाद्यपेक्षया ।'न हि देहादिरात्मा स्यान्न च शत्रुरुदीरितः ।अतो दैहिकवृद्धौ वा क्षये वा किं प्रयोजनम् ॥यस्तु देहगतो जीवः स हि नाशं न गच्छति ।ततः शत्रुविवृद्धौ वा स्वनाशे शोचनं कुतः ॥देहादिव्यतिरिक्तौ तु जीवेशौ प्रतिजानताम् ।अत आत्मविवृद्धिस्तु वासुदेवे रतिः स्थिरा ।शत्रुनाशस्तथाऽज्ञाननाशो नान्यः कथञ्चन''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
द्वितीयोऽध्यायः
तावद् यात भुवं यूयं ब्रह्मक्षत्रसमेधिताम् ।सूदयध्वं तपोयज्ञस्वाध्यायव्रतदानकान् ॥ १० ॥
विष्णुर्द्विजक्रियामूलो यज्ञो धर्ममयः पुमान् । देवर्षिपितृभूतानां धर्मस्य च परायणम् ॥ ११ ॥
'विप्रयज्ञादिमूलं तु हरिरित्यासुरं मतम् ।हरिरेव हि सर्वस्य मूलं सम्यङ्मतो नृप॥ इति ब्राह्मे ॥
नित्य आत्माऽव्ययः शुद्धः सर्ववित् सर्वगः परः ।धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गं मायया विसृजन् गुणान् ॥ २२ ॥
धत्तेऽसावात्मनो लिङ्गम् । जीवमनआदीनामाधारं ब्रह्म ॥ २२ ॥
यथाऽम्भसा प्रचलता तरवोऽपि चला इव ।चक्षुषा भ्राम्यमाणेन दृश्यते भ्रमतीव भूः ॥ २३ ॥
एवं गुणैर्भ्राम्यमाणे मनस्यविकलः पुमान् ।याति तत्साम्यतां भद्रे ह्यलिङ्गो लिङ्गवानिव ॥ २४ ॥
लिङ्गवानिव – जीव इव ।'असमं समतामेति भ्रान्तिदृष्ट्यैव केवलम् ।जीवेन ब्रह्म न समं तत्त्वदृष्ट्या कथञ्चन॥ इति षाड्गुण्ये ॥'यथोदचलनाद् वृक्षप्रतिबिम्बप्रचालनात् ।तटस्थवृक्षचलनं कल्पयेदबुधो नरः ॥तथा मनसिजैर्दोषैराभासे दूषिते नरे ।आभासिनो ब्रह्मणश्च दोषमज्ञः प्रकल्पयेत् ॥आत्मनश्चक्षुषो भ्रान्त्या यथा पश्येद्भ्रमं भुवः ।तथैव स्वात्मनो दोषाद्दोषवद्ब्रह्म पश्यति॥ इति ब्रह्मतर्के ॥२३-२४॥
सम्भवश्च विनाशश्च शोकश्च विविधः स्मृतः ।अविवेकश्च चिन्ता च विवेकस्मृतिरेव च ॥ २६ ॥
विवेकस्मृतिः अविवेकिन एव विवेकित्वभ्रान्तिः ।'अन्तर्हिरण्यकादीनां भक्तिरस्त्येव केशवे ।असुरावेशतस्त्वन्यान् हरिस्तोतृन्द्विषन्ति च॥ इति पाद्मे ॥ २६ ॥
यम उवाच– अहो अमीषां वयसाऽधिकानां विपश्यतां लोकविधिं विमोहः । यत्रोद्भवस्तत्र गतं मनुष्यं स्वयं सधर्मा अनुशोचन्त्यपार्थम् ॥ ३७ ॥
यत्रोद्भवस्तत्र गतं अदर्शनं गतम् ।'अदर्शनादिहायातः पुनश्चादर्शनं गतःइति भारते ॥ ३७ ॥
भूतानि तैस्तैर्निजयोनिकर्मभि-र्भवन्ति काले न भवन्ति सर्वशः ।
अन्यतम आत्मा परमात्मा ।'सुविरुद्धस्वरूपत्वाज्जीवादन्यतमो हरिः॥ इति वामने ॥भगवन्माहात्म्यकथनेन सर्वस्य तद्वशत्वात्स एव भजनीयो न शोकेन प्रयोजनम् । इति फलितार्थः ॥ ४१ ॥
यथाऽनलो दारुषु भिन्न ईयतेयथाऽनिलो देहगतः पृथक् स्थितः ।
'देहदारुगतौ प्राणवह्नी सर्वगतं नभः ।देहादिभ्यो यथा भिन्ना न लिप्यन्ते च तद्गुणैः ।तथा जीवगतो विष्णुर्जीवाद्भिन्नो न तद्गुणैः॥ इति च ॥
सुयज्ञो नन्वयं शेते मूढा यमनुशोचथ ।यः श्रोता योऽनुवक्तेह न स दृश्येत कर्हिचित् ॥ ४४ ॥
न श्रोता नानुवक्ताऽयं मुख्योऽप्यत्र महानसुः ।यस्त्विहेन्द्रियवानात्मा स चान्यः प्राणदेहयोः ॥ ४५ ॥
भूतेन्द्रियमनोलिङ्गान् देहानुच्चावचान् विभुः ।भजत्युत्सृजति ह्यन्यस्तच्चापि स्वेन तेजसा ॥ ४६ ॥
यावल्लिङ्गान्वितो ह्यात्मा तावत् कर्मनिबन्धनः ।ततो विपर्ययः क्लेशो मायायोगोऽनुवर्तते ॥ ४७ ॥
वितथाभिनिवेशोऽयं यद्गुणेष्वर्थदृग्वचः ।यथा मनोरथः स्वप्नः सर्वमैन्द्रियकं मृषा ॥ ४८ ॥
इन्द्रियवान् जीवः । भजत्युत्सृजति ह्यन्यः परमात्मा । स एव श्रोताऽनुवक्ता च ।'नान्योऽतोऽस्ति द्रष्टा नान्योऽतोऽस्ति श्रोता स योऽतोऽश्रुतः। इत्यादेः ॥मुख्यप्राणोऽपि स्वतो न श्रोता किमु जीव इति । अयं ननु सुयज्ञ इत्याक्षेपः । यश्च सुयज्ञः सोऽपि स्वतः श्रोतुं वक्तुं न च शक्तः । अतस्तस्यानुशोकेन किमित्यर्थः ।'अन्यो जीवोऽचितो देहात्तद्वशो देह उच्यते ।पश्यामीत्यभिमानोऽस्य चक्षुराद्यभिमानवान् ॥न तद्वशाश्चक्षुराद्या न दृष्ट्यादौ स ईश्वरः ।चक्षुराद्या मनो जीवो दृष्ट्यादिश्चापि यद्वशे ॥स प्राण इति विज्ञेयो ज्ञाता मन्ता च स प्रभुः ।तस्यापि ज्ञातृमन्तृत्वं न स्वतः शक्यते क्वचित् ॥यस्तस्य ज्ञातृमन्तृत्वदाता स भगवान्हरिः ।स्वतो ज्ञाता च मन्ता च द्रष्टा श्रोता च केशवः ॥ज्ञानादिदो न तस्यान्यः सर्वस्य ज्ञानदो हरिः ।स देहान्भजते विष्णुः स्वेच्छयैवोत्सृजत्यपि ॥यावद्देहस्थितो विष्णुस्तावज्जीवो विपर्ययः ।तावत् क्लेशादयश्चास्य वृथा चेन्द्रियवृत्तयः ॥यदोत्सृजति देहं स हरिः सर्वात्मना विभुः ।तदा तदभिमानी तु जीवो मुच्येत संसृतेः ॥अतिभिन्नस्वरूपौ तौ जीवेशावेकदेहगौ ।देहाभिमानी त्वेकोऽत्र न मानी मानदः परः॥ इति गारुडे ।'इन्द्रियाद्यभिमानेन तद्वान् जीव उदीर्यते ।अतन्मानाद्धरिः प्रोक्तस्त्वदेहोऽनिन्द्रियस्तथा ॥जीवानभिमते देहे न विष्णुर्जीवति स्थितः ।अतश्चादेह उद्दिष्टः परमात्मा सनातनः॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ।स चान्यः श्रोतुर्वक्तुश्चेति चशब्दः ॥लिङ्गान् भूतेन्द्रियमनोरूपान् ।'लिङ्गं स्वरूपमुद्दिष्टं लिङ्गं ज्ञापकमेव च। इति शब्दनिर्णये ॥आत्मा परमात्मा । कर्मनिबन्धनो जीवः । ततः परमात्मनो विपरीतः ॥ मृषा वृथा । स्वप्नदृष्टवित्तादिवत् ।'लेपाभिमानी जीवस्तु स्वरूपानुभवी न च ।मुक्तेः प्राक्तेन मान्युक्तो न मानी विष्णुरुच्यते ॥सर्वं ममेति पश्यन्नप्यलेपाभिमतिर्यतः ।सम्यक्स्वरूपानुभवात्स्वतन्त्रत्वाददोषतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥४४-४८॥
हिरण्यकशिपुरुवाच–बाल एवं प्रवदति सर्वे विस्मितचेतसः ।
'अहं ममाभिमानादि त्वयथोत्थमनित्यकम् ।महदादि यथोत्थं च नित्या चापि यथोत्थिता ॥अस्वतन्त्रैव प्रकृतिः स्वतन्त्रो नित्य एव च ।यथार्थभूतश्च पर एक एव जनार्दनः॥ इति च ॥ ५८ ॥
क आत्मा कः परो वाऽत्र स्वीयः पारक्य एव च ।स्वपराभिनिवेशेन विनाऽज्ञानेन देहिनः ॥ ६० ॥
'क आत्मा कः परःइति देहाद्यपेक्षया ।'न हि देहादिरात्मा स्यान्न च शत्रुरुदीरितः ।अतो दैहिकवृद्धौ वा क्षये वा किं प्रयोजनम् ॥यस्तु देहगतो जीवः स हि नाशं न गच्छति ।ततः शत्रुविवृद्धौ वा स्वनाशे शोचनं कुतः ॥देहादिव्यतिरिक्तौ तु जीवेशौ प्रतिजानताम् ।अत आत्मविवृद्धिस्तु वासुदेवे रतिः स्थिरा ।शत्रुनाशस्तथाऽज्ञाननाशो नान्यः कथञ्चन॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥