Bhagavatatatparyanirnaya/C7/S1: Difference between revisions
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}} | }} | ||
== प्रथमोऽध्यायः == | == प्रथमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः । | |||
| verse_line2 = स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥ | |||
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'बाध्यादिस्थो हरिर्नित्यं बाध्यतादिगतेत्यपि ।गीयते न तु बाध्यत्वादिदोषयुतत्वतः''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ | |||
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| verse_line1 = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते । | |||
| verse_line2 = विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥ | |||
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'दधिस्थघृतवत्काष्ठे वह्निवच्च जनार्दनः ।देहेन्द्रियासुजीवेभ्यो विविच्य ज्ञायते न तु''॥ इति च ॥ | |||
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| verse_line1 = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥ | |||
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प्रधानपुंभ्यां सह ॥ | |||
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| verse_line1 = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥ | |||
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काले कालविषयेऽपीशिता । देहादिकारणत्वात् सुरानीकमिव स्थितं सत्वम् ।'स्वभावतः प्रियत्वात्तु सदा देवप्रियो हरिः ।अप्रियश्चासुराणां स स्वभावात्तूभयं नृणाम् ॥देशकालौ गुणांश्चैव भक्त्यादीनप्यपेक्ष्य तु ।योग्यतां च तथा कर्म सम इत्यभिधीयते ॥स्वतः प्रियोऽपि देवानामुत्पाद्यैव गुणानिमान् ।इतरेषां तथा दोषान्सुखदुःखे ददात्यजः ॥उभयं तु मनुष्याणामतः सम इतीरितः ।अनादिनियताश्चैव गुणदोषाः सुरादिषु ॥यथाक्रमं पुनश्चैव नियमाद्वर्धितास्तथा ।विष्णुनैव ततो नित्यं विषमश्च जनार्दनः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥'न विष्णोर्विषमत्वं तु योग्यतापेक्षया क्वचित् ।योग्यतायास्तन्नियत्या विषमत्वं भवेदिति''॥ इति स्कान्दे ॥'विषमत्वं तु दोषाय शुभाशुभविपर्यये ।अतस्तादृशवैषम्यं ब्रह्मसूत्रे निराकृतम् ॥शुभाशुभनियन्तृत्वं न दोषो गुण एव सः ।अतस्तदिष्टं कृष्णस्य ब्रह्मसूत्रकृतो विभोः''॥ इति तन्त्रनिर्णये ॥ | |||
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| verse_line1 = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् । | |||
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'नियमाद्भुज्यते पुम्भिर्धर्माधर्मफलं मृतौ ।कैश्चिदत्रापि भुज्येत तस्मान्नाधर्ममाचरेत्''॥ इति भारते ॥ | |||
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| verse_line1 = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः । | |||
| verse_line2 = तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥ | |||
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कैवल्यात् देहाद्यभावादेव । अकर्तुः तस्यान्यः कर्ता न विद्यते । इदं एषा ।'व्यत्ययोऽतिशयकुत्सनभेदेषु''इति सूत्रात् ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा । | |||
| verse_line2 = स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥ | |||
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कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् । तत्रैव मनसोऽभिनिवेशेन तदन्यं नेक्षते । वैरादीनामेकतमेनापि यो युञ्ज्यात् स नेक्षत इति स्वभावकथनं न विधिः ।'कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद्विष्णुमव्ययम् ।मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः''।'तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्''॥'अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्''॥'मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः''॥'यदनिन्दत्पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्वरम् ।तस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताद्दुस्तरादघात् ॥हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः''॥'वरतोऽपि न मुच्यन्ते द्वेषिणः शापतोऽपि तु ।भक्ता नैव निपात्यन्ते धर्माधर्मैस्तथेतरैः ॥अन्यावेशकृतं यत्तु तद्वराद्यैरपोह्यते ।तद्विरुद्धस्वभावानामन्यथा न कथञ्चन''इत्यादेः ॥यस्मादेवं कोऽप्युपद्रवो नास्ति भगवतस्तस्मादेव द्वेषादिनापि मनो योक्तुं शक्यते तत्प्रेरणया । तादृशानां एतदेव चिन्तयति च । अन्यथा आत्मनो दुःखकारणं द्वेषादिकं कथं सर्वनियामको हरिरुत्पादयेत् ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् । | |||
| verse_line2 = न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥ | |||
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| verse_line1 = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् । | |||
| verse_line2 = संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे । | |||
| verse_line2 = वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥ | |||
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तत्रैव हेतुः । यथा वैरानुबन्धेनेति । यथा वैराभिनिवेशिनः तथा भक्त्यभि-निवेशिनो न सन्ति । तत्कथमन्यथा भक्तानेव बहून्हरिः कुर्यादिति भावः ॥कीटः पेशस्कृतेत्यादि चैद्यादीनां भक्तियुतत्वप्रतिपादनम् । स्नेहाद्यायतननाशादिनाऽप्युपद्रवोऽस्य नास्तीति निर्वैरेणेत्याद्युक्तम् ।'ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुराः''इति श्रुतिः ।तन्मयतां मनसस्तत्राभिनिवेशनम् ।'मागधाद्या यथा नित्यं द्वेषादाग्रहिणो हरौ ।न तथाऽऽग्रहिणो भक्ता ऋते ब्रह्माणमव्ययम्''॥ इति हरिवंशेषु ॥योगः स्नेहः । संरम्भभययुक्तस्नेहेन ।'प्रीतिः स्नेहस्तथा योगः प्रेमबन्ध इतीर्यते''। इति शब्दनिर्णये ॥वैरयुक्तयाऽप्यनुचिन्तया तमापुः ।'अनुचिन्तेति तामाहुर्भक्तिपूर्वा तु या स्मृतिः''। इति च ॥'स्नेहादन्नं ददातीति स्वाकर्षणभयेऽपि च ।विद्यमानेऽप्यल्पकोपे सङ्गतिस्नेहतस्तथा ॥पेशस्कृद्रूपतां कीटो यथा याति तथैव तु ।चैद्यादयोऽसुरावेशशाद्धरौ द्वेषयुता अपि ॥निजस्वभावया भक्तया नीता हरिसरूपताम् ।तथा हि करुणो विष्णुरन्यावेशाद्यदि द्विषन् ॥हीयते किं ममानेन नित्यानन्द स्वरूपिणः ।देहबन्धयुतानां हि द्वेषिणाऽपकृतं भवेत् ॥मम को ह्यपराध्येत निर्दोषसुखरूपिणः ।अतो मय्यपराधस्तु स्वस्मिन्नेव न मे भवेत् ॥अतो यच्चासुरावेशात्कृतमेतेन दुष्कृतम् ।अनादिभक्तो यस्मान्मे मोचयिष्ये ततस्त्वहम् ॥इति मत्वा मोचयति चैद्यादीनपि केशवः''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २८-३० ॥ | |||
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| verse_line1 = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः । | |||
| verse_line2 = आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥ | |||
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कामादिभिरपि यथावद्भक्त्या सहैव मन आवेश्य तदघं यत्तु द्वेषादिकृतमघं यथाभूतया भक्त्या हित्वा ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः । | |||
| verse_line2 = सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥ | |||
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'गोप्यः कामयुता भक्ताः कंसाविष्टः स्वयं भृगुः ।ज्ञेयो भययुतो भक्तश्चैद्यादिस्था जयादयः ॥विद्वेषसंयुता भक्ता वृष्णयो बन्धुसंयुताः ।बहुमानस्नेहसाम्याद्देवा भक्ताः प्रकीर्तिताः ॥स्नेहोपसर्जनादेव बहुमानान्मुनीश्वराः ।बहुमानोऽपि देवानामृषिभ्योऽप्यधिको मतः ॥ब्रह्मवीन्द्रेन्द्र-कामादेरितरेषां यथाक्रमम्''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ | |||
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| verse_line1 = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति । | |||
| verse_line2 = तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥ | |||
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कतमोऽपि भक्तियोगो न वेनस्य । तस्मात्केनापि प्रकारेण उपायेनैव मनो निवेशयेत् । नानुपायेन ।'उपायो भक्तिरुद्दिष्टो द्वेषाद्या अनुपायकाः''। इति शब्दनिर्णये ॥ | |||
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| verse_line1 = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव । | |||
| verse_line2 = पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥ | |||
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स्वतो भक्ताश्चैद्यादयोऽपि परावेशाद्द्वेषिण इत्यत्र हेतुर्मातृष्वस्रेय इत्यादि ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः । | |||
| verse_line2 = दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥ | |||
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द्वास्थावित्यनेनाधिकारस्थत्वमुक्तम् ।'अधिकारस्थिताश्चैव विमुक्ताश्च द्विधा जनाः ।विष्णुलोकस्थितास्तेषां वरशापादियोगिनः ॥अधिकारस्थिता मुक्तिं नियतं प्राप्नुवन्ति च ।विमुक्त्यनन्तरं तेषां वरशापादयो न तु ॥देहेन्द्रियासुयुक्ताश्च पूर्वं पश्चान्न तैर्युताः ।अप्यभीमानिभिस्तेषां देवैः स्वात्मोत्तमैर्युताः''॥ इति तन्त्रसारे ॥३८॥ | |||
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| verse_line1 = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् । | |||
| verse_line2 = भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥ | |||
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सर्वभूतात्मनि भूतम् ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_line1 = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव । | |||
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'हिरण्यकशिपुर्भूतममन्यत मृतौ हरिम् ।अतो भयानको जातस्तत्र राजानमेव च ॥मत्वा राजैव सञ्जातः कृष्णं चक्रादिलक्षणैः ।मृतिकाले हरिं चैव मत्वा भक्त्यैव केवलम् ॥द्वाःस्थत्वं हरिमाविश्य प्रापैव मनुजोऽपि तु''॥ इति गारुडे ॥'विष्णुभक्तेश्च तज्ज्ञानादन्यतो मुक्तिवाचकाः ।विष्णोर्गुणह्रासवाचः श्रीब्रह्मादेस्तथा क्रमात् ॥विष्ण्वादिद्वेषतश्चैव सुखवाचस्तथाऽखिलाः ।मोहनार्थाः समुद्दिष्टा यथार्थद्योतकास्तथा''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ४५-४६ ॥ | |||
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| verse_line1 = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् । | |||
| verse_line2 = नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४८ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C07_S01_V48 | |||
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| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
वैरानुबन्धः वैरयुक्ता भक्तिः ।'अनुबन्धस्तु भक्तिः स्याद्बन्धः स्नेह उदाहृत''॥ इति च ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
प्रथमोऽध्यायः
निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥
'बाध्यादिस्थो हरिर्नित्यं बाध्यतादिगतेत्यपि ।गीयते न तु बाध्यत्वादिदोषयुतत्वतः॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥
ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥
'दधिस्थघृतवत्काष्ठे वह्निवच्च जनार्दनः ।देहेन्द्रियासुजीवेभ्यो विविच्य ज्ञायते न तु॥ इति च ॥
कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥
प्रधानपुंभ्यां सह ॥
य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥
काले कालविषयेऽपीशिता । देहादिकारणत्वात् सुरानीकमिव स्थितं सत्वम् ।'स्वभावतः प्रियत्वात्तु सदा देवप्रियो हरिः ।अप्रियश्चासुराणां स स्वभावात्तूभयं नृणाम् ॥देशकालौ गुणांश्चैव भक्त्यादीनप्यपेक्ष्य तु ।योग्यतां च तथा कर्म सम इत्यभिधीयते ॥स्वतः प्रियोऽपि देवानामुत्पाद्यैव गुणानिमान् ।इतरेषां तथा दोषान्सुखदुःखे ददात्यजः ॥उभयं तु मनुष्याणामतः सम इतीरितः ।अनादिनियताश्चैव गुणदोषाः सुरादिषु ॥यथाक्रमं पुनश्चैव नियमाद्वर्धितास्तथा ।विष्णुनैव ततो नित्यं विषमश्च जनार्दनः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥'न विष्णोर्विषमत्वं तु योग्यतापेक्षया क्वचित् ।योग्यतायास्तन्नियत्या विषमत्वं भवेदिति॥ इति स्कान्दे ॥'विषमत्वं तु दोषाय शुभाशुभविपर्यये ।अतस्तादृशवैषम्यं ब्रह्मसूत्रे निराकृतम् ॥शुभाशुभनियन्तृत्वं न दोषो गुण एव सः ।अतस्तदिष्टं कृष्णस्य ब्रह्मसूत्रकृतो विभोः॥ इति तन्त्रनिर्णये ॥
शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥
'नियमाद्भुज्यते पुम्भिर्धर्माधर्मफलं मृतौ ।कैश्चिदत्रापि भुज्येत तस्मान्नाधर्ममाचरेत्॥ इति भारते ॥
यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥
कैवल्यात् देहाद्यभावादेव । अकर्तुः तस्यान्यः कर्ता न विद्यते । इदं एषा ।'व्यत्ययोऽतिशयकुत्सनभेदेषुइति सूत्रात् ॥
तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥
कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् । तत्रैव मनसोऽभिनिवेशेन तदन्यं नेक्षते । वैरादीनामेकतमेनापि यो युञ्ज्यात् स नेक्षत इति स्वभावकथनं न विधिः ।'कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद्विष्णुमव्ययम् ।मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः।'तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्॥'अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥'मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥'यदनिन्दत्पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्वरम् ।तस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताद्दुस्तरादघात् ॥हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः॥'वरतोऽपि न मुच्यन्ते द्वेषिणः शापतोऽपि तु ।भक्ता नैव निपात्यन्ते धर्माधर्मैस्तथेतरैः ॥अन्यावेशकृतं यत्तु तद्वराद्यैरपोह्यते ।तद्विरुद्धस्वभावानामन्यथा न कथञ्चनइत्यादेः ॥यस्मादेवं कोऽप्युपद्रवो नास्ति भगवतस्तस्मादेव द्वेषादिनापि मनो योक्तुं शक्यते तत्प्रेरणया । तादृशानां एतदेव चिन्तयति च । अन्यथा आत्मनो दुःखकारणं द्वेषादिकं कथं सर्वनियामको हरिरुत्पादयेत् ॥ २७ ॥
यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥
कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥
एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥
तत्रैव हेतुः । यथा वैरानुबन्धेनेति । यथा वैराभिनिवेशिनः तथा भक्त्यभि-निवेशिनो न सन्ति । तत्कथमन्यथा भक्तानेव बहून्हरिः कुर्यादिति भावः ॥कीटः पेशस्कृतेत्यादि चैद्यादीनां भक्तियुतत्वप्रतिपादनम् । स्नेहाद्यायतननाशादिनाऽप्युपद्रवोऽस्य नास्तीति निर्वैरेणेत्याद्युक्तम् ।'ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुराःइति श्रुतिः ।तन्मयतां मनसस्तत्राभिनिवेशनम् ।'मागधाद्या यथा नित्यं द्वेषादाग्रहिणो हरौ ।न तथाऽऽग्रहिणो भक्ता ऋते ब्रह्माणमव्ययम्॥ इति हरिवंशेषु ॥योगः स्नेहः । संरम्भभययुक्तस्नेहेन ।'प्रीतिः स्नेहस्तथा योगः प्रेमबन्ध इतीर्यते। इति शब्दनिर्णये ॥वैरयुक्तयाऽप्यनुचिन्तया तमापुः ।'अनुचिन्तेति तामाहुर्भक्तिपूर्वा तु या स्मृतिः। इति च ॥'स्नेहादन्नं ददातीति स्वाकर्षणभयेऽपि च ।विद्यमानेऽप्यल्पकोपे सङ्गतिस्नेहतस्तथा ॥पेशस्कृद्रूपतां कीटो यथा याति तथैव तु ।चैद्यादयोऽसुरावेशशाद्धरौ द्वेषयुता अपि ॥निजस्वभावया भक्तया नीता हरिसरूपताम् ।तथा हि करुणो विष्णुरन्यावेशाद्यदि द्विषन् ॥हीयते किं ममानेन नित्यानन्द स्वरूपिणः ।देहबन्धयुतानां हि द्वेषिणाऽपकृतं भवेत् ॥मम को ह्यपराध्येत निर्दोषसुखरूपिणः ।अतो मय्यपराधस्तु स्वस्मिन्नेव न मे भवेत् ॥अतो यच्चासुरावेशात्कृतमेतेन दुष्कृतम् ।अनादिभक्तो यस्मान्मे मोचयिष्ये ततस्त्वहम् ॥इति मत्वा मोचयति चैद्यादीनपि केशवः॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २८-३० ॥
कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥
कामादिभिरपि यथावद्भक्त्या सहैव मन आवेश्य तदघं यत्तु द्वेषादिकृतमघं यथाभूतया भक्त्या हित्वा ॥ ३१ ॥
गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥
'गोप्यः कामयुता भक्ताः कंसाविष्टः स्वयं भृगुः ।ज्ञेयो भययुतो भक्तश्चैद्यादिस्था जयादयः ॥विद्वेषसंयुता भक्ता वृष्णयो बन्धुसंयुताः ।बहुमानस्नेहसाम्याद्देवा भक्ताः प्रकीर्तिताः ॥स्नेहोपसर्जनादेव बहुमानान्मुनीश्वराः ।बहुमानोऽपि देवानामृषिभ्योऽप्यधिको मतः ॥ब्रह्मवीन्द्रेन्द्र-कामादेरितरेषां यथाक्रमम्॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥
कतमोऽपि भक्तियोगो न वेनस्य । तस्मात्केनापि प्रकारेण उपायेनैव मनो निवेशयेत् । नानुपायेन ।'उपायो भक्तिरुद्दिष्टो द्वेषाद्या अनुपायकाः। इति शब्दनिर्णये ॥
मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥
स्वतो भक्ताश्चैद्यादयोऽपि परावेशाद्द्वेषिण इत्यत्र हेतुर्मातृष्वस्रेय इत्यादि ॥ ३४ ॥
पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥
द्वास्थावित्यनेनाधिकारस्थत्वमुक्तम् ।'अधिकारस्थिताश्चैव विमुक्ताश्च द्विधा जनाः ।विष्णुलोकस्थितास्तेषां वरशापादियोगिनः ॥अधिकारस्थिता मुक्तिं नियतं प्राप्नुवन्ति च ।विमुक्त्यनन्तरं तेषां वरशापादयो न तु ॥देहेन्द्रियासुयुक्ताश्च पूर्वं पश्चान्न तैर्युताः ।अप्यभीमानिभिस्तेषां देवैः स्वात्मोत्तमैर्युताः॥ इति तन्त्रसारे ॥३८॥
तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥
सर्वभूतात्मनि भूतम् ॥ ४४ ॥
ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥
तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥
'हिरण्यकशिपुर्भूतममन्यत मृतौ हरिम् ।अतो भयानको जातस्तत्र राजानमेव च ॥मत्वा राजैव सञ्जातः कृष्णं चक्रादिलक्षणैः ।मृतिकाले हरिं चैव मत्वा भक्त्यैव केवलम् ॥द्वाःस्थत्वं हरिमाविश्य प्रापैव मनुजोऽपि तु॥ इति गारुडे ॥'विष्णुभक्तेश्च तज्ज्ञानादन्यतो मुक्तिवाचकाः ।विष्णोर्गुणह्रासवाचः श्रीब्रह्मादेस्तथा क्रमात् ॥विष्ण्वादिद्वेषतश्चैव सुखवाचस्तथाऽखिलाः ।मोहनार्थाः समुद्दिष्टा यथार्थद्योतकास्तथा॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ४५-४६ ॥
वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् ।नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४८ ॥
वैरानुबन्धः वैरयुक्ता भक्तिः ।'अनुबन्धस्तु भक्तिः स्याद्बन्धः स्नेह उदाहृत॥ इति च ॥