Bhagavatatatparyanirnaya/C6/S16: Difference between revisions
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एष नित्योऽव्ययः ।'अनित्यसम्बन्धयुताः पित्राद्या नित्ययुग्घरिः''॥ इति च ।आत्मानं चावताररूपेण सृजते ॥ ९ ॥ | |||
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'भोक्ता सद्गुणभोक्तृत्वान्न भोक्ता तदवृद्धितः ।अचिन्त्यशक्तितस्तच्च युज्यते परमेशितुः''॥ इति च ॥ ११ ॥ | |||
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मृन्मयेष्विव मृज्जातिः ।'पृथिवी पर्वताश्चैव मृन्मयाः समुदीरिताः ।तेषु मृज्जातयः सर्वे जायन्ते स्थावरादयः''॥ इति च ॥ २२ ॥ | |||
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'अन्यान्तर्यामिणं विष्णुमुपास्यान्यसमीपगः ।भवेद्योग्यतया तस्य पदं वा प्राप्नुयान्नरः''॥ इति नारदीये ॥ २९ ॥ | |||
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अनेन प्रकारेण मुहुस्तत्सकाशमभ्ययात् ।'शेषान्तर्यामिणं विष्णुं चित्रकेतुरुपास्य तु ।शेषाविष्टहरेश्चापि वरान्प्राप्याप तद्गतिम्''॥ इति तन्त्रमालायाम् ॥ ३१ ॥ | |||
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'हरिस्तु सर्वभूतानि तदन्तर्याम्यपेक्षया ।तिङ्पदान्यपि सर्वाणि सुप्पदानि तथैव च ।तस्मिन्नेव प्रवर्तन्ते मुख्यवृत्त्या विशेषतः''॥ इति च ॥ ५१ ॥ | |||
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प्रतिबोधेऽन्वेति स्वयमपि प्रतिबुद्धः । सुप्तावस्वपन्व्यतिरिच्येत ॥ ५६ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये षष्ठस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'सर्वभिन्नं परात्मानं विस्मरन्संसरेदिह ।अभिन्नं संस्मरन्याति तमो नास्त्यत्र संशयः''॥ इति च ॥ ५७ ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
षोडशोऽध्यायः
एष नित्योऽव्ययः सूक्ष्म एकः सर्वाश्रयः स्वदृक् ।आत्ममायागुणैर्विश्वमात्मानं सृजते प्रभुः ॥ ९ ॥
एष नित्योऽव्ययः ।'अनित्यसम्बन्धयुताः पित्राद्या नित्ययुग्घरिः॥ इति च ।आत्मानं चावताररूपेण सृजते ॥ ९ ॥
नादत्त आत्मा हि गुणं न दोषं न क्रियाफलम् ।उदासीन इवासीनः परावरदृगीश्वरः ॥ ११ ॥
'भोक्ता सद्गुणभोक्तृत्वान्न भोक्ता तदवृद्धितः ।अचिन्त्यशक्तितस्तच्च युज्यते परमेशितुः॥ इति च ॥ ११ ॥
वचस्युपरते प्राप्यो य एको मनसा सह ।अनामरूपचिन्मात्रः सोऽव्ययः सदसत्परः ॥२१॥
बाह्यमनस्युपरते चिन्मात्रमनसा सह प्राप्यः ॥ २१ ॥
यस्मिन्निदं यतश्चेदं तिष्ठत्यप्येति जायते ।मृन्मयेष्विव मृज्जातिस्तस्मै ते ब्रह्मणे नमः ॥ २२ ॥
मृन्मयेष्विव मृज्जातिः ।'पृथिवी पर्वताश्चैव मृन्मयाः समुदीरिताः ।तेषु मृज्जातयः सर्वे जायन्ते स्थावरादयः॥ इति च ॥ २२ ॥
ततः कतिपयाहोभिर्विद्ययेद्धमनोगतिः ।जगाम देवदेवस्य शेषस्य चरणान्तिकम् ॥ २९ ॥
'अन्यान्तर्यामिणं विष्णुमुपास्यान्यसमीपगः ।भवेद्योग्यतया तस्य पदं वा प्राप्नुयान्नरः॥ इति नारदीये ॥ २९ ॥
तद्दर्शनध्वस्तसमस्तकिल्बिषः स्वच्छामलान्तःकरणोऽभ्ययान्मुहुः ।प्रवृद्धभक्त्याऽऽप्रणयाश्रुलोचनः
अनेन प्रकारेण मुहुस्तत्सकाशमभ्ययात् ।'शेषान्तर्यामिणं विष्णुं चित्रकेतुरुपास्य तु ।शेषाविष्टहरेश्चापि वरान्प्राप्याप तद्गतिम्॥ इति तन्त्रमालायाम् ॥ ३१ ॥
अहं वै सर्वभूतानि भूतात्मा भूतभावनः ।शब्दब्रह्म परं ब्रह्म ममोभे शाश्वती तनू ॥ ५१ ॥
'हरिस्तु सर्वभूतानि तदन्तर्याम्यपेक्षया ।तिङ्पदान्यपि सर्वाणि सुप्पदानि तथैव च ।तस्मिन्नेव प्रवर्तन्ते मुख्यवृत्त्या विशेषतः॥ इति च ॥ ५१ ॥
लोकेऽविततमात्मानं लोकं चात्मनि सन्ततम् ।उभयं च मया व्याप्तं मयि चैवोभयं कृतम् ॥ ५२ ॥
लोकं चात्मनि सन्ततं वासनारूपेण ॥ ५२ ॥
एवं जागरणादीनि जीवस्थानानि चात्मनः ।मायामात्राणि विज्ञाय तद्द्रष्टारं परं स्मरेत् ॥ ५४ ॥
मायामात्राणि प्रकृतिनिर्मितानि ॥ ५४ ॥
उभयं स्मरतः पुंसः प्रस्वापप्रतिबोधयोः ।अन्वेति व्यतिरिच्येत तज्ज्ञानं ब्रह्म तत् परम् ॥ ५६ ॥
प्रतिबोधेऽन्वेति स्वयमपि प्रतिबुद्धः । सुप्तावस्वपन्व्यतिरिच्येत ॥ ५६ ॥
यद्येष विस्मृतः पुंसो मद्भावो भिन्न आत्मनः ।ततः संसार एतस्य देहाद् देहो मृतेर्मृतिः ॥ ५७ ॥
'सर्वभिन्नं परात्मानं विस्मरन्संसरेदिह ।अभिन्नं संस्मरन्याति तमो नास्त्यत्र संशयः॥ इति च ॥ ५७ ॥