Bhagavatatatparyanirnaya/C6/S15: Difference between revisions
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| verse_line1 = वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः । | |||
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| verse_line1 = रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः । | |||
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| verse_line1 = हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः । | |||
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' नारायणायना देवा ऋष्याद्यास्तत्परायणाः ।ब्रह्माद्याः केचनैव स्युः सिद्धो योग्यसुखं लभन् ॥ "इति तन्त्रभागवते'नवकोट्यस्तु देवानामृषयः शतकोटयः ।नारायणायनाः सर्वे ये केचित्तत्परायणाः''॥ इति च ॥ १५-१९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते । | |||
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| verse_line1 = सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः । | |||
| verse_line2 = गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाः | |||
| verse_line2 = कर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥ | |||
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'मनसो द्वेषरागाभ्यां पुण्यपापसमुद्भवः ।पुत्रादि पुण्यपापाभ्यां तस्मात्सर्वं मनोभवम्''॥ इति नारदीये ॥ २५-२८ ॥ | |||
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| verse_line2 = देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥ | |||
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'द्रव्यात्मकः स्थूलदेहः क्रिया कर्मेन्द्रियाणि च ।ज्ञानेन्द्रियाणि च मनो ज्ञानात्मकमुदाहृतम्''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥'कार्यकारणयोरेकशब्दव्यवहृतिर्भवेत्''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ २९ ॥ | |||
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'अनन्यापेक्षितस्त्वेको हरिरन्यद्द्वयं स्मृतम् ।अन्यापेक्षत्वतस्तेन प्राप्तत्वाद्द्वैतमुच्यते''॥ इति च ॥ ३० ॥ | |||
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| verse_line1 = यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वे | |||
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| verse_line3 = सद्यस्तदीयमतुलानधिकं महित्वं | |||
| verse_line4 = प्रापुर्भवानपि परं न चिरादुपैति ॥ ३६ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये षष्ठस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'रुद्राद्याः शेषदेहस्थं विष्णुं संकर्षणाभिधम् ।शेषान्तर्यामिणं ज्ञात्वा स्वपदं प्रापुरञ्जसा''॥ इति तन्त्रभागवते ।'द्वैतेन बन्धसंत्यागाद्द्वैतत्यागी भवत्युत''॥ इति शब्दनिर्णये ।देहाद्येऽहंममाभिमानो भ्रमः ।'तेषां तेषां पदान्येव वैष्णवानि पदानि तु ।तेषां महित्वं च तथा हरेस्तद्वशगं यतः ॥अतुल्यानधिकं चैव तस्य तस्यैव मुक्तिगम् ।स्वस्यैव पूर्वमाहात्म्यमपेक्ष्य न हरेः क्वचित् ॥माहात्म्यमन्यप्राप्यं स्यान्न ते विष्णविति श्रुतेः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥'ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान्केवलो हरिः''॥ इति स्कान्दे ॥तत्प्रसादलभ्यत्वात्तदीयमपि तेनातुलमनधिकं चान्यमाहात्म्यम् ॥३६॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
पञ्चदशोऽध्यायः
चरन्ति ह्यवनौ कामं ब्राह्मणा भगवत्प्रियाः ।मादृशां ग्राम्यबुद्धीनां बोधायोन्मत्तलिङ्गिनः ॥ १५ ॥
कुमारो नारद ऋभुरङ्गिरा देवलोऽसितः ।अपान्तरतमो व्यासो मार्कण्डेयोऽथ गौतमः ॥ १६ ॥
वसिष्ठो भगवान् रामः कपिलो बादरायणिः ।दूर्वासा याज्ञवल्क्यश्च जातूकर्ण्यस्तथाऽऽरुणिः ॥ १७ ॥
रोमशश्च्यवनो दत्त आसुरिः सपतञ्जलिः ।पराशरोऽथ मैत्रेयो भरद्वाजश्च आरुणः ।
हिरण्यनाभः कौशल्यः श्रुतदेवः क्रतुध्वजः ।एते परे च सिद्धेशाश्चरन्ति ज्ञानहेतवः ॥ १९ ॥
' नारायणायना देवा ऋष्याद्यास्तत्परायणाः ।ब्रह्माद्याः केचनैव स्युः सिद्धो योग्यसुखं लभन् ॥ "इति तन्त्रभागवते'नवकोट्यस्तु देवानामृषयः शतकोटयः ।नारायणायनाः सर्वे ये केचित्तत्परायणाः॥ इति च ॥ १५-१९ ॥
अधुना पुत्रिणां तापो भवतैवानुभूयते ।एवं दारा गृहा रायो विविधैश्वर्यसम्पदः ॥ २५ ॥
सर्वेऽपि शूरसेनेमे शोकमोहभयार्तिदाः ।गन्धर्वनगरप्रख्याः स्वप्नमायामनोरथाः ॥ २७ ॥
दृश्यमाना विनाऽर्थेन न दृश्यन्ते मनोभवाःकर्माभिध्यायतो नाना कर्माणि मनसोऽभवन् ॥ २८ ॥
'मनसो द्वेषरागाभ्यां पुण्यपापसमुद्भवः ।पुत्रादि पुण्यपापाभ्यां तस्मात्सर्वं मनोभवम्॥ इति नारदीये ॥ २५-२८ ॥
अयं हि देहिनो देहो द्रव्यज्ञानक्रियात्मकः ।देहिनो विविधक्लेशसन्तापकृदुदाहृतः ॥ २९ ॥
'द्रव्यात्मकः स्थूलदेहः क्रिया कर्मेन्द्रियाणि च ।ज्ञानेन्द्रियाणि च मनो ज्ञानात्मकमुदाहृतम्॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥'कार्यकारणयोरेकशब्दव्यवहृतिर्भवेत्॥ इति शब्दनिर्णये ॥ २९ ॥
तस्मात् स्वस्थेन मनसा विमृश्य गतिमात्मनः ।द्वैते ध्रुवार्थविश्रम्भं त्यजोपशममाविश ॥ ३० ॥
'अनन्यापेक्षितस्त्वेको हरिरन्यद्द्वयं स्मृतम् ।अन्यापेक्षत्वतस्तेन प्राप्तत्वाद्द्वैतमुच्यते॥ इति च ॥ ३० ॥
यत्पादमूलमुपसृत्य नरेन्द्र पूर्वेशर्वादयो भ्रममिमं द्वितयं विसृज्य ।
'रुद्राद्याः शेषदेहस्थं विष्णुं संकर्षणाभिधम् ।शेषान्तर्यामिणं ज्ञात्वा स्वपदं प्रापुरञ्जसा॥ इति तन्त्रभागवते ।'द्वैतेन बन्धसंत्यागाद्द्वैतत्यागी भवत्युत॥ इति शब्दनिर्णये ।देहाद्येऽहंममाभिमानो भ्रमः ।'तेषां तेषां पदान्येव वैष्णवानि पदानि तु ।तेषां महित्वं च तथा हरेस्तद्वशगं यतः ॥अतुल्यानधिकं चैव तस्य तस्यैव मुक्तिगम् ।स्वस्यैव पूर्वमाहात्म्यमपेक्ष्य न हरेः क्वचित् ॥माहात्म्यमन्यप्राप्यं स्यान्न ते विष्णविति श्रुतेः॥ इति तन्त्रभागवते ॥'ब्रह्मेशानादिभिर्देवैर्यत्प्राप्तुं नैव शक्यते ।तद्यत्स्वभावः कैवल्यं स भवान्केवलो हरिः॥ इति स्कान्दे ॥तत्प्रसादलभ्यत्वात्तदीयमपि तेनातुलमनधिकं चान्यमाहात्म्यम् ॥३६॥