Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S18: Difference between revisions
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'अप्रयासेन कर्तृत्वमकर्तृत्वमिहोच्यते ।महाशक्तित्वतस्तच्च युज्यते परमस्य तु''॥ इति तन्त्रसारे ॥ ५ ॥ | |||
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'कामदेवस्थितं विष्णुमुपास्ते श्री रतिस्थिता ।कामदेवं रतिश्चापि विष्णोस्तु प्राकृतां तनुम्''॥इति ब्रह्माण्डे ॥ १५,१७ ॥ | |||
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'स्पर्धन्त इव देवास्तु हरिणा यत्र कुत्रचित् ।हरेरेवाज्ञया क्वापि दैत्यावेशादथापि वा''॥ इति च ॥ २७ ॥ | |||
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उपलम्भनादयथा । यथा दृष्टं तथा न तिष्ठत्यन्यथाभवतीत्यर्थः ॥ ३१ ॥ | |||
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'सर्वान्तर्यामिकत्वात्तु सर्वनामा हरिः स्वयम् ।न तु सर्वस्वरूपत्वाद्रूपत्वमुपचारतः''॥ इति च ॥ ३२ ॥ | |||
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दशावतार इत्यादिसङ्ख्या विनीयते विशेषेण नीयते तज्ज्ञानं तद्रूपमेव हि॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line4 = गूढं क्रियार्थैर्नम ईरितात्मने ॥ ३६ ॥ | |||
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क्रियार्थैर्यज्ञाद्यर्थैरिन्द्रादिनामभिरीरितात्मने ॥ ३६ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे अष्टादशोऽध्यायः ॥}} | |||
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मायागुणैः तदिच्छानुसारिभिः ।'द्रव्येशः शङ्करः प्रोक्तः क्रियेशो गरुडः स्मृतः ।कारणेशस्तथा ब्रह्मा वायुराधारपः स्मृतः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ३७ ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
अष्टादशोऽध्यायः
विश्वोद्भवस्थाननिरोधकर्म तेह्यकर्तुरङ्गीकृतमप्यपावृतम् ।
'अप्रयासेन कर्तृत्वमकर्तृत्वमिहोच्यते ।महाशक्तित्वतस्तच्च युज्यते परमस्य तु॥ इति तन्त्रसारे ॥ ५ ॥
केतुमाले भगवान्कामदेवस्वरूपेणास्ते लक्ष्म्याः प्रियचिकीर्षया प्रजापतेर्दुहितॄणां च तद्वर्षपतीनां पुरुषायुषाऽहोरात्रपरिसङ्ख्यानानां यासां गर्भा महापुरुषमहास्त्रतेजसोद्वेजितमनसां विध्वस्ता व्यसवः संवत्सरान्ते निपतन्ति ॥ १५ ॥
तद्भगवतो मायामयं रूपं परमसमाधियोगेन रमादेवी संवत्सरस्य रात्रिषु प्रजापतेर्दुहितृभिरुपेताऽहस्सु तद्भर्तृभिरुपेतोपास्ते । इदं चोदाहरति ॥ १७ ॥
'कामदेवस्थितं विष्णुमुपास्ते श्री रतिस्थिता ।कामदेवं रतिश्चापि विष्णोस्तु प्राकृतां तनुम्॥इति ब्रह्माण्डे ॥ १५,१७ ॥
यं लोकपालाः किल मत्सरज्वराहित्वा यतन्तोऽपि पृथक्समेत्य च ।
'स्पर्धन्त इव देवास्तु हरिणा यत्र कुत्रचित् ।हरेरेवाज्ञया क्वापि दैत्यावेशादथापि वा॥ इति च ॥ २७ ॥
यद्रूपमेतन्निजमाययाऽर्पितंअर्थस्वरूपं बहुरूपरूपितम् ।
उपलम्भनादयथा । यथा दृष्टं तथा न तिष्ठत्यन्यथाभवतीत्यर्थः ॥ ३१ ॥
जरायुजं स्वेदजमण्डजोद्भिजंचराचरं देवर्षिपितृभूतभेदम् ।
'सर्वान्तर्यामिकत्वात्तु सर्वनामा हरिः स्वयम् ।न तु सर्वस्वरूपत्वाद्रूपत्वमुपचारतः॥ इति च ॥ ३२ ॥
यस्मिन्नसंख्येयविशेषनाम-रूपाकृतौ कविभिः कल्पितेयम् ।
दशावतार इत्यादिसङ्ख्या विनीयते विशेषेण नीयते तज्ज्ञानं तद्रूपमेव हि॥ ३३ ॥
यस्य स्वरूपं कवयो विपश्चितोगुणेषु योनिष्विव जातवेदसम् ।
क्रियार्थैर्यज्ञाद्यर्थैरिन्द्रादिनामभिरीरितात्मने ॥ ३६ ॥
द्रव्यक्रियाहेत्वयनेशकर्तृभि-र्मायागुणैर्वस्तुनिरीक्षितात्मने ।
मायागुणैः तदिच्छानुसारिभिः ।'द्रव्येशः शङ्करः प्रोक्तः क्रियेशो गरुडः स्मृतः ।कारणेशस्तथा ब्रह्मा वायुराधारपः स्मृतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ ३७ ॥