Jump to content

Bhagavatatatparyanirnaya/C5/S5: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
 
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Line 9: Line 9:
}}
}}
== पञ्चमोऽध्यायः ==
== पञ्चमोऽध्यायः ==
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V05
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।
| verse_line2  = तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V05
| id      = BTN_C05_S05_V05_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
क्रियाफलं तावदेव । कर्मात्मकं कर्मवशम् ॥ ५ ॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V06
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।
| verse_line2  = प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V06
| id      = BTN_C05_S05_V06_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
अविद्यया प्रयुङ्क्ते ॥ ६ ॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V08
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।
| verse_line2  = यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V08
| id      = BTN_C05_S05_V08_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
'ब्रह्माद्या याज्ञवल्क्याद्या मुच्यन्ते स्त्रीसहायिनः ।बध्यन्ते केचनैतेषां विशेषं च विदो विदुः''॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥८॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V10
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।
| verse_line2  = सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V10
| id      = BTN_C05_S05_V10_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
'आत्मनो विहितं कर्म वर्जयित्वाऽन्यकर्मणः ।कामस्य च परित्यागो निरीहेत्याहुरुत्तमाः''॥ इति च ॥ १० ॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V13
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सर्वत्र मद्भावविचक्षणेन
| verse_line2  = ज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।
| verse_line3  = योगेन धृत्युद्भवसत्वयुक्तो
| verse_line4  = लिङ्गं व्यपोहेत्कुशलोऽहमाख्यम् ॥ १३ ॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V13
| id      = BTN_C05_S05_V13_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
'सर्वस्मादुत्तमो विष्णुरिति ज्ञानमुदाहृतम् ।प्रतिजीवं येन मुक्तिस्तद्विज्ञानं विदां मतम्''॥ इति च ।'ज्ञानं विष्णोरुत्तमत्वे तदेव प्रतिपूरुषम् ।विशेषेण तु विज्ञानं तच्च जानाति सर्ववित् ॥द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युक्तस्तीक्ष्णदंष्ट्रश्च सौम्यदृक् ।घोररुक्चापि पुरुषः स सर्वज्ञ उदाहृतः''॥ इत्यध्यात्मे ॥'षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।सप्तपादश्चतुर्हस्तः स देवैरपि पूज्यते''॥ इति वायुप्रोक्ते ॥'न्यग्रोधमण्डलो व्यामो बाहू न्यग्रोध उच्यते''॥ इति च ॥ १३ ॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V20
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।
| verse_line2  = अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V20
| id      = BTN_C05_S05_V20_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
'नाभिरित्यथ नाम स्याद्धरेः सर्वाश्रयो यतः''। इति कौर्मे ।तत्तस्य मम शुश्रूषणम् ॥ २० ॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V22
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानो
| verse_line2  = दक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् ।
| verse_line3  = भवः परः सोथ विरिञ्चिवीर्यः
| verse_line4  = स मत्परोहं द्विजदेवदेवः ॥ २२ ॥
}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V22
| id      = BTN_C05_S05_V22_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
द्विजदेवानां देवः ॥ २२ ॥
}}
{{VerseBlock
| verse_id      = BTN_C05_S05_V26
| document_id  = BTN
| chapter_id    = BTN_C05
| section_id    = BTN_C05_S05
| adhikarana    =
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि-
| verse_line2  = श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि ।
| verse_line3  = सम्भावितव्यानि पदेपदे वो
| verse_line4  = विविक्तदृष्टिस्तदुतार्हणं मे ॥ २६ ॥
}}
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये पञ्चमस्कन्धे पञ्चमोऽध्यायः ॥}}
{{Commentary
| verse_id = BTN_C05_S05_V26
| id      = BTN_C05_S05_V26_B1
| name    = Bhashyam
| label    = Bhashyam
| text    =
विविक्तदृष्टिर्जीवानां धिष्ण्यतया परमेश्वरस्य भेददृष्टिः ।'उपपादयेत्परात्मानं जीवेभ्यो यः पदेपदे ।भेदेनैव न चैतस्मात्प्रियो विष्णोस्तु कश्चन''॥ इति पाद्मे ॥'यो हरेश्चैव जीवानां भेदवक्ता हरेः प्रियः''। इति च ॥ २६ ॥
}}




[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]]
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]]

Revision as of 05:34, 8 April 2026

पञ्चमोऽध्यायः

पराभवस्तावदबोधजातो यावन्न जिज्ञासत आत्मतत्त्वम् ।तावत्क्रियास्तावदिदं मनो वै कर्मात्मकं येन शरीरबन्धः ॥५॥


क्रियाफलं तावदेव । कर्मात्मकं कर्मवशम् ॥ ५ ॥
एवं मनः कर्मवशं प्रयुङ्क्त अविद्ययात्मन्व्यवधीयमाने ।प्रीतिर्न यावन्मयि वासुदेवे न मुच्यते देहयोगेन तावत् ॥ ६ ॥


अविद्यया प्रयुङ्क्ते ॥ ६ ॥
पुंसः स्त्रिया मिथुनीभाव एष तयोर्मिथो हृदयग्रन्थिमाहुः ।यतो गृहक्षेत्रसुताप्तवित्तैर्जनस्य मोहोऽयमहं ममेति ॥ ८ ॥


'ब्रह्माद्या याज्ञवल्क्याद्या मुच्यन्ते स्त्रीसहायिनः ।बध्यन्ते केचनैतेषां विशेषं च विदो विदुः॥ इति सत्यसंहितायाम् ॥८॥
हरौ गुरौ मयि भक्त्यानुवृत्त्या वितृष्णया द्वन्द्वतितिक्षया च ।सर्वत्र जन्तोर्व्यसनावगत्या जिज्ञासया तपसेहानिवृत्त्या ॥१०॥


'आत्मनो विहितं कर्म वर्जयित्वाऽन्यकर्मणः ।कामस्य च परित्यागो निरीहेत्याहुरुत्तमाः॥ इति च ॥ १० ॥
सर्वत्र मद्भावविचक्षणेनज्ञानेन विज्ञानविराजितेन ।


'सर्वस्मादुत्तमो विष्णुरिति ज्ञानमुदाहृतम् ।प्रतिजीवं येन मुक्तिस्तद्विज्ञानं विदां मतम्॥ इति च ।'ज्ञानं विष्णोरुत्तमत्वे तदेव प्रतिपूरुषम् ।विशेषेण तु विज्ञानं तच्च जानाति सर्ववित् ॥द्वात्रिंशल्लक्षणैर्युक्तस्तीक्ष्णदंष्ट्रश्च सौम्यदृक् ।घोररुक्चापि पुरुषः स सर्वज्ञ उदाहृतः॥ इत्यध्यात्मे ॥'षण्णवत्यङ्गुलो यस्तु न्यग्रोधपरिमण्डलः ।सप्तपादश्चतुर्हस्तः स देवैरपि पूज्यते॥ इति वायुप्रोक्ते ॥'न्यग्रोधमण्डलो व्यामो बाहू न्यग्रोध उच्यते॥ इति च ॥ १३ ॥
तस्माद्भवन्तो हृदयेन जाताः सर्वे महीयांसममुं सुनाभम् ।अक्लृष्टबुद्ध्या भरतं भजध्वं शुश्रूषणं तद्भरणं प्रजानाम् ॥२०॥


'नाभिरित्यथ नाम स्याद्धरेः सर्वाश्रयो यतः। इति कौर्मे ।तत्तस्य मम शुश्रूषणम् ॥ २० ॥
देवासुरेभ्यो मघवान् प्रधानोदक्षादयो ब्रह्मसुताश्च तेषाम् ।


द्विजदेवानां देवः ॥ २२ ॥
सर्वाणि मद्धिष्ण्यतया भवद्भि-श्चराणि भूतानि सुता ध्रुवाणि ।


Template:AuthorNote

विविक्तदृष्टिर्जीवानां धिष्ण्यतया परमेश्वरस्य भेददृष्टिः ।'उपपादयेत्परात्मानं जीवेभ्यो यः पदेपदे ।भेदेनैव न चैतस्मात्प्रियो विष्णोस्तु कश्चन॥ इति पाद्मे ॥'यो हरेश्चैव जीवानां भेदवक्ता हरेः प्रियः। इति च ॥ २६ ॥