Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S23: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== त्रयोविंशोऽध्यायः == | == त्रयोविंशोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V11 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म- | |||
| verse_line2 = सत्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्व्या । | |||
| verse_line3 = ज्ञानं विरक्तिमदभून्निशितेन येन | |||
| verse_line4 = चिच्छेद संशयपदं निजजीवकोशम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V11 | |||
| id = BTN_C04_S23_V11_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'आविर्भावतिरोभावौ ज्ञानस्य ज्ञानिनोऽपि तु ।अपेक्ष्याज्ञस्तथा ज्ञानमुत्पन्नमिति चोच्यते''॥ इति तन्त्रसारे ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V12 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह- | |||
| verse_line2 = स्तत् तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन । | |||
| verse_line3 = तावन्न योगगतिभिर्यतिरप्रयत्नो | |||
| verse_line4 = यावद् गदाग्रजकथासु रतिं न कुर्यात् ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V12 | |||
| id = BTN_C04_S23_V12_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अपरोक्षतया वृत्तिज्ञानभेदनिरीक्षणम् ।स्वरूपज्ञानसंस्थित्या ज्ञानत्याग उदीर्यते ॥स्वरूपज्ञानतः सम्यग्रतिर्विष्णुकथासु च''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V13 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि । | |||
| verse_line2 = ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वकलेवरम् ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V13 | |||
| id = BTN_C04_S23_V13_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
ब्रह्मणि भूतः ॥ १३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V15 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः । | |||
| verse_line2 = वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V16 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः । | |||
| verse_line2 = क्षितिमम्भसि तत् तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V17 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् । | |||
| verse_line2 = भूतादिस्तान् समुत्क्षिप्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V18 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् । | |||
| verse_line2 = तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् । | |||
| verse_line3 = ज्ञानवैराग्यवीर्येण स्वरूपस्थो व्यधात् प्रभुः ॥ १८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V18 | |||
| id = BTN_C04_S23_V18_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अस्येदं कारणमिति ज्ञानमेव विलापनम् ।समाधिकाले विज्ञेयं देहादेर्दर्शनात्पुनः''॥ इति च ॥ १६ ॥'मायेति प्रकृतिश्चेति मायाजीवश्च कथ्यते ।शेतेऽनुकेशवं यस्मात्तस्मादनुशयोऽपि च ।एतैस्तु नामभिर्वाच्या श्रीर्विष्णोरनपायिनी ॥तयैवानुशयी जीवस्तया बद्धो यतः सदा ।पुरुषः शयनात्पूर्षु तथाऽहानादहं स्मृतः ॥अप्राकृततनुत्वात्तु स्वरूपं हरिरुच्यते ।नित्यचिद्दर्शनान्नित्यं ब्रह्म पूर्णत्वतः सदा''॥ इति भागवततन्त्रे ॥ १५-१८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V25 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S23 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = देव्य ऊचुः – | |||
| verse_line2 = अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् । | |||
| verse_line3 = सर्वात्मना पतिं भेजे यज्ञेशं श्रीवधूरिव ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे त्रयोविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S23_V25 | |||
| id = BTN_C04_S23_V25_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अनपेक्षो गुणैः पूर्णो धन्य इत्युच्यते बुधैः''॥इति शब्दनिर्णये ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
त्रयोविंशोऽध्यायः
तस्यानया भगवतः परिशुद्धकर्म-सत्वात्मनस्तदनु संस्मरणानुपूर्व्या ।
'आविर्भावतिरोभावौ ज्ञानस्य ज्ञानिनोऽपि तु ।अपेक्ष्याज्ञस्तथा ज्ञानमुत्पन्नमिति चोच्यते॥ इति तन्त्रसारे ॥ ११ ॥
छिन्नान्यधीरधिगतात्मगतिर्निरीह-स्तत् तत्यजेऽच्छिनदिदं वयुनेन येन ।
'अपरोक्षतया वृत्तिज्ञानभेदनिरीक्षणम् ।स्वरूपज्ञानसंस्थित्या ज्ञानत्याग उदीर्यते ॥स्वरूपज्ञानतः सम्यग्रतिर्विष्णुकथासु च॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १२ ॥
एवं स वीरप्रवरः संयोज्यात्मानमात्मनि ।ब्रह्मभूतो दृढं काले तत्याज स्वकलेवरम् ॥ १३ ॥
ब्रह्मणि भूतः ॥ १३ ॥
उत्सर्पयन्नसुं मूधर्ि्न क्रमेणावेश्य निस्स्पृहः ।वायुं वायौ क्षितौ कायं तेजस्तेजस्ययूयुजत् ॥ १५ ॥
खान्याकाशे द्रवं तोये यथास्थानं विभागशः ।क्षितिमम्भसि तत् तेजस्यदो वायौ नभस्यमुम् ॥ १६ ॥
इन्द्रियाणि समस्तानि तन्मात्राणि यथोद्भवम् ।भूतादिस्तान् समुत्क्षिप्य महत्यात्मनि सन्दधे ॥ १७ ॥
तं सर्वगुणविन्यासं जीवे मायामये न्यधात् ।तं चानुशयमात्मस्थमसावनुशयी पुमान् ।
'अस्येदं कारणमिति ज्ञानमेव विलापनम् ।समाधिकाले विज्ञेयं देहादेर्दर्शनात्पुनः॥ इति च ॥ १६ ॥'मायेति प्रकृतिश्चेति मायाजीवश्च कथ्यते ।शेतेऽनुकेशवं यस्मात्तस्मादनुशयोऽपि च ।एतैस्तु नामभिर्वाच्या श्रीर्विष्णोरनपायिनी ॥तयैवानुशयी जीवस्तया बद्धो यतः सदा ।पुरुषः शयनात्पूर्षु तथाऽहानादहं स्मृतः ॥अप्राकृततनुत्वात्तु स्वरूपं हरिरुच्यते ।नित्यचिद्दर्शनान्नित्यं ब्रह्म पूर्णत्वतः सदा॥ इति भागवततन्त्रे ॥ १५-१८ ॥
देव्य ऊचुः –अहो इयं वधूर्धन्या या चैवं भूभुजां पतिम् ।
'अनपेक्षो गुणैः पूर्णो धन्य इत्युच्यते बुधैः॥इति शब्दनिर्णये ॥ २५ ॥