Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S20: Difference between revisions
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'देवेभ्य ऋषयो भूपाश्चोच्यन्ते शक्तिमत्तया ।क्वचित्क्वचिन्मोहनार्थं कादाचित्काच्च हेतुतः''इति नारदीये ॥ १० ॥ | |||
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'एकात्मा हरिरुद्दिष्टः प्रधानत्वात्समस्तत''इति च ॥प्राय इत्यवधारणाक्षेपः ।'प्रायःपदं स्यात्प्राचुर्ये चाक्षेपात्मावधारणे ।अर्थतोऽवधृतिः क्षेपो मुखाक्षेपोऽवधारणम्''॥ इति च ॥ २९ ॥ | |||
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सम्पद्यते प्राप्यते ॥ ३३ ॥ | |||
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प्रधानादीन् गृहीत्वा जीवं प्राप्य पुण्यकर्मभिर्ज्ञायते ।यथा गुणवदिन्धनेऽग्निर्मथनादिना ॥ ३४ ॥ | |||
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हरिरिन्द्रो यच्चरणाभिवन्दनादनपायिनीं लक्ष्मीमवाप । सोऽपि विष्णुर्ब्राह्मणप्रियः ।'यत्प्रसादेन देवेन्द्रो वेदोदितयशा अभूत् ।सोऽपि विष्णुरमेयात्मा सदा ब्राह्मणवत्सलः''॥ इति हरिवंशेषु ॥ ३७ ॥ | |||
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तस्मान्मोक्षसुखात्परं हविर्भुजां देवानामप्यत्र संसारेऽस्ति किम् ? ॥३९॥ | |||
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पारमहंस्यवर्या गावो यस्य ॥ ४० ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे एकविंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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अहो वयमित्यादि तत्स्थपरमेश्वरापेक्षया ।'यो ब्रह्मक्षत्रमाविश्य''इति वचनात् ॥ ४८ ॥ | |||
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Revision as of 05:34, 8 April 2026
एकविंशोऽध्यायः
को न्वस्य कीर्तिं नशृृणोत्यभिज्ञोयद्विक्रमोच्छिष्टमशेषभूपाः ।
'देवेभ्य ऋषयो भूपाश्चोच्यन्ते शक्तिमत्तया ।क्वचित्क्वचिन्मोहनार्थं कादाचित्काच्च हेतुतःइति नारदीये ॥ १० ॥
अस्ति यज्ञपतिर्नाम केषांचिदिह सत्तमाः ।इहामुत्र च लक्ष्यन्ते ज्योत्स्नावत्यः क्वचिद् भुवः ॥ २६ ॥
'प्रकाशवद्भुवो देवा मानुषाश्चापि केचन॥ इति वाराहे ॥ २६ ॥
राज्यस्वर्गापवर्गाणां प्रायेणैकात्महेतुता ।दौहित्रादीनृते मृत्योः शोच्यान् धर्मविमोहितान् ॥ २९ ॥
'एकात्मा हरिरुद्दिष्टः प्रधानत्वात्समस्ततइति च ॥प्राय इत्यवधारणाक्षेपः ।'प्रायःपदं स्यात्प्राचुर्ये चाक्षेपात्मावधारणे ।अर्थतोऽवधृतिः क्षेपो मुखाक्षेपोऽवधारणम्॥ इति च ॥ २९ ॥
असाविहानेकगुणाध्वरैः सता पृथग्विधैर्द्रव्यगुणक्रियोक्तिभिः ।सम्पद्यतेऽर्थाशयलिङ्गनामभिर्विशुद्धविज्ञानघनस्वरूपतः ॥३३॥
सम्पद्यते प्राप्यते ॥ ३३ ॥
प्रधानकालाशयकर्मसङ्ग्रहःशरीरशेषं प्रतिपद्य चेतनः ।
प्रधानादीन् गृहीत्वा जीवं प्राप्य पुण्यकर्मभिर्ज्ञायते ।यथा गुणवदिन्धनेऽग्निर्मथनादिना ॥ ३४ ॥
ब्रह्मण्यदेवः पुरुषः पुरातनोनित्यं हरिर्यच्चरणाभिवन्दनात् ।
हरिरिन्द्रो यच्चरणाभिवन्दनादनपायिनीं लक्ष्मीमवाप । सोऽपि विष्णुर्ब्राह्मणप्रियः ।'यत्प्रसादेन देवेन्द्रो वेदोदितयशा अभूत् ।सोऽपि विष्णुरमेयात्मा सदा ब्राह्मणवत्सलः॥ इति हरिवंशेषु ॥ ३७ ॥
पुमाल्लभेताप्यतिवेलमात्मनःप्रसादतोऽत्यन्तशमं स्वतः स्वयम् ।
तस्मान्मोक्षसुखात्परं हविर्भुजां देवानामप्यत्र संसारेऽस्ति किम् ? ॥३९॥
अश्नात्यनन्तः खलु तत्त्वकोविदैःश्रद्धाहुतं यन्मुख इज्यनामभिः ।
पारमहंस्यवर्या गावो यस्य ॥ ४० ॥
पुत्रेण जयते लोक इति सत्यवती श्रुतिः ।ब्रह्मदण्डहतः पापो यद् वेनोऽत्यतरत् तमः ॥ ४५ ॥
'वेनस्थो राजसो जीवः पृथुना स्वर्गतिं गतः ।स्वयं तु तम एवाप सात्विकः पृथुतामगात्॥ इति ब्रह्माण्डे ॥४५॥
अहो वयं ह्यद्य पवित्रकीर्ते त्वयैव नाथेन मुकुन्दनाथाः ।यदुत्तमश्लोकतमस्य विष्णोर्ब्रह्मण्यदेवस्य कथां व्यनक्षि ॥४८॥
अहो वयमित्यादि तत्स्थपरमेश्वरापेक्षया ।'यो ब्रह्मक्षत्रमाविश्यइति वचनात् ॥ ४८ ॥