Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S12: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== त्रयोदशोऽध्यायः == | == त्रयोदशोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V09 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः । | |||
| verse_line2 = स्वरूपमवरुन्धानो नान्यदस्मात् तदैक्षत ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V09 | |||
| id = BTN_C04_S12_V09_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
स्वरूपं जीवस्य बिम्बरूपं परमात्मानम् ।'भिन्नस्वरूपमभिदं स्वरूपं तु द्विधा हरेः ।भिन्नस्वरूपं ब्रह्माद्या मत्स्याद्यभिदमुच्यते''॥ इति गारुडे ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V11 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः । | |||
| verse_line2 = वत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V11 | |||
| id = BTN_C04_S12_V11_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'कल्पः कल्पाभिमानी सन् शिंशुमारानुगः स्थितः ।वत्सरो राज्यमकरोत्पित्रा दत्तं महाबलः''॥ इति ब्राह्मे ।'चक्रे नारायणः साक्षात्किंस्तुघ्नः कल्पमात्मजम्''। इति पाद्मे ॥११॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V31 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सदस्या ऊचुः– | |||
| verse_line2 = नरदेवेह भवतो नावद्यं हि मनाक् स्थितम् । | |||
| verse_line3 = अस्त्येकं प्राक्तनमघं यदि हेदृक् त्वमप्रजः ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V32 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सप्रजं नृप । | |||
| verse_line2 = इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V33 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः । | |||
| verse_line2 = यद् यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V33 | |||
| id = BTN_C04_S12_V33_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अनपत्योऽपि सद्धर्मा लोकजिन्नात्र संशयः ।देवैस्तु पृथुजन्मार्थे हविरङ्गस्य नो हृतम् ॥अनपत्यत्वकर्माऽसौ बालहत्या कृता पुरा ।अतो दुष्टोऽभवत्पुत्र इष्टो विष्णुरतः पृथुः''॥ इति वामने ॥३१-३३॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V39 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः । | |||
| verse_line2 = अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V40 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S12 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः । | |||
| verse_line2 = हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे त्रयोदशोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S12_V40 | |||
| id = BTN_C04_S12_V40_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'मृत्युर्देवो यमभ्राता वेनमातामहोऽसुरः ।पीडां वेनेति च प्राहुर्वेनोऽसौ पीडनादभूत्''॥ इति च ॥ ३९,४० ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:34, 8 April 2026
त्रयोदशोऽध्यायः
अव्यवच्छिन्नयोगाग्निदग्धकर्ममलाशयः ।स्वरूपमवरुन्धानो नान्यदस्मात् तदैक्षत ॥ ९ ॥
स्वरूपं जीवस्य बिम्बरूपं परमात्मानम् ।'भिन्नस्वरूपमभिदं स्वरूपं तु द्विधा हरेः ।भिन्नस्वरूपं ब्रह्माद्या मत्स्याद्यभिदमुच्यते॥ इति गारुडे ॥ ९ ॥
मत्वा तं जडमुन्मत्तं कुलवृद्धाः समन्त्रिणः ।वत्सरं भूपतिं चक्रुर्यवीयांसं भ्रमेः सुतम् ॥ ११ ॥
'कल्पः कल्पाभिमानी सन् शिंशुमारानुगः स्थितः ।वत्सरो राज्यमकरोत्पित्रा दत्तं महाबलः॥ इति ब्राह्मे ।'चक्रे नारायणः साक्षात्किंस्तुघ्नः कल्पमात्मजम्। इति पाद्मे ॥११॥
सदस्या ऊचुः–नरदेवेह भवतो नावद्यं हि मनाक् स्थितम् ।
तथा साधय भद्रं ते आत्मानं सप्रजं नृप ।इष्टस्ते पुत्रकामस्य पुत्रं दास्यति यज्ञभुक् ॥ ३२ ॥
यथा स्वभागधेयानि ग्रहीष्यन्ति दिवौकसः ।यद् यज्ञपुरुषः साक्षादपत्याय हरिर्वृतः ॥ ३३ ॥
'अनपत्योऽपि सद्धर्मा लोकजिन्नात्र संशयः ।देवैस्तु पृथुजन्मार्थे हविरङ्गस्य नो हृतम् ॥अनपत्यत्वकर्माऽसौ बालहत्या कृता पुरा ।अतो दुष्टोऽभवत्पुत्र इष्टो विष्णुरतः पृथुः॥ इति वामने ॥३१-३३॥
स बाल एव पुरुषो मातामहमनुव्रतः ।अधर्मांशोद्भवं मृत्युं तेनाभवदधार्मिकः ॥ ३९ ॥
स शरासनमुद्यम्य मृगयुर्वनगोचरः ।हन्त्यसाधुर्मृगान् दीनान् वेनोऽसावित्यरौज्जनः ॥ ४० ॥
'मृत्युर्देवो यमभ्राता वेनमातामहोऽसुरः ।पीडां वेनेति च प्राहुर्वेनोऽसौ पीडनादभूत्॥ इति च ॥ ३९,४० ॥