Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S10: Difference between revisions
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परब्रह्मणि स्थितस्य ध्यानादिकं विना न भवति । सुप्तौ दृष्टत्वात् ॥१०॥ | |||
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'पश्यमानोऽपि तु हरिं न तु वेत्ति कथञ्चन ।वेत्ति किञ्चित्प्रसादेन हरेरथ गुरोस्तथा''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १३ ॥ | |||
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वधिं अवधिम् । अल्लोपेन । संसारस्यावधिभूतं त्वामास्थिताः ॥ तैः सहैवास्ते ॥ १५ ॥ | |||
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| verse_line1 = तव पादमूलं भजत आचार्यस्याशिष्टयः शिक्षाः सत्याशीःप्रदा एव । तथापि अस्मान् शिष्यान् विशिष्टफलप्राप्तये पुनः परिपाति भवान् । अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे तदन्तवत् ॥ ३१ ॥ | |||
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'आधिपत्यमनित्यं तु ध्रुवलोकस्य यद्ध्रुवे ।न तु तत्स्थानगन्तॄणां यतीनां गतिरुत्तमा ॥तस्यापि मुक्तिर्नियता नियतं चापि तत्पदम् ।तथापि कामनानिन्दा ध्रुवेण सुकृता बत''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ ३१ ॥ | |||
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'द्वितीयस्य स्वतन्त्रस्य त्वभावाद्द्वयवर्जितः ।ईश्वरश्चेशितव्यस्य भावात्स परमेश्वरः''॥ इति हरिवंशेषु ॥ ३३ ॥ | |||
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'हरौ नियतचित्तत्वाद्गृहवत्तत्प्रवेशनात् ।मोक्षं तादात्म्यमित्याहुर्न तद्रूपत्वतः क्वचित्''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥तच्चित्ततैव तादात्म्यम् ।'नैकात्मतां मे स्पृहयन्ति''इत्युक्तत्वात् ।'हरीच्छितेच्छुतैकात्म्यं न तेनैकस्वरूपता''इति च ।'कामेन मे काम आगात्''इति च श्रुतिः ॥ ३५ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे दशमोऽध्यायः ॥}} | |||
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'कलभश्चैव कन्यानां करिणी बालमङ्गले''। इति राजनीतौ ॥ ५३ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
दशमोऽध्यायः
या निर्वृतिस्तनुभृतां तव पादपद्म-ध्यानाद् भवज्जनकथाश्रवणेन वा स्यात् ।
परब्रह्मणि स्थितस्य ध्यानादिकं विना न भवति । सुप्तौ दृष्टत्वात् ॥१०॥
ते न स्मरन्त्यतितरां प्रियमीशमाद्यंस्वान् संपदः सुतसुहृद्गृहवित्तदारान् ।
ये स्वाः सम्पदः स्मरन्ति ते त्वां न स्मरन्ति ।ये भगवद्भक्तसङ्गाः ते स्वाः सम्पदो न स्मरन्ति ॥ १२ ॥
तिर्यङ्नगद्विजसरीसृपदेवदैत्य-मर्त्यादिभिर्विरचितं सदसद्विशेषम् ।
'पश्यमानोऽपि तु हरिं न तु वेत्ति कथञ्चन ।वेत्ति किञ्चित्प्रसादेन हरेरथ गुरोस्तथा॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १३ ॥
त्वं नित्यमुक्तपरिशुद्धविशुद्ध आत्माकूटस्थ आदिपुरुषो भगवांस्त्र्यधीशः ।
वधिं अवधिम् । अल्लोपेन । संसारस्यावधिभूतं त्वामास्थिताः ॥ तैः सहैवास्ते ॥ १५ ॥
यस्मिन् विरुद्धगतयोऽप्यनिशं पतन्तिविद्यादयो विविधशक्तय आनुपूर्व्या ।
'आनुपूर्वी श्रुतिश्चैव त्रयी चाम्नाय उच्यते। इत्यभिधानम् ॥ १६ ॥
सत्याशिषो हि भगवंस्तव पादमूल-माशिष्टयोऽनुभजतः पुरुषार्थमूर्तेः ।
तव पादमूलं भजत आचार्यस्याशिष्टयः शिक्षाः सत्याशीःप्रदा एव । तथापि अस्मान् शिष्यान् विशिष्टफलप्राप्तये पुनः परिपाति भवान् । अहो बत ममानात्म्यं मन्दभाग्यस्य पश्यत । भवच्छिदः पादमूलं गत्वा याचे तदन्तवत् ॥ ३१ ॥
'आधिपत्यमनित्यं तु ध्रुवलोकस्य यद्ध्रुवे ।न तु तत्स्थानगन्तॄणां यतीनां गतिरुत्तमा ॥तस्यापि मुक्तिर्नियता नियतं चापि तत्पदम् ।तथापि कामनानिन्दा ध्रुवेण सुकृता बत॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ ३१ ॥
दैवीं मायामुपाश्रित्य प्रसुप्त इव भिन्नदृक् ।तप्ये द्वितीयेऽप्यसति भ्रातृभ्रातृव्यहृद्रुजा ॥ ३३ ॥
'द्वितीयस्य स्वतन्त्रस्य त्वभावाद्द्वयवर्जितः ।ईश्वरश्चेशितव्यस्य भावात्स परमेश्वरः॥ इति हरिवंशेषु ॥ ३३ ॥
भवच्छिदमयाचेऽहं भवं भाग्यविवर्जितः ।तादात्म्यं यच्छतो मौढ्यान्मानो मे भिक्षितं बत
'हरौ नियतचित्तत्वाद्गृहवत्तत्प्रवेशनात् ।मोक्षं तादात्म्यमित्याहुर्न तद्रूपत्वतः क्वचित्॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥तच्चित्ततैव तादात्म्यम् ।'नैकात्मतां मे स्पृहयन्तिइत्युक्तत्वात् ।'हरीच्छितेच्छुतैकात्म्यं न तेनैकस्वरूपताइति च ।'कामेन मे काम आगात्इति च श्रुतिः ॥ ३५ ॥
लाल्यमानं जनैरेवं ध्रुवं सभ्रातरं नृपः ।आरोप्य करिणीं हृष्टः स्तूयमानोऽविशत् पुरम् ॥ ५३ ॥
'कलभश्चैव कन्यानां करिणी बालमङ्गले। इति राजनीतौ ॥ ५३ ॥