Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S9: Difference between revisions
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== नवमोऽध्यायः == | == नवमोऽध्यायः == | ||
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'आविष्टा हरिणा जीवा ब्रह्मा दक्षो मनुः पृथुः ।शक्राद्या ऋषयश्चैव मत्स्यव्यासादयो हरिः ॥''इति ब्रह्मवैवर्ते ॥७॥ | |||
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परिणततया एकस्मिन्नेव भूतेन ॥ ५४ ॥ | |||
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मन्त्रहृदयेन मन्त्रेण च नमः शब्देन च ॥ ६१ ॥ | |||
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तस्यैव योग्यत्वाल्लोकपालानां दुष्करम् ।'नाशक्यं देवतानां तु यदन्यैः शकितं क्वचित् ।शक्ता अपि न कुर्वन्ति यदन्यविहितं बुधाः''॥ इति ब्राह्मे ॥ ७२ ॥ | |||
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दृष्ट्या निरूपणया । आदेशेन उपदेशेन ॥ ७४ ॥ | |||
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| verse_line1 = देवाश्चक्रुस्तपोविघ्नं त्रासयन्तः स्वमायया । | |||
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'यत्र देवैः कृते विघ्ने खण्डितो न पुमान्भवेत् ।तत्र तद्यशसे विघ्नं कुर्युर्न तु विघातने ॥यत्र खण्डितता तत्र खण्डनायैव केवलम् ।सत्यकामा यतो देवास्ते चित्ताद्यभिमानिनः ॥अतो विमोहनायैव प्राप्नुयुस्ते पराजयम् ।तेषामशक्तितोक्तिश्च विमोहाय सुरद्विषाम्''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥८०॥ | |||
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भूतेन्द्रियाश्रयं भगवद्रूपम् ॥ ८१ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनो | |||
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विश्वं भगवन्तम् । आत्मनो द्वारं सर्वजीवोत्पत्त्यादिद्वारम् । लोकानामेव निरुच्छ्वासः लोकपालास्तदर्थमेव शरणं ययुः ।'ध्यातुर्ध्रुवस्य कीर्त्यर्थं हरिणा सह देवताः ।लोकोच्छ्वासं निरुध्याथ श्वासार्थं च हरिं ययुः ॥अन्यप्रवृत्तयस्तेभ्यो न तेषामन्यतः क्वचित् ।स्वोत्तमेभ्यस्तु देवेभ्यस्तेषां स्युः स्वप्रवृत्तयः''॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥ | |||
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| verse_line1 = देवा ऊचुः– | |||
| verse_line2 = नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं | |||
| verse_line3 = चराचरस्याखिलसत्वधाम्नः । | |||
| verse_line4 = विधेहि तन्नो वृजिनाद् विमोक्षं | |||
| verse_line5 = प्राप्ता वयं त्वां शरणं शरण्यम् ॥ ८५ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥}} | |||
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अखिलसत्वसमूहस्य ।'तेजः शक्तिः समूहश्च गृहं धामेति कथ्यते''।इति तत्त्वनिर्णये ॥ ८५ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
नवमोऽध्यायः
अथातः कीर्तये वंशं पुण्यकीर्तेः कुरूद्वह ।स्वायंभुवस्यापि मनोर्हरेरंशांशजन्मनः ॥ ७ ॥
'आविष्टा हरिणा जीवा ब्रह्मा दक्षो मनुः पृथुः ।शक्राद्या ऋषयश्चैव मत्स्यव्यासादयो हरिः ॥इति ब्रह्मवैवर्ते ॥७॥
प्रियव्रतोत्तानपादौ शतरूपापतेः सुतौ ।वासुदेवस्य कलया रक्षायां जगतः स्थितौ ॥ ८ ॥
'प्रियव्रतोत्तानपादप्रमुखेषु हरिः स्वयम् ।आविष्टः सर्वभूतेषु ऋषभाद्याः स्वयं हरिः॥ इति हरिवंशेषु ॥८॥
विकल्पे विद्यमानेऽपि न ह्यसंतोषहेतवः ।पुंसो मोहमृते भिन्ना यल्लोका निजकर्मभिः ॥ ३१ ॥
विविधकल्पने विद्यमानेऽपि परिणततया ॥ ३१ ॥
स्मयमानमभिध्यायेत् सानुरागावलोकनम् ।नियमेनैकभूतेन मनसा वरदर्षभम् ॥ ५४ ॥
परिणततया एकस्मिन्नेव भूतेन ॥ ५४ ॥
परिचर्या भगवतो यावतीः पूर्वसेविताः ।ता मन्त्रहृदयेनैव प्रयुञ्ज्यान्मन्त्रमूर्तये ॥ ६१ ॥
मन्त्रहृदयेन मन्त्रेण च नमः शब्देन च ॥ ६१ ॥
सुदुष्करं कर्म कृत्वा लोकपालैरपि प्रभुः ।एष्यत्यचिरतो राजन् यशो विपुलयंस्तव ॥ ७२ ॥
तस्यैव योग्यत्वाल्लोकपालानां दुष्करम् ।'नाशक्यं देवतानां तु यदन्यैः शकितं क्वचित् ।शक्ता अपि न कुर्वन्ति यदन्यविहितं बुधाः॥ इति ब्राह्मे ॥ ७२ ॥
तत्राभिषिक्तः प्रयतस्तामुपोष्य विभावरीम् ।समाहितः पर्यचरद् दृष्ट्याऽऽदेशेन पूरुषम् ॥ ७४ ॥
दृष्ट्या निरूपणया । आदेशेन उपदेशेन ॥ ७४ ॥
देवाश्चक्रुस्तपोविघ्नं त्रासयन्तः स्वमायया ।सर्पेभसिंहकूष्माण्डैस्तान् नापश्यत् परं गतः ॥ ८० ॥
'यत्र देवैः कृते विघ्ने खण्डितो न पुमान्भवेत् ।तत्र तद्यशसे विघ्नं कुर्युर्न तु विघातने ॥यत्र खण्डितता तत्र खण्डनायैव केवलम् ।सत्यकामा यतो देवास्ते चित्ताद्यभिमानिनः ॥अतो विमोहनायैव प्राप्नुयुस्ते पराजयम् ।तेषामशक्तितोक्तिश्च विमोहाय सुरद्विषाम्॥ इति ब्रह्माण्डे ॥८०॥
सर्वतो मन आकृष्य हृदि भूतेन्द्रियाश्रयम् ।ध्यायन् भगवतो रूपं नाद्राक्षीत् किञ्चनापरम् ॥ ८१ ॥
भूतेन्द्रियाश्रयं भगवद्रूपम् ॥ ८१ ॥
तस्मिन्नभिध्यायति विश्वमात्मनोद्वारं निरुध्यासुमनन्यया धिया ।
विश्वं भगवन्तम् । आत्मनो द्वारं सर्वजीवोत्पत्त्यादिद्वारम् । लोकानामेव निरुच्छ्वासः लोकपालास्तदर्थमेव शरणं ययुः ।'ध्यातुर्ध्रुवस्य कीर्त्यर्थं हरिणा सह देवताः ।लोकोच्छ्वासं निरुध्याथ श्वासार्थं च हरिं ययुः ॥अन्यप्रवृत्तयस्तेभ्यो न तेषामन्यतः क्वचित् ।स्वोत्तमेभ्यस्तु देवेभ्यस्तेषां स्युः स्वप्रवृत्तयः॥ इति तत्त्वनिर्णये ॥
देवा ऊचुः–नैवं विदामो भगवन् प्राणरोधं
अखिलसत्वसमूहस्य ।'तेजः शक्तिः समूहश्च गृहं धामेति कथ्यते।इति तत्त्वनिर्णये ॥ ८५ ॥