Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S8: Difference between revisions
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== अष्टमोऽध्यायः == | == अष्टमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महित्वे स्वभुवादयः । | |||
| verse_line2 = यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥ | |||
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'उत्पत्तिर्हरिरूपाणां व्यक्तिरेव न संशयः ।उत्पत्तिरेव जीवानां देहोत्पत्तिरितीर्यते''। इति तत्त्वनिर्णये ॥ २४ ॥ | |||
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| verse_line1 = दक्ष उवाच– | |||
| verse_line2 = शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं | |||
| verse_line3 = चिन्मात्रमेकमभयं प्रतिषिध्य मायाम् । | |||
| verse_line4 = तिष्ठंस्तयैव पुरुषत्वमुपेत्य तस्या- | |||
| verse_line5 = मास्ते भवानपरिशुद्धमिवामनन्ति ॥ २६ ॥ | |||
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'जडमाया न तस्यास्ति शरीरत्वेन कुत्रचित् ।सृष्ट्वा तया शरीराणि तत्स्थितेः पुरुषः स्मृतः ।मायायामशरीरायामपि विष्णुः स्वयं स्थितः ॥तस्मात्प्राकृत इत्येव जीववत्तं वदन्ति हि ।अस्पृष्टत्वेऽपि तद्धर्मैस्तद्गत्वादेव कारणात्''॥ इति तत्त्वविवेके ॥ २६ ॥ | |||
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| verse_line1 = ऋत्विज ऊचुः– | |||
| verse_line2 = तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात् | |||
| verse_line3 = कर्मण्यवग्रहधियो भगवन् विदामः । | |||
| verse_line4 = धर्मोपलक्षणमिदं त्रिवृदध्वराख्यं | |||
| verse_line5 = ज्ञातं यदर्थमधिदैवमदस्त्वमास्थाः ॥ २७ ॥ | |||
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अधिदैवं उत्तमदैवम् । यद्यज्ञभागार्थं यज्ञभुग्देवताशरीरे आस्थाः ।'भुङ्क्ते यज्ञभुजो देवानाविश्य पुरुषोत्तमः''। इति च ॥ २७ ॥ | |||
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| verse_line1 = रुद्र उवाच– | |||
| verse_line2 = तव वरद वराड्घ्रावाशिषा चानभिध्ये | |||
| verse_line3 = ह्यपि मुनिभिरसक्तैरादरेणार्हणीये । | |||
| verse_line4 = यदि रचितधियं मां विद्धि लोकापविद्धं | |||
| verse_line5 = जगति न गणयेयं त्वत्परानुग्रहेण ॥ २९ ॥ | |||
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आशिषोऽपि तत एव भवन्तीत्यतश्चशब्दः ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = नैतत् स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ- | |||
| verse_line2 = भेदग्रहः पुरुषो यावदीक्षेत् । | |||
| verse_line3 = ज्ञानस्य चार्थस्य गुणस्य चाश्रया- | |||
| verse_line4 = न्मायामयाद् व्यतिरिक्तो यतस्त्वम् ॥ ३१ ॥ | |||
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'अव्यक्तादिपदार्थानां विशेषज्ञानिनाऽपि तु ।न देहो वैष्णवो ज्ञेय आनन्दः प्राकृतो न हि''॥ इति तन्त्रसारे ।पदार्थभेदग्रहः पदार्थविशेषज्ञः ।'भेदोऽन्तरं विशेषश्च सूक्ष्मेक्षा चाभिधीयते''इति तत्त्वनिर्णये ॥ ३१ ॥ | |||
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| verse_line1 = ऋषय ऊचुः – | |||
| verse_line2 = अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं | |||
| verse_line3 = यदात्मना चरसि हि कर्म नाज्यसे । | |||
| verse_line4 = विभूतयो यत उपसेदुरीश्वरा- | |||
| verse_line5 = न्न मन्यते स्वयमनुवर्तिनीं भवान् ॥ ३४ ॥ | |||
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ईश्वरान् ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = लोकपाला ऊचुः– | |||
| verse_line2 = दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं | |||
| verse_line3 = प्रत्यग्दृष्ट्या दृश्यते येन विश्वम् । | |||
| verse_line4 = माया ह्येषा भवदीया हि भूमन् | |||
| verse_line5 = यस्त्वं षष्ठः पञ्चभिर्भासि भूतैः ॥ ३७ ॥ | |||
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माया ह्येषा भवदीया भगवत्सामर्थ्यमेव ।'भगवन्महिमैवासौ यद्दृश्यो भगवान् स्वयम्''। इति च ॥ ३७ ॥ | |||
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| verse_line1 = योगेश्वरा ऊचुः– | |||
| verse_line2 = प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमृतप्रिय प्रभो | |||
| verse_line3 = विश्वात्मनीक्षेन्न पृथग् य आत्मनः । | |||
| verse_line4 = अथापि भृत्येश तयोपधावता- | |||
| verse_line5 = मनन्यवृत्त्याऽनुगृहाण वत्सल ॥ ३८ ॥ | |||
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न पृथग् य आत्मनः । अन्यथा यो न पश्यति ।'पृथग्ज्ञानं तदित्याहुर्यत्किञ्चिद्वीक्ष्यतेऽन्यथा ।ज्ञानज्ञेयाविरोधेन त्वपृथग्वस्तुनो दृशिः ॥केचिद्भेदं विनिन्दन्ति ह्यासुरज्ञानवृत्तयः ।निराकुर्वन्त्यथो मन्दा भेदस्य परमार्थताम् ॥ये तु तत्त्वविदो मुख्या भेदं ब्रह्मान्यवस्तुनोः ।परमार्थमिति ज्ञात्वा नित्यं विष्णुमुपासते''॥ इति गारुडे ।हे भृत्येश । तयाऽनन्यवृत्त्या उपधावतामस्माकमनुग्रहोऽस्त्येव । तथापि पुनरनुगृहाण ।'यथार्थज्ञानिनो नान्यः प्रियो विष्णोस्तु कश्चन ।तथाप्यधिकसन्तुष्ट्यै प्रसीदेत्यर्थनं पुनः''॥ इति च ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_line1 = जगदुद्भवस्थितिलयेषु लीलया | |||
| verse_line2 = प्रविभज्यमानगुणयाऽऽत्ममायया । | |||
| verse_line3 = रचितात्मभेदमतये स्वसंस्थया | |||
| verse_line4 = ह्यतिवर्तितभ्रमगुणात्मने नमः ॥ ३९ ॥ | |||
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'प्रकृत्या जडया मिथ्याज्ञानं जनयतीश्वरः ।तस्य भ्रमश्च सत्वाद्या न सन्ति परमेशितुः''॥ इति च ॥ ३९ ॥ | |||
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| verse_line1 = अग्निरुवाच– | |||
| verse_line2 = यत्तेजसाऽहं सुसमिद्धतेजा | |||
| verse_line3 = हव्यं वहाम्यध्वर आज्यसिक्तम् । | |||
| verse_line4 = तं यज्ञियं पञ्चविधं च पञ्चभिः | |||
| verse_line5 = स्विष्टं यजुर्भिः प्रणतोऽस्मि यज्ञम् ॥ ४१ ॥ | |||
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'यज्ञो यज्ञपुमांश्चैव यज्ञेशो यज्ञभावनः ।यज्ञभुक्चेति पञ्चात्मा यज्ञेष्विज्यो हरिः स्वयम् ॥ओश्रावयास्तुश्रौषड्यजाथो येयजामहे ।वषट्कारान्तकैर्नित्यं यजुर्भिः पञ्चभिर्विभुः''॥ इति तन्त्रसारे ॥४१॥ | |||
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| verse_line1 = ब्राह्मणा ऊचुः– | |||
| verse_line2 = त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयं | |||
| verse_line3 = त्वं हि मन्त्राः समिद् दर्भपात्राणि च । | |||
| verse_line4 = त्वं सदस्यर्त्विजो दम्पती देवता | |||
| verse_line5 = अग्निहोत्रं स्वधा सोम आज्यं पशुः ॥ ४५ ॥ | |||
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'सर्वशब्दाभिधेयत्वं सर्वान्तर्यामिकत्वतः ।न तु सर्वस्वरूपत्वात्सर्वभिन्नो यतो हरिः''॥ इति मात्स्ये ॥ ४५ ॥ | |||
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| verse_line2 = अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् । | |||
| verse_line3 = आत्मेश्वर उपद्रष्टा स्वयंदृगविशेषणः ॥ ५० ॥ | |||
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'अन्तर्यामिस्वरूपेण ब्रह्मरुद्राद्यभिन्नता ।न तु जीवस्वरूपेण जीवा भिन्ना यतो हरेः ॥विशेषाभेदवचनं सन्निधानविशेषतः ।सन्निधानं तु तत्प्रोक्तं सामर्थ्यव्यञ्जनं हरेः''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि । | |||
| verse_line2 = देहात्मबुद्धिर्भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥ | |||
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'हरेर्वशत्वदृष्टिस्तु भूतानामपृथग्दृशिः ।प्रियत्वदृष्टिरथवा ब्रह्मादीनां विशेषतः''॥ इति गारुडे ॥ ५२ ॥ | |||
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| verse_line1 = त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् । | |||
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सर्वभूतात्मना सर्वभूतान्तर्यामित्वेन ॥ ५४ ॥ | |||
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उभयतः सोमतो हविषश्च ॥ ५५ ॥ | |||
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| verse_line1 = अनन्यभावैकगतिः शक्तिः सुप्तेव पूरुषम् | |||
| verse_line2 = एतद् भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः । | |||
| verse_line3 = श्रुतं भागवताच्छिष्यादुद्धवान्मे बृहस्पतेः ॥ ५९ ॥ | |||
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'शक्तित्वाद्विष्णुशक्तिस्तु शक्तिशब्देन चोच्यते ।शक्यत्वात्प्रकृतिश्चापि स्वापः सृष्टिं विना हरौ ।रतिस्तस्यास्तु कथितो नह्यन्यः स्वाप उच्यते''॥ इति तन्त्रसारे ॥ | |||
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| verse_line1 = पीत्वाऽन्तरजरं वह्निश्चच्छर्द शरकानने । | |||
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| verse_line1 = षड्भिर्मुखैः स्तनं पीत्वा स बालः षण्मुखोऽभवत् । | |||
| verse_line2 = ततश्चक्रुः सैन्यपालं सर्वासुरभयंकरम् ॥ ६४ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥}} | |||
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'स्वाहाद्वारेण नदीतीरे शरकानने चच्छर्द''। इति भारतोक्तेः ॥६४॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
अष्टमोऽध्यायः
अप्यर्वाग्वृत्तयो यस्य महित्वे स्वभुवादयः ।यथामति गृणन्ति स्म कृतानुग्रहविग्रहम् ॥ २४ ॥
'उत्पत्तिर्हरिरूपाणां व्यक्तिरेव न संशयः ।उत्पत्तिरेव जीवानां देहोत्पत्तिरितीर्यते। इति तत्त्वनिर्णये ॥ २४ ॥
दक्ष उवाच–शुद्धं स्वधाम्न्युपरताखिलबुद्ध्यवस्थं
'जडमाया न तस्यास्ति शरीरत्वेन कुत्रचित् ।सृष्ट्वा तया शरीराणि तत्स्थितेः पुरुषः स्मृतः ।मायायामशरीरायामपि विष्णुः स्वयं स्थितः ॥तस्मात्प्राकृत इत्येव जीववत्तं वदन्ति हि ।अस्पृष्टत्वेऽपि तद्धर्मैस्तद्गत्वादेव कारणात्॥ इति तत्त्वविवेके ॥ २६ ॥
ऋत्विज ऊचुः–तत्त्वं न ते वयमनञ्जन रुद्रशापात्
अधिदैवं उत्तमदैवम् । यद्यज्ञभागार्थं यज्ञभुग्देवताशरीरे आस्थाः ।'भुङ्क्ते यज्ञभुजो देवानाविश्य पुरुषोत्तमः। इति च ॥ २७ ॥
रुद्र उवाच–तव वरद वराड्घ्रावाशिषा चानभिध्ये
आशिषोऽपि तत एव भवन्तीत्यतश्चशब्दः ॥ २९ ॥
नैतत् स्वरूपं भवतोऽसौ पदार्थ-भेदग्रहः पुरुषो यावदीक्षेत् ।
'अव्यक्तादिपदार्थानां विशेषज्ञानिनाऽपि तु ।न देहो वैष्णवो ज्ञेय आनन्दः प्राकृतो न हि॥ इति तन्त्रसारे ।पदार्थभेदग्रहः पदार्थविशेषज्ञः ।'भेदोऽन्तरं विशेषश्च सूक्ष्मेक्षा चाभिधीयतेइति तत्त्वनिर्णये ॥ ३१ ॥
ऋषय ऊचुः –अनन्वितं ते भगवन् विचेष्टितं
ईश्वरान् ॥ ३४ ॥
लोकपाला ऊचुः–दृष्टः किं नो दृग्भिरसद्ग्रहैस्त्वं
माया ह्येषा भवदीया भगवत्सामर्थ्यमेव ।'भगवन्महिमैवासौ यद्दृश्यो भगवान् स्वयम्। इति च ॥ ३७ ॥
योगेश्वरा ऊचुः–प्रेयान्न तेऽन्योऽस्त्यमृतप्रिय प्रभो
न पृथग् य आत्मनः । अन्यथा यो न पश्यति ।'पृथग्ज्ञानं तदित्याहुर्यत्किञ्चिद्वीक्ष्यतेऽन्यथा ।ज्ञानज्ञेयाविरोधेन त्वपृथग्वस्तुनो दृशिः ॥केचिद्भेदं विनिन्दन्ति ह्यासुरज्ञानवृत्तयः ।निराकुर्वन्त्यथो मन्दा भेदस्य परमार्थताम् ॥ये तु तत्त्वविदो मुख्या भेदं ब्रह्मान्यवस्तुनोः ।परमार्थमिति ज्ञात्वा नित्यं विष्णुमुपासते॥ इति गारुडे ।हे भृत्येश । तयाऽनन्यवृत्त्या उपधावतामस्माकमनुग्रहोऽस्त्येव । तथापि पुनरनुगृहाण ।'यथार्थज्ञानिनो नान्यः प्रियो विष्णोस्तु कश्चन ।तथाप्यधिकसन्तुष्ट्यै प्रसीदेत्यर्थनं पुनः॥ इति च ॥ ३८ ॥
जगदुद्भवस्थितिलयेषु लीलयाप्रविभज्यमानगुणयाऽऽत्ममायया ।
'प्रकृत्या जडया मिथ्याज्ञानं जनयतीश्वरः ।तस्य भ्रमश्च सत्वाद्या न सन्ति परमेशितुः॥ इति च ॥ ३९ ॥
अग्निरुवाच–यत्तेजसाऽहं सुसमिद्धतेजा
'यज्ञो यज्ञपुमांश्चैव यज्ञेशो यज्ञभावनः ।यज्ञभुक्चेति पञ्चात्मा यज्ञेष्विज्यो हरिः स्वयम् ॥ओश्रावयास्तुश्रौषड्यजाथो येयजामहे ।वषट्कारान्तकैर्नित्यं यजुर्भिः पञ्चभिर्विभुः॥ इति तन्त्रसारे ॥४१॥
ब्राह्मणा ऊचुः–त्वं क्रतुस्त्वं हविस्त्वं हुताशः स्वयं
'सर्वशब्दाभिधेयत्वं सर्वान्तर्यामिकत्वतः ।न तु सर्वस्वरूपत्वात्सर्वभिन्नो यतो हरिः॥ इति मात्स्ये ॥ ४५ ॥
श्रीभगवानुवाच–अहं ब्रह्मा च शर्वश्च जगतः कारणं परम् ।
'अन्तर्यामिस्वरूपेण ब्रह्मरुद्राद्यभिन्नता ।न तु जीवस्वरूपेण जीवा भिन्ना यतो हरेः ॥विशेषाभेदवचनं सन्निधानविशेषतः ।सन्निधानं तु तत्प्रोक्तं सामर्थ्यव्यञ्जनं हरेः॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥
तस्मिन् ब्रह्मण्यद्वितीये केवले परमात्मनि ।देहात्मबुद्धिर्भूतानि भेदेनाज्ञोऽनुपश्यति ॥ ५२ ॥
'हरेर्वशत्वदृष्टिस्तु भूतानामपृथग्दृशिः ।प्रियत्वदृष्टिरथवा ब्रह्मादीनां विशेषतः॥ इति गारुडे ॥ ५२ ॥
त्रयाणामेकभावानां यो न पश्यति वै भिदाम् ।सर्वभूतात्मना ब्रह्मन् स शान्तिमधिगच्छति ॥ ५४ ॥
सर्वभूतात्मना सर्वभूतान्तर्यामित्वेन ॥ ५४ ॥
मैत्रेय उवाच–एवं भगवताऽऽदिष्टः प्रजापतिपतिर्हरिम् ।
उभयतः सोमतो हविषश्च ॥ ५५ ॥
अनन्यभावैकगतिः शक्तिः सुप्तेव पूरुषम्एतद् भगवतः शम्भोः कर्म दक्षाध्वरद्रुहः ।
'शक्तित्वाद्विष्णुशक्तिस्तु शक्तिशब्देन चोच्यते ।शक्यत्वात्प्रकृतिश्चापि स्वापः सृष्टिं विना हरौ ।रतिस्तस्यास्तु कथितो नह्यन्यः स्वाप उच्यते॥ इति तन्त्रसारे ॥
पीत्वाऽन्तरजरं वह्निश्चच्छर्द शरकानने ।कुमारोऽभूत् ततस्तस्मै स्तनं षट् कृत्तिका ददुः ॥ ६३ ॥
षड्भिर्मुखैः स्तनं पीत्वा स बालः षण्मुखोऽभवत् ।ततश्चक्रुः सैन्यपालं सर्वासुरभयंकरम् ॥ ६४ ॥
'स्वाहाद्वारेण नदीतीरे शरकानने चच्छर्द। इति भारतोक्तेः ॥६४॥