Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S2: Difference between revisions
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'गिरिः प्राणः समुद्दिष्टस्तत्सुता वेदवाक्स्मृता ।पुष्पं स्वर्गादयः प्रोक्ताः फलं मोक्ष उदाहृतम्''॥ इति वामने ॥'अनङ्गो मन्मथो मन्था कामोऽङ्गज उदाहृतः''। इति शब्दनिर्णये ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
द्वितीयोध्यायः
नन्दिरुवाच–य एतन्मर्त्यमुद्दिश्य भगवत्यप्रतिद्रुहि ।
गृहेषु कूटधर्मेषु सक्तो ग्राम्यसुखेच्छया ।कर्मतन्त्रं वितनुताद् वेदवादविपन्नधीः ॥ २३ ॥
बुद्ध्या पराभिध्यायिन्या विस्मृतात्मगतिः पशुः ।स्त्रीकामः सोऽस्तु नितरां दक्षो बस्तमुखोऽचिरात् ॥ २४ ॥
विद्याबुद्धिरविद्यायां कर्ममय्यामसावजः ।संसरन्त्विह ये चामुमनुशर्वावमानिनम् ॥ २५ ॥
'ये ज्ञानविषयाः शापा मुक्तिगाश्चाधिकारिणाम् ।कादाचित्कास्ते भवन्ति नैव ते सार्वकालिकाः ॥तेषां ज्ञानस्य मुक्तेश्च तारतम्यस्य चैव हि ।भगवन्नियतत्वात्तु शापादिर्नात्र कारणम्॥ इति वाराहे ॥२२-२५॥
गिरेः सुतायाः पुष्पिण्या मधुगन्धेन भूरिणा ।मथ्ना चोन्मथितात्मानः संमुह्यन्तु हरद्विषः ॥ २६ ॥
'गिरिः प्राणः समुद्दिष्टस्तत्सुता वेदवाक्स्मृता ।पुष्पं स्वर्गादयः प्रोक्ताः फलं मोक्ष उदाहृतम्॥ इति वामने ॥'अनङ्गो मन्मथो मन्था कामोऽङ्गज उदाहृतः। इति शब्दनिर्णये ॥