Bhagavatatatparyanirnaya/C4/S1: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== प्रथमोऽध्यायः == | == प्रथमोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V01 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = मैत्रेय उवाच– | |||
| verse_line2 = मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे । | |||
| verse_line3 = आकूतिर्देवहूतिश्च प्रसूतिरिति विश्रुताः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V01 | |||
| id = BTN_C04_S01_V01_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'पुनःपुनः कथां प्राहुरभ्यासादुत्तमं फलम् ।विज्ञापयितुकामास्तु विद्वांसस्तत्रतत्र तु''॥ इत्याग्नेये ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V20 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः । | |||
| verse_line2 = प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V21 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना । | |||
| verse_line2 = निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V22 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः । | |||
| verse_line2 = वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V22 | |||
| id = BTN_C04_S01_V22_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ब्रह्मस्थश्चैव रुद्रस्थः स्वयं चापि हरिः प्रभुः ।प्रजां त्रिपुरुषसमां यच्छत्वित्यत्रिरैच्छत ॥तस्मात्स ब्रह्मरुद्राभ्यां सह विष्णुर्जगत्पतिः ।आगत्य तु त्रिमूर्त्यंशान् पुत्रान्प्रादाज्जनार्दनः ।भावित्वाच्चैव कार्यस्य लोकानां मोहनाय च''॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २०-२२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V30 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = देवा ऊचुः– | |||
| verse_line2 = यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा । | |||
| verse_line3 = तत्संकल्पस्य ते ब्रह्मन् यद् वै ध्यायसि ते वयम् ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V30 | |||
| id = BTN_C04_S01_V30_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
तत्स्थविष्ण्वपेक्षया ते वयमिति ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V33 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् । | |||
| verse_line2 = दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V33 | |||
| id = BTN_C04_S01_V33_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ब्रह्मणो नावतारोऽस्ति सन्निधानं तु केवलम् ।ऋते विष्णोरात्मनश्च तदंशोक्तिः प्रवेशतः''॥ इति च ।'सृष्टिभेदाद्विरूपं तु कथा पञ्चोत्तरं शतम् ।वैरूप्यमन्यद्विज्ञेयं तात्पर्यान्मोहनाय च''॥ इति स्कान्दे ।'ऋते तु पाण्डवकथां कार्ष्णं रामायणं तथा ।विष्णोर्ब्रह्मादिनां चैव क्रमाद्य्वत्यस्तशक्तिताम् ।एतदापादकं चान्यदृते कल्पादिभेदतः ।कथाभेदस्तु विज्ञेयो मोहायैतेषु भिन्नता''॥ इति वाराहे ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V52 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् । | |||
| verse_line2 = मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V55 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् । | |||
| verse_line2 = देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V56 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = देवा ऊचुः– | |||
| verse_line2 = यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं | |||
| verse_line3 = खे रूपभेदमिव तत्प्रतिचक्षणाय । | |||
| verse_line4 = एतेन धर्मसदने ऋषिमूर्तिनाऽद्य | |||
| verse_line5 = प्रादुश्चकार पुरुषाय नमः परस्मै ॥ ५६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V59 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ । | |||
| verse_line2 = भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V59 | |||
| id = BTN_C04_S01_V59_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'नरे विष्णुः समाविष्टः स्वयं नारायणो हरिः ।अर्जुने च नरावेशः कृष्णो नारायणः स्वयम्''॥ इति तत्त्वविवेके ॥खे रूपभेदो ऽभ्रादिः ।'यथाकाशस्थितो नित्यम्''इत्यादि च ।'यथाकाशे विमानादिरूपभेदः प्रतीयते ।तथा हरौ जगदिदं तत्सामर्थ्यात्प्रतीयते''॥ इति ब्राह्मे ॥ ५२-५९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V66 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C04 | |||
| section_id = BTN_C04_S01 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा । | |||
| verse_line2 = अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C04_S01_V66 | |||
| id = BTN_C04_S01_V66_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अप्रौढेव अस्वीकृतेव ॥ ६६ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
प्रथमोऽध्यायः
मैत्रेय उवाच–मनोस्तु शतरूपायां तिस्रः कन्याश्च जज्ञिरे ।
'पुनःपुनः कथां प्राहुरभ्यासादुत्तमं फलम् ।विज्ञापयितुकामास्तु विद्वांसस्तत्रतत्र तु॥ इत्याग्नेये ॥ १ ॥
शरणं तं प्रपद्येऽहं य एव जगदीश्वरः ।प्रजामात्मसमां मह्यं प्रयच्छत्विति चिन्तयन् ॥ २० ॥
तप्यमानं त्रिभुवनं प्राणायामैधिताग्निना ।निर्गतेन मुनेर्मूघ्नः समीक्ष्य प्रभवस्त्रयः ॥ २१ ॥
अप्सरोमुनिगन्धर्वसिद्धविद्याधरोरगैः ।वितायमानयशसो मुदाऽऽश्रमपदं ययुः ॥ २२ ॥
'ब्रह्मस्थश्चैव रुद्रस्थः स्वयं चापि हरिः प्रभुः ।प्रजां त्रिपुरुषसमां यच्छत्वित्यत्रिरैच्छत ॥तस्मात्स ब्रह्मरुद्राभ्यां सह विष्णुर्जगत्पतिः ।आगत्य तु त्रिमूर्त्यंशान् पुत्रान्प्रादाज्जनार्दनः ।भावित्वाच्चैव कार्यस्य लोकानां मोहनाय च॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ॥ २०-२२ ॥
देवा ऊचुः–यथा कृतस्ते संकल्पो भाव्यं तेनैव नान्यथा ।
तत्स्थविष्ण्वपेक्षया ते वयमिति ॥ ३० ॥
सोमोऽभूद् ब्रह्मणोंऽशेन दत्तो विष्णोस्तु योगवित् ।दुर्वासाः शङ्करस्यांशो निबोधाङ्गिरसः प्रजाः ॥ ३३ ॥
'ब्रह्मणो नावतारोऽस्ति सन्निधानं तु केवलम् ।ऋते विष्णोरात्मनश्च तदंशोक्तिः प्रवेशतः॥ इति च ।'सृष्टिभेदाद्विरूपं तु कथा पञ्चोत्तरं शतम् ।वैरूप्यमन्यद्विज्ञेयं तात्पर्यान्मोहनाय च॥ इति स्कान्दे ।'ऋते तु पाण्डवकथां कार्ष्णं रामायणं तथा ।विष्णोर्ब्रह्मादिनां चैव क्रमाद्य्वत्यस्तशक्तिताम् ।एतदापादकं चान्यदृते कल्पादिभेदतः ।कथाभेदस्तु विज्ञेयो मोहायैतेषु भिन्नता॥ इति वाराहे ॥ ३३ ॥
मेधा स्मृतिं तितिक्षा तु क्षेमं ह्रीः प्रश्रयं सुतम् ।मूर्तिः सर्वगुणोत्पत्ती नरनारायणावृषी ॥ ५२ ॥
नृत्यन्ति स्म स्त्रियो देव्य आसीत् परममङ्गलम् ।देवा ब्रह्मादयः सर्वे उपतस्थुरभिष्टवैः ॥ ५५ ॥
देवा ऊचुः–यो मायया विरचितं निजयात्मनीदं
ताविमौ वै भगवतो हरेरंशाविहाऽगतौ ।भारव्ययाय च भुवः कृष्णौ यदुकुरूद्वहौ ॥ ५९ ॥
'नरे विष्णुः समाविष्टः स्वयं नारायणो हरिः ।अर्जुने च नरावेशः कृष्णो नारायणः स्वयम्॥ इति तत्त्वविवेके ॥खे रूपभेदो ऽभ्रादिः ।'यथाकाशस्थितो नित्यम्इत्यादि च ।'यथाकाशे विमानादिरूपभेदः प्रतीयते ।तथा हरौ जगदिदं तत्सामर्थ्यात्प्रतीयते॥ इति ब्राह्मे ॥ ५२-५९ ॥
पितर्यप्रतिरूपे स्वे भवायानागसे रुषा ।अप्रौढेवात्मनात्मानमजहाद् योगसंयुता ॥ ६६ ॥
अप्रौढेव अस्वीकृतेव ॥ ६६ ॥