Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S29: Difference between revisions
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== एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | == एकोनत्रिंशोऽध्यायः == | ||
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'सबीजो वैष्णवो योगो निर्बीजस्त्वन्यदैवतः ।बीजं विष्णुर्हि जगतः शाखाद्याश्चान्यदेवताः''॥ इति कौर्मे ॥ १ ॥ | |||
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सर्वस्मरणाशक्तावेकाङ्गे ।'यावन्न च्यवते मन''इत्युक्तत्वात् ।'सर्वं स्मर्तुमशक्तः सन्नेकाङ्गं चिन्तयेद्बुधः''। इति च ॥ २० ॥ | |||
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'ब्रह्मा चित्ताभिमानेन चैत्यस्तन्नियमाद्धरिः ।स च ब्रह्मा हरेः कण्ठे कौस्तुभत्वेन भासते''॥ इति भागवततन्त्रे ॥ २७ ॥ | |||
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'साक्षाच्छ्रीस्तु हरे रूपमिन्दिरा तु तदाश्रयात्''॥ इति च ॥ २९ ॥ | |||
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'न पृथग्दिदृक्षेत्''। तमेव दिदृक्षेदित्यर्थः ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line4 = स्तच्चापि चित्तबडिशं शनकैर्वियुङ्क्ते ॥ ३३ ॥ | |||
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चित्तबडिशवियोगो ध्यानानन्तरसमाधिः ॥ ३३ ॥ | |||
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मुक्ताश्रयं विष्णुविषयम् । स्वचित्तं जीवचैतन्ये ततम् । निर्वाणमृच्छति शरीराभिमानं जहाति । स्वचिदभिमानेन ॥ ३४ ॥ | |||
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'असत्कर्ता तु जीवः स्यात्सत्कर्ता परमेश्वरः''। इति शब्दनिर्णये ।'दुर्दुःखमिति विज्ञेयं खं सुखं च तयोर्यतः ।प्रदाता परमो विष्णुस्तस्माद्दुःखादनामवान्''॥ इति हरिवंशेषु ॥३५॥ | |||
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अनन्यभावेन तद्रूपाणामभेदेन । तदात्मतां तस्याऽदानादिकर्तृत्वं च भूतविषये ॥ ४१ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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प्रकृतिं पराभाव्य तदुत्तमत्वेनैव सदावतिष्ठते परः ।'सर्वभूतस्थमीशेशं जेतारं प्रकृतेरपि ।अविशेषं सदैवैकं चिन्तयन्विप्रमुच्यते''॥ इति च ॥ ४३ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
एकोनत्रिंशोऽध्यायः
भगवानुवाच–योगस्य लक्षणं वक्ष्ये सबीजस्य नृपात्मजे ।
'सबीजो वैष्णवो योगो निर्बीजस्त्वन्यदैवतः ।बीजं विष्णुर्हि जगतः शाखाद्याश्चान्यदेवताः॥ इति कौर्मे ॥ १ ॥
स्वधिष्ण्यानामेकदेशे मनसा प्राणधारणम् ।वैकुण्ठलीलाभिध्यानं समाधानं तथाऽऽत्मनः ॥ ६ ॥
'समाधिरप्रयत्नेन मनसः संस्थितिर्भवेत्। इति च ॥ ६ ॥
तस्मिन् लब्धपदं चित्तं सर्वावयवसंस्थितम् ।विलोक्यैकत्र संयुज्यादङ्गे भगवतो मुनिः ॥ २० ॥
सर्वस्मरणाशक्तावेकाङ्गे ।'यावन्न च्यवते मनइत्युक्तत्वात् ।'सर्वं स्मर्तुमशक्तः सन्नेकाङ्गं चिन्तयेद्बुधः। इति च ॥ २० ॥
कौमोदकीं भगवतो दयितां स्मरेतदिग्धामरातिभटशोणितकर्दमेन ।
'ब्रह्मा चित्ताभिमानेन चैत्यस्तन्नियमाद्धरिः ।स च ब्रह्मा हरेः कण्ठे कौस्तुभत्वेन भासते॥ इति भागवततन्त्रे ॥ २७ ॥
यच्छ्रीनिकेतमलिभिः परिसेव्यमानंभूत्या स्वया कुटिलकुन्तलवृन्दजुष्टम् ।
'साक्षाच्छ्रीस्तु हरे रूपमिन्दिरा तु तदाश्रयात्॥ इति च ॥ २९ ॥
ध्यानायनं रहसि तद् बहुलाधरोष्ठ-भासाऽरुणायिततनुद्विजकुन्दपङ्क्ति ।
'न पृथग्दिदृक्षेत्। तमेव दिदृक्षेदित्यर्थः ॥ ३२ ॥
एवं हरौ भगवति प्रतिलब्धभावोभक्त्या द्रवद्धृदय उत्पुलकप्रमोदः ।
चित्तबडिशवियोगो ध्यानानन्तरसमाधिः ॥ ३३ ॥
मुक्ताश्रयं यर्हि निर्विषयं स्वचित्तंनिर्वाणमृच्छति मनः सहसा यथार्चिः ।
मुक्ताश्रयं विष्णुविषयम् । स्वचित्तं जीवचैतन्ये ततम् । निर्वाणमृच्छति शरीराभिमानं जहाति । स्वचिदभिमानेन ॥ ३४ ॥
सोऽप्येतया चरमया मनसो निवृत्त्यातस्मिन् महिम््नयवसितः सुखदुःखबाह्ये ।
'असत्कर्ता तु जीवः स्यात्सत्कर्ता परमेश्वरः। इति शब्दनिर्णये ।'दुर्दुःखमिति विज्ञेयं खं सुखं च तयोर्यतः ।प्रदाता परमो विष्णुस्तस्माद्दुःखादनामवान्॥ इति हरिवंशेषु ॥३५॥
सर्वभूतेषु चात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि ।ईक्षेतानन्यभावेन भूतेषु च तदात्मताम् ॥ ४१ ॥
अनन्यभावेन तद्रूपाणामभेदेन । तदात्मतां तस्याऽदानादिकर्तृत्वं च भूतविषये ॥ ४१ ॥
तस्मादिमां स्वां प्रकृतिं देवीं सदसदात्मिकाम् ।दुर्विभाव्यां पराभाव्य स्वरूपेणावतिष्ठते ॥ ४३ ॥
प्रकृतिं पराभाव्य तदुत्तमत्वेनैव सदावतिष्ठते परः ।'सर्वभूतस्थमीशेशं जेतारं प्रकृतेरपि ।अविशेषं सदैवैकं चिन्तयन्विप्रमुच्यते॥ इति च ॥ ४३ ॥