Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S26: Difference between revisions
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== षड्विंशोऽध्यायः == | == षड्विंशोऽध्यायः == | ||
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'नारायणो ब्रह्मवायू वीन्द्रशेषौ हरस्तथा ।कामः शक्रो गुरुर्दक्षो मन्वाद्या भास्करादयः ।सर्वजीवाश्च क्रमशः पुरुषाख्याभिशब्दिताः ॥"'एतत्पत्न्यो बन्धशक्तिः स्त्रियः सर्वास्तथा जडम् ।क्रमात्प्रकृतिशब्दोक्तास्तज्ज्ञानाद्विप्रमुच्यते''॥ इति दत्तात्रेययोगे ॥११॥ | |||
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'परमात्मादिकं देहे यदध्यात्मं तदीरितम्''। इति च ।'सुखं शरीरभोग्यं तु दुःखं सर्वं तथैव च ।मुक्तौ विलयमायाति नित्यानन्दस्तु भुज्यते''॥ इति च ॥ १३ ॥ | |||
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'बाह्ये सुखे त्वनासक्तेरसुखं दुःखवर्जनात् ।अदुःखं हरिभक्त्यैव नित्यानन्दं यदा मनः ।तदा तं परमात्मानं पश्यत्यात्मप्रसादतः''॥ इति कापिलेये ।'अभेदात्स्वावतारेषु निरन्तर उदाहृतः ।गुणदेहेन्द्रियाभेदात्केवलोऽसदृशत्वतः ।अखण्डः पूर्णशक्तित्वादहमेकः सदा मतः''इति च ।'बन्धशक्तिः प्रकृत्याख्या विष्णुशक्त्या वियुज्यते''। इति च ॥१६-१८॥ | |||
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| verse_line1 = मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् । | |||
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'यादृशी मयि भक्तिः स्यात्तादृश्यन्यत्र नैव चेत् ।अनन्यभक्तिरुद्रेकात्सा ययैव तरेत्सृतिम्''॥ इति च ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च । | |||
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'एकः पूर्णो हरिर्नान्यस्तदन्ये तद्वशा मताः ।इति ज्ञानं स्थिरं यत्तदैकात्म्यज्ञानमुच्यते''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २३ ॥ | |||
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| verse_line3 = जातस्नेहो यत्र तन्वाऽभिजातः । | |||
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'शुक्लेन जनिरन्येषां हरेः स्वतनुवैव तु ।नित्योदितज्ञानतनोः कुतः स्याच्छुक्लतो जनिः''॥ इति गारुडे ॥३१॥ | |||
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'आनुश्रविककर्माऽसौ श्रुत्युक्तं यो न लङ्घयेत्''। इति भविष्यत्पर्वणि ।'सदा सर्वगुणाढ्यत्वात्सत्वो विष्णुरुदीर्यते''। इति कापिलेये ॥३२॥ | |||
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'अपूर्णभक्तेर्मुक्तौ तु न सुखं पूर्तिमेष्यति ।अतस्तादृशमुक्तेश्च भक्तिः पूर्णा गरीयसी''॥ इति च ॥ ३३ ॥ | |||
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'नेच्छन्ति सायुज्यमपि फलत्वेन हरिर्यदि ।ददाति भक्तिसन्तुष्ट आज्ञात्वेनैव गृह्णते ।तादृशानां सुखाधिक्यं पुनर्मुक्तौ भविष्यति''॥ इति च ॥ ३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपा | |||
| verse_line2 = नङ्क्षयन्ति मे नोऽनिमिषो लेढि हेतिः । | |||
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| verse_line4 = सखा गुरुः सुहृदो दैवमिष्टम् ॥ ३८ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे षड्विंशोऽध्यायः ॥}} | |||
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आदानादिकर्तृत्वादात्मा ॥ ३८ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
षड्विंशोऽध्यायः
तं त्वा गताऽहं शरणं शरण्यंस्वभृत्यसंसारतरोः कुठारम् ।
'नारायणो ब्रह्मवायू वीन्द्रशेषौ हरस्तथा ।कामः शक्रो गुरुर्दक्षो मन्वाद्या भास्करादयः ।सर्वजीवाश्च क्रमशः पुरुषाख्याभिशब्दिताः ॥"'एतत्पत्न्यो बन्धशक्तिः स्त्रियः सर्वास्तथा जडम् ।क्रमात्प्रकृतिशब्दोक्तास्तज्ज्ञानाद्विप्रमुच्यते॥ इति दत्तात्रेययोगे ॥११॥
भगवानुवाच–योग आध्यात्मिकः पुंसां मतो निःश्रेयसाय मे ।
'परमात्मादिकं देहे यदध्यात्मं तदीरितम्। इति च ।'सुखं शरीरभोग्यं तु दुःखं सर्वं तथैव च ।मुक्तौ विलयमायाति नित्यानन्दस्तु भुज्यते॥ इति च ॥ १३ ॥
अहंममाभिमानोत्थैः कामलोभादिभिर्मलैः ।वीतं यदाऽऽत्मनः शुद्धमदुःखमसुखं समम् ॥ १६ ॥
तदा पुरुष आत्मानं केवलं प्रकृतेः परम् ।निरन्तरं स्वयञ्ज्योतिरणिमानमखण्डितम् ॥ १७ ॥
ज्ञानवैराग्ययुक्तेन भक्तियोगेन चात्मना ।परिपश्यत्युदासीनां प्रकृतिं च हतौजसम् ॥ १८ ॥
'बाह्ये सुखे त्वनासक्तेरसुखं दुःखवर्जनात् ।अदुःखं हरिभक्त्यैव नित्यानन्दं यदा मनः ।तदा तं परमात्मानं पश्यत्यात्मप्रसादतः॥ इति कापिलेये ।'अभेदात्स्वावतारेषु निरन्तर उदाहृतः ।गुणदेहेन्द्रियाभेदात्केवलोऽसदृशत्वतः ।अखण्डः पूर्णशक्तित्वादहमेकः सदा मतःइति च ।'बन्धशक्तिः प्रकृत्याख्या विष्णुशक्त्या वियुज्यते। इति च ॥१६-१८॥
मय्यनन्येन भावेन भक्तिं कुर्वन्ति ये दृढाम् ।मत्कृते त्यक्तकर्माणस्त्यक्तस्वजनबान्धवाः ॥ २२ ॥
'यादृशी मयि भक्तिः स्यात्तादृश्यन्यत्र नैव चेत् ।अनन्यभक्तिरुद्रेकात्सा ययैव तरेत्सृतिम्॥ इति च ॥ २२ ॥
मदाश्रयाः कथा मृष्टाः शृण्वन्ति कथयन्ति च ।तपन्ति विविधांस्तापानैकात्म्यगतचेतसः ॥ २३ ॥
'एकः पूर्णो हरिर्नान्यस्तदन्ये तद्वशा मताः ।इति ज्ञानं स्थिरं यत्तदैकात्म्यज्ञानमुच्यते॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २३ ॥
मैत्रेय उवाच–विदित्वाऽर्थं कपिलो मातुरित्थं
'शुक्लेन जनिरन्येषां हरेः स्वतनुवैव तु ।नित्योदितज्ञानतनोः कुतः स्याच्छुक्लतो जनिः॥ इति गारुडे ॥३१॥
भगवानुवाच–देवानां गुणलिङ्गानामानुश्रविककर्मणाम् ।
'आनुश्रविककर्माऽसौ श्रुत्युक्तं यो न लङ्घयेत्। इति भविष्यत्पर्वणि ।'सदा सर्वगुणाढ्यत्वात्सत्वो विष्णुरुदीर्यते। इति कापिलेये ॥३२॥
अनिमित्ता भगवति भक्तिः सिद्धेर्गरीयसी ।जरयत्याशु या कोशं निगीर्णमनलो यथा ॥ ३३ ॥
'अपूर्णभक्तेर्मुक्तौ तु न सुखं पूर्तिमेष्यति ।अतस्तादृशमुक्तेश्च भक्तिः पूर्णा गरीयसी॥ इति च ॥ ३३ ॥
नैकात्म्यतां मे स्पृहयन्ति केचिन्-मत्पादसेवाभिरता मदीहाः ।
'नेच्छन्ति सायुज्यमपि फलत्वेन हरिर्यदि ।ददाति भक्तिसन्तुष्ट आज्ञात्वेनैव गृह्णते ।तादृशानां सुखाधिक्यं पुनर्मुक्तौ भविष्यति॥ इति च ॥ ३४ ॥
न कर्हिचिन्मत्पराः शान्तरूपानङ्क्षयन्ति मे नोऽनिमिषो लेढि हेतिः ।
आदानादिकर्तृत्वादात्मा ॥ ३८ ॥