Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S15: Difference between revisions
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे पञ्चदशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'विष्णुहस्तवधाल्लोको भक्तस्यान्यस्य न क्वचित् ।तथाप्यसुरमोहाय न विविक्तं क्वचित्क्वचित्''॥ इति स्कान्दे ॥'हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः''इति च ।'स्वतः सद्गतियोग्यस्य पुत्रादेर्हेतुता भवेत् ।योग्यताऽनादिभक्तिः स्यादयोग्यस्य कुतो गतिः' ॥इति ब्रह्मतर्के ॥ ५० ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
पञ्चदशोऽध्यायः
ब्रह्मादयो यत्कृतसेतुपालायत्कारणं विश्वमिदं च मायया ।
'पिशाचचर्यामचरद्रुद्रो विष्ण्वाज्ञयैव तु ।गर्भिणीवधनोदार्थमहो विष्णुर्विडम्बकृत्॥ इति वाराहे ॥ २८ ॥
मैत्रेय उवाच–श्रुत्वा भागवतं पौत्रममोदत दितिर्भृशम् ।
'विष्णुहस्तवधाल्लोको भक्तस्यान्यस्य न क्वचित् ।तथाप्यसुरमोहाय न विविक्तं क्वचित्क्वचित्॥ इति स्कान्दे ॥'हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमःइति च ।'स्वतः सद्गतियोग्यस्य पुत्रादेर्हेतुता भवेत् ।योग्यताऽनादिभक्तिः स्यादयोग्यस्य कुतो गतिः' ॥इति ब्रह्मतर्के ॥ ५० ॥