Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S7: Difference between revisions
Appearance
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3) |
||
| Line 9: | Line 9: | ||
}} | }} | ||
== सप्तमोऽध्यायः == | == सप्तमोऽध्यायः == | ||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V01 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = ऋषिरुवाच– | |||
| verse_line2 = इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः । | |||
| verse_line3 = प्रसुप्तलोकतन्त्राणां निशम्य गिरमीश्वरः ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V01 | |||
| id = BTN_C03_S07_V01_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'शक्यत्वाच्छक्तयो विष्णोर्महदाद्या रमा तथा ।स्वरूपशक्तिः शक्तित्वान्मुख्यशक्तिर्हि सा यतः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥समेत्य आसतीनां असमेतानां, प्रसुप्तलोकतन्त्राणाम् अनाविर्भूतलोक-सृष्टिशक्तीनाम् ।'तनुते येन कार्यं यत्तन्त्रं साधनमुच्यते ।कारणानां स्वशक्तिर्वा प्रधानं साधनं यतः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V02 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः । | |||
| verse_line2 = त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V02 | |||
| id = BTN_C03_S07_V02_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'शब्दाद्या नभ आद्याश्च मनोयुक्तेन्द्रियाणि च ।अहङ्कारो महांश्चैव त्रयोविंशतिको गणः ॥देवतेन्द्रिययोरैक्यान्न पृथग्गणनं तयोः ।प्रकृतिस्तु चतुर्विंशा पञ्चविंशो हरिः स्वयम् ॥यदा जडांशस्वीकारो जीवस्तत्पञ्चविंशकः ।षडिं्वशको महाविष्णुः श्रिया वा सप्तविंशकः''॥ इति तत्त्वनिर्णये ।त्रयोविंशति तत्त्वानि प्राविशद्रमया सह ।कालाख्यया स्वयं विष्णुः शक्यत्वाच्छक्तिरूपया ॥ २ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V03 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् । | |||
| verse_line2 = भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V03 | |||
| id = BTN_C03_S07_V03_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'सर्वचेष्टकरूपेण स्वसामर्थ्येन केशवः ।तानि भिन्नानि तत्त्वानि योजयामास चांशतः''इति च ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V04 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः । | |||
| verse_line2 = प््रोरितोऽजनयत् स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V04 | |||
| id = BTN_C03_S07_V04_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
मात्राभिः अंशैः ॥ ४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V07 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् । | |||
| verse_line2 = विबभाजाऽत्मनाऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V07 | |||
| id = BTN_C03_S07_V07_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ईश्वरो दैवमुद्दिष्टं सर्वस्यापि प्रभुत्वतः''॥ इति च ।आत्मशक्तिः प्रकृतिः ॥ ७ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S08_V08 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः । | |||
| verse_line2 = आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S08_V08 | |||
| id = BTN_C03_S08_V08_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'पुरुषेणाऽत्मभूतेन''इति योऽण्डमसृजत् स एष इत्युक्तः ।'आद्योऽवतारो विष्णोस्तु पुरुषो नाम कीर्तितः ।असृजत् स महत्तत्त्वं स एवाण्डं समाविशत्''॥ ८ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V09 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा । | |||
| verse_line2 = विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V09 | |||
| id = BTN_C03_S07_V09_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'स ब्रह्मणो हृदिस्थत्वाद्धृदयं चेति कीर्त्यते''॥ इति च ।'प्राणादिपञ्चकं चैव तथा नागादिपञ्चकम् ।सनागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जयाः ।एवं तु दशधा प्राण अध्यात्मादित्रिधाऽखिलाः''॥इति च व्योमसंहितायाम् ॥ ९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V16 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् । | |||
| verse_line2 = प्राणोनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V16 | |||
| id = BTN_C03_S07_V16_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'प्राणः प्रथमजो यस्तु प्रधानो वायुरीरितः ।त्वगात्माद्यास्तु तत्पुत्रा द्विधाभूतमुदाहृतम्''॥इति तत्त्वनिर्णये ॥ १६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V24 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् । | |||
| verse_line2 = बुद्ध्या स्वांशेन येनासौ निश्चयं प्रतिपद्यते ॥ २४ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V25 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् । | |||
| verse_line2 = कर्त्रा सस्वांशेन येनासौ कर्तव्य प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V26 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् । | |||
| verse_line2 = चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V26 | |||
| id = BTN_C03_S07_V26_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अहं सत्वमिति द्वेधा ब्रह्मनाड्या अवान्तरम् ।कर्तृनामा ह्यहङ्कारस्त्वहंनाड्यां व्यवस्थितः ॥सत्त्वनाड्यां तथा चित्तमभिमानो हरस्तथा ।अहंनाड्यां सत्वनाड्यां ब्रह्मा चैव व्यवस्थितः ॥आत्मनाड्यां तथा बुद्धिस्तत्रस्थश्च बृहस्पतिः''॥ इति ॥ २६ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V30 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह । | |||
| verse_line2 = यत्रोन्मुखत्वाद् वर्णानां मुख्योऽभूद् ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३० ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V31 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः । | |||
| verse_line2 = यो जातस्त्रायते वर्णान् पुरुषान् कण्टकक्षतात् ॥ ३१ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V32 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः । | |||
| verse_line2 = वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V33 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये । | |||
| verse_line2 = तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V33 | |||
| id = BTN_C03_S07_V33_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'ब्रह्माभिमानी तु भृगुरजनि ब्रह्मणो मुखात् ।क्षत्राभिमानी तु मनुर्ब्रह्मबाह्वोरजायत ॥ऊर्वोर्विडभिमानी च वास्तुः पादात्कृतिस्तथा ।एते पूर्वं हरेर्जाता ब्रह्मणस्तदनन्तरम् ॥एवं रुद्राच्च वायोश्च तदन्तस्थहरेर्यतः''॥ इति षाड्गुण्ये ॥३०-३३॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V35 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः । | |||
| verse_line2 = कः श्रद्दध्यादुदाहर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V35 | |||
| id = BTN_C03_S07_V35_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'अधिकत्वाद्देवशब्दो दैवतेष्वधिको यतः ।दैवं हरिः कर्म मूलं कृतिरित्येव भण्यते ॥व्याप्तत्वादात्मशब्दश्च श्रीपतित्वाच्च माधवः''॥ इति च ॥ ३५ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V39 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् । | |||
| verse_line2 = यत् स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
{{VerseBlock | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V40 | |||
| document_id = BTN | |||
| chapter_id = BTN_C03 | |||
| section_id = BTN_C03_S07 | |||
| adhikarana = | |||
| verse_type = shloka | |||
| verse_line1 = यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह । | |||
| verse_line2 = अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४० ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे सप्तमोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = BTN_C03_S07_V40 | |||
| id = BTN_C03_S07_V40_B1 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
'आत्मा ब्रह्मा न वेद । अहं रुद्रः ।'गुणपूर्तेरात्मशब्दो ब्रह्मा हीनत्वतो हरः ।अहंशब्दस्तथाप्येतौ न जानीतो हरिं परम्''॥ इति ब्राह्मे ।भगवतो मायां भगवतो महिमानम् ।'माया तु महिमा प्रक्ता प्रचुर्ये तु मयड्यतः''॥ इति पाद्मे ।आत्मवर्त्मा परमात्मगतिः ॥ ३९ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
सप्तमोऽध्यायः
ऋषिरुवाच–इति तासां स्वशक्तीनामसतीनां समेत्य सः ।
'शक्यत्वाच्छक्तयो विष्णोर्महदाद्या रमा तथा ।स्वरूपशक्तिः शक्तित्वान्मुख्यशक्तिर्हि सा यतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥समेत्य आसतीनां असमेतानां, प्रसुप्तलोकतन्त्राणाम् अनाविर्भूतलोक-सृष्टिशक्तीनाम् ।'तनुते येन कार्यं यत्तन्त्रं साधनमुच्यते ।कारणानां स्वशक्तिर्वा प्रधानं साधनं यतः॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ १ ॥
कालसंज्ञां तदा देवीं बिभ्रच्छक्तिमुरुक्रमः ।त्रयोविंशतितत्त्वानां गणं युगपदाविशत् ॥ २ ॥
'शब्दाद्या नभ आद्याश्च मनोयुक्तेन्द्रियाणि च ।अहङ्कारो महांश्चैव त्रयोविंशतिको गणः ॥देवतेन्द्रिययोरैक्यान्न पृथग्गणनं तयोः ।प्रकृतिस्तु चतुर्विंशा पञ्चविंशो हरिः स्वयम् ॥यदा जडांशस्वीकारो जीवस्तत्पञ्चविंशकः ।षडिं्वशको महाविष्णुः श्रिया वा सप्तविंशकः॥ इति तत्त्वनिर्णये ।त्रयोविंशति तत्त्वानि प्राविशद्रमया सह ।कालाख्यया स्वयं विष्णुः शक्यत्वाच्छक्तिरूपया ॥ २ ॥
सोऽनुप्रविष्टो भगवान् चेष्टारूपेण तं गणम् ।भिन्नं संयोजयामास सुप्तं कर्म प्रबोधयन् ॥ ३ ॥
'सर्वचेष्टकरूपेण स्वसामर्थ्येन केशवः ।तानि भिन्नानि तत्त्वानि योजयामास चांशतःइति च ॥ ३ ॥
प्रबुद्धकर्मा दैवेन त्रयोविंशतिको गणः ।प््रोरितोऽजनयत् स्वाभिर्मात्राभिरधिपूरुषम् ॥ ४ ॥
मात्राभिः अंशैः ॥ ४ ॥
स वै विश्वसृजां गर्भो दैवकर्मात्मशक्तिमान् ।विबभाजाऽत्मनाऽत्मानमेकधा दशधा त्रिधा ॥ ७ ॥
'ईश्वरो दैवमुद्दिष्टं सर्वस्यापि प्रभुत्वतः॥ इति च ।आत्मशक्तिः प्रकृतिः ॥ ७ ॥
एष ह्यशेषसत्त्वानामात्मांशः परमात्मनः ।आद्योऽवतारो यत्रासौ भूतग्रामो विभाव्यते ॥ ८ ॥
'पुरुषेणाऽत्मभूतेनइति योऽण्डमसृजत् स एष इत्युक्तः ।'आद्योऽवतारो विष्णोस्तु पुरुषो नाम कीर्तितः ।असृजत् स महत्तत्त्वं स एवाण्डं समाविशत्॥ ८ ॥
साध्यात्मं साधिदैवं च साधिभूतमिति त्रिधा ।विराट्प्राणो दशविध एकधा हृदयेन च ॥ ९ ॥
'स ब्रह्मणो हृदिस्थत्वाद्धृदयं चेति कीर्त्यते॥ इति च ।'प्राणादिपञ्चकं चैव तथा नागादिपञ्चकम् ।सनागकूर्मकृकलदेवदत्तधनञ्जयाः ।एवं तु दशधा प्राण अध्यात्मादित्रिधाऽखिलाः॥इति च व्योमसंहितायाम् ॥ ९ ॥
निर्भिन्नान्यथ चर्माणि लोकपालोऽनिलोऽविशत् ।प्राणोनांशेन संस्पर्शं येनासौ प्रतिपद्यते ॥ १६ ॥
'प्राणः प्रथमजो यस्तु प्रधानो वायुरीरितः ।त्वगात्माद्यास्तु तत्पुत्रा द्विधाभूतमुदाहृतम्॥इति तत्त्वनिर्णये ॥ १६ ॥
आत्मानं चास्य निर्भिन्नं वाचस्पतिरुपाविशत् ।बुद्ध्या स्वांशेन येनासौ निश्चयं प्रतिपद्यते ॥ २४ ॥
अहं चास्य विनिर्भिन्नमभिमानोऽविशत् पदम् ।कर्त्रा सस्वांशेन येनासौ कर्तव्य प्रतिपद्यते ॥ २५ ॥
सत्त्वं चास्य विनिर्भिन्नं महान् धिष्ण्यमुपाविशत् ।चित्तेनांशेन येनासौ विज्ञानं प्रतिपद्यते ॥ २६ ॥
'अहं सत्वमिति द्वेधा ब्रह्मनाड्या अवान्तरम् ।कर्तृनामा ह्यहङ्कारस्त्वहंनाड्यां व्यवस्थितः ॥सत्त्वनाड्यां तथा चित्तमभिमानो हरस्तथा ।अहंनाड्यां सत्वनाड्यां ब्रह्मा चैव व्यवस्थितः ॥आत्मनाड्यां तथा बुद्धिस्तत्रस्थश्च बृहस्पतिः॥ इति ॥ २६ ॥
मुखतोऽवर्तत ब्रह्म पुरुषस्य कुरूद्वह ।यत्रोन्मुखत्वाद् वर्णानां मुख्योऽभूद् ब्राह्मणो गुरुः ॥ ३० ॥
बाहुभ्योऽवर्तत क्षत्रं क्षत्रियस्तदनुव्रतः ।यो जातस्त्रायते वर्णान् पुरुषान् कण्टकक्षतात् ॥ ३१ ॥
विशोऽवर्तन्त तस्योर्वोर्लोकवृत्तिकरीर्विभोः ।वैश्यस्तदुद्भवो वार्तां नृणां यः समवर्तयत् ॥ ३२ ॥
पद्भ्यां भगवतो जज्ञे शुश्रूषाकर्मसिद्धये ।तस्यां जातः पुरा शूद्रो यद्वृत्त्या तुष्यते हरिः ॥ ३३ ॥
'ब्रह्माभिमानी तु भृगुरजनि ब्रह्मणो मुखात् ।क्षत्राभिमानी तु मनुर्ब्रह्मबाह्वोरजायत ॥ऊर्वोर्विडभिमानी च वास्तुः पादात्कृतिस्तथा ।एते पूर्वं हरेर्जाता ब्रह्मणस्तदनन्तरम् ॥एवं रुद्राच्च वायोश्च तदन्तस्थहरेर्यतः॥ इति षाड्गुण्ये ॥३०-३३॥
एतत् क्षत्तर्भगवतो दैवकर्मात्मरूपिणः ।कः श्रद्दध्यादुदाहर्तुं योगमायाबलोदयम् ॥ ३५ ॥
'अधिकत्वाद्देवशब्दो दैवतेष्वधिको यतः ।दैवं हरिः कर्म मूलं कृतिरित्येव भण्यते ॥व्याप्तत्वादात्मशब्दश्च श्रीपतित्वाच्च माधवः॥ इति च ॥ ३५ ॥
अतो भगवतो मायां मायिनामपि मोहिनीम् ।यत् स्वयं चात्मवर्त्मात्मा न वेद किमुतापरे ॥ ३९ ॥
यतोऽप्राप्य निवर्तन्ते वाचश्च मनसा सह ।अहं चान्य इमे देवास्तस्मै भगवते नमः ॥ ४० ॥
'आत्मा ब्रह्मा न वेद । अहं रुद्रः ।'गुणपूर्तेरात्मशब्दो ब्रह्मा हीनत्वतो हरः ।अहंशब्दस्तथाप्येतौ न जानीतो हरिं परम्॥ इति ब्राह्मे ।भगवतो मायां भगवतो महिमानम् ।'माया तु महिमा प्रक्ता प्रचुर्ये तु मयड्यतः॥ इति पाद्मे ।आत्मवर्त्मा परमात्मगतिः ॥ ३९ ॥