Bhagavatatatparyanirnaya/C3/S4: Difference between revisions
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आत्ममायायाः आत्मसामर्थ्यस्य । गतिं पूर्वमेवावलोक्य ।'ज्ञात्वा कतिपयैर्वर्षैः पूर्वमेव जनार्दनः ।मौसलं ज्ञानसन्तत्या उद्धवं बदरीं नयत् ॥स ज्ञानं तत्र विस्तीर्य पुनर्द्वारवतीं ययौ ।पूर्वमेवोपदिष्टोऽपि हरिणा ज्ञानमुद्धवः ॥स्वर्गारोहणकाले तु पुनः पप्रच्छ केशवम् ।पुनः श्रुत्वा बदर्यां तु वर्षत्रयमुवास ह ॥ज्ञानं संस्थाप्य पश्चाच्च स्वेच्छया स्वर्गतः प्रभुः''॥ इति गारुडे ॥५॥ | |||
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आकृतिं पृथिवीम् ।'शरीरमाकृतिर्देहः कुः पृथ्वी च मही तथा''॥ इत्यभिधानम् ।'पृथिवीलोकसन्त्यागो देहत्यागो हरेः स्मृतः ।नित्यानन्दस्वरूपत्वादन्यन्नैवोपलभ्यते ॥दर्शयेज्जनमोहाय सदृशीं मृतकाकृतिम् ।नटवद्भगवान्विष्णुः परज्ञानाकृतिस्स्वयम्''॥ इति स्कान्धे ।'राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवैहि यथा नटस्य''।इति च ॥ २९ ॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये तृतीयस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥}} | |||
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'उत्तमैरधिकत्वं वा साम्यं वा विजयोऽपि वा ।उच्यतेऽपि तु नीचानां मोहार्थं वाप्युपेक्षया ।मूढदृष्ट्यनुसाराद्वा किञ्चित्साम्येन वा क्वचित्''॥इति ब्रह्मतर्के ॥ ३१ ॥ | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
चतुर्थोऽध्यायः
उद्धव उवाच–भगवानात्ममायाया गतिं तामवलोक्य सः ।
अहं चोक्तो भगवता प्रपन्नार्तिहरेण ह ।बदरीं त्वं प्रयाहीति स्वकुलं सञ्जिहीर्षुणा ॥ ४ ॥
अथापि तदभिप््रोतं जानन्नहमरिंदम ।पृष्ठतोऽन्वगमं भर्तुः पादविश्लेषणाक्षमः ॥ ५ ॥
आत्ममायायाः आत्मसामर्थ्यस्य । गतिं पूर्वमेवावलोक्य ।'ज्ञात्वा कतिपयैर्वर्षैः पूर्वमेव जनार्दनः ।मौसलं ज्ञानसन्तत्या उद्धवं बदरीं नयत् ॥स ज्ञानं तत्र विस्तीर्य पुनर्द्वारवतीं ययौ ।पूर्वमेवोपदिष्टोऽपि हरिणा ज्ञानमुद्धवः ॥स्वर्गारोहणकाले तु पुनः पप्रच्छ केशवम् ।पुनः श्रुत्वा बदर्यां तु वर्षत्रयमुवास ह ॥ज्ञानं संस्थाप्य पश्चाच्च स्वेच्छया स्वर्गतः प्रभुः॥ इति गारुडे ॥५॥
राजोवाच–निधनमुपगतेषु वृष्णिभोजे-
शुक उवाच–ब्रह्मशापापदेशेन कालेनामोघवाञ्छितः ।
आकृतिं पृथिवीम् ।'शरीरमाकृतिर्देहः कुः पृथ्वी च मही तथा॥ इत्यभिधानम् ।'पृथिवीलोकसन्त्यागो देहत्यागो हरेः स्मृतः ।नित्यानन्दस्वरूपत्वादन्यन्नैवोपलभ्यते ॥दर्शयेज्जनमोहाय सदृशीं मृतकाकृतिम् ।नटवद्भगवान्विष्णुः परज्ञानाकृतिस्स्वयम्॥ इति स्कान्धे ।'राजन् परस्य तनुभृज्जननाप्ययेहा मायाविडम्बनमवैहि यथा नटस्य।इति च ॥ २९ ॥
नोद्धवोऽण्वपि मन्न्यूनो यद्गुणैर्निर्जितः प्रभुः ।अतो मद्वत् पुनर्लोकं ग्राहयन्निह तिष्ठतु ॥ ३१ ॥
'उत्तमैरधिकत्वं वा साम्यं वा विजयोऽपि वा ।उच्यतेऽपि तु नीचानां मोहार्थं वाप्युपेक्षया ।मूढदृष्ट्यनुसाराद्वा किञ्चित्साम्येन वा क्वचित्॥इति ब्रह्मतर्के ॥ ३१ ॥