Bhagavatatatparyanirnaya/C2/S8: Difference between revisions
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== नवमोऽध्यायः == | == नवमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = श्रीशुक उवाच— | |||
| verse_line2 = आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः । | |||
| verse_line3 = न घटेतार्थसम्बन्धः स्वप्ने द्रष्टुरिवाञ्जसा ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line2 = रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥ | |||
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| verse_line1 = यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः । | |||
| verse_line2 = रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥ | |||
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परस्य अर्थव्यतिरिक्तस्य । 'यदधातुमतः''इत्यस्य ह्युत्तरम् ।'अशरीरस्य जीवस्य शरीरोत्पत्तिकारणम् ।ईश्वरेच्छा प्राथमिका तां विना न हि किञ्चन ॥द्वितीया प्रकृतिः प्रोक्ता तद्रूपा हि गुणास्त्रयः ।तेषां सम्पातजो भावो ममाहमिति या मतिः ॥देहात्परस्य देहित्वमहंभावमृते कुतः ।यथा रजस्तमोभावैर्विना स्वप्नो न जायते ॥निद्रा कामाद्यभावेन तद्वद्देहः क्व तान्विना ।तस्मात्प्रकृत्यैव पुमान्मानुषादिविकारया ॥मानुषादिरिवाभाति नित्यचैतन्यरूपवान् ।यदा स्वरूपं जानाति कालप्रकृतिवर्जितम् । ।वासुदेवप्रसादेन तदा मुक्तो भवत्यसौ''॥ इति भविष्यत्पुराणे ॥१-३॥ | |||
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| verse_line1 = आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् । | |||
| verse_line2 = ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥ | |||
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यतो भगवदुक्तं प्रमाणमतस्तदुक्तं पुराणं त्वत्प्रश्नानामुत्तरत्वेन वक्ष्ये ॥ ४ ॥ | |||
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| verse_line2 = जितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः । | |||
| verse_line3 = अतप्यत स्माखिललोकतापनं | |||
| verse_line4 = तपस्तपीयांस्तपतां समाहितः ॥ ८ ॥ | |||
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तपो ब्रह्म ।'तपसोऽध्यजायत''। इति श्रुतेः ।अखिललोकप्रकाशनं यत् तदाऽऽलोचयामास । तपतां तपीयानित्यनेनात्युत्तमोत्तमत्वमुक्तं भवति ।'महन्महीयसामादिं ब्रूयादत्युत्तमोत्तमम् ।यत्राधिकं वदेत्किञ्चिज्ज्ञेयोऽर्थस्तत्र चाधिकः''। इति व्यासनिरुक्ते ॥'तपोरूपं परं ब्रह्म ब्रह्माऽचिन्तयदञ्जसा''। इति षाड्गुण्ये ॥ ८ ॥ | |||
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| verse_line1 = तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितः | |||
| verse_line2 = सन्दर्शयामास परं न यत् पदम् । | |||
| verse_line3 = व्यपेतसंक्लेशविमोहसाध्वसं | |||
| verse_line4 = सन्दृष्टवद्भिर्विबुधैरभिष्टुतम् ॥ ९ ॥ | |||
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यत् यतः । 'यत्तदित्यादयः शब्दाः पञ्चम्यन्ताः प्रकीर्तिताः''।इति च ॥ ९ ॥ | |||
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| verse_line1 = न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोः | |||
| verse_line2 = सत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः । | |||
| verse_line3 = न यत्र माया किमुतापरे हरे- | |||
| verse_line4 = रनुव्रता यत्र सुरासुरार्चिताः ॥ १० ॥ | |||
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मायातीतत्वात् ॥ १० ॥ | |||
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| verse_line1 = श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोः | |||
| verse_line2 = करोति मानं बहुधा विभूतिभिः । | |||
| verse_line3 = प््रोङ्खश्रिता याः कुसुमाकरानुगै- | |||
| verse_line4 = र्विगीयमाना प््रिायकर्म गायती ॥ १३ ॥ | |||
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प््रोङ्खश्रिताः याः विभूतयः ॥ १३ ॥ | |||
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| verse_line1 = ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिं | |||
| verse_line2 = श्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् । | |||
| verse_line3 = सुनन्दनन्दप्रबलार्हणादिभिः | |||
| verse_line4 = स्वपार्षदमुख्यैः परिसेवितं विभुम् ॥ १४ ॥ | |||
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'सत्वं तु शोभनत्वं स्यात्तद्युक्ताः सात्वता मताः''। इत्यध्यात्मे ॥'मुक्तैः स्वपार्षदैः पूर्वैर्ब्रह्माद्यैश्चैव संयुतम् ।ब्रह्मा ददर्श तपसा भगवन्तं हरिं प्रभुम्''॥ इति गारुडे ॥ १४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुं | |||
| verse_line2 = वृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः । | |||
| verse_line3 = युक्तं भगैः स्वैरितरत्र चाध्रुवैः | |||
| verse_line4 = स्व एव धामन्रममाणमीश्वरम् ॥ १६ ॥ | |||
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'इच्छाद्या मोचिकाद्याश्च अणिमाद्याश्च शक्तयः ।प्रदिष्टा वासुदेवाद्या दामोदरपरास्तथा ॥अङ्गानि विमलाद्यास्तु प्रह्व्याद्यात्मादिका मताः ।एवं षोडशभिश्चैव पञ्चभिश्च हरिः स्वयम् ॥चतुर्भिश्च वृतो नित्यं तत्स्वरूपाश्च शक्तयः''॥ इति भागवततन्त्रे ॥ १६ ॥ | |||
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| verse_line1 = मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् । | |||
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मनीषितं तपः ॥ २१ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते । | |||
| verse_line2 = तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥ | |||
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| verse_line1 = सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः । | |||
| verse_line2 = बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥ | |||
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कर्मविमोहिते इदं कार्यमित्यजानति । हृदयं प््रिायम् ।'प््रिायं हृदयमुद्रिक्तं कान्तमित्यभिधीयते''। इत्यभिधानात् ।'तपः प््रिायं सदा विष्णोस्तपसैवाप्यते हरिः ।स्वयं च तपसैवेदं बिभर्ति ज्ञानमेव हि ।तपःशब्दाभिधं प्रोक्तं ज्ञानरूपो हरिर्यतः ।ज्ञानवीर्यो ज्ञानबलो ज्ञानानन्द उदाहृतः''॥इति बृहत्संहितायाम् ॥ २२,२३ ॥ | |||
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| verse_line2 = ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् । | |||
| verse_line3 = सरहस्यं तदङ्गं च गृहाण गदितं मया ॥ ३० ॥ | |||
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'येन येन यथा ज्ञात्वा नियतं मुक्तिराप्यते ।तद्विज्ञानमिति प्रोक्तं ज्ञानं साधारणं स्मृतम्''॥ इति वामने ॥३०॥ | |||
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| verse_line2 = पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥ | |||
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परं स्वतन्त्रं न ।विष्णोरधीनं प्राक् सृष्टेस्तथैव च लयादनु ।अस्य सत्वप्रवृत्त्यादि विशेषेणाधिगम्यते ॥स्वातन्त्र्यं स्थितिकाले तु कथञ्चिद्बुद्धिमोहतः ।प्रतीयमानमपि तु तस्मान्नैवेति गम्यताम् ॥जनिष्येऽहं लयिष्येऽहमिति न ह्यभिसन्धितः ।अतो जीवनमप्येतद्भवेदीशाभिसंहितम् ॥अतः स्वरूपभेदेऽपि ह्यात्मैवेदमिति श्रुतिः ।वदत्यस्येशतन्त्रत्वाद्यदशक्तस्त्वसन्निति । ।विद्यन्ते हि तदा जीवाः कालकर्मादिकं तथा ।क्वान्यथा हि पुनः सृष्टिः पूर्वकर्मानुसारिणी''॥ इति ब्रह्मतर्के ।त्वमेतच्च परं न भवेत् । स्वतन्त्रं न ॥ ३२ ॥ | |||
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| verse_line1 = ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि । | |||
| verse_line2 = तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥ | |||
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| verse_line1 = यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च । | |||
| verse_line2 = प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥ | |||
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अर्थवदिव प्रतीयते । न च परमात्मन्यर्थवत् प्रतीयते । अर्थं प्रयोजनमृते । न हि जीवप्रकृतिभ्यामीश्वरस्यार्थः ।'मुख्यतो विष्णुशक्तिर्हि मायाशब्देन भण्यते ।उपचारतस्तु प्रकृतिर्जीवश्चैव हि भण्यते''॥ इति च ।यथाऽऽभासो जीवः ॥'सर्वं परे स्थितमपि नैव तत्रेति भण्यते ।यतो हरेर्न जीवेन जीवनं न हरौ ततः ॥जीवः प्रकृतिरप्यत्र यतो नैव हि बन्धकृत् ।कर्म चाफलदातृत्वात्कालश्चापरिणामनात् ॥यथा छत्रधराद्यास्तु रथस्था अपि सर्वशः ।रथिनो नैव भण्यन्ते एवं हरिगता अपि॥"'यथा महान्ति भूतानि शरीरेषु बहिस्तथा ।एवं हरिश्च भूतेषु बहिश्च व्याप्तिहेतुतः ।तस्मात्तत्स्थो न तत्स्थश्च प्रोच्यते हरिरीश्वरः''इति च ॥ ३३,३४ ॥ | |||
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| verse_line1 = एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः । | |||
| verse_line2 = अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥ | |||
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अन्यभावाभावकाले देशे च तद्विद्यमानाविद्यमानशक्तिमांश्चेत्यन्वय-व्यतिरकौ ॥ ३५ ॥ | |||
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| verse_line1 = अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः । | |||
| verse_line2 = सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥ | |||
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'सर्वस्यापि प्रधानत्वात् स सर्वमय ईर्यते''॥ इति च ॥ ३८ ॥ | |||
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| verse_line1 = मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः । | |||
| verse_line2 = महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥ | |||
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मायां माहात्म्यं विविदिषुः । अन्येषां माहात्म्यपतेः ।'मुख्यतो विष्णुमाहात्म्यं मायाशब्दोदितं भवेत् ।प्रधानत्वाच्च मातृत्वान्मेयत्वं चैव तस्य हि''॥ इति च ॥ ४१ ॥ | |||
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| verse_line1 = नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप । | |||
| verse_line2 = ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥ | |||
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'हरिर्व्यासादिरूपेण सर्वज्ञोऽपि स्वयं प्रभुः ।शृृणोति नारदादिभ्यो मोहायैषां प्रसिद्धये''॥ इति पाद्मे ॥ ४४ ॥ | |||
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| verse_line1 = यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् । | |||
| verse_line2 = यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये द्वितीयस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥ ९ ॥}} | |||
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'विराड्ब्रह्मा समुद्दिष्टस्तद्गतः परमो यतः ।अतो वैराजमित्येनमाहुरीशत्वतो विराट्''॥इति बृहत्संहितायाम् ॥ ४५ ॥ | |||
}} | |||
[[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | ||
Revision as of 05:33, 8 April 2026
नवमोऽध्यायः
श्रीशुक उवाच—आत्ममायामृते राजन् परस्यानुभवात्मनः ।
बहुरूप इवाऽभाति मायया बहुरूपया ।रममाणो गुणेष्वस्या ममाहमिति मन्यते ॥ २ ॥
यर्हि चायं महित्वे स्वे परस्मिन्कालमाययोः ।रमते गतसंमोहस्त्यक्त्वोदास्ते तदोभयम् ॥ ३ ॥
परस्य अर्थव्यतिरिक्तस्य । 'यदधातुमतःइत्यस्य ह्युत्तरम् ।'अशरीरस्य जीवस्य शरीरोत्पत्तिकारणम् ।ईश्वरेच्छा प्राथमिका तां विना न हि किञ्चन ॥द्वितीया प्रकृतिः प्रोक्ता तद्रूपा हि गुणास्त्रयः ।तेषां सम्पातजो भावो ममाहमिति या मतिः ॥देहात्परस्य देहित्वमहंभावमृते कुतः ।यथा रजस्तमोभावैर्विना स्वप्नो न जायते ॥निद्रा कामाद्यभावेन तद्वद्देहः क्व तान्विना ।तस्मात्प्रकृत्यैव पुमान्मानुषादिविकारया ॥मानुषादिरिवाभाति नित्यचैतन्यरूपवान् ।यदा स्वरूपं जानाति कालप्रकृतिवर्जितम् । ।वासुदेवप्रसादेन तदा मुक्तो भवत्यसौ॥ इति भविष्यत्पुराणे ॥१-३॥
आत्मतत्वविशुध्यर्थं यदाह भगवानृतम् ।ब्रह्मणेऽदर्शयद्रूपमव्यलीकव्रतादृतः ॥ ४ ॥
यतो भगवदुक्तं प्रमाणमतस्तदुक्तं पुराणं त्वत्प्रश्नानामुत्तरत्वेन वक्ष्ये ॥ ४ ॥
दिव्यं सहस्राब्दममोघदर्शनोजितानिलात्मा विजितोभयेन्द्रियः ।
तपो ब्रह्म ।'तपसोऽध्यजायत। इति श्रुतेः ।अखिललोकप्रकाशनं यत् तदाऽऽलोचयामास । तपतां तपीयानित्यनेनात्युत्तमोत्तमत्वमुक्तं भवति ।'महन्महीयसामादिं ब्रूयादत्युत्तमोत्तमम् ।यत्राधिकं वदेत्किञ्चिज्ज्ञेयोऽर्थस्तत्र चाधिकः। इति व्यासनिरुक्ते ॥'तपोरूपं परं ब्रह्म ब्रह्माऽचिन्तयदञ्जसा। इति षाड्गुण्ये ॥ ८ ॥
तस्मै स्वलोकं भगवान्सभाजितःसन्दर्शयामास परं न यत् पदम् ।
यत् यतः । 'यत्तदित्यादयः शब्दाः पञ्चम्यन्ताः प्रकीर्तिताः।इति च ॥ ९ ॥
न वर्तते यत्र रजस्तमस्तयोःसत्वं च मिश्रं न च कालविक्रमः ।
मायातीतत्वात् ॥ १० ॥
श्रीर्यत्र रूपिण्युरुगायपादयोःकरोति मानं बहुधा विभूतिभिः ।
प््रोङ्खश्रिताः याः विभूतयः ॥ १३ ॥
ददर्श तत्राखिलसात्वतां पतिंश्रियःपतिं यज्ञपतिं जगत्पतिम् ।
'सत्वं तु शोभनत्वं स्यात्तद्युक्ताः सात्वता मताः। इत्यध्यात्मे ॥'मुक्तैः स्वपार्षदैः पूर्वैर्ब्रह्माद्यैश्चैव संयुतम् ।ब्रह्मा ददर्श तपसा भगवन्तं हरिं प्रभुम्॥ इति गारुडे ॥ १४ ॥
अध्यर्हणीयासनमास्थितं विभुंवृतं चतुष्षोडशपञ्चशक्तिभिः ।
'इच्छाद्या मोचिकाद्याश्च अणिमाद्याश्च शक्तयः ।प्रदिष्टा वासुदेवाद्या दामोदरपरास्तथा ॥अङ्गानि विमलाद्यास्तु प्रह्व्याद्यात्मादिका मताः ।एवं षोडशभिश्चैव पञ्चभिश्च हरिः स्वयम् ॥चतुर्भिश्च वृतो नित्यं तत्स्वरूपाश्च शक्तयः॥ इति भागवततन्त्रे ॥ १६ ॥
मनीषितानुभावोऽयं मम लोकावलोकनम् ।यदुपश्रुत्य रहसि चकर्थ परमं तपः ॥ २१ ॥
मनीषितं तपः ॥ २१ ॥
प्रत्यादिष्टं मया तत्र त्वयि कर्मविमोहिते ।तपो मे हृदयं साक्षादात्माऽऽहं तपसोऽनघ ॥ २२ ॥
सृजामि तपसैवेदं ग्रसामि तपसा पुनः ।बिभर्मि तपसा विश्वं वीर्यं मे दुस्तरं तपः ॥ २३ ॥
कर्मविमोहिते इदं कार्यमित्यजानति । हृदयं प््रिायम् ।'प््रिायं हृदयमुद्रिक्तं कान्तमित्यभिधीयते। इत्यभिधानात् ।'तपः प््रिायं सदा विष्णोस्तपसैवाप्यते हरिः ।स्वयं च तपसैवेदं बिभर्ति ज्ञानमेव हि ।तपःशब्दाभिधं प्रोक्तं ज्ञानरूपो हरिर्यतः ।ज्ञानवीर्यो ज्ञानबलो ज्ञानानन्द उदाहृतः॥इति बृहत्संहितायाम् ॥ २२,२३ ॥
भगवानुवाच–ज्ञानं परमगुह्यं मे यद्विज्ञानसमन्वितम् ।
'येन येन यथा ज्ञात्वा नियतं मुक्तिराप्यते ।तद्विज्ञानमिति प्रोक्तं ज्ञानं साधारणं स्मृतम्॥ इति वामने ॥३०॥
अहमेवासमग्रे च नान्यद्यत्सदसत् परम् ।पश्चादहं त्वमेतच्च योऽवशिष्येत सोऽस्म्यहम् ॥ ३२ ॥
परं स्वतन्त्रं न ।विष्णोरधीनं प्राक् सृष्टेस्तथैव च लयादनु ।अस्य सत्वप्रवृत्त्यादि विशेषेणाधिगम्यते ॥स्वातन्त्र्यं स्थितिकाले तु कथञ्चिद्बुद्धिमोहतः ।प्रतीयमानमपि तु तस्मान्नैवेति गम्यताम् ॥जनिष्येऽहं लयिष्येऽहमिति न ह्यभिसन्धितः ।अतो जीवनमप्येतद्भवेदीशाभिसंहितम् ॥अतः स्वरूपभेदेऽपि ह्यात्मैवेदमिति श्रुतिः ।वदत्यस्येशतन्त्रत्वाद्यदशक्तस्त्वसन्निति । ।विद्यन्ते हि तदा जीवाः कालकर्मादिकं तथा ।क्वान्यथा हि पुनः सृष्टिः पूर्वकर्मानुसारिणी॥ इति ब्रह्मतर्के ।त्वमेतच्च परं न भवेत् । स्वतन्त्रं न ॥ ३२ ॥
ऋतेऽर्थं यत्प्रतीयेत न प्रतीयेत चात्मनि ।तद्विद्यादात्मनो मायां यथाऽऽभासो यथा तमः ॥ ३३ ॥
यथा महान्ति भूतानि भूतेषूच्चावचेषु च ।प्रविष्टान्यप्रविष्टानि तथा तेषु न तेष्वहम् ॥ ३४ ॥
अर्थवदिव प्रतीयते । न च परमात्मन्यर्थवत् प्रतीयते । अर्थं प्रयोजनमृते । न हि जीवप्रकृतिभ्यामीश्वरस्यार्थः ।'मुख्यतो विष्णुशक्तिर्हि मायाशब्देन भण्यते ।उपचारतस्तु प्रकृतिर्जीवश्चैव हि भण्यते॥ इति च ।यथाऽऽभासो जीवः ॥'सर्वं परे स्थितमपि नैव तत्रेति भण्यते ।यतो हरेर्न जीवेन जीवनं न हरौ ततः ॥जीवः प्रकृतिरप्यत्र यतो नैव हि बन्धकृत् ।कर्म चाफलदातृत्वात्कालश्चापरिणामनात् ॥यथा छत्रधराद्यास्तु रथस्था अपि सर्वशः ।रथिनो नैव भण्यन्ते एवं हरिगता अपि॥"'यथा महान्ति भूतानि शरीरेषु बहिस्तथा ।एवं हरिश्च भूतेषु बहिश्च व्याप्तिहेतुतः ।तस्मात्तत्स्थो न तत्स्थश्च प्रोच्यते हरिरीश्वरःइति च ॥ ३३,३४ ॥
एतावदेव जिज्ञास्यं तत्वजिज्ञासुनाऽऽत्मनः ।अन्वयव्यतिरेकाभ्यां यत्स्यात्सर्वत्र सर्वदा ॥ ३५ ॥
अन्यभावाभावकाले देशे च तद्विद्यमानाविद्यमानशक्तिमांश्चेत्यन्वय-व्यतिरकौ ॥ ३५ ॥
अन्तर्हितेन्द्रियार्थाय हरयेऽवहिताञ्जलिः ।सर्वभूतमयो विश्वं ससर्जेदं स पूर्ववत् ॥ ३८ ॥
'सर्वस्यापि प्रधानत्वात् स सर्वमय ईर्यते॥ इति च ॥ ३८ ॥
मायां विविदिषुर्विष्णोः मायेशस्य महामुनिः ।महाभागवतो राजन् पितरं पर्यतोषयत् ॥ ४१ ॥
मायां माहात्म्यं विविदिषुः । अन्येषां माहात्म्यपतेः ।'मुख्यतो विष्णुमाहात्म्यं मायाशब्दोदितं भवेत् ।प्रधानत्वाच्च मातृत्वान्मेयत्वं चैव तस्य हि॥ इति च ॥ ४१ ॥
नारदः प्राह मुनये सरस्वत्यास्तटे नृप ।ध्यायते ब्रह्म परमं व्यासायामिततेजसे ॥ ४४ ॥
'हरिर्व्यासादिरूपेण सर्वज्ञोऽपि स्वयं प्रभुः ।शृृणोति नारदादिभ्यो मोहायैषां प्रसिद्धये॥ इति पाद्मे ॥ ४४ ॥
यदुताहं त्वया पृष्टो वैराजात्पुरुषादिदम् ।यथाऽऽसीत्तदुपाख्यास्ये प्रश्नानन्यांश्च कृत्स्नशः ॥ ४५ ॥
'विराड्ब्रह्मा समुद्दिष्टस्तद्गतः परमो यतः ।अतो वैराजमित्येनमाहुरीशत्वतो विराट्॥इति बृहत्संहितायाम् ॥ ४५ ॥