Bhagavatatatparyanirnaya/C1/S16: Difference between revisions
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स्निग्धेषु पाण्डुषु विष्णोः सारथ्यादिभिर्विशेषतो भक्तिं करोति ॥ १७ ॥ | |||
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त्यागो मिथ्याभिमानवर्जनम् ।'मिथ्याभिमानविरतिस्त्याग इत्यभिधीयते''इति नारायणाध्यात्मे ॥एकान्ततः शुभभागित्वं सौभाग्यम् ।'शुभैकभागी सुभगो दुर्भगस्तद्विपर्ययः''इति गीताकल्पे ।'शमः प्रियादिबुद्ध्युज्झा क्षमा क्रोधाद्यनुत्थितिः ।महाविरोधकर्तुश्च सहनं तु तितिक्षणम्''॥ इति पाद्मे ।'स्वयं सर्वस्य कर्तृत्वात् कुतस्तस्य प्रियाप्रिये''इति च पाद्मे ।'प्रियमेव यतः सर्वमप्रियं नास्ति कुत्रचित् ।स्वयमेव यतः कर्ता शान्तोऽतो हरिरीश्वरः''। इति ब्रह्मतर्के ॥ २७,२८ ॥ | |||
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| verse_line1 = प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः । | |||
| verse_line2 = गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥ | |||
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मानः परेषाम् ॥ २९ ॥ | |||
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| verse_line1 = इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः । | |||
| verse_line2 = प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥ | |||
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{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये प्रथमस्कन्धे षोडशोऽध्यायः ॥}} | |||
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'गुणैः स्वरूपभूतैस्तु गुण्यसौ हरिरीश्वरः ।न विष्णोर्न च मुक्तानां कोऽपि भिन्नो गुणो मतः''॥ इति ब्रह्मतर्के । | |||
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Revision as of 05:33, 8 April 2026
षोडशोऽध्यायः
शौनक उवाच—कस्य हेतोर्निजग्राह कलिं दिग्विजये नृपः ।
कोऽसौ इत्याक्षेपः । कलिम् इत्युक्तत्वात् ॥ ५ ॥
तत्कथ्यतां महाभाग यदि विष्णुकथाश्रयम् ।अथ वाऽस्य पदाम्भोजमकरन्दलिहां सताम् ॥ ६ ॥
अथ इति पक्षान्तरे । वा यदि ॥ ६ ॥
किमन्यैरसदालापैरायुषो यदसद्व्ययः ।क्षुद्रायुषां नृणामङ्ग मर्त्यानां मृतिच्छताम् ॥ ७ ॥
अन्यथा चेदायुषोऽसद्व्ययः इत्यर्थः ।'यद्यर्थे च विकल्पार्थे वाशब्दः समुदीर्यतेइति नाममहोदधौ ॥ ७ ॥
एतदर्थं हि भगवान् आहूतः परमर्षिभिः ।अहो नृलोके पीयेत हरिलीलामृतं वचः ॥ ९ ॥
एतदर्थं हि मृत्युरुपहूतः । अहो नृलोके पीयेत इति ॥ ९ ॥
सारथ्यपार्षदसेवनसख्यदौत्य-वीरासनानुगमनस्तवनप्रणामैः ।
स्निग्धेषु पाण्डुषु विष्णोः सारथ्यादिभिर्विशेषतो भक्तिं करोति ॥ १७ ॥
धरोवाच—सत्यं शौचं दया दानं त्यागः सन्तोष आर्जवम् ।
ज्ञानं विरक्तिरैश्वर्यं शौर्यं तेजो धृतिः स्मृतिः ।स्वातन्त्र्यं कौशलं कान्तिः सौभगं मार्दवं क्षमा ॥ २८ ॥
त्यागो मिथ्याभिमानवर्जनम् ।'मिथ्याभिमानविरतिस्त्याग इत्यभिधीयतेइति नारायणाध्यात्मे ॥एकान्ततः शुभभागित्वं सौभाग्यम् ।'शुभैकभागी सुभगो दुर्भगस्तद्विपर्ययःइति गीताकल्पे ।'शमः प्रियादिबुद्ध्युज्झा क्षमा क्रोधाद्यनुत्थितिः ।महाविरोधकर्तुश्च सहनं तु तितिक्षणम्॥ इति पाद्मे ।'स्वयं सर्वस्य कर्तृत्वात् कुतस्तस्य प्रियाप्रियेइति च पाद्मे ।'प्रियमेव यतः सर्वमप्रियं नास्ति कुत्रचित् ।स्वयमेव यतः कर्ता शान्तोऽतो हरिरीश्वरः। इति ब्रह्मतर्के ॥ २७,२८ ॥
प्रागल्भ्यं प्रश्रयः शीलं सह ओजो बलं भगः ।गाम्भीर्यं स्थैर्यमास्तिक्यं कीर्तिर्मानोऽनहङ्कृतिः ॥ २९ ॥
मानः परेषाम् ॥ २९ ॥
इमे चान्ये च भगवन्नित्या यत्र महागुणाः ।प्रार्थ्या महत्वमिच्छद्भिः न च यान्ति स्म कर्हिचित् ॥३०॥
'गुणैः स्वरूपभूतैस्तु गुण्यसौ हरिरीश्वरः ।न विष्णोर्न च मुक्तानां कोऽपि भिन्नो गुणो मतः॥ इति ब्रह्मतर्के ।