Aitareya/C3/S1: Difference between revisions
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}} | }} | ||
== प्रथमोऽध्यायः == | == प्रथमोऽध्यायः == | ||
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| verse_line1 = अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् । | |||
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विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् । | |||
विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकामृषयो विदुः ॥ | |||
तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ । | |||
बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः ॥ | |||
विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः । | |||
अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः ॥ | |||
तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः । | |||
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| verse_line1 = पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः । | |||
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पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥ | |||
देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते । | |||
देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् ॥ | |||
दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते । | |||
वेदकत्वाच्चायनत्वाद्रूपं यद्वायुनामकम् ॥ | |||
विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् । | |||
संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥ | |||
वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् । | |||
षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् ॥ | |||
पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते । | |||
उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् ॥ | |||
षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि । | |||
व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते ॥ | |||
सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ॥ | |||
इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥ | |||
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| verse_line1 = आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे । स हाविपरिहृतो मेने न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति । समाने वै तत्परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः । | |||
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आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः । | |||
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| verse_line1 = समानं ह्येतद्भवति वायुश्चाकाशश्चेत्यधिदैवतम् । | |||
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भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥ | |||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम् । मन उत्तररूपम् । प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम् । वागुत्तररूपम् । मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम् । वागुत्तररूपम् । प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च । | |||
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अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् । | |||
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| verse_line1 = स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंहतः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥ | |||
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मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः । | |||
विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥ | |||
इति च । | |||
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प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः । | |||
वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥ | |||
इति च । | |||
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प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति । | |||
वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैव तानि कर्मनामान्येव इति च श्रुतिः । | |||
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मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् । | |||
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मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा । | |||
नित्यायुषा च युक्तः स्यात् संहितारूपविद्धरेः ॥ इति च । | |||
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प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ शाकल्यस्य । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वृष्टिः सन्धिः । पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद्बलवदनूद्गृह्णन् सन्दधदहोरात्रे वर्षति । द्यावापृथिव्यौ समधातामित्युताप्याहुरितीन्वधिदैवतम् । | |||
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| text = | |||
वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः । | |||
पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ॥ | |||
माण्डूकेयैर्हि शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् । | |||
तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ॥ | |||
तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् । | |||
भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् ॥ | |||
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| verse_line1 = अथाध्यात्मम् ॥ | |||
| verse_line2 = पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम् । इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाकाशः । तस्मिन्हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तो यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः । यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींष्येवमिमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि । यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुर्यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयं यथाऽयमग्निः पृथिव्यामेवमिदमुपस्थे रेतः । एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाहेदमेव पृथिव्या रूपमिदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ | |||
| verse_line3 = २॥ | |||
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| text = | |||
उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः । | |||
अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ॥ | |||
वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चात्मनः । | |||
तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः ॥ | |||
आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् । | |||
वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् ॥ | |||
सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्घृद्रेतःसु च स्थितिम् । | |||
कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च ॥ | |||
स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥ इत्यादि च । | |||
}} | |||
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| text = | |||
वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥ | |||
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| verse_line1 = अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनमुभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठाऽवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाह तस्य नास्त्युपवादः । | |||
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| text = | |||
पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता । | |||
दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ॥ | |||
नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता । | |||
स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्युपवदेन्न तम् ॥ | |||
तस्यापवदिता याति त्रैलोक्यादध एव हि । | |||
नाशमाप्नोति निरये तस्मादपवदेन्न तम् ॥ | |||
गच्छस्यध इति ब्रूयादन्यं ब्राह्मणतस्तथा । | |||
ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स न चेतरः ॥ | |||
इति च ॥ | |||
}} | |||
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| text = | |||
भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् । | |||
}} | |||
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| text = | |||
क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् । | |||
लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥ इति च । | |||
तस्मादतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तं तस्य नास्त्युपवाद इति । तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान् इत्यादिवत् । | |||
}} | |||
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| verse_line1 = यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत्प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत् पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्दिवं देवतामारो द्यौस्त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेदन्तरिक्षं देवतामारोऽन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वाब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत्तथा स्यात् । | |||
}} | |||
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| text = | |||
उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = AIT_C03_S01_V10 | |||
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| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते । | |||
ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ॥ | |||
नाशयिष्यति विष्णुस्त्वामन्धे तमसि पातयेत् । | |||
इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद्देवसर्गात्मकं क्वचित्॥ इति च । | |||
}} | |||
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| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् । | |||
विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ॥ | |||
सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु । | |||
तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥ | |||
भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद्विष्णव इत्यसौ । | |||
मोक्षकामो विषणवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥ | |||
विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः । | |||
सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥ | |||
तज्ज्ञानामेव नान्येषामिति वेदानुशासनम् । | |||
संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्न चाब्रुवन् ॥ | |||
परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तमथापि वा । | |||
यद्वदेत् तत्तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥ इति च । | |||
}} | |||
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अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण । | |||
}} | |||
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| verse_line1 = न त्वेवान्यत्कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥ | |||
}} | |||
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| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः । | |||
योऽतिक्रमति तस्याज्ञामतिद्युम्नः प्रकीर्तितः ॥ | |||
मोक्षयोग्योऽपि यस्त्वेवमतिद्युम्नो भवेत् पुमान् । | |||
लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥ | |||
लोकच्युतो भवेत्येनमपि नैव वदेत् क्वचित्। | |||
च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥ इति च ॥३ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेच्छक्नुवन्तं चेन्मन्येत प्राणं वंशं समधां३ । प्राणं मा वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ चेदशक्नुवन्तं मन्येत प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ | |||
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भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः । | |||
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सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् । | |||
वायुं च मुक्तिमाप्नोति य एवं तदुपासकम् ॥ | |||
निन्देत विष्णुविज्ञानविषये तं वदेत सः । | |||
विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा ॥ | |||
न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वामतो हि तौ । | |||
ज्ञानसामर्थ्यवानित्थं ब्रूयाद्देवादिरुत्तमः ॥ | |||
अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो हि यः । | |||
स ब्रूयाद्विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम् ॥ | |||
सन्धातुं नाशको यस्माद्धास्यतस्त्वामतो हि तौ ॥ इति च । | |||
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स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः । | |||
}} | |||
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तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा । | |||
विष्णुर्जहाति तं पापमिह चामुत्र च प्रभुः ॥ इति च भारते ॥४ ॥ | |||
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| verse_line1 = अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः । पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहितेति ॥ | |||
| verse_line2 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्तयति येन स्वरास्वरं विजानाति येन मात्रामात्रां विभजते सा संहितेति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः । अक्षरे खल्विमे अविकर्षन्ननेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद्याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद्भवति । सामैवाहं संहितां मन्य इति । | |||
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पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् । | |||
वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ॥ | |||
उत्तराक्षरसञ्ज्ञं च वर्णयोरन्तरस्थितम् । | |||
अवनात् काशनाच्चैतदवकाशाभिधं हरेः ॥ | |||
नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथावदत् । | |||
ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः ॥ | |||
व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति । | |||
तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः ॥ | |||
सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥ | |||
इति च । | |||
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मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च । | |||
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| verse_line1 = तदप्येतदृषिणोक्तं– बृहस्पते न परः साम्नो विदुरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥ | |||
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मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः । | |||
येषां नैतन्नापरं किं च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्॥ | |||
}} | |||
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| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः । | |||
आदेवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ॥ | |||
अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य नित्यनिरतिशयदुःखस्यान्धतमसो योग्याः शास्त्रदस्यवः । | |||
}} | |||
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| text = | |||
ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः । | |||
शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥ | |||
कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः । | |||
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥ | |||
ब्रह्मस्तेना निरानन्दाः अपक्वमनसोऽशिवाः । | |||
वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥ | |||
तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥ | |||
इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनादेवंविधा एव स्तेनाः । अभिद्रुहस्पदस्थाश्च । निरामिणः रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन नीचताविदः । त एव रिपवश्च तस्य । | |||
}} | |||
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अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् । | |||
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥ | |||
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः । | |||
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥ | |||
इत्यादिवचनादसुरादयः । | |||
}} | |||
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अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः । | |||
}} | |||
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| text = | |||
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् । | |||
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥ | |||
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः । | |||
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥ | |||
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥ | |||
इत्यादि वचनात् । | |||
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ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि । | |||
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वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे । | |||
स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥ | |||
इति च । | |||
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सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् । | |||
तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद्यतः ॥ | |||
इति वचनात् । | |||
सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नो वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद्रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥ | |||
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| verse_line1 = बृहद्रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यःवाग्वैरथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः । भरद्वाजो बृहदाचक्रे अग्नेरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | |||
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| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता । | |||
नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ॥ | |||
मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः । | |||
वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ॥ | |||
प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् । | |||
रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् ॥ | |||
विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् । | |||
नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः ॥ | |||
रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ । | |||
वाक्प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् ॥ | |||
लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् । | |||
एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत ॥ | |||
तार्क्ष्य एतावन्मात्रं च समुद्दिश्य न चापरम् । | |||
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| verse_line1 = वाक्प्राणेन संहितेति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन पवमानो विश्वैर्देवैः स्वर्गेण लोकेन स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता । स यो हैतामवरपरां संहितां वेदैवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते यथैषा संहिता । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = AIT_C03_S01_V16 | |||
| id = AIT_C03_S01_V16_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥ | |||
द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् । | |||
संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता ॥ | |||
तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् । | |||
अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा ॥ | |||
प्रोक्ताऽवरपरेत्येव वाक्प्राणाख्यौ रमाच्युतौ । | |||
संहितैका तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः ॥ | |||
वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि । | |||
तृतीया संहिता प्रोक्ता देवतास्ताः सशङ्कराः ॥ | |||
चतुर्थी संहिता प्रोक्ता शङ्करो ब्रह्मणा सह । | |||
पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः ॥ | |||
प्रथमायां द्वितीयायां विष्णुरेव परो मतः । | |||
तृतीयायां वायुरेव चतुर्थ्यां सर्वदेवताः ॥ | |||
विरिञ्च एव पञ्चम्यामवरा इतरे ततः । | |||
प्रथमायां संहितायामवरो वामभागगः ॥ | |||
द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः । | |||
चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः ॥ | |||
अवराद्याः परान्ता यदेताः सर्वाश्च संहिताः । | |||
ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः ॥ | |||
अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् । | |||
द्योतनाच्च .... | |||
}} | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेदभिव्याहार्षन्नेव विद्याद्दिवं संहिताऽगमद्विदुषां देवानामेवं भविष्यतीति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
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| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
.... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥ | |||
आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा । | |||
विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक्तेन महत्फलम् ॥ | |||
तेषामेव हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः । | |||
अगमद्देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥ | |||
इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा । | |||
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| verse_line1 = वाक्संहितेति पञ्चालचण्डः वाचा वै वेदास्सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति । तद्यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेह । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति स्वपिति वा प्राणे तदा वाग्भवति । प्राणस्तदा वाचं रेह । तावन्योन्यं रीहः । वाग्वै माता । प्राणः पुत्रः । तदप्येतदृषिणोक्तम्– | |||
| verse_line2 = एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे । | |||
| verse_line3 = तं पाकेन मनसाऽपश्यमन्तितस्तं माता रेळ्हि स उ रेळ्हि मातरम् ॥ इति । | |||
| verse_line4 = स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
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| id = AIT_C03_S01_V18_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥ | |||
मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् । | |||
वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी ॥ | |||
प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः । | |||
ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः ॥ | |||
उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद्व्यज्यते हरिः । | |||
सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥ | |||
}} | |||
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| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | |||
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| chapter_id = AIT_C03 | |||
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| verse_type = mantra | |||
| verse_line1 = अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम् । पतिरुत्तररूपम् । पुत्रः सन्धिः । प्रजननं सन्धानम् । सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च । पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च तदप्येतदृषिणोक्तम्– अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥ | |||
| verse_line2 = ६ ॥ | |||
}} | |||
{{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमन्महैतरेयोपनिषद्भाष्ये तृतीयारण्यके प्रथमोऽध्यायः ॥}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | |||
| id = AIT_C03_S01_V19_B01 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि । | |||
विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ॥ | |||
स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः । | |||
देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः ॥ | |||
माननात् पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः । | |||
पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः ॥ | |||
स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः । | |||
त्राणात् पूर्तित एवासौ वर्णसन्धानकर्मणि ॥ | |||
सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः । | |||
प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः ॥ | |||
जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता । | |||
वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः ॥ | |||
स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः । | |||
अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः ॥ | |||
पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः । | |||
मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः ॥ | |||
विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः । | |||
ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः ॥ | |||
गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः । | |||
माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः ॥ | |||
पालनात् पितृनामासौ पितृष्वेव व्यवस्थितः । | |||
रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः ॥ | |||
एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः । | |||
जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः ॥ | |||
जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते । | |||
जनिं यस्मात् तवयति तवनं हि प्रकाशनम् ॥ | |||
इति च । | |||
}} | |||
{{Commentary | |||
| verse_id = AIT_C03_S01_V19 | |||
| id = AIT_C03_S01_V19_B02 | |||
| name = Bhashyam | |||
| label = Bhashyam | |||
| text = | |||
प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ । | |||
यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ॥ | |||
अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च । | |||
स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते ॥ | |||
तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् । | |||
आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् ॥ | |||
चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् । | |||
सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् ॥ | |||
धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः । | |||
वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद्विभुः ॥ | |||
सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि । | |||
चतूरूपं परं विष्णुं राजानौ प्रथसप्रथौ ॥ | |||
भरद्वाजौ वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् । | |||
यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः ॥ | |||
जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते । | |||
प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः ॥ | |||
प्राप्यो देवैर्यतो नित्यमनिरुद्धाभिधो हरिः । | |||
तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः ॥ | |||
आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् । | |||
तद्बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् ॥ | |||
भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् । | |||
चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते ॥ | |||
अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् एवं चत्वार एव ते । | |||
अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् ॥ | |||
गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च । | |||
सर्वज्ञत्वाद्यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् ॥ | |||
तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः । | |||
सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् ॥ | |||
घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते । | |||
निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् ॥ | |||
प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् । | |||
दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च ॥ | |||
वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद्धोत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ । | |||
यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥ | |||
इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् । | |||
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यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् । | |||
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चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः । | |||
परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इति नामकः ॥ | |||
रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः । | |||
एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् ॥ | |||
सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा । | |||
परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः ॥ | |||
मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती । | |||
लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा ॥ | |||
स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि । | |||
नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि च ॥ इत्यादि च ॥ ६ ॥ | |||
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Revision as of 05:32, 8 April 2026
प्रथमोऽध्यायः
अथाऽतः संहितायाः उपनिषत् ।
विष्णुनाम्नि षकारस्य णकारस्य च संहिताम् ।
विष्णोस्तु बहुरूपाणां वाचिकामृषयो विदुः ॥
तौ च वर्णौ हरेः सम्यक्स्वरूपप्रतिपादकौ ।
बहुधैव स्थितस्यास्य सदैवैकस्वरूपिणः ॥
विष्णुनामार्थरूपत्वाद् वेदानामपि सर्वशः ।
अन्येषामपि शब्दानां संहिता विष्णुवाचिकाः ॥
तद्वाचकास्तथा वर्णाः सर्वे लौकिकवैदिकाः ।पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वायुस्संहितेति माण्डूकेयः ।
पृथिवीनामकं रूपं पृथुत्वात् पृथिवीस्थितम् ॥
देवता पूर्ववर्णस्य पूर्वरूपं तदुच्यते ।
देवतोत्तरवर्णस्य क्रीडनाच्च द्युनामकम् ॥
दिवि स्थितं हरे रूपमुत्तरं रूपमुच्यते ।
वेदकत्वाच्चायनत्वाद्रूपं यद्वायुनामकम् ॥
विष्णोस्तद्वर्णयोर्मध्यदेवतेति प्रकीर्तितम् ।
संहितानामकं तच्च रूपद्वयसहस्थितेः ॥
वर्णद्वयं विकारं च षकारं केचिदब्रुवन् ।
षकारं मध्यमत्रैव णकारं केचिदुत्तरम् ॥
पृथक्करणमेवैषां वर्णयोर्मध्यमुच्यते ।
उपसर्गमात्रं वीत्याहुः केचिन्नाम ष्णुमात्रकम् ॥
षकारं च णकारं च वर्णौ पूर्वोत्तरावपि ।
व्यक्तिरेवोष्मणस्तत्र मध्यमित्यभिधीयते ॥
सर्वेप्येत उपादेयाः पक्षा निर्दोषका यतः ॥
इत्याद्यैतरेयसंहितायाम् ॥आकाशः संहितेत्यस्य माक्षव्यो वेदयाञ्चक्रे । स हाविपरिहृतो मेने न मेऽस्य पुत्रेण समगादिति । समाने वै तत्परिहृतो मेन इत्यागस्त्यः ।
आकाशस्थ आकाशनामा भगवान् वर्णयोर्मध्यदेवतेति माक्षव्यः । उभयरूपसंहितत्वात् संहितानामकः । स माण्डूकेयस्तेन माक्षव्येणापरिहृतः स्वपक्षः इति मेने । मे मदीयेन मदुपासितेनास्याकाशस्य पुत्रेण वायुना न समागादसौ माक्षव्यः । वायुस्थविष्ण्वनुपासनात् । यद्यप्याकाशस्थो भगवान् संहितानामको भवति । तथापि न वायुस्थस्यासंहितात्वं भवतीत्यपरिहृतत्वम् । परिहृतो माण्डूकेयपक्ष इत्यहं मेन इत्यागस्त्यः । आकाशे विष्णूपासनस्याधिकफलत्वात् । पिता ह्याकाशो वायोः ।
समानं ह्येतद्भवति वायुश्चाकाशश्चेत्यधिदैवतम् ।
भगवतस्तु पक्षः समत्वमेव वाय्वाकाशयोरिति । आकाशस्य पितृत्वाद् वायोर्बलाधिकत्वाच्चोभयोरुपासनास्थानत्वे साम्यम् । तस्मादुभावपि ग्राह्यौ । त्वगिन्द्रियदेवतात्वेनाकाशात् पूर्वमेव वायोः सात्विकाहङ्कारजत्वाद् वायोराकाशाद्गुणाधिकत्वम् । तथाप्यत्राकाशस्य पितृत्वं व्याप्तिश्चाधिकेत्युपासनायां साम्यम् ॥
अथाध्यात्मम् । वाक्पूर्वरूपम् । मन उत्तररूपम् । प्राणस्संहितेति शूरवीरो माण्डूकेयः । अथ हास्य पुत्र आह ज्येष्ठः। मनः पूर्वरूपम् । वागुत्तररूपम् । मनसा वा अग्रे सङ्कल्पयति । अथ वाचा व्याहरति । तस्मान्मन एव पूर्वरूपम् । वागुत्तररूपम् । प्राणस्त्वेव संहितेति । समानमेनयोरत्र पितुश्च पुत्रस्य च ।
अत्र प्राणाख्यस्य प्राणे स्थितस्य विष्णोः संहितानामत्वे पितापुत्रयोः साम्यमेव । अन्यत्र तु पुत्रपक्ष एव बलीयान् । युक्तिमत्वात् ।
स एषोऽश्वरथः प्रष्टिवाहनो मनोवाक्प्राणसंहतः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन । सर्वमायुरेतीति नु माण्डूकेयानाम् ॥ १ ॥
मनोवाक्प्राणनामाऽसौ मन आदिषु संस्थितः ।
विष्णुस्तस्य रथो देह इन्द्रियाश्वः प्रकीर्तितः ॥इति च ।
प्रष्टिः स पृच्छनीयत्वात् परमात्मा जनार्दनः ।
वक्तृत्वाच्चैव वाङ्नामा मनो मन्तृत्वहेतुतः ॥इति च ।
प्राणन्नेव प्राणो नाम भवति ।
वदन् वाक्पश्यंश्चक्षुः शृण्वन् श्रोत्रं मन्वानो मनस्तान्यस्यैव तानि कर्मनामान्येव इति च श्रुतिः ।
मुक्तिरेव स्वर्गलोकः । अमुष्मिन् स्वर्गे लोके सर्वान् कामानाप्त्वेति प्रस्तुतत्वात् ।
मुक्तः प्रकृष्टज्ञानैश्च वेदैर्विष्णूत्थतेजसा ।
नित्यायुषा च युक्तः स्यात् संहितारूपविद्धरेः ॥ इति च ।
प्रकृष्टत्वेन जननात् प्रजेति ज्ञानम् । पान्ति शंसाधनाश्चेति पशवो वेदाः । परब्रह्मणो विष्णोर्वरणादेव सम्यक् चायितं स्वरूपं तेजः ब्रह्मवर्चसम् । लौकिकप्रजादिकमपि तदिच्छतां यथायोग्यं भवति । माण्डूकेयैर्ऋषिभिरुपाश्रिता एता विद्याः ॥ १ ॥
अथ शाकल्यस्य । पृथिवी पूर्वरूपम् । द्यौरुत्तररूपम् । वृष्टिः सन्धिः । पर्जन्यः सन्धाता । तदुतापि यत्रैतद्बलवदनूद्गृह्णन् सन्दधदहोरात्रे वर्षति । द्यावापृथिव्यौ समधातामित्युताप्याहुरितीन्वधिदैवतम् ।
वराहो वामनः सिंह इति रूपत्रयं हरेः ।
पूर्वोत्तरार्णमध्येषु स्थितमुक्तं सनातनम् ॥
माण्डूकेयैर्हि शाकल्यो वासुदेवादिरूपिणम् ।
तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ॥
तेषु चोच्चारके चैव स्थितमाह चतुर्विधम् ।
भूमिद्युवृष्टिपर्जन्यनाम्नोर्व्यादिषु संस्थितम् ॥अथाध्यात्मम् ॥पुरुषो ह वा अयं सर्व आनन्दं द्वे विदले भवत इत्याहुः । तस्येदमेव पृथिव्या रूपम् । इदं दिवः । तत्रायमन्तरेणाकाशो यथाऽसौ द्यावापृथिव्यावन्तरेणाकाशः । तस्मिन्हास्मिन्नाकाशे प्राण आयत्तो यथाऽमुष्मिन्नाकाशे वायुरायत्तः । यथाऽमूनि त्रीणि ज्योतींष्येवमिमानि पुरुषे त्रीणि ज्योतींषि । यथाऽसौ दिव्यादित्य एवमिदं शिरसि चक्षुर्यथाऽसावन्तरिक्षे विद्युदेवमिदमात्मनि हृदयं यथाऽयमग्निः पृथिव्यामेवमिदमुपस्थे रेतः । एवमु ह स्म सर्वलोकमात्मानमनुविधायाहेदमेव पृथिव्या रूपमिदं दिवः । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥
उर्व्यादीनां चतुर्णां च देह एव स्थितिं पुनः ।
अधरार्धस्य चोर्व्याश्च साम्यमन्यस्य वै दिवा ॥
वाचो वृष्ट्यैव साम्यं च पर्जन्येनैव चात्मनः ।
तेषां तेषु स्थितिं चैव विष्णोश्च चतुरात्मनः ॥
आकाशस्यान्तराकाशे नृसिंहस्यात्र संस्थितिम् ।
वायोः प्राणात्मतां चैव तत्र दाशरथेः स्थितिम् ॥
सूर्यविद्युद्धुताशानां दृग्घृद्रेतःसु च स्थितिम् ।
कपिलस्य च हंसस्य जामदग्न्यस्य तेषु च ॥
स्थितिं वदति विद्येयमपि मोक्षप्रदायिनी ॥ इत्यादि च ।वर्षणाद् वृष्टिः । परं जनयतीति पर्जन्यनामा विष्णुः । सन्धिनोतीति सन्धिः । धिनु पृष्टाविति धातुः । सम्यग्धारणात् सन्धाता । वर्षणमेव द्यावापृथिव्योः सन्धानम् । पर्जन्यस्थो भगवांस्तत्कर्ता ॥२॥
अथातो निर्भुजप्रवादाः । पृथिव्यायतनं निर्भुजम् । दिव्यायतनं प्रतृण्णम् । अन्तरिक्षायतनमुभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठाऽवराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तमुपवदेदच्योष्ठा उत्तराभ्यां स्थानाभ्यामित्येनं ब्रूयात् । यस्त्वेवोभयमन्तरेणाह तस्य नास्त्युपवादः ।
पृथिवीस्थो वराहस्तु संहितादेवतोदिता ।
दिविष्ठो वामनश्चैव सम्प्रोक्तः पददेवता ॥
नृसिंहस्त्वन्तरिक्षस्थो भगवान् क्रमदेवता ।
स्वाध्यायमेवं ध्यात्वा यः करोत्युपवदेन्न तम् ॥
तस्यापवदिता याति त्रैलोक्यादध एव हि ।
नाशमाप्नोति निरये तस्मादपवदेन्न तम् ॥
गच्छस्यध इति ब्रूयादन्यं ब्राह्मणतस्तथा ।
ब्रह्मप्राप्तेर्हि योग्यो यो ब्राह्मणः स न चेतरः ॥
इति च ॥भञ्जनवर्जितत्वान्निर्भुजं संहिता । तृण च्छेदन इति धातोः प्रतृण्णं पदम् । उभयमन्तरेण क्रमः । निर्भुजमूलत्वात् पदादीनां तद्विषयप्रवादा अपि निर्भुजप्रवादा इत्येवोच्यन्ते ।पृथिवीस्थितपृथिवीनामकविष्ण्वायतनं पृथिव्यायतनमित्यादि । अवराभ्यां पृथिव्यन्तरिक्षाभ्यां च्युतोऽसीति । उत्तराभ्यामन्तरिक्षद्युभ्याम् ।
क्रमस्वाध्यायकृद्यस्तं विशेषेण न निन्दयेत् ।
लोकत्रयादपि भ्रष्टो यस्मात् तन्निन्दको भवेत् ॥ इति च ।तस्मादतिदुष्टत्वात् तन्निन्दको नास्त्येवेत्युक्तं तस्य नास्त्युपवाद इति । तं कृष्णं पुण्डरीकाक्षं को नु युध्येत बुद्धिमान् इत्यादिवत् ।
यद्धि सन्धिं विवर्तयति तन्निर्भुजस्य रूपम् । अथ यच्छुद्धे अक्षरे अभिव्याहरति तत्प्रतृण्णस्य । अग्र उ एवोभयमन्तरेणोभयं व्याप्तं भवति । अन्नाद्यकामो निर्भुजं ब्रूयात् । स्वर्गकामः प्रतृण्णम् । उभयकाम उभयमन्तरेण । अथ यद्येनं निर्भुजं ब्रुवन्तं पर उपवदेत् पृथिवीं देवतामारः पृथिवी त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनं प्रतृण्णं ब्रुवन्तं पर उपवदेद्दिवं देवतामारो द्यौस्त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ यद्येनमुभयमन्तरेण ब्रुवन्तं पर उपवदेदन्तरिक्षं देवतामारोऽन्तरिक्षं त्वा देवता रिष्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वाब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत्तथा स्यात् ।
उपवदेदित्युक्तो मनुष्यमात्रः । पर उपवदेदित्यसुरः । सर्वशत्रुत्वात् ।
अमुक्तियोग्यैस्तु नरैर्विदुषां निन्दने कृते ।
ब्रूयाल्लोकच्युतोऽसीति निन्दितोऽसुरसर्गगैः ॥
नाशयिष्यति विष्णुस्त्वामन्धे तमसि पातयेत् ।
इति ब्रूयान्न तु ब्रूयाद्देवसर्गात्मकं क्वचित्॥ इति च ।षणयोः सन्धिकरणात् संहिताध्ययनं भवेत् ।
विषणुस्त्विति यो ब्रूयात् पदाध्यायी भवेत सः ॥
सन्ध्युक्तिश्च विभागश्च द्वयं व्याप्तं क्रमेण तु ।
तस्माद् द्विधाऽपि वचनात् क्रमाध्यायी भवेत सः ॥
भोगवृद्धिं च यो मोक्ष इच्छेद्विष्णव इत्यसौ ।
मोक्षकामो विषणवे द्वयकामो द्वयं वदेत् ॥
विष्णुनामात्मकत्वाच्चाथ संहितपदक्रमाः ।
सर्ववेदस्थिता मोक्षतद्भोगद्वयसाधकाः ॥
तज्ज्ञानामेव नान्येषामिति वेदानुशासनम् ।
संहिताद्या ब्रुवन् वाऽपि य एवंविन्न चाब्रुवन् ॥
परिवादं ब्रुवन्तं वा न ब्रुवन्तमथापि वा ।
यद्वदेत् तत्तथैव स्यात् क्षिप्रमेव न संशयः ॥ इति च ।अग्र एव । अग्र्यमेवोभयमन्तरेण ।
न त्वेवान्यत्कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माऽऽह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥ ३ ॥
द्युम्नो द्युतिस्वरूपत्वाद् विष्णुरेव प्रकीर्तितः ।
योऽतिक्रमति तस्याज्ञामतिद्युम्नः प्रकीर्तितः ॥
मोक्षयोग्योऽपि यस्त्वेवमतिद्युम्नो भवेत् पुमान् ।
लोकच्युतोऽसीत्येवं तं ब्रूयान्नाज्ञास्थितं क्वचित्॥
लोकच्युतो भवेत्येनमपि नैव वदेत् क्वचित्।
च्युतोऽसीति तु शिक्षार्थं ब्रूयान्नैवान्यथा क्वचित्॥ इति च ॥३ ॥अथातोऽनुव्याहाराः । प्राणो वंश इति विद्यात् । स य एनं प्राणं वंशमुपवदेच्छक्नुवन्तं चेन्मन्येत प्राणं वंशं समधां३ । प्राणं मा वंशं सन्दधतं न शक्नोषीत्याह । प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । अथ चेदशक्नुवन्तं मन्येत प्राणं वंशं समधित्सिषन्तं नाशकः सन्धातुं प्राणस्त्वा वंशो हास्यतीत्येनं ब्रूयात् । यथा तु कथा च ब्रुवन्वा ब्रुवन्तं वा ब्रूयादभ्याशमेव यत् तथा स्यात् । न त्वेवान्यत् कुशलाद् ब्राह्मणं ब्रूयात् । अतिद्युम्न एव ब्राह्मणं ब्रूयात् । नातिद्युम्ने च न ब्राह्मणं ब्रूयात् । नमो अस्तु ब्राह्मणेभ्य इति ह स्माह शूरवीरो माण्डूकेयः ॥४ ॥
भगवदुपासकस्य यस्मिन् कस्मिंश्चिद्दोष उक्ते तं प्रत्युक्तिप्रकारः पूर्वं दर्शितः । अनुव्याहारशब्देन भगवदुपासनाविषय एवास्याशक्त्यादिदोषं वदतः प्रत्युक्तिरुच्यते । निर्भुजं वदन्तमित्यादि त्ववस्थामात्रदर्शनम् । आत्मनो ज्ञानसामर्थ्यानुसारेण वक्तव्यत्वादनुव्याहारः ।
सर्वाधारत्वतो वंश इत्युपासीत यो हरिम् ।
वायुं च मुक्तिमाप्नोति य एवं तदुपासकम् ॥
निन्देत विष्णुविज्ञानविषये तं वदेत सः ।
विष्णुना वंशभूतेन वायुना सहितं तथा ॥
न शक्नोषीति मामात्थ हास्यतस्त्वामतो हि तौ ।
ज्ञानसामर्थ्यवानित्थं ब्रूयाद्देवादिरुत्तमः ॥
अन्यो गन्धर्वपित्रादिरल्पज्ञानबलो हि यः ।
स ब्रूयाद्विष्णुवायुभ्यां सन्धिमिच्छन्तमेव माम् ॥
सन्धातुं नाशको यस्माद्धास्यतस्त्वामतो हि तौ ॥ इति च ।स य एनं प्राणं वंशमुपवदेत् प्राणं प्रत्येनमुपासकमुपवदेत् । प्राणस्य विष्णोः प्रियत्वं तव न प्राप्स्यतीति । नाशकः सन्धातुं मया सह सन्धानं कर्तुं नाशकः । मम प्रीतिं कर्तुं नाशकः ।
तद्भक्तभक्तेष्वपि यो न कुर्यात् प्रीतिमञ्जसा ।
विष्णुर्जहाति तं पापमिह चामुत्र च प्रभुः ॥ इति च भारते ॥४ ॥
अथ खल्वाहुर्निर्भुजवक्त्राः । पूर्वमक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सा संहितेति ॥स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ वयं ब्रूमो निर्भुजवक्त्रा इति ह स्माह ह्रस्वो माण्डूकेयः । पूर्वमेवाक्षरं पूर्वरूपम् । उत्तरमुत्तररूपम् । योऽवकाशः पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण येन सन्धिं विवर्तयति येन स्वरास्वरं विजानाति येन मात्रामात्रां विभजते सा संहितेति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति । अथ हास्य पुत्र आह मध्यमः प्रातीबोधीपुत्रः । अक्षरे खल्विमे अविकर्षन्ननेकीकुर्वन् यथावर्णमाह । तद्याऽसौ मात्रा पूर्वरूपोत्तररूपे अन्तरेण सन्धिविज्ञपनी साम तद्भवति । सामैवाहं संहितां मन्य इति ।
पूर्ववर्णस्थितं यत्तद्रूपं पूर्वाक्षराभिधम् ।
वराहाख्यं हरेरन्यवर्णगं वामनाभिधम् ॥
उत्तराक्षरसञ्ज्ञं च वर्णयोरन्तरस्थितम् ।
अवनात् काशनाच्चैतदवकाशाभिधं हरेः ॥
नृसिंहरूपमित्याहुर्निर्भुजास्यास्तथावदत् ।
ह्रस्वो येनाक्षरोच्चारो मात्रासन्धिस्वरात्मकः ॥
व्यासरूपो हरिः साक्षात् संहितानामकस्त्विति ।
तत्पुत्रो मध्यमः प्राह समोच्चारणकारणः ॥
सामनामा वासुदेवः संहितानामवानिति ॥
इति च ।मापयति त्रायति चेति मात्रा भगवान् । यथोच्चारितवर्णयोर्मध्यस्थितश्च ।
तदप्येतदृषिणोक्तं– बृहस्पते न परः साम्नो विदुरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ॥ ५ ॥
मानस्तेनेभ्यो ये अभि द्रुहस्पदे निरामिणो रिपवोऽन्नेषु जागृधुः ।
येषां नैतन्नापरं किं च नैकं ब्रह्मणस्पते ब्रूहि तेभ्यः कदाचित्॥
अथो शमेनोपरता मनुष्याः ये धर्मिणो ब्रूहि तेभ्यः सदा नः ।
आदेवानामोहते वि व्रयो हृदि बृहस्पते न परः साम्नो विदुः ॥अभिद्रुहस्पदे अभितो द्रोहस्य नित्यनिरतिशयदुःखस्यान्धतमसो योग्याः शास्त्रदस्यवः ।
ऐकात्म्यं नाम यदिदं केचिद् ब्रूयुरनैपुणाः ।
शास्त्रतत्त्वमविज्ञाय तथावादबला जनाः ॥
कामक्रोधाभिभूतत्वादहङ्कारवशं गताः ।
याथातथ्यमविज्ञाय शास्त्राणां शास्त्रदस्यवः ॥
ब्रह्मस्तेना निरानन्दाः अपक्वमनसोऽशिवाः ।
वैगुण्यमेव पश्यन्ति न गुणानि नियुञ्जते ॥
तेषां तमःशरीराणां तम एव परायणम् ॥
इति मोक्षधर्मे भगवद्वचनादेवंविधा एव स्तेनाः । अभिद्रुहस्पदस्थाश्च । निरामिणः रामस्य रमणरूपस्य पूर्णानन्दस्वरूपस्य विष्णोर्जीवस्वरूपताज्ञानेन नीचताविदः । त एव रिपवश्च तस्य ।अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥
मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः ॥
इत्यादिवचनादसुरादयः ।अन्नेषु जागृधुः भोगमात्रगृध्नवः । येषामेतत्सर्वोत्तमं वासुदेवाख्यं परं ब्रह्म नास्तीति पक्षः । ईशितव्ये विद्यमाने हीश्वरो भवतीति । न चापरं किञ्चित्परमापेक्षया ह्यपरमिति । किं तर्हि किञ्चनैकं किमप्येकमेव वस्त्वस्ति न परमपरं चेति तेषां पक्षः ।
असत्यमप्रतिष्ठं ते जगदाहुरनीश्वरम् ।
अपरस्परसम्भूतं किमन्यत् कामहैतुकम् ॥
एतां दृष्टिमवष्टभ्य नष्टात्मानोऽल्पबुद्धयः ।
प्रभवन्त्युग्रकर्माणः क्षयाय जगतोऽहिताः ॥
ईश्वरोऽहमहं भोगी सिद्धोऽहं बलवान् सुखी ॥
इत्यादि वचनात् ।ब्रह्मणस्पते ब्रह्मणो वेदस्य पते वायो । अथ हेममासन्यं प्राणमूचुः । एष उ एव ब्रह्मणस्पतिर्वाग्वै ब्रह्म तस्या एष पतिस्तस्मादु ब्रह्मणस्पतिः इत्यादि श्रुतेरेतादृशेभ्यो मा ब्रूहि । शमेन विष्णुनिष्ठया उप समीपे तस्मिन्नेव रताः साम्नो विष्णोः परं किमपि न विदुः । तदेव देवानां व्रयः । सर्वदेवानां परतमं विष्ण्वाख्यं ब्रह्म हृदा व्योहते । वासुदेवादिरूपेण वरं नियामकं चेति व्रयः । तेभ्यो ब्रूहि ।
वायुं विद्याः समासाद्य सर्वासां पतिमूचिरे ।
स्तेनेभ्यो मैव नो ब्रूहि ब्रूह्यथो वैष्णवेषु च ॥इति च ।
सामनाम्ना श्रुतिर्यस्माद्विष्णुमाह ततः प्रियम् ।
तन्नाम विष्णोरिह तु संहितार्थं वदेद्यतः ॥
इति वचनात् ।
सामनाम्नः संहिताशब्दार्थत्वाद्विष्णोस्तस्य नाम्नः श्रुतिसिद्धत्वाच्च सामनाम्नो वासुदेवरूपसमाख्यासु पञ्चरात्रे पठितत्वाच्च तद्रूपं संहितानामकमिति युक्तमित्यभिप्रायः ॥५ ॥बृहद्रथन्तरयो रूपेण संहिता सन्धीयत इति तार्क्ष्यःवाग्वैरथन्तरस्य रूपम् । प्राणो बृहतः । उभाभ्यामु खलु संहिता सन्धीयते वाचा च प्राणेन च । एतस्यां ह स्मोपनिषदि संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । एतस्यां ह स्म मात्रायां संवत्सरं गा रक्षयते तार्क्ष्यः । तदप्येतदृषिणोक्तं– रथन्तरमाजभारा वसिष्ठः । भरद्वाजो बृहदाचक्रे अग्नेरिति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।
देवता पूर्ववर्णस्य लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ।
नारायणस्तूत्तरस्य तौ वाक्प्राणाभिधौ मतौ ॥
मध्यस्थः संहितानामा सोऽर्धनारीपुमात्मकः ।
वेदात्मकत्वाद् वाङ्नाम्नी लक्ष्मीरेव प्रकीर्तिता ॥
प्राणनामा प्रणेतृत्वात् साक्षान्नारायणः स्वयम् ।
रमित्यानन्द उद्दिष्टः सम्भोग्यं थमुदाहृतम् ॥
विष्णुभोग्या रतितरा लक्ष्मीरेव रथन्तरम् ।
नारायणो बृहत्वात्तु बृहन्नामा प्रकीर्तितः ॥
रथन्तरस्य बृहतो देवते चैव तावुभौ ।
वाक्प्राणसंस्थितौ चैव ताभ्यामेव हि सन्धितम् ॥
लक्ष्मीनारायणं रूपं संहितानामकं शुभम् ।
एतां विद्यामवाप्तुं हि वत्सरं गा अरक्षत ॥
तार्क्ष्य एतावन्मात्रं च समुद्दिश्य न चापरम् ।वाक्प्राणेन संहितेति कौण्ठरव्यः । प्राणः पवमानेन पवमानो विश्वैर्देवैः स्वर्गेण लोकेन स्वर्गो लोको ब्रह्मणा । सैषाऽवरपरा संहिता । स यो हैतामवरपरां संहितां वेदैवं हैव स प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सन्धीयते यथैषा संहिता ।
संहितादेवता बह्व्य इति कुण्ठरवात्मजः ॥
द्वयं द्वयं देवतानां मिलितं हरिशर्ववत् ।
संहितानामकं तत्र वर्णमध्यस्य देवता ॥
तयोरेकं देवतयोः परमन्यत् तथाऽवरम् ।
अवरस्य परस्यापि संयोगात् संहिता तु सा ॥
प्रोक्ताऽवरपरेत्येव वाक्प्राणाख्यौ रमाच्युतौ ।
संहितैका तथैवान्या केशवो वायुसंयुतः ॥
वायुः स पवमानाख्यो देवताश्चाखिला अपि ।
तृतीया संहिता प्रोक्ता देवतास्ताः सशङ्कराः ॥
चतुर्थी संहिता प्रोक्ता शङ्करो ब्रह्मणा सह ।
पञ्चमी संहिता चैव संहिता मोक्षदा इमाः ॥
प्रथमायां द्वितीयायां विष्णुरेव परो मतः ।
तृतीयायां वायुरेव चतुर्थ्यां सर्वदेवताः ॥
विरिञ्च एव पञ्चम्यामवरा इतरे ततः ।
प्रथमायां संहितायामवरो वामभागगः ॥
द्वितीयायां तु परमस्तृतीयायां तथाऽवरः ।
चतुर्थ्यां परमश्चैव पञ्चम्यां वामगोऽवरः ॥
अवराद्याः परान्ता यदेताः सर्वाश्च संहिताः ।
ततोऽवरपराः प्रोक्ता नैवोक्तास्ताः परावराः ॥
अभिमानी द्युलोकस्य शिवः सर्वस्य लोकनात् ।
द्योतनाच्च ....स यदि परेण वोपसृतः स्वेन वाऽर्थेनाभिव्याहरेदभिव्याहार्षन्नेव विद्याद्दिवं संहिताऽगमद्विदुषां देवानामेवं भविष्यतीति । शश्वत् तथा स्यात् । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति ।
.... यदि ब्रूयान्मन्त्रमेतमथापि वा ॥
आत्मार्थेऽथ परार्थे वा चिन्तयेदेवमञ्जसा ।
विद्वांसो देवता यस्मात् सम्यक्तेन महत्फलम् ॥
तेषामेव हरिश्चैव संहितारूपकः प्रभुः ।
अगमद्देवलोकं हि कर्तुं देवेष्वनुग्रहम् ॥
इति चिन्तयतस्तेषां प्रसादात् फलमञ्जसा ।वाक्संहितेति पञ्चालचण्डः वाचा वै वेदास्सन्धीयन्ते । वाचा च्छन्दांसि । वाचा मित्राणि सन्दधति । वाचा सर्वाणि भूतानि । अथो वागेवेदं सर्वमिति । तद्यत्रैतदधीयते वा भाषते वा वाचि तदा प्राणो भवति । वाक् तदा प्राणं रेह । अथ यत्र तूष्णीं वा भवति स्वपिति वा प्राणे तदा वाग्भवति । प्राणस्तदा वाचं रेह । तावन्योन्यं रीहः । वाग्वै माता । प्राणः पुत्रः । तदप्येतदृषिणोक्तम्–एकः सुपर्णः स समुद्रमाविवेश स इदं विश्वं भुवनं विचष्टे ।
पञ्चालचण्डो वाचं तु ब्रह्माणीं हि सरस्वतीम् ॥
मन्यतेऽस्याः पुत्रवच्च देवं नारायणं प्रभुम् ।
वेदैर्हि व्यज्यते विष्णुः सा च वेदाभिमानिनी ॥
प्राणस्थो भगवान् विष्णुः प्राणनामा प्रणेतृतः ।
ब्रह्मणोऽपि पिता नित्यं भगवान् पुरुषोत्तमः ॥
उपचर्यते पुत्र इति वेदैर्यद्व्यज्यते हरिः ।
सा देवी संहितानाम्नी वाच्योऽस्या विष्णुरेव हि ॥अथातः प्रजापतिसंहिता । जाया पूर्वरूपम् । पतिरुत्तररूपम् । पुत्रः सन्धिः । प्रजननं सन्धानम् । सैषाऽदितिः संहिता । अदितिर्हीदं सर्वं यदिदं किञ्च । पिता च माता च पुत्रश्च प्रजननं च तदप्येतदृषिणोक्तम्– अदितिर्माता स पिता स पुत्र इति । स य एवमेतां संहितां वेद सन्धीयते प्रजया पशुभिर्यशसा ब्रह्मवर्चसेन स्वर्गेण लोकेन सर्वमायुरेति सर्वमायुरेति ॥६ ॥
प्रजापत्याख्यशर्वेण प्रोक्ताऽन्या संहितापि हि ।
विष्णुरेवादितिर्नाम सर्वस्यात्ता यतः प्रभुः ॥
स एव पितृसंस्थस्तु पातृत्वात् पितृनामकः ।
देवतोत्तरवर्णस्य मातृस्थो मातृनामकः ॥
माननात् पूर्ववर्णस्य देवतेति प्रकीर्तितः ।
पोषकत्वात् सन्धिनामा वर्णयोरन्तरस्थितः ॥
स एव पुत्रसंस्थश्च पुत्रनामा जनार्दनः ।
त्राणात् पूर्तित एवासौ वर्णसन्धानकर्मणि ॥
सन्धाननामा सन्धानकर्तृत्वात् पुरुषोत्तमः ।
प्रजातिकर्मसंस्थश्च स एव प्रजनाभिधः ॥
जनकत्वात् परो विष्णुरेवं विष्णुर्हि संहिता ।
वासुदेवादिरूपेण चतुर्धैवं व्यवस्थितः ॥
स एव दिवि संस्थश्च द्युनामा क्रीडनात् प्रभुः ।
अन्तरेवेक्षणाच्चैव सोऽन्तरिक्षोऽन्तरिक्षगः ॥
पृथिवी पृथिवीस्थश्च प्रथितत्वाज्जनार्दनः ।
मुख्यार्थत्वात् सर्वनाम्नां सर्वदेवाभिधो हरिः ॥
विश्वे देवा इति प्रोक्तो बहुधा तेषु संस्थितः ।
ज्ञानद्युतेर्देवनामा स्थितो देवेषु केशवः ॥
गां धारयंश्च गन्धर्वो गन्धर्वेषु व्यवस्थितः ।
माननान्मानुषो नाम मानुषेषु स्थितो हरिः ॥
पालनात् पितृनामासौ पितृष्वेव व्यवस्थितः ।
रतेः प्राणेऽसुराख्यश्च सोऽसुरेषु व्यवस्थितः ॥
एवं पञ्चजनेषुस्थो हरिः पञ्चजनाभिधः ।
जातनामा जातसंस्थः प्रादुर्भूतगुणत्वतः ॥
जनिक्रियास्थितश्चासौ जनित्वमिति गीयते ।
जनिं यस्मात् तवयति तवनं हि प्रकाशनम् ॥
इति च ।प्रथश्च सप्रथश्चैव राजानौ मत्स्यदेशजौ ।
यापयामासतुर्विष्णोर्हविर्नाम्नो हविर्मुखे ॥
अनुष्टुब्देवता यस्तु नृसिंहो जगतोऽस्य च ।
स्वमुखे हवनादेव हविरित्यभिधीयते ॥
तस्मिन् यज्ञे वसिष्ठस्तु चतूरूपाज्जनार्दनात् ।
आजहार श्रियं देवीं रथन्तरवराभिधाम् ॥
चतुर्मूतिः स्तुतस्तेन प्रेषयामास तां श्रियम् ।
सा चास्मै प्रददौ विद्यां प्रययौ च पुनर्हरिम् ॥
धातेत्युक्तोऽनिरुद्धस्तु प्रद्युम्नस्तु द्युनामकः ।
वासुदेवः प्रसविता सर्वस्य प्रसवाद्विभुः ॥
सङ्कर्षणो विष्णुनामा प्रणेतृत्वाद् बलादपि ।
चतूरूपं परं विष्णुं राजानौ प्रथसप्रथौ ॥
भरद्वाजौ वसिष्ठश्च ध्यात्वाऽविन्दन् परात् परम् ।
यजनीयो यजुर्नामा विष्णुः सङ्कर्षणाभिधः ॥
जीवानां स्कन्दनादेव स्कन्नः प्रद्युम्न उच्यते ।
प्रथमो वासुदेवस्तु देवयानोऽनिरुद्धकः ॥
प्राप्यो देवैर्यतो नित्यमनिरुद्धाभिधो हरिः ।
तस्मादेवं चतुर्मूर्तेः स्तुतिसन्तोषिताद्धरेः ॥
आजहार भरद्वाजो रूपं नारायणाभिधम् ।
तद्बृहन्नामकं विष्णोश्चातुरात्म्यात् समुद्गतम् ॥
भरद्वाजमुपागम्य प्रादान्मोक्षवरं परम् ।
चतुर्मूर्तिः स भगवानग्निरित्यभिधीयते ॥
अग्र्यत्वात् सर्वभूतानाम् एवं चत्वार एव ते ।
अविन्दंस्तं चतुर्मूर्तिं साक्षान्नारायणं प्रभुम् ॥
गुहायां संस्थितमपि ह्यतीव हितमस्य च ।
सर्वज्ञत्वाद्यज्ञनाम्नो विष्णोस्तेजः परं हि तत् ॥
तस्मादेव चतुर्मूर्तेः सूरिप्राप्यत्वहेतुतः ।
सूर्यनाम्नोऽहरन् घर्मनामानं तं नृसिंहकम् ॥
घर्षणात् सर्वलोकस्य नृसिंहो घर्म उच्यते ।
निर्गत्य स चतुर्मूर्तेर्विप्रक्षत्राभिसंस्तुतात् ॥
प्रथादीनां चतुर्णां च पुरुषार्थचतुष्टयम् ।
दत्वा जगाम भगवान् स्वकीयां तनुमेव च ॥
वसिष्ठाच्च भरद्वाजाद्धोत्रध्वर्य्वोर्नृपौ तु तौ ।
यथेष्टसिद्धिं सम्प्राप्तौ सम्यगिष्टाज्जनार्दनात् ॥
इत्याद्यृग्वेदसंहितायाम् ।यस्य प्रथ इति नाम स च हविर्नाम्नो विष्णोर्हविर्यत् अयत् । अटो लोपेनान्तर्णीतणिच्त्वेन अयापयदित्यर्थः । एवं सप्रथ इति यस्य नामासौ । हविर्यदिति पृथक्सम्बन्धः । आचक्रे आकारयामास । अविन्दन् ते ते अविन्दन्नित्यध्यात्माधिदैवतयोरुभयत्रापि भगवन्तमविन्दन्नित्यर्थः । देवयानं गुहा यदिति वचनात् ।
चतुःशिखण्डां तु रमां द्विरूपो भगवान् हरिः ।
परमानन्दरूपत्वात् सुपर्ण इति नामकः ॥
रमयामास तस्यां च निषण्णः सर्वदैव सः ।
एक एव च विष्णुः स प्रविष्टः क्षीरसागरम् ॥
सर्वं पश्यत्यसौ देवः पूर्णाकुण्ठेन चेतसा ।
परिपक्वेन मनसाऽपश्यमित्याह तं त्वजः ॥
मातेव व्यञ्जकत्वात् तं प्राणस्थं वाक् सरस्वती ।
लिहते लिह्यत इव प्राणस्थेन तु सा सदा ॥
स्वयं तु भगवान् विष्णुर्वाक्पतेर्ब्रह्मणोऽपि हि ।
नित्यः पिता स्वतन्त्रश्च नास्य माता पिताऽपि च ॥ इत्यादि च ॥ ६ ॥