Jump to content

Bhagavadgitatatparya/C15: Difference between revisions

From Grantha
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Imported from pramati-sarvamoola XML (grantha.io importer v3)
Tag: New redirect
 
Line 1: Line 1:
== पञ्चदशोऽध्यायः ==
#REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C15]]
{{Adhyaya
| document_id  = BGT
| chapter_num  = 15
| title        = पञ्चदशोऽध्यायः
}}
संसारस्वरूपतदत्ययोपायविज्ञानान्यस्मिन्नध्याये दर्शयति-
त्रयोदशोक्तं विविच्य दर्शयति-
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V01
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ऊर्ध्वमूलमधःशाखं अश्वत्थं प्राहुरव्ययम् ।
| verse_line2  = छन्दांसि यस्य पर्णानि यस्तं वेद स वेदवित् ॥१ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Uvacha|श्री भगवानुवाच}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V01
| id      = BGT_C15_V01_B01
| text    =
'पृथङ्ग् मूलं हरिस्त्वस्य जगद्वृक्षस्य भूमिवत् ।
सत्त्वादियुक्ते चिदचित्प्रकृती मूलभागवत् ।
अत्रापि चिदचिद्योगो वृक्षवत् सम्प्रकीर्तितः ।
पृथिवीदेवतावत् तद्धरिर्मृद्वदचेतना ।
उत्तमत्वात्तु मूलानामूर्ध्वमूलस्त्वयं स्मृऽतः ।
नीचास्ततो महदहम्बुद्धयो भूतसंयुताः ।
शाखाश्छन्दांसि पर्णानि काममोक्षफले ह्यतः'' ॥१ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V02
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अधश्चोर्ध्वं प्रसृतास्तस्य शाखा गुणप्रवृद्धा विषयप्रवालाः ।
| verse_line2  = अधश्च मूलान्यनुसन्ततानि कर्मानुबन्धीनि मनुष्यलोके ॥ २ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V02
| id      = BGT_C15_V02_B01
| text    =
कारणेषु स्थितं कार्यं व्याप्तं कार्येषु कारणम् ।
अन्योन्यसंयुताः शाखाः मूलानि च सदैव तु ।
विषयाः दर्शनीयत्वात् प्रवालसदृशाः मताः ॥२ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V03
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = न रूपमस्येह तथोपलभ्यते नान्तो न चादिर्न च सम्प्रतिष्ठा ।
| verse_line2  = अश्वत्थमेनं सुविरूढमूल- मसङ्गशस्रेण दृढेन छित्त्वा॥ ३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V04
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ततः परं तत्परिमार्गितव्यं यस्मिन् गता न निवर्तन्ति भूयः ।
| verse_line2  = तमेव चाद्यं पुरुषं प्रपद्ये यतः प्रवृत्तिः प्रसृता पुराणी॥ ४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V04
| id      = BGT_C15_V04_B01
| text    =
जगद्वृक्षोयमश्वत्थो ह्यश्ववच्चञ्चलात्मकः ।
अव्ययोयं प्रवाहेण स्वस(क्ति)क्तज्ञानहेतिना ।
विष्णोः सम्यक् पृथग्दृष्टिनामच्छेदनभाक् सदा ।
अव्यक्तादिसमस्तं तु नेति नेत्यादिवाक्यतः ।
बोधेनैव पृथग् विष्णोः कृत्वा मृग्यः स केशवः ।
तमेवाद्यं प्रपद्येत यदंशाभासको ह्ययम् ।
जीवराशिः समस्तोपि ब्रह्मरुद्रेन्द्रपूर्वकः ॥ ३-४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V05
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = निर्मानमोहा जितसङ्गदोषा अध्यात्मनित्या विनिवृत्तकामाः ।
| verse_line2  = द्वन्द्वैर्विमुक्ताः सुखदुःखसञ्ज्ञै- र्गच्छन्त्यमूढाः पदमव्ययं तत्॥ ५ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V06
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = न तद्भासयते सूर्यो न शशाङ्को न पावकः ।
| verse_line2  = यद्गत्वा न निवर्तन्ते तद्धाम परमं मम॥६ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V07
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ममैवांशो जीवलोके जीवभूतः सनातनः ।
| verse_line2  = मनःषष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति॥७ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V07
| id      = BGT_C15_V07_B01
| text    =
किञ्चित् सादृश्यमात्रेण भिन्नोप्यंश इवोच्यते ।
ईश्वरस्तु यदा त्वस्य शरीरं विशति प्रभुः ।
मनःपष्ठानींद्रियाणि प्रकृतिस्थानि कर्षति ॥ शब्दादीन् प्रति ... ॥ ७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V08
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = शरीरं यदवाप्नोति यच्चाप्युत्क्रामतीश्वरः ।
| verse_line2  = गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात्॥८ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V08
| id      = BGT_C15_V08_B01
| text    =
... अथ यदा जीवमादाय यात्यतः ।
गृहीत्वैतानि संयाति वायुर्गन्धानिवाशयात् ॥८ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V09
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रोत्रं चक्षुः स्पर्शनं च रसनं घ्राणमेव च ।
| verse_line2  = अधिष्ठाय मनश्चायं विषयानुपसेवते॥९ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V10
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = उत्क्रामन्तं स्थितं वापि भुञ्जानं वा गुणान्वितम् ।
| verse_line2  = विमूढा नानुपश्यन्ति पश्यन्ति ज्ञानचक्षुषः॥१० ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V11
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यतन्तो योगिनश्चैनं पश्यन्त्यात्मन्यवस्थितम् ।
| verse_line2  = यतन्तोप्यकृतात्मानो नैनं पश्यन्त्यचेतसः॥११ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V12
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यदादित्यगतं तेजो जगद् भासयतेखिलम् ।
| verse_line2  = यच्चन्द्रमासि यच्चाग्नौ तत्तेजो विदि्ध मामकम्॥१२ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V12
| id      = BGT_C15_V12_B01
| text    =
भुङ्क्ते हरिः शुभान् भोगानिंद्रियेषु व्यवस्थितः ।
पूर्णानन्दोपि भगवान् क्रीडया भुङ्क्त एव तु ॥ ९-१२ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V13
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = गामाविश्य च भूतानि धारयाम्यहमोजसा ।
| verse_line2  = पुष्णामि चौषधीः सर्वाः सोमो भूत्वा रसात्मकः॥१३ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V14
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अहं वैश्वानरो भूत्वा प्राणिनां देहमाश्रितः ।
| verse_line2  = प्राणापानसमायुक्तः पचाम्यन्नं चतुर्विधम्॥१४ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V15
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = सर्वस्य चाहं हृदि संनिविष्टो मत्तः स्मृऽतिर्ज्ञानमपोहनं च ।
| verse_line2  = वेदैश्च सर्वैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम्॥ १५ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V16
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।
| verse_line2  = क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोक्षर उच्यते॥१६ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V17
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।
| verse_line2  = यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥१७ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V18
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।
| verse_line2  = अतोस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥१८ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V19
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यो मामेवमसंमूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।
| verse_line2  = स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥१९ ॥
}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C15_V20
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C15
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।
| verse_line2  = एतद्बुद्ध्वा बुदि्धमान् स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥२० ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V20
| id      = BGT_C15_V20_author-note
| text    =
॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे पुराणपुुरुषोत्तमयोगो नाम पञ्चदशोध्यायः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V20
| id      = BGT_C15_V20_author-note
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये पञ्चदशोध्यायः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C15_V20
| id      = BGT_C15_V20_B01
| text    =
सौम्यत्वात् सोमनामासौ सोममण्डलगः सदा ।स एवाग्निस्थितो विष्णुः नाम्ना वैश्वानरः सदा ।सर्वेषां स नराणां यदुपजीव्यः सदैव च ।स एव व्यासरूपेण वेदान्तकृदुदाहृतः ।ब्रह्मरुद्रादयः सर्वे शरीरक्षरणात् क्षराः ।श्रीरक्षरात्मेत्युदिता नित्यचिद्देहका यतः ।चेतनाचेतनस्यास्य राशेः संस्थापकत्वतः ।कूटस्थ आत्मा सा ज्ञेया परमात्मा हरिः स्वयम् ।'क्षराक्षरात्मनोर्यस्मादुत्तमः स सदानयोः ।पुरुषोत्तमनाम्नातः प्रसिद्धो लोकवेदयोः'' ॥ इति नारायणश्रुतिः ।॥ १३-२० ॥
}}
 
 
[[Category:Bhagavadgitatatparya]]

Latest revision as of 06:48, 13 April 2026