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Bhagavadgitatatparya/C3: Difference between revisions

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== तृतीयोऽध्यायः ==
#REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C03]]
{{Adhyaya
| document_id  = BGT
| chapter_num  = 3
| title        = तृतीयोऽध्यायः
}}
आत्मस्वरूपं ज्ञानसाधनं चोक्तं पूर्वत्र ।
ज्ञानसाधनत्वेनाकर्म विनिन्द्य कर्म विधीयत उत्तराध्याये-
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C03_V01
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = ज्यायसी चेत् कर्मणस्ते मता बुदि्धर्जनार्दन ।
| verse_line2  = तत् किं कर्मणि घोरे मां नियोजयसि केशव॥१ ॥
}}
 
{{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BGT_C03_V02
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = व्यामिश्रेणैव वाक्येन बुदि्धं मोहयसीव मे ।
| verse_line2  = तदेकं वद निश्चित्य येन श्रेयोहमाप्नुयाम्॥२ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V02
| id      = BGT_C03_V02_B01
| text    =
ज्ञानं योगश्चोक्तौ । तत्र कर्मयोगं विशेषतः प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन । 'दूरेण ह्यवरं कर्म'' इति प्रश्नबीजम् ॥ १,२ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C03_V03
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = श्रीभगवानुवाच
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V03
| id      = BGT_C03_V03_B01
| text    =
ज्ञानप्रचुरो योगो ज्ञानयोगः । कर्मप्रचुरोन्यः ।'साङ्ख्या ज्ञानप्रधानत्वाद् देवाश्च यतयस्तथा ।मुख्यसाङ्ख्यास्तत्र देवा ज्ञानमेषां महद् यतः ।बहुकर्मकृतोप्येते ततोपि बहुवेदनात् ।मुख्यसाङ्ख्या इति ज्ञेयास्तदन्ये कर्मयोगिनः ।ज्ञानिनोप्यतिबाहुल्यात् कर्मणः कर्मयोगिनः ।नोभयं तद् विना कश्चित् पुमान् हि पुरुषार्थभाक् ।न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।न च ज्ञानं विना कर्म पुरुषार्थकरं भवेत्'' ॥ इति ब्रह्मवैवर्ते ।निष्ठा पर्यवसितिर्मुक्तिः ।'ज्ञानिनो मोक्षनियमस्तथापि शुभकर्मणा ।आनन्दवृदि्धरन्येन ह्रासो ज्ञानं तु कर्मणा'' ॥ इति परमश्रुतेः ।'न कर्मणा न प्रजया धनेन'' इत्यादिविरोधो न । अन्यथा 'न कर्मणामनारम्भात्'' इत्याद्युभयसमवाक्यशेषविरोधश्च । समत्वं च 'न हि कश्चित्'' इत्यादेः । 'नान्यः पन्थाः'' इत्यपि ज्ञानमृते न मोक्ष इत्येवाह ॥ ३,४ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = न कर्मणामनारम्भान्नैष्कर्म्यं पुरुषोश्नुते ।
| verse_line2  = न च संन्यसनादेव सिदि्धं समधिगच्छति॥४ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = न हि कश्चित् क्षणमपि जातु तिष्ठत्यकर्मकृत् ।
| verse_line2  = कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वः प्रकृतिजैर्गुणैः॥५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V05
| id      = BGT_C03_V05_B01
| text    =
'कर्तृत्वं द्विविधं प्रोक्तं विकारश्च स्वतन्त्रता ।विकारः प्रकृतेरेव विष्णोरेव स्वतन्त्रता'' ॥ इति पैङ्गिश्रुतेः ।
            'कार्यते ह्यवश'' इत्यत्रावशो विष्णुवशः । 'अः इति ब्रह्म'' इत्यादिश्रुतेः ॥५ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = कर्मेंद्रियाणि संयम्य य आस्ते मनसा स्मरन् ।
| verse_line2  = इंद्रियार्थान् विमूढात्मा मिथ्याचारः स उच्यते॥६ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यस्त्विंद्रियाणि मनसा नियम्यारभतेर्जुन ।
| verse_line2  = कर्मेंद्रियैः कर्मयोगमसक्तः स विशिष्यते॥७ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = नियतं कुरु कर्म त्वं कर्म ज्यायो ह्यकर्मणः ।
| verse_line2  = शरीरयात्रापि च ते न प्रसिद्ध्येदकर्मणः॥८ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यज्ञार्थात् कर्मणोन्यत्र लोकोयं कर्मबन्धनः ।
| verse_line2  = तदर्थं कर्म कौन्तेय मुक्तसङ्गः समाचर॥९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V09
| id      = BGT_C03_V09_B01
| text    =
कर्मणा बध्यते जन्तुरित्यादिकमप्यवैष्णवकर्मविषयमित्याह - यज्ञार्थादिति ।'ज्ञो नाम भगवान्विष्णुस्तं यात्युद्देश एष यः ।स यज्ञ इति सम्प्रोक्तो विहिते कर्मणि स्थितः'' ॥ इति बर्कश्रुतिः ॥९ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = सहयज्ञाः प्रजाः सृष्ट्वा पुरोवाच प्रजापतिः ।
| verse_line2  = अनेन प्रसविष्यध्वमेष वोस्त्विष्टकामधुक्॥१० ॥
}}
 
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| verse_line1  = देवान् भावयतानेन ते देवा भावयन्तु वः ।
| verse_line2  = परस्परं भावयन्तः श्रेयः परमावाप्स्यथ॥११ ॥
}}
 
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| verse_line1  = इष्टान् भोगान् हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।
| verse_line2  = तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः॥१२ ॥
}}
 
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| verse_line1  = यज्ञशिष्टाशिनः सन्तो मुच्यन्ते सर्वकिल्बिषैः ।
| verse_line2  = भुञ्जते ते त्वघं पापा ये पचन्त्यात्मकारणात्॥१३ ॥
}}
 
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| verse_line1  = अन्नाद् भवन्ति भूतानि पर्जन्यादन्नसम्भवः ।
| verse_line2  = यज्ञाद् भवति पर्जन्यो यज्ञः कर्मसमुद्भवः॥१४ ॥
}}
 
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| verse_line1  = कर्म ब्रह्मोद्भवं विदि्ध ब्रह्माक्षरसमुद्भवम् ।
| verse_line2  = तस्मात् सर्वगतं ब्रह्म नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितम्॥१५ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।
| verse_line2  = अघायुरिंद्रियारामो मोघं पार्थ स जीवति॥१६ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V16
| id      = BGT_C03_V_B01
| text    =
जननात् परसस्यादेः पर्जन्यो मेघसन्ततिः ।स यज्ञात् कर्मणः सोपि समस्तं कर्म केशवात् ॥ स नित्योप्यक्षरततिरूपाद्वाक्यादि्ध गम्यते ।वाक्यमुच्चार्यते भूतैस्तान्यन्नात्तच्च मेघतः ॥ तस्मात्सर्वगतो विष्णुर्नित्यं यज्ञे प्रतिष्ठितः ।एवं प्रवर्तितं चक्रं नानुवर्तयतीह यः ।स पापो विश्वहन्तृत्वान्नरके मज्जति ध्रुवम् ॥ वाचिको मानसो यज्ञो न्यासिनां तु विशेषतः ।वनस्थस्याक्रतुर्यज्ञः क्रत्वादिर्ग्रहिणोखिलः ॥ शुश्रूषाद्यात्मको यज्ञो विहितो ब्रह्मचारिणः ।विद्याभयादिदानं च सर्वेषामपि सम्मतम् ॥ गृहिणो वित्तदानं तु वनस्थस्यान्नपूर्वकम् ।सर्वैः कार्यं तपो घोरमिति सर्वे त्रिकर्मिणः ॥ इति नारदीये ।ब्रह्माक्षरशब्दार्थयोर्व्यत्यासे तस्मात्सर्वगतं ब्रह्म इति प्रत्यभिज्ञाविरोधश्चक्राप्रवेशश्च ॥ १४-१६ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = यस्त्वात्मरतिरेव स्यादात्मतृप्तश्च मानवः ।
| verse_line2  = आत्मन्येव च सन्तुष्टस्तस्य कार्यं न विद्यते॥१७ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V17
| id      = BGT_C03_V_B01
| text    =
तृप्तिसन्तोषशब्दयोः पर्यायत्वेपि परमात्मना तृप्तः परमात्मनि तृप्त इति विशेषः ।'विष्णुप्रसादाद्रतिमांस्तृप्तो विष्णुप्रसादतः ।विष्णावेवातितृप्तश्च मुक्तोसौ विध्यगोचरः'' ॥ इत्याग्नेये ।
          'रतिरानन्द उद्दिष्टस्तृप्तिस्तु कृतकृत्यता ।प्रीतिस्तु द्विविधः स्नेहः कर्मजो निज एव च'' ॥ इति शब्दनिर्णये ।'सन्तोषस्तृप्तिरापूर्तिः प्रीतिः पर्यायवाचकाः'' । इत्यभिधानम् ॥१७ ॥
}}
 
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| verse_line1  = नैव तस्य कृतेनार्थो नाकृतेनेह कश्चन ।
| verse_line2  = न चास्य सर्वभूतेषु कश्चिदर्थव्यपाश्रयः॥१८ ॥
}}
 
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| verse_line1  = तस्मादसक्तः सततं कार्यं कर्म समाचर ।
| verse_line2  = असक्तो ह्याचरन्कर्म परमाप्नोति पूरुषः॥१९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
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| verse_id = BGT_C03_V19
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| text    =
यस्मादमुक्तस्य कार्यमस्त्येव तस्मादसक्तः । असक्त आचरन्नेव यस्मा-त्परमाप्नोति । मुक्तस्यैव कार्यं नास्तीत्येवकारार्थोपि यस्त्विति तुशब्देनावगतः । 'तस्मात् कर्म समाचर'' इत्युपसंहारविरोधश्चान्यथा ।
'ब्रह्मनिष्ठा ब्रह्मरता ब्रह्मज्ञानसुतर्पिताः ।
पाण्डवानां च मुक्तानामन्तरं किञ्चिदेव हि'' ॥ इति भविष्यत्पर्ववचनाच्च नार्जुनस्यामुख्याधिकारिता । आत्मरतिरेव स्यात् इत्येवशब्देन मुक्तानामेभ्यो विशेषो दर्शितः । एषां कदाचिद् दुःखाभासस्यापि भावात् ॥१९ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = कर्मणैव हि संसिदि्धमास्थिता जनकादयः ।
| verse_line2  = लोकसङ्ग्रहमेवापि सम्पश्यन् कर्तुमर्हसि॥२० ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
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| verse_id = BGT_C03_V20
| id      = BGT_C03_V20_B01
| text    =
'सहैव कर्मणा सिदि्धमास्थिता जनकादयः ।
ज्ञाननिष्ठा अपि ततः कार्यं वर्णाश्रमोचितम्'' ॥ इति च ।
अज्ञानां ज्ञानदं कर्म ज्ञानिनां लोकसङ्ग्रहात् ।
अद्धैव तुष्टिदं मह्यं सा मुक्तानन्दपूर्तिदा ॥२० ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = यद्यदाचरति श्रेष्ठस्तत्तदेवेतरो जनः ।
| verse_line2  = स यत्प्रमाणं कुरुते लोकस्तदनुवर्तते॥२१ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = न मे पार्थास्ति कर्तव्यं त्रिषु लोकेषु किञ्चन ।
| verse_line2  = नानवाप्तमवाप्तव्यं वर्त एव च कर्मणि॥२२ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C03_V22
| id      = BGT_C03_V22_B01
| text    =
'ममैव केवलं नास्ति केनाप्यर्थस्तथाप्यहम् ।कर्मकृल्लोकरक्षायै तस्मात् कुर्वीत मत्परः'' ॥इति कृष्णसंहितायाम् ।'रक्षया वाथ सृष्ट्या वा संहृत्यादेर्न तु क्वचित् ।अर्थो विष्णोस्तथाप्येष स्वभावात्सर्वकर्मकृत् ।मत्तो नृत्तादिकं यद्वत्कुर्यात्सुखविशेषतः ।परमानन्दरूपत्वात् कुर्याद्विष्णुस्तथैव तु'' ॥ इति बर्कश्रुतिः ॥२२ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = यदि ह्यहं न वर्तेयं जातु कर्मण्यतंद्रितः ।
| verse_line2  = मम वर्त्मानुवर्तन्ते मनुष्याः पार्थ सर्वशः॥२३ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = उत्सीदेयुरिमे लोका न कुर्यां कर्म चेदहम् ।
| verse_line2  = सङ्करस्य च कर्ता स्यामुपहन्यामिमाः प्रजाः॥२४ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
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| verse_line1  = सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।
| verse_line2  = कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसङ्ग्रहम्॥२५ ॥
}}
 
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| verse_line1  = न बुदि्धभेदं जनयेदज्ञानां कर्मसङ्गिनाम् ।
| verse_line2  = जोषयेत्सर्वकर्माणि विद्वान् युक्तः समाचरन्॥२६ ॥
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| verse_line1  = प्रकृतेः क्रियमाणानि गुणैः कर्माणि सर्वशः ।
| verse_line2  = अहङ्कारविमूढात्मा कर्ताहमिति मन्यते॥२७ ॥
}}
 
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| verse_line1  = तत्त्ववित्तु महाबाहो गुणकर्मविभागयोः ।
| verse_line2  = गुणा गुणेषु वर्तन्त इति मत्वा न सज्जते॥२८ ॥
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = प्रकृतेर्गुणसम्मूढाः सज्जन्ते गुणकर्मसु ।
| verse_line2  = तानकृस्नविदो मन्दान् कृत्स्नविन्न विचालयेत्॥२९ ॥
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| verse_line1  = मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।
| verse_line2  = निराशीर्निर्ममो भूत्वा युद्ध्यस्व विगतज्वरः॥३० ॥
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| verse_line1  = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।
| verse_line2  = श्रद्धावन्तोनसूयन्तो मुच्यन्ते तेपि कर्मभिः॥३१ ॥
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| verse_line1  = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।
| verse_line2  = सर्वज्ञानविमूढांस्तान् विदि्ध नष्टानचेतसः॥३२ ॥
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = सदृशं चेष्टते स्वस्याः प्रकृतेर्ज्ञानवानपि ।
| verse_line2  = प्रकृतिं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति॥३३ ॥
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| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = इंद्रियस्येंद्रियस्यार्थे रागद्वेषौ व्यवस्थितौ ॥ तयोर्न वशमागच्छेत् तौ ह्यस्य परिपन्थिनौ॥ ३४ ॥
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C03
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| verse_line1  = श्रेयान् स्वधर्मो विगुणः परधर्मात् स्वनुष्ठितात् ।
| verse_line2  = स्वधर्मे निधनं श्रेयः परधर्मो भयावहः॥३५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
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| verse_id = BGT_C03_V35
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| text    =
'नाहं कर्ता हरिः कर्ता तत्पूजा कर्म चाखिलम् ।तथापि मत्कृता पूजा तत्प्रसादेन नान्यथा ।तद्भक्तिस्तत्फलं मह्यं तत्प्रसादः पुनः पुनः ।कर्मन्यासो हरावेवं विष्णोस्तृप्तिकरः सदा ।यस्मात्स्वतन्त्रकर्तृत्वं विष्णोरेव न चान्यगम् ।तदधीनं स्वतन्त्रत्वं स्वावरापेक्षयैव तु ।जीवस्य विकृतिर्नाम कर्तृत्वं जडसंश्रयम् ।पुमान्दोग्धा च गौर्दोग्ध्री स्तनो दोग्धेतिवत्क्रमात्'' ॥ इति ब्रह्मतर्कवचनादीश्वरजीवप्रकृत्यादीनां कर्तृत्वमकर्तृत्वं च विभागेन ज्ञातव्यं सर्वत्र ।'क्वचित् स्वभावः प्रकृतिः क्वचिच्च त्रिगुणात्मिका ।क्वचित् प्रकृष्टकर्तृत्वाद् भगवान्प्रकृतिर्हरिः'' ॥ इति शब्दनिर्णये ।
          'स्वभावतस्त्रिधा जीवा उत्तमाधममध्यमाः ।उत्तमास्तत्र देवाद्या मर्त्यमध्यास्तु मध्यमाः ।अधमा असुराद्याश्च नैषामस्त्यन्यथाभवः ।शरीरमात्रान्यथात्वे स्वजातिं पुनरेष्यति ।उत्तमा मुक्तियोग्यास्तु सृतियोग्यास्तु मध्यमाः ।अपरेन्धतमोयोग्याः प्राप्तिः साधनपूर्तितः ।पूर्त्यभावेन सर्वेषामनादिः संसृतिः स्मृऽता ।नैव पूर्तिश्च सर्वेषां नित्यकालहरीच्छया ।अतोनुवर्तते नित्यं संसारोयमनादिमान् ।अतोधमानां जीवानां मिथ्याज्ञानादयोखिलाः ।स्वाभाविका गुणा ज्ञेया मध्यमर्त्येषु मिश्रिताः ।तत्वज्ञानं विष्णुभक्तिरित्याद्या देवतादिषु ।कार्यते ह्यवशः कर्म सर्वैस्तैः प्राकृतैर्गुणैः ।स्वाभाविकगुणानेतान् हेतुं कृत्वैव विष्णुना ।कर्मसु क्रियमाणेषु कर्ताहमिति मूढधीः ।मन्यते तत्वविद्विष्णोर्गुणा इच्छादयस्तु ये ।स्वाभाविकेषु जीवस्य कामाद्येषु सदैव तु ।प्रेरकत्वेन वर्तन्ते स्वातन्त्र्यं मम न क्वचित् ।इति मत्वा न सक्तः स्यात्प्रीतोस्य भवति प्रभुः ।स्वभावगुणसम्मूढा ज्ञानादिगुणवत्तरम् ।स्वातन्त्र्येणैव कर्तारं चात्मानं प्रतिजानते ।तान्गुणान् कर्म तच्चैव विष्ण्वधीनं न ते विदुः ।तेष्वयोग्येषु तत्वज्ञस्तत्त्वं नातिप्रकाशयेत् ।वदेद्विवादरूपेण नोपदेशात्मना क्वचित् ।सभ्यरूपेण वा ब्रूयात्पृष्टेव्यक्तिकृदेव वा ।बुद्ध्वाप्यसौ यतो नित्यं स्वभावानुगचेष्टितः ।स्वभावं यान्ति भूतानि निग्रहः किं करिष्यति'' ॥ इत्यादि प्रकाशसंहितायाम् ॥ २७-३५ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C03_V36
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| verse_line1  = अथ केन प्रयुक्तोयं पापं चरति पूरुषः ।
| verse_line2  = अनिच्छन्नपि वार्ष्णेय बलादिव नियोजितः॥३६ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Uvacha|अर्जुन उवाच}}
 
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| verse_id = BGT_C03_V36
| id      = BGT_C03_V36_B01
| text    =
परमेश्वराद्देवेभ्यश्चार्वाक्तनप्रेरकं पृच्छति । अथ केनेति ॥ ३६ ॥
}}
 
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| verse_line1  = काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।
| verse_line2  = महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम्॥३७ ॥
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{{Uvacha|श्रीभगवानुवाच}}
 
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| verse_line1  = धूमेनाव्रियते वह्निर्यथादर्शो मलेन च ।
| verse_line2  = यथोल्बेनावृतो गर्भस्तथा तेनेदमावृतम्॥३८ ॥
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| verse_line1  = आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।
| verse_line2  = कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च॥३९ ॥
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| verse_line1  = इंद्रियाणि मनोबुदि्धरस्याधिष्ठानमुच्यते ।
| verse_line2  = एतैर्विमोहयत्येष ज्ञानमावृत्य देहिनम्॥४० ॥
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| verse_line1  = तस्मात्त्वमिंद्रियाण्यादौ नियम्य भरतर्षभ ।
| verse_line2  = पाप्मानं प्रजहि ह्येनं ज्ञानविज्ञाननाशनम्॥४१ ॥
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'अखिलप्रेरको विष्णुर्ब्रह्माद्यास्तदवान्तराः ।असुरा अशुभेष्वेव कामादेरभिमानिनः ।तत्र कामः कालनेमिः सर्वं धूममलोल्बवत् ।शुभमध्याधमजनं क्रमादावृत्य तिष्ठति ।महाशनस्य तस्येदं नालं तेनानलोग्निवत् ।भुञ्जान इंद्रियाविष्टो ज्ञानास्त्रेणैव (दह्यते)हन्यते'' ॥ इति ब्रह्मतर्के ।ज्ञानावरणरूपेणेदमावृणोतीत्यावृतं ज्ञानमिति पुनराह । न केवलं दुष्पूरो नालमिति मन्यते चेत्यनलः । 'अग्नेरप्यनलः कामो यन्नालमिति मन्यत'' इति च ॥ ३७-४१ ॥
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| verse_line1  = इंद्रियाणि पराण्याहुरिंद्रियेभ्यः परं मनः ।
| verse_line2  = मनसस्तु परा बुदि्धर्यो बुद्धेः परतस्तु सः॥४२ ॥
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| verse_line1  = एवं बुद्धेः परं बुद्ध्वा संस्तभ्यात्मानमात्मना ।
| verse_line2  = जहि शत्रुं महाबाहो कामरूपं दुरासदम्॥४३ ॥
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॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे कर्मयोगो नाम तृतीयोध्यायः ॥
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्भगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये तृतीयोध्यायः ॥
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'सर्वेभ्यः प्रवरा देवा इन्द्राद्या इंद्रियात्मकाः ।तेभ्यो मनोभिमानी तु रुद्रस्तस्मात्सरस्वती ।बुध्द्यात्मिका ततो ब्रह्मा महानात्मा परः स्मृऽतः ।अव्यक्तरूपा लक्ष्मीश्च वरातोतो हरिः स्वयम् ।न तत्समोधिको वेति ह्यानुपूर्वी प्रकीर्तिता ।यथाक्रमप्रबोधेन नाश्याः कामादिशत्रवः ।प्राप्यते च परं स्थानं विष्णोरतुलमञ्जसा'' ॥ इति च ।'न चेंद्रियेभ्यः परा ह्यर्था रुद्रोहङ्कृतिरूपकः'' । इत्यादिविरोधः ।'सर्वाभिमानिनो देवाः सर्वेपि ह्युत्तरोत्तरम् ।आधिक्यं वक्तुमेवैषां पृथक्स्थानमुदीर्यते ।आधिक्यक्रम एवात्र शास्त्रतात्पर्यमिष्यते ।स्थानेषु त्ववरेषां च परे सन्ति न चेतरे ।तथापि पितुरर्थो यः पुत्रस्याप्युपचर्यते ।अव्यक्तादिपदार्थानां सर्वे तदभिमानिनः'' ॥ इति च ।'यत्र ह क्व च पुत्रस्य तत्पितुर्यत्र वा पितुस्तद्वा पुत्रस्येत्येतदुक्तं भवति'' । इत्यादिश्रुतेश्च ।'बहुवाचिनां तुशब्दानां लिङ्गप्रकरणादिभिः ।प्रवृत्तिहेतोश्चाधिक्यान्निर्णयोर्थेषु गम्यते'' ॥ इति शब्दनिर्णये ।'लिङ्गादिसाम्यं यत्र स्यात्प्रयोगाधिक्यमेव तु ।निर्णायकं भवेत्तत्र तेन स्यात्सुबहुश्रुतः'' ॥ इति ब्रह्मतर्के ॥४२ ॥
}}
 
 
[[Category:Bhagavadgitatatparya]]

Latest revision as of 06:48, 13 April 2026