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| == तृतीयः परिच्छेदः ==
| | #REDIRECT [[Vishnutattvavinirnaya#VTN_C03]] |
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| | title = तृतीयः परिच्छेदः
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| ‘वर्जितः सर्वदोषैर्यो गुणसर्वस्वमूर्तिमान् । स्वतन्त्रो यद्वशाः सर्वे स विष्णुः परमो मतः ॥’ इति परमोपनिषदि ।
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| ‘नित्यपूर्णाखलिगुणो विदोषः सर्वदैव यः । स्वतन्त्रः स परो (परमो) विष्णुर्जन्ममृत्यादिवर्जितः ॥’
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| नारद उवाच ।
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| ‘निर्दोषश्चेत् कथं विष्णुर्मानुषेषूदपद्यत ।चिन्ताश्रमव्रणाज्ञानदुःखयुग् दृश्यते कथम् ॥
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| एष मे संशयो ब्रह्मन् हृदि शल्य इवार्पितः । अनुद्धार्योऽपरैर्मत्यैः सूक्तिशक्त्या तमुद्धर ॥
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| ब्रह्मोवाच ।
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| स्त्रीपुंमलाभियोगात्मदेहो विष्णोर्न जायते । किन्तु निर्दोषचैतन्यसुखां नित्यां स्वकां तनुम् ॥
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| प्रकाशयति सैवेयं जनिर्विष्णोर्न चापरा । तथाऽप्यसुरमोहाय परेषां च क्वचित् क्वचित् ॥
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| दुःखाज्ञानभ्रमादीन् स दर्शयेच्छुद्धसद्गुणः । क्व व्रणादि क्व चाज्ञानं स्वतन्त्राचिन्त्यसद्गुणे ॥
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| दोर्लभ्यायैव मौक्षस्य दर्शयेत् तान्यजो हरिः । मिथ्यादर्शनदोषेण तेन मुक्तिं न यान्ति च ॥
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| तमो यान्ति च तेनैव तस्माद्दोषविवर्जितम् । प्रादुर्भावगतं चैव जानीयाद्विष्णुमञ्जसा ॥’ इति ब्रह्माण्डे ।
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| गुणक्रियादयो विष्णोः स्वरूपं नान्यदिष्यते । अतो मिथोऽपि भेदो न तेषां क्वचित् कदाचन ॥
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| स्वरूपेऽपि विशेषोऽस्ति स्वरूपत्ववदेव तु । भेदाभावेऽपि तेनैव व्यवहारश्च सर्वतः ॥’ इति महो(परमो)पनिषदि ।
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| अभिन्नत्वमभेदश्च यथा भेदविवर्जितम् । व्यवहार्यं पृथक् च स्यादेवं सर्वे गुणाः हरेः ॥
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| अभेदाभिन्नयोर्भेदा यदि वा भेदभिन्नयोः । अनवस्थितिरेव स्यान्न विशेषणतामतिः ॥
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| मूलसम्बन्धमज्ञात्वा तस्मादेकमनन्तधा । व्यवहार्यं विशेषेण दुस्तर्कबलतो हरेः ॥ विशेषोऽपि स्वरूपं स स्वनिर्वाहकताऽस्य च ॥’ इति ब्रह्मतर्के ॥
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| ‘एकमेवाद्वितीयं तत् ’(छां.उ.६.१), ‘नेह नानास्ति किञ्चन’(कठ.२.१.११)
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| ‘मृत्योः स मृत्युमाप्नोति य इह नानेव पश्यति।’ (कठ.२.१.१०)
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| ‘यथोदकं दुर्गे वृष्टं पर्वतेषु विधावति । एवं धर्मान् पृथक् पश्यन् तानेवानु विधावति ॥(कठ.२.१.१४)’ इत्यादिश्रुतेश्च ॥
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| ‘देशः सर्वत्र पुरुषः स्वतन्त्रः कालनित्यता । इत्यादिषु स्वसम्बन्धो यथैव गुणरूपिणः ॥गुणित्वं गुणभोक्तृत्वं स्याद् विष्णोस्तच्च स स्वयम् ॥’ इति ब्रह्मतर्के ।
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| विष्णुं सर्वगुणैः पूर्णं ज्ञात्वा संसारवर्जितः । निर्दुःखानन्दभुङ् नित्यं तत्समीपे स मोदते ।मुक्तानां चाश्रयो विष्णुरधिकोधिपतिस्तथा ।तद्वशा एव ते सर्वे सर्वेदैव स ईश्वरः ॥’ इति परमश्रुतिः ।
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| ‘अमृतस्यैष सेतुः’(मुण्डक.४.६(२.२.५)) ,‘सोश्नुते सर्वान् कामान् सह ब्रह्मणा विपश्चिता’(ब्रह्मवल्लि.२(तै.उ.२.२)) इत्यादि च ॥
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| ‘नृपाद्या शतधृत्यन्ताः मुक्तिगा उत्तरोत्तरम् । गुणैः सर्वै शतगुणा मोदन्त इति हि श्रुतिः ॥’ इति पाद्मे ।
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| अतो निश्शेषदोषवर्जितः पूर्णानन्तगुणो नारायण इति सिद्धम् ।
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| यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलं बट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।
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| वायो रामवचोनयं प्रथमकं पृक्षो द्वितीयं वपुः मध्वो यत्तु तृतीयमेतदमुना ग्रन्थः कृतः केशवे ॥
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| स्वतन्त्रायाखिलेशाय निर्दोषगुणरूपिणे ।
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| प्रेयसे मे सुपूर्णाय नमो नारायणाय ते ॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचितः श्रीमद्विष्णुतत्त्वविनिर्णयः तृतीयः परिच्छेदः ॥
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| [[Category:Vishnutattvavinirnaya]] | |