Sadacharasmriti: Difference between revisions
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= सदाचारस्मृतिः | <div class="gr-doc-title">सदाचारस्मृतिः</div> | ||
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| verse_line1 = यस्मिन् सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।निराशीर्निर्ममो याति परं जयति सोऽच्युतः॥ १॥ | |||
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| verse_line1 = स्मृत्वा विष्णुं समुत्थाय कृतशौचो यथाविधि ।धौतदन्तः समाचम्य स्नानं कुर्याद् विधानतः॥ २॥ | |||
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| verse_line1 = उद्धृतेति मृदाऽऽलिप्य द्विषडष्टषडक्षरैः ।त्रिर्निमज्याप्यसूक्तेन प्रोक्षयित्वा पुनस्ततः ।मृदाऽऽलिप्य निमज्य त्रिस्त्रिर्जपेदघमर्षणम्॥ ३॥ | |||
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| verse_line1 = स्रष्टारं सर्वलोकानां स्मृत्वा नारायणं परम् ।यतश्वासो निमज्याप्सु प्रणवेनोत्थितस्ततः ।सिञ्चन् पुरुषसूक्तेन स्वदेहस्थं हरिं स्मरन्॥ ४॥ | |||
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| verse_line1 = वसित्वा वास आचभ्य प्रोक्ष्याचम्य च मन्त्रतः ।गायत्र्या चाञ्जलिं दत्वा ध्यात्वा सूर्यगतं हरिम्॥ ५॥ | |||
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| verse_line1 = मन्त्रतः परिवृत्याथ समाचम्य सुरादिकान् ।तर्पयित्वा निपीड्याथ वासो विस्तृत्य चाञ्जसा॥ ६॥ | |||
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| verse_line1 = अर्कमण्डलगं विष्णुं ध्यात्वैव त्रिपदीं जपेत् ।सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्॥ ७॥ | |||
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| verse_line1 = आसूर्यदर्शनात्तिष्ठेत् ततस्तूपविशेत वा ।पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्राम् उत्तरां सदिवाकराम् ।उत्तरामुपविश्यैव वाग्यतः सर्वदा जपेत्॥८॥ | |||
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| verse_line1 = ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥९॥ | |||
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| verse_line1 = गायत्र्यास्त्रिगुणं विष्णुं ध्यायन्नष्टाक्षरं जपेत् ।प्रणम्य देवान् विप्रांश्च गुरूंश्च हरिपार्षदान् ।एवं सर्वोत्तमं विष्णुं ध्यायन्नेवार्चयेद्धरिम्॥ १०॥ | |||
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| verse_line1 = ध्यानप्रवचनाभ्यां च यथायोग्यमुपासनम् ।धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः ।स्नात्वा सम्पूजयेद्विष्णुं वेदतन्त्रोक्तमार्गतः॥ ११॥ | |||
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| verse_line1 = वैश्वदेवं बलिं चैव कुर्यान्नित्यं तदर्पणम् ।इष्टं दत्तं हुतं जप्तं पूर्तं यच्चात्मनः प्रियम् ।दारान् सुतान् प्रियान् प्राणान् परस्मै सन्निवेदयेन्॥ १२॥ | |||
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| verse_line1 = भुक्तशेषं भगवतो भृत्यातिथिपुरस्सरः ।भुञ्जीत हृद्गतं विष्णुं स्मरंस्तद्गतमानसः ।आचम्य मूलमन्त्रेण कोष्ठं स्वमभिमन्त्रयेत्॥ १३॥ | |||
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| verse_line1 = वेदशास्त्रविनोदेन प्रीणयन् पुरुषोत्तमम् ।अहःशेषं नयेत्सन्ध्याम् उपासीताथ पूर्ववत्॥ १४॥ | |||
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| verse_line1 = यामात्परत एवाथ स्वपेद्ध्यायन् जनार्दनम् ।अन्तराले ततो बुद्ध्वा स्मरेत बहुशो हरिम्॥ १५॥ | |||
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| verse_line1 = कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्स्वभावम् ।करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ १६॥ | |||
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| verse_line1 = द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ १७॥ | |||
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| verse_line1 = उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ १८॥ | |||
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| verse_line1 = यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ १९॥ | |||
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| verse_line1 = यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ २०॥ | |||
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| verse_line1 = इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत'''॥ २१॥ | |||
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| verse_line1 = रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः'''॥ २२॥ | |||
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| verse_line1 = ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ २३॥ | |||
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| verse_line1 = ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥ २४॥ | |||
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| verse_line1 = स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः॥२६॥ | |||
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| verse_line1 = विशेषो निष्क्रिययतेरजलाञ्जलिना तथा ।तर्पणं तु हरेरेव यतेरन्यस्य चोदितम्। समिद्धोमो वटोश्चैव स्मृत्वा विष्णुं हुताशने॥३१॥ | |||
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| verse_line1 = धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः ।तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते॥ ३५॥ | |||
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| verse_line1 = आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्यसमुद्धृतिः ।सदाचारस्य विषये कृता सङ्क्षेपतः शुभा॥ ३६॥ | |||
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| verse_line1 = अशेषकल्याणगुणनित्यानुभवसत्तनुः ।अशेषदोषरहितः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥ ३९॥ | |||
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॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिता सदाचारस्मृतिः समाप्ता॥ | |||
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Latest revision as of 13:32, 13 April 2026
सदाचारस्मृतिः
यस्मिन् सर्वाणि कर्माणि संन्यस्याध्यात्मचेतसा ।निराशीर्निर्ममो याति परं जयति सोऽच्युतः॥ १॥
स्मृत्वा विष्णुं समुत्थाय कृतशौचो यथाविधि ।धौतदन्तः समाचम्य स्नानं कुर्याद् विधानतः॥ २॥
उद्धृतेति मृदाऽऽलिप्य द्विषडष्टषडक्षरैः ।त्रिर्निमज्याप्यसूक्तेन प्रोक्षयित्वा पुनस्ततः ।मृदाऽऽलिप्य निमज्य त्रिस्त्रिर्जपेदघमर्षणम्॥ ३॥
स्रष्टारं सर्वलोकानां स्मृत्वा नारायणं परम् ।यतश्वासो निमज्याप्सु प्रणवेनोत्थितस्ततः ।सिञ्चन् पुरुषसूक्तेन स्वदेहस्थं हरिं स्मरन्॥ ४॥
वसित्वा वास आचभ्य प्रोक्ष्याचम्य च मन्त्रतः ।गायत्र्या चाञ्जलिं दत्वा ध्यात्वा सूर्यगतं हरिम्॥ ५॥
मन्त्रतः परिवृत्याथ समाचम्य सुरादिकान् ।तर्पयित्वा निपीड्याथ वासो विस्तृत्य चाञ्जसा॥ ६॥
अर्कमण्डलगं विष्णुं ध्यात्वैव त्रिपदीं जपेत् ।सहस्रपरमां देवीं शतमध्यां दशावराम्॥ ७॥
आसूर्यदर्शनात्तिष्ठेत् ततस्तूपविशेत वा ।पूर्वां सन्ध्यां सनक्षत्राम् उत्तरां सदिवाकराम् ।उत्तरामुपविश्यैव वाग्यतः सर्वदा जपेत्॥८॥
ध्येयः सदा सवितृमण्डलमध्यवर्ती नारायणः सरसिजासनसन्निविष्टः ।केयूरवान् मकरकुण्डलवान् किरीटी हारी हिरण्मयवपुर्धृतशङ्खचक्रः॥९॥
गायत्र्यास्त्रिगुणं विष्णुं ध्यायन्नष्टाक्षरं जपेत् ।प्रणम्य देवान् विप्रांश्च गुरूंश्च हरिपार्षदान् ।एवं सर्वोत्तमं विष्णुं ध्यायन्नेवार्चयेद्धरिम्॥ १०॥
ध्यानप्रवचनाभ्यां च यथायोग्यमुपासनम् ।धर्मेणेज्यासाधनानि साधयित्वा विधानतः ।स्नात्वा सम्पूजयेद्विष्णुं वेदतन्त्रोक्तमार्गतः॥ ११॥
वैश्वदेवं बलिं चैव कुर्यान्नित्यं तदर्पणम् ।इष्टं दत्तं हुतं जप्तं पूर्तं यच्चात्मनः प्रियम् ।दारान् सुतान् प्रियान् प्राणान् परस्मै सन्निवेदयेन्॥ १२॥
भुक्तशेषं भगवतो भृत्यातिथिपुरस्सरः ।भुञ्जीत हृद्गतं विष्णुं स्मरंस्तद्गतमानसः ।आचम्य मूलमन्त्रेण कोष्ठं स्वमभिमन्त्रयेत्॥ १३॥
वेदशास्त्रविनोदेन प्रीणयन् पुरुषोत्तमम् ।अहःशेषं नयेत्सन्ध्याम् उपासीताथ पूर्ववत्॥ १४॥
यामात्परत एवाथ स्वपेद्ध्यायन् जनार्दनम् ।अन्तराले ततो बुद्ध्वा स्मरेत बहुशो हरिम्॥ १५॥
कायेन वाचा मनसेन्द्रियैर्वा बुद्ध्यात्मना वानुसृतस्स्वभावम् ।करोति यद्यत्सकलं परस्मै नारायणायेति समर्पयेत्तत्॥ १६॥
द्वाविमौ पुरुषौ लोके क्षरश्चाक्षर एव च ।क्षरः सर्वाणि भूतानि कूटस्थोऽक्षर उच्यते॥ १७॥
उत्तमः पुरुषस्त्वन्यः परमात्मेत्युदाहृतः ।यो लोकत्रयमाविश्य बिभर्त्यव्यय ईश्वरः॥ १८॥
यस्मात्क्षरमतीतोहमक्षरादपि चोत्तमः ।अतोऽस्मि लोके वेदे च प्रथितः पुरुषोत्तमः॥ १९॥
यो मामेवमसम्मूढो जानाति पुरुषोत्तमम् ।स सर्वविद्भजति मां सर्वभावेन भारत॥ २०॥
इति गुह्यतमं शास्त्रमिदमुक्तं मयानघ ।एतद्बुद्ध्वा बुद्धिमान्स्यात्कृतकृत्यश्च भारत॥ २१॥
रुद्रं समाश्रिता देवा रुद्रो ब्रह्माणमाश्रितः ।ब्रह्मा मामाश्रितो नित्यं नाहं कञ्चिदुपाश्रितः॥ २२॥
ये मे मतमिदं नित्यमनुतिष्ठन्ति मानवाः ।श्रद्धावन्तोऽनसूयन्तो मुच्यन्ते तेऽपि कर्मभिः॥ २३॥
ये त्वेतदभ्यसूयन्तो नानुतिष्ठन्ति मे मतम् ।सर्वज्ञानविमूढांस्तान्विद्धि नष्टानचेतसः॥ २४॥
द्वौ भूतसर्गौ लोकेऽस्मिन्दैव आसुर एव च ।विष्णुभक्तिपरो दैवो विपरीतस्तथासुरः॥२५॥
स्मर्तव्यः सततं विष्णुर्विस्मर्तव्यो न जातुचित् ।सर्वे विधिनिषेधाः स्युरेतयोरेव किङ्कराः॥२६॥
धर्मो भवत्यधर्मोऽपि कृतो भक्तैस्तवाच्युत ।पापं भवति धर्मोऽपि यो न भक्तैः कृतो हरेः॥२७॥
मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।नित्यं भवेच्च मन्निष्ठो बुभूषुः पुरुषस्सदा॥२८॥
एष नित्यः सदाचारो गृहिणो वनिनस्तथा ।वैश्वदेवं बलिं दन्तधावनं चाप्यृते वटोः॥२९॥
एवमेव यतेः स्वीयवित्तेन तु विना सदा ।मूलमन्त्रैः सदा स्नानं विष्णोरेव च तर्पणम्॥३०॥
विशेषो निष्क्रिययतेरजलाञ्जलिना तथा ।तर्पणं तु हरेरेव यतेरन्यस्य चोदितम्। समिद्धोमो वटोश्चैव स्मृत्वा विष्णुं हुताशने॥३१॥
सर्ववर्णाश्रमैर्विष्णुरेक एवेज्यते सदा ।रमाब्रह्मादयस्तस्य परिवारत एव तु॥३२॥
कविं पुराणमनुशासितारम् अणोरणीयांसमनुस्मरेद् यः ।सर्वस्य धातारमचिन्त्यरूपम् आदित्यवर्णं तमसः परस्तात्॥३३॥
वेदाहमेतं पुरुषं महान्तम् आदित्यवर्णं तमसस्तु पारे ।सर्वाणि रूपाणि विचिन्त्य धीरः नामानि कृत्वाभिवदन् यदास्ते॥ ३४॥
धाता पुरस्ताद्यमुदाजहार शक्रः प्रविद्वान्प्रदिशश्चतस्रः ।तमेवं विद्वानमृत इह भवति नान्यः पन्था अयनाय विद्यते॥ ३५॥
आनन्दतीर्थमुनिना व्यासवाक्यसमुद्धृतिः ।सदाचारस्य विषये कृता सङ्क्षेपतः शुभा॥ ३६॥
अशेषकल्याणगुणनित्यानुभवसत्तनुः ।अशेषदोषरहितः प्रीयतां पुरुषोत्तमः॥ ३९॥
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिता सदाचारस्मृतिः समाप्ता॥