|
|
| Line 1: |
Line 1: |
| == द्वितीयः पादः ==
| | #REDIRECT [[Anuvyakyanam#AV_C03_S02]] |
| {{Adhyaya
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_num = 3
| |
| | title = द्वितीयः पादः
| |
| }}पश्चाददृष्ट्यविज्ञानकालदुःखपृथग्भवाः ।स्थानभेदो विरुद्धत्वं न्यायसाम्यं स्वतो भवः ॥1॥
| |
| | |
| गुणसाम्यमयोगश्च तर्कबाधो विलोमता ।नानाभावः प्रलोभश्च युक्तयः पूर्वपक्षगाः ॥2॥
| |
| | |
| अशक्यकर्तृताशक्तिः स्वतोऽबोधस्तदेव च ।अमानक्लृप्तिसन्मानव्यवस्थात्यल्पताभवाः ॥3॥
| |
| | |
| विशेषदृष्टिवाक्ये च पुंशक्तिः सुनिर्दशनम् ।अलौकिकत्वमाधिक्यं स्वातन्त्र्यं निर्णयप्रमाः ॥4॥
| |
| | |
| === सन्ध्याधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V01
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = वासनाः सर्ववस्तूनामनाद्यनुभवागताः ।सन्त्येवाशेषजीवानामनादिमनसि स्थिताः ॥5॥
| |
| }}
| |
| | |
| === देहयोगाधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V03
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = सृष्ट्वैव वासनाभिश्च प्रपञ्चं स्वाप्नमीश्वरः ।वासनामात्रतां तस्य नीत्वाऽन्तर्धापयत्यजः ॥107॥
| |
| }}
| |
| | |
| === सम्पत्त्यधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V07
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = सुषुप्तिबोधमोहांश्च स्ववशस्तद्वशं सदा ।जीवं नयति देवेशः नान्यः कर्ताऽस्य कश्चन ॥108॥
| |
| }}
| |
| | |
| === नस्थानतोऽप्यधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V08
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = न स्थानतोभेदतोऽप्यस्य भेदः कश्चित् परेशितुः ।सर्वत्राशेषदोषोज्झपूर्णकल्याणचिद्गुणः ॥109॥
| |
| }}
| |
| | |
| === उपमाधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V10
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = यत आभासतामेव श्रुतिरस्य वदत्यलम् ।‘‘यथैषा पुरुषे छाया एतस्मिन्नेतदाततम्’’ ॥121॥
| |
| }}
| |
| | |
| === स्थानविशेषाधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V17
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = प्रतिबिम्बवदप्येषामानन्दोऽन्यगुणा यथा ॥163॥
| |
| }}
| |
| | |
| === पालकत्वाधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V17
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = ..... सृष्टिनाशौ तदधीनावितीरिते ।स्वभावत्वात् स्थितेर्नैतदपेक्षेति न युज्यते ॥166॥
| |
| }}
| |
| | |
| === अव्यक्ताधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V17
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = अव्यक्तोऽपि स्वशक्यैव भक्तानां दृश्यते हरिः ॥167॥
| |
| }}
| |
| | |
| === उभयव्यपदेशाधिकरणम् (अहिकुण्डलाधिकरणम्) ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V17
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = तदभिन्ना गुणा नित्यमपि सर्वे विशेषतः ।गुणत्वेन गुणित्वेन भोक्तृभोग्यतया स्थिताः ॥168॥
| |
| }}
| |
| | |
| === परानन्दाधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V17
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = .... ते चाखलिवलिक्षणाः ।सर्वे सर्वगुणात्मानः सर्वकर्तार एव तु ॥209॥
| |
| }}
| |
| | |
| === फलाधिकरणम् ===
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = AV_C03_S02_V20
| |
| | document_id = AV
| |
| | chapter_id = AV_C03
| |
| | verse_type = sutra
| |
| | verse_line1 = स एवाशेषजीवस्थनिःसङ्ख्यानादिकालिकान् ॥213॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Bhashyam
| |
| | verse_id = AV_C03_S02
| |
| | id = AV_C03_S02_author-note
| |
| | text =
| |
| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
| |
| }}
| |
| | |
| | |
| [[Category:Anuvyakyanam]] | |