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| == प्रथमः पादः ==
| | #REDIRECT [[Anuvyakyanam#AV_C01_S01]] |
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| | title = प्रथमः पादः
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| }}नारायणं निखिलपूर्णगुणैकदेहं निर्दोषमाप्यतममप्यखिलैः सुवाक्यैः ।अस्योद्भवादिदमशेषविशेषतोऽपि वन्द्यं सदा प्रियतमं मम सन्नमामि ॥1॥
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| तमेव शास्त्रं प्रभवं प्रणम्य जगद्गुरूणां गुरुमञ्जसैव ।विशेषतो मे परमाख्यविद्याव्याख्यां करोम्यन्वपि चाहमेव ॥2॥
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| प्रादुर्भूतो हरिर्व्यासो विरिञ्चभवपूर्वकैः ।अर्थितः परविद्याख्यं चक्रे शास्त्रमनुत्तमम् ॥3॥
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| गुरुर्गुरूणां प्रभवः शास्त्राणां बादरायणः ।यतस्तदुदितं मानमजादिभ्यस्तदर्थतः ॥4॥
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| वक्तृश्रोतृप्रसक्तीनां यदाप्तिरनुकूलता ।आप्तवाक्यतया तेन श्रुतिमूलतया तथा ॥5॥
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| युक्तिमूलतया चैव प्रामाण्यं त्रिविधं महत् ।दृश्यते ब्रह्मसूत्राणामेकधाऽन्यत्र सर्वशः ॥6॥
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| अतो नैतादृशं किञ्चित् प्रमाणतममिष्यते ।स्वयङ्कृताऽपि तद्य्वाख्या क्रियते स्पष्टतार्थतः ॥7॥
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| तत्र ताराथमूलत्वं सर्वशास्त्रस्य चेष्यते ।सर्वत्रानुगतत्वेन पृथगोङ्क्रियतेऽखिलैः ॥8॥
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| === जिज्ञासाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = ओतत्ववाची ह्योङ्कारो वक्त्यसौ तद्गुणोतताम् ।स एव ब्रह्मशब्दार्थो नारायणपदोदितः ॥9॥
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| === जन्माधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = अन्तस्समुद्रगं विश्वप्रसूतेः कारणं तु यत् ।सूक्तोपनिषदाद्युक्तं ‘जन्माद्यस्य’ इति लक्ष्यते ॥89॥
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| === शास्त्रयोनित्वाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = एवं धर्मानिति श्रुत्या तदभेदोऽप्युदीर्यते ।शैवाद्यागमसम्प्राप्तदृष्टगेन फलेन तु ॥112॥
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| === समन्वयाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = उपक्रमादिलिङ्गेभ्यो नान्या स्यादनुमा ततः ।त एवान्वयनामानः तैः सम्यक् प्रविचारिते ॥120॥
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| === ईक्षत्यधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = ईक्षणीयत्वतो विष्णुर्वाच्य एव न चान्यथा ॥121॥
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| === आनन्दमयाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = एवं शास्त्रवगम्यत्वे विभागेन समन्वयम् ॥154॥
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| === अन्तस्थत्वाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = ............ देवानां तत्र शक्तताम् ।आशङ्क्य तत्र रूढिं च तच्छब्दानामपि स्वयम् ॥242॥
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| === आकाशाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = चेष्टा हि चेतनानां या सा भवेत् तत्प्रसादतः ।अचेतनस्वभावस्तु विवरादिः कथं ततः ॥244॥
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| === प्राणाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = .............अध्यात्ममन्वयव्यतिरेकतः ॥246॥
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| | verse_line1 = नित्यत्वादेव शब्दस्य तत्स्वभावः कथं हरेः ।कथं प्रसिद्धबहुलशब्दानामन्यथार्थता ॥248॥
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| === अन्तिमप्राणाधिकरणम् ===
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| | verse_line1 = .........बाहुल्ये श्रुतिलिङ्गयोः ॥249॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते ब्रह्मसूत्रानुव्याख्याने प्रथमाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥
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| [[Category:Anuvyakyanam]] | |