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| __TOC__
| | #REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C17]] |
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| | title = सप्तदशोऽध्यायः
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| गुणभेदान् प्रपञ्चयत्यनेनाध्यायेन ।सदसत्कर्मविवेकः ।
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| | verse_line1 = ये शास्त्रविधिमुत्सृज्य यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
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| | verse_line2 = तेषां निष्ठा तु का कृष्ण सत्त्वमाहो रजस्तमः॥१ ॥
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| अर्जुन उवाच
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| | verse_line1 = त्रिविधा भवति श्रद्धा देहिनां सा स्वभावजा ।
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| | verse_line2 = सात्त्विकी राजसी चैव तामसी चेति तां शृृणु॥२ ॥
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| श्रीभगवानुवाच
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| | verse_line1 = सत्त्वानुरूपा सर्वस्य श्रद्धा भवति भारत ।
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| | verse_line2 = श्रद्धामयोयं पुरुषो यो यच्छ्रद्धः स एव सः॥३ ॥
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| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| | text =
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| सत्त्वानुरूपा जीवानुरूपा अतो ये सात्त्विकश्रद्धास्ते सात्त्विका इति (ज्ञेयाः) ज्ञायन्तेन्येन्य इति । श्रद्धामयः श्रद्धास्वरूपः ।
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| 'श्रद्धा स्वरूपं जीवस्य तस्माच्छ्रद्धाविभेदतः ।
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| उत्तमाधममध्यास्तु जीवा ज्ञेयाः पृथक् पृथक् ।
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| स्वरूपभूता श्रद्धैव तमोगानां च मोक्षिणाम् ।
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| शिष्यते संसृतिस्थानां श्रद्धारूपं मनोपरम् ।
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| तत्र स्वरूपश्रद्धैव व्यज्यते प्रायशः क्वचित् ।
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| सात्विकस्य तमोरूपा श्रद्धान्तःकरणात्मिका ।
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| सात्त्विकी तामसस्यापि भूयस्त्वात् तद् विविच्यते ।
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| श्रद्धेत्यास्तिक्यनिष्ठोक्ता सा येषां दैवतोत्तमे ।
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| विष्णौ तद्भक्तबुद्ध्यैव रमाब्रह्मादिकेषु तु ।
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| ते सात्त्विका इति ज्ञेयास्तैरिष्टं विष्णुरेव तु ।
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| श्रीश्च साध्यक्षविद्याख्या ब्रह्मेन्द्राद्याश्च देवताः ।
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| विबुधत्वात्तु मन्वाख्या भुञ्जते प्रीतिपूर्वकम् ।
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| व्यामिश्रयाजिनो ये तु विष्ण्वाधिक्ये ससंशयाः ।
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| स्वरूपमात्रे देवानां श्रद्धायुक्ताश्च सर्वदा ।
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| राजसास्ते तु विज्ञेयास्तैरिष्टं यक्षराक्षसाः ।
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| दीनत्वाद् देवनामानो ब्रह्मेन्द्रादिसनामकाः ।
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| गृह्णन्ति ये हरिं त्वन्यदेवादिसममेव वा ।
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| नीचं ब्रह्माद्यनन्यं वा मन्यन्ते नेति चाखिलम् ।
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| तत्तच्छ्रद्धायुतास्ते तु तामसाः परिकीर्तिताः ।
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| भूतप्रेतास्तु तैरिष्टं शिवस्कन्दादिनामकाः ।
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| साक्षाच्छिवपरीवारा भुञ्जते ह्यतितामसाः ।
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| मोक्षः साङ्कल्पिकः स्वर्गो भूतादित्वं फलं क्रमात् ।
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| त्यक्त्वापि शास्त्रविहितं मिथ्याज्ञानविवर्जिताः ।
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| भक्त्या विष्णुं यजन्तो ये निषिद्धाचरणोज्ज्ञिताः ।
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| तेपि यान्ति हरिं शास्त्रविधानस्थाः कुतः पुनः ॥३ ॥
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| | verse_line1 = यजन्ते सात्त्विका देवान्यक्षरक्षांसि राजसाः ।
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| | verse_line2 = प्रेतान्भूतगणांश्चान्ये यजन्ते तामसा जनाः॥४ ॥
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| | verse_line1 = अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपो जनाः ।
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| | verse_line2 = दम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः॥५ ॥
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| | verse_line1 = कर्शयन्तः शरीरस्थं भूतग्राममचेतसः ।
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| | verse_line2 = मां चैवान्तः शरीरस्थं तान्विद्ध्यासुरनिश्चयान्॥६ ॥
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| | verse_line1 = आहारस्त्वपि सर्वस्य त्रिविधो भवति प्रियः ।
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| | verse_line2 = यज्ञस्तपस्तथा दानं तेषां भेदमिमं शृृणु॥७ ॥
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| अशास्त्रविहितं घोरं तप्यन्ते ये तपोधनाः (तपो जनाः) ।डम्भाहङ्कारसंयुक्ताः कामरागबलान्विताः ।अकृशानपि लक्ष्म्यादीन् देवान् विष्णुपरायणान् ।विष्णुं च सर्वदेहस्थान् कृशत्वेन विजानते ।तेषामल्पगुणत्वेन कल्पनात् ते तमो ध्रुवम् ।यान्ति ज्ञेयाश्च ते दैत्याः पिशाचा वाथ राक्षसाः ॥ अन्नैश्चैवाथ यज्ञाद्यैः प्रायो ज्ञेया इमे नराः ।सात्त्विका सात्त्विकान् कुर्युर्यस्मादन्ये तथेतरान् ॥ ओन्तत्सदिति यद् विष्णोर्नामत्रयमुदाहृतम् ।प्रसिद्धं वैदिकं तस्मात् कर्म सद्विषयं हि सत् ।तत्राश्रद्धाकृतं तस्मादसदित्येव कीर्त्यते ।विप्रा वेदाश्च यज्ञाश्च यस्मादोताः परस्परम् ।विहिता विष्णुना तेन विष्णुरोमिति कीर्तितः ।ओतमस्मिन्निदं सर्वमिति चोक्तः स ओमिति ।तस्मादोमिति यज्ञादीन् प्रवर्तन्ते हि वैदिकाः ।अनोङ्कृतं ह्यासुरं स्याद् यत् तस्मादोङ्कृतं त्वपि ।ओङ्कारार्थहरेः सम्यगज्ञानादासुरं भवेत् ।फलं त्वनभिसन्धाय तद् ब्रह्म स्यान्ममास्पदम् ।इति यत् क्रियते कर्म तन्नामातो जनार्दनः ।अभिसन्धितं हि तत् प्रोक्तं ततं वा स्वगुणैः सदा'' ॥ इत्यादि च ।'मयः(मयं) प्रधानमुद्दिष्टं स्वरूपं कार्यमेव च'' इति शब्दनिर्णये ।शास्त्रविहितमपि भगवच्छ्रद्धाहीनमसदेवेति वक्ष्यति'अश्रद्धया हुतम्'' इति । भगवच्छ्रद्धारहितत्वादेव चाशास्त्रविहितं भवति । 'विष्णुभक्तिविधानार्थं सर्वं शास्त्रं प्रवर्तते'' ॥ इति पैङ्गिश्रुतिः ।॥ ४-७ ॥
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| | verse_line1 = आयुःसत्त्वबलारोग्यसुखप्रीतिविवर्धनाः ।
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| | verse_line2 = रस्याः स्निग्धाः स्थिरा हृद्या आहाराः सात्त्विकप्रियाः ॥८ ॥
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| स्थिराः स्थिरगुणाः घृतादयः । कवादीनामप्यारोग्यरसाद्यर्थत्वेन सात्त्विकत्वमेव । रस्यादीनामपि राजसत्वमनारोग्यादिहेतुत्वे ।'दुःखशोकामयप्रदाः'' इत्युक्तेः । सत्त्वं साधुभावः । भवति हि सोपि शुच्यन्नात् ।'हृद्यं पश्चान्मनोहारि प्रियं तत्कालसौख्यदम् ।सुखदं दीर्घसुखदं रस्यमभ्यास सौख्यदम्'' ॥ इति शब्दनिर्णये ॥८ ॥
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| | verse_line1 = कवाम्ललवणात्युष्णतीक्ष्णरूक्षविदाहिनः ।
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| | verse_line2 = आहारा राजसस्येष्टा दुःखशोकामयप्रदाः॥९ ॥
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| रूक्षं नीरसम् । तीक्ष्णं सर्षपादि ॥ ९ ॥
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| | verse_line1 = यातयामं गतरसं पूति पर्युषितं च यत् ।
| |
| | verse_line2 = उच्छिष्टमपि चामेध्यं भोजनं तामसप्रियम्॥१० ॥
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| 'यामान्तरितपाकं तु यातयाममुदीर्यते ।क्वचिच्च गतसारं स्यान्नियम्यं यातमस्य यत्'' ॥ इति च ।पूर्वं स्वादु पश्चादन्यथाजातं गतरसम्'शुद्धभागवतानां तु स्वभावापेक्षयैव तु ।स्वादुत्वादि विजानीयात् पदार्थानां न चान्यथा'' ॥ इति सूदशास्त्रे ।॥१० ॥
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| | verse_line1 = अफलाकाङ्क्षिभिर्यज्ञो विधिदृष्टो य इज्यते ।
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| | verse_line2 = यष्टव्यमेवेति मनः समाधाय स सात्त्विकः॥११ ॥
| |
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| | verse_line1 = अभिसन्धाय तु फलं दम्भार्थमपि चैव यत् ।
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| | verse_line2 = इज्यते भरतश्रेष्ठ तं यज्ञं विदि्ध राजसम्॥१२ ॥
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| | verse_line1 = विधिहीनमसृष्टान्नं मन्त्रहीनमदक्षिणम् ।
| |
| | verse_line2 = श्रद्धाविरहितं यज्ञं तामसं परिचक्षते॥१३ ॥
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| | verse_line1 = देवद्विजगुरुप्राज्ञपूजनं शौचमार्जवम् ।
| |
| | verse_line2 = ब्रह्मचर्यमहिंसा च शारीरं तप उच्यते॥१४ ॥
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| | verse_line1 = अनुद्वेगकरं वाक्यं सत्यं प्रियहितं च यत् ।
| |
| | verse_line2 = स्वाध्यायाभ्यसनं चैव वाङ्मयं तप उच्यते॥१५ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavadgitatatparya
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| }}
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| |
| 'यागात्तु राजसात् स्वर्गः साङ्कल्पिक उदाहृतः ।लोकः स दीनदेवानां सनाम्नां वासवादिभिः ।विष्णावश्रद्धयायोग्यकामाच्चैषां पुनर्भवेत् ।नरकं च विना यज्ञं राजसा नरलोकगाः ।निषिद्धकर्म कुर्युश्चेदीयुस्ते नरकं ध्रुवम् ।'कदाचित् सात्त्विकाः कुर्युः कर्म राजसतामसम् ।अन्येन्यच्च तथाप्येषां स्थितिः स्वाभावि(की)के पुनः ।स्वं स्वं कर्म तु सर्वेषां सदैव स्यान्महत्फलम् । अन्यदल्पफलं चैव बाहुल्यं तेषु लक्षणम्'' ॥ इति पाद्मे ॥ १२-१५ ॥
| |
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| | verse_line1 = मनः प्रसादः सौम्यत्वं मौनमात्मविनिग्रहः ।
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| | verse_line2 = भावसंशुदि्धरित्येतत्तपो मानसमुच्यते॥१६ ॥
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| मौनं मननम् ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = श्रद्धया परया तप्तं तपस्तत्त्रिविधं नरैः ।
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| | verse_line2 = अफलाकाङ्क्षिभिर्युक्तैः सात्त्विकं परिचक्षते॥१७ ॥
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| | verse_line1 = सत्कारमानपूजार्थं तपो दम्भेन चैव यत् ।
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| | verse_line2 = क्रियते तदिह प्रोक्तं राजसं चलमध्रुवम्॥१८ ॥
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| | verse_line1 = मूढग्राहेणात्मनो यत्पीडया क्रियते तपः ।
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| | verse_line2 = परस्योत्सादानर्थं वा तत्तामसमुदाहृतम्॥१९ ॥
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| | verse_line1 = दातव्यमिति यद्दानं दीयतेनुपकारिणे ।
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| | verse_line2 = देशे काले च पात्रे च तद्दानं सात्त्विकं स्मृऽतम्॥२० ॥
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| | verse_line1 = यत्तु प्रत्युपकारार्थं फलमुद्दिश्य वा पुनः ।
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| | verse_line2 = दीयते च परिक्लिष्टं तद्दानं राजसं स्मृऽतम्॥२१ ॥
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| | verse_line1 = ओशकाले यद्दानमपात्रेभ्यश्च दीयते ।
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| | verse_line2 = असत्कृतमवज्ञातं तत्तामसमुदाहृतम्॥२२ ॥
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| युक्तैः भगवदर्पणादियोगयुक्तैः । युक्तैरिति दानादिषु सर्वत्र समम् ॥ १७-२२ ॥
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| | verse_line1 = ॐ तत्सदिति निर्देशो ब्रह्मणस्त्रिविधः स्मृऽतः ।
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| | verse_line2 = ब्राह्मणास्तेन वेदाश्च यज्ञाश्च विहिताः पुरा ॥२३ ॥
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| | verse_line1 = तस्मादोमित्युदाहृत्य यज्ञदानतपःक्रियाः ।
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| | verse_line1 = तदित्यनभिसन्धाय फलं यज्ञतपःक्रियाः ।
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| | verse_line1 = सद्भावे साधुभावे च सदित्येतत्प्रयुज्यते ।
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| | verse_line1 = यज्ञे तपसि दाने च स्थितिः सदिति चोच्यते ।
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| | verse_line1 = अश्रद्धया हुतं दत्तं तपस्तप्तं कृतं च यत् ।
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| ॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे श्रद्धात्रयविभागयोगो नाम सप्तदशोध्यायः ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये सप्तदशोध्यायः ॥
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| तत्सम्बन्धित्वादेव कर्मादि सत् । ओं तत्सदिति नाम्नां विष्णौ प्रसिद्धत्वात् । ''स्रवत्यनोङ्कृतं ब्रह्म परस्ताच्च विशीर्यते । अनोङ्कृतं आसुरं कर्म" इति श्रुतेः अनोङ्कृतस्य आसुरत्वप्रसिद्धेः ।''अनर्थज्ञोदितो मन्त्रो निरर्थस्त्राति मानतः ।यन्मन्त्रस्तेन कथितो मन्त्रार्थो ज्ञेय एव तत्" ॥ इति पैङ्गिश्रुतेश्च ।तदर्थत्वेन फलानभिसन्धिपूर्वककर्मणः एव सात्विकत्वाच्च । तद्भक्त्या तत्स्मरणपूर्वकमेव कर्म सत् अन्यदसदेवेति भावः । राजसस्यापि असदन्तर्भाव एव । विष्णुश्रद्धारहितत्वात् ॥ 'सात्त्विकं मोक्षदं कर्म राजसं सृतिदुःखदम् ।तामसं पातदं ज्ञेयं तत् कुर्यात् कर्म वैष्णवम्'' ॥ इत्याग्नेये॥२३-२८॥
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| [[Category:Bhagavadgitatatparya]]
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