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Bhagavadgitatatparya/C9: Difference between revisions

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__TOC__
#REDIRECT [[Bhagavadgitatatparya#BGT_C09]]
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{{Adhyaya
| document_id  = BGT
| chapter_num  = 9
| title        = नवमोऽध्यायः
}}
सप्तमाध्यायोक्तं स्पष्टयत्यस्मिन्नध्याये-
सप्तमोक्तं प्रपञ्चयति ।
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| verse_id      = BGT_C09_V01
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = इदं तु ते गुह्यतमं प्रवक्ष्याम्यनसूयवे ।
| verse_line2  = ज्ञानं विज्ञानसहितं यज्ज्ञात्वा मोक्ष्यसेशुभात्॥१ ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V01
| id      = BGT_C09_V01_uvaaca
| text    =
श्रीभगवानुवाच
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = राजविद्या राजगुह्यं पवित्रमिदमुत्तमम् ।
| verse_line2  = प्रत्यक्षावगमं धर्म्यं सुसुखं कर्तुमव्ययम्॥२ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।
| verse_line2  = अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि॥३ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
| verse_line2  = मत्स्थानि सर्वभूतानि न चाहं तेष्ववस्थितः॥४ ॥
}}
 
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| verse_line1  = न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।
| verse_line2  = भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः॥५ ॥
}}
 
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| verse_line1  = यथाकाशस्थितो नित्यं वायुः सर्वत्रगो महान् ।
| verse_line2  = तथा सर्वाणि भूतानि मत्स्थानीत्युपधारय॥६ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = सर्वभूतानि कौन्तेय प्रकृतिं यान्ति मामिकाम् ।
| verse_line2  = कल्पक्षये पुनस्तानि कल्पादौ विसृजाम्यहम्॥७ ॥
}}
 
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| verse_line1  = प्रकृतिं स्वामवष्टभ्य विसृजामि पुनः पुनः ।
| verse_line2  = भूतग्राममिमं कृत्स्नमवशं प्रकृतेर्वशात्॥८ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = न च मां तानि कर्माणि निबध्नन्ति धनञ्जय ।
| verse_line2  = उदासीनवदासीनमसक्तं तेषु कर्मसु॥९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V09
| id      = BGT_C09_V09_B01
| text    =
'विष्णुगान्यप्यतत्स्थानि भूतान्येष ह्यसङ्गतः'' इति च । ममात्मा मम देह एव । तदनन्यत्वात् । देहस्याचेतनत्वाशङ्कानिवृत्तये 'ममात्मा'' इत्याह ॥ ४-९ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = मयाध्यक्षेण प्रकृतिः सूयते सचराचरम् ।
| verse_line2  = हेतुनानेन कौन्तेय जगद्विपरिवर्तते॥१० ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V10
| id      = BGT_C09_V10_B01
| text    =
'अध्यक्षोधिपतिः प्रोक्तो यदक्षाण्यस्य चोपरि'' । इति शब्दनिर्णये ।॥१० ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
| verse_line2  = परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्॥११ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
| verse_line2  = राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः॥१२ ॥
}}
 
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| verse_line1  = महात्मानस्तु मां पार्थ दैवीं प्रकृतिमाश्रिताः ।
| verse_line2  = भजन्त्यनन्यमनसो ज्ञात्वा भूतादिमव्ययम्॥१३ ॥
}}
 
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| verse_line1  = सततं कीर्तयन्तो मां यतन्तश्च दृढव्रताः ।
| verse_line2  = नमस्यन्तश्च मां भक्त्या नित्ययुक्ता उपासते॥१४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V14
| id      = BGT_C09_V14_B01
| text    =
मानुषीं मनुष्यसदृशीम् 'तन्वा विष्णुरनन्योपि स्वाधीनत्वात् तदाश्रितः'' । इति च ।'ब्रह्मरुद्ररमादीनां साम्यदृष्टिरनन्यता ।प्रादुर्भावगतस्यापि दोषदृष्टिरपूर्णता ।धर्मदेहावतारादेर्भेददृष्टिश्च सङ्करः ।अवतारेष्विति ज्ञेयमवज्ञानं जनार्दने ।सर्वं मोघं शुभं तस्य योवजानाति केशवम् ।अवरं याति च तमः प्रादुर्भावगतोप्यतः ।ज्ञेयः केवलचिद्देहो विदोषः पूर्णसद्गुणः'' ॥ इति च भविष्यत्पर्वणि ॥ ११-१४ ॥
}}
 
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| verse_line1  = ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।
| verse_line2  = एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम्॥१५ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V15
| id      = BGT_C09_V15_B01
| text    =
'एकमूर्तिश्चतुर्मूर्तिरथवा पञ्चमूर्तिकः ।
द्वादशादिप्रभेदो वा पूज्यते सज्जनैर्हरिः'' ॥ इति च ॥१५ ॥
}}
 
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| verse_line1  = अहं क्रतुरहं यज्ञः स्वधाहमहमौषधम् ।
| verse_line2  = मन्त्रोहमहमेवाज्यमहमग्निरहं हुतम्॥१६ ॥
}}
 
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| verse_line1  = पिताहमस्य जगतो माता धाता पितामहः ।
| verse_line2  = वेद्यं पवित्रमोङ्कार ऋक्साम यजुरेव च॥१७ ॥
}}
 
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| verse_line1  = गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।
| verse_line2  = प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम्॥१८ ॥
}}
 
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| verse_line1  = तपाम्यहमहं वर्षं निगृह्णाम्युत्सृजामि च ।
| verse_line2  = अमृतं चैव मृत्युश्च सदसच्चाहमर्जुन॥१९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V19
| id      = BGT_C09_V19_B01
| text    =
'अर्च्यत्वादृक्समत्वाच्च निजरूपेषु साम सः ।याज्यत्वात् स यजुर्यज्ञः सार्वज्ञ्यात् पुरुषोत्तमः ।'क्रतुः कृतिस्वरूपत्वात् स्वधानन्यधृतो यतः ।मानात् त्रातीति मन्त्रोयमुष्टानां निधिरौषधम् ।आ ज्यायस्त्वादाज्यनामा दर्भोदरधरो यतः ।अहूतत्वाद्धुतं चायमग्निर्नेतागतेर्यतः'' ॥ इत्यादि च ।'तत्तत्पदार्थभिन्नोपि तत्तन्नामैवमच्युतः ।स्वातन्त्र्यात् सर्वकर्तृत्वात् गुणानन्त्याच्च केवलम्'' ॥ इति च ।'ओमित्याक्रियते यस्मादोङ्कारो भगवान् (हरिः) परः'' इति च ।'पातीति पिता मानान्माता यत् स पितुर्महान् ।पितामहो निधातृत्वान्निधानं भीतरक्षणात् ।शरणं व्यञ्जनाच्चैव बीजमित्युच्यते प्रभुः'' ॥ इति च ।प्रलयकाले संहर्तृत्वात् प्रलयः । अन्यदापीति मृत्युः'प्राणगः प्राणधर्ता यदमृतं प्रविलापयन् ।विश्वं प्रलय इत्युक्तो मृत्युरन्यत्र मारणात्'' ॥ इति च ।'सत् साधुगुणपूर्णत्वादस्मान्नान्यो गुणाधिकः ।यतोतोसदिति प्रोक्तं विष्ण्वाख्यं परमं पदम्'' ॥ इति शब्दनिर्णये ।॥ १६-१९ ॥ त्रैविद्या मां सोमपाः पूतपापा यज्ञैरिष्ट्वा स्वर्गतिं प्रार्थयन्ते ।ते पुण्यमासाद्य सुरेन्द्रलोकं अश्नन्ति दिव्यान् दिवि देवभोगान्॥ २० ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = ते तं भुक्त्वा स्वर्गलोकं विशालं
| verse_line2  = क्षीणे पुण्ये मर्त्यलोकं विशन्ति ।
| verse_line3  = एवं त्रयीधर्ममनुप्रपन्ना
| verse_line4  = गतागतं कामकामा लभन्ते॥ २१ ॥
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = अनन्याश्चिन्तयन्तो मां ये जनाः पर्युपासते ।
| verse_line2  = तेषां नित्याभियुक्तानां योगक्षेमं वहाम्यहम्॥२२ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = येप्यन्यदेवता भक्ता यजन्ते श्रद्धयान्विताः ।
| verse_line2  = तेपि मामेव कौन्तेय यजन्त्यविधिपूर्वकम्॥२३ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
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| verse_id = BGT_C09_V22
| id      = BGT_C09_V22_B01
| text    =
'अनन्यदेवतायागाद् भक्त्युद्रेकादकामनात् ।
सदा योगाच्च वैशिष्ट्यं त्रैविद्याद् वैष्णवादपि ।
स्यादि्ध भागवतस्यैव तेन ब्रह्मादयोखिलाः ।
अश्वमेधादिभिर्यज्ञैरपि केशवयाजिनः ।
वैष्णवा इति बुद्ध्यैव मानयन्त्यन्यदेवताः ॥'' इत्याग्नेये ।
'सम्यग्गुणगणज्ञानादुपासा पर्युपासना'' । इति च ॥ २०-२३ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = अहं हि सर्वयज्ञानां भोक्ता च प्रभुरेव च ।
| verse_line2  = न तु मामभिजानन्ति तत्त्वेनातश्च्यवन्ति ते॥२४ ॥
}}
 
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| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = यान्ति देवव्रता देवान् पितॄन् यान्ति पितॄव्रताः ।
| verse_line2  = भूतानि यान्ति भूतेज्या यान्ति मद्याजिनोपि माम् ॥॥ २५ ॥
}}
 
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| verse_line1  = पत्रं पुष्पं फलं तोयं यो मे भक्त्या प्रयच्छति ।
| verse_line2  = तदहं भक्त्युपहृतमश्नामि प्रयतात्मनः॥२६ ॥
}}
 
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| verse_line1  = यत्करोषि यदश्नासि यज्जुहोषि ददासि यत् ।
| verse_line2  = यत्तपस्यसि कौन्तेय तत् कुरुष्व मदर्पणम्॥२७ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C09_V27
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।
| verse_line2  = संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि॥२८ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V27
| id      = BGT_C09_V27_B01
| text    =
मामिष्ट्वा प्रार्थयन्त इत्युक्तत्वाज्जानन्तोपि नाभिजानन्ति तत्त्वेन ।
'सर्वदेववरत्वेन यो न जानाति केशवम् ।
तस्य पुण्यानि मोघानि याति चान्धं तमो ध्रुवम्'' ॥ इति च ।
'मोघाशा मोघकर्माणः'' इत्युक्तत्वाच्च न केवलाज्ञविषयं मिथ्याज्ञानिविषयं वा 'च्यवन्ति ते'' इत्यादि । अतः सर्वाधिक्यं विष्णोर्ज्ञात्वापि ब्रह्मादीनां तत्परिवारत्वादिकमजानतामिदं फलम् ॥ २४-२८ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C09_V28
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = समोहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योस्ति न प्रियः ।
| verse_line2  = ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V28
| id      = BGT_C09_V28_B01
| text    =
'नास्य भक्तोपि यो द्वेष्यो नचाभक्तोपि यः प्रियः ।किन्तु भक्त्यनुसारेण फलदोतः समो हरिः'' इति पाद्मे ।प्रीत्या मयि ते ॥२९ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C09_V29
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
| verse_type    = shloka
| verse_line1  = अपि चेत्सुदुराचारो भजते मामनन्यभाक् ।
| verse_line2  = साधुरेव स मन्तव्यः सम्यग्व्यवसितो हि सः॥३० ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C09_V30
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = क्षिप्रं भवति धर्मात्मा शश्वच्छान्तिं निगच्छति ।
| verse_line2  = कौन्तेय प्रतिजानीहि न मे भक्तः प्रणश्यति॥३१ ॥
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = मां हि पार्थ व्यपाश्रित्य येपि स्युः पापयोनयः ।
| verse_line2  = स्त्रियो वैश्यास्तथा शूद्रास्तेपि यान्ति परां गतिम्॥३२ ॥
}}
 
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| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = किं पुनर्ब्राह्मणाः पुण्या भक्ता राजर्षयस्तथा ।
| verse_line2  = अनित्यमसुखं लोकमिमं प्राप्य भजस्व माम्॥३३ ॥
}}
 
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| verse_id      = BGT_C09_V33
| document_id  = BGT
| chapter_id    = BGT_C09
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| verse_line1  = मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।
| verse_line2  = मामेवैष्यसि युक्त्वैवमात्मानं मत्परायणः॥३४ ॥
| commentary1  = bhagavadgitatatparya
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V33
| id      = BGT_C09_V33_author-note
| text    =
॥ ओं तत्सदिति श्रीमद्भगवद्गीतासु उपनिषत्सु ब्रह्मविद्यायां योगशास्त्रे श्रीकृष्णार्जुनसंवादे राजविद्याराज्यगुह्ययोगो नाम नवमोध्यायः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V33
| id      = BGT_C09_V33_author-note
| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभगवद्गीतातात्पर्यनिर्णये नवमोध्यायः ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BGT_C09_V33
| id      = BGT_C09_V33_B01
| text    =
'पापादिकारिताश्चैव पुंसां स्वाभाविका अपि ।
विप्रत्वाद्यास्तत्र पुण्याः स्वाभाव्या एव मुक्तिगाः ।
यान्ति स्त्रीत्वं पुमांसोपि पापतः कामतोपि वा ।
न स्त्रियो यान्ति पुंस्त्वं तु स्वभावादेव याः स्त्रियः ।
पुंसा सहैव पुन्देहस्थितिः स्याद् वरदानतः ।
तज्जन्मनि वराः पापजाताभ्यो निजसत्स्त्रियः ।
सर्वेषामपि जीवानामन्त्यदेहो यथा निजः। मुक्तौ च निजभावः स्यात् कर्मभोगान्ततोपि वा'' इति भविष्यत्पर्ववचनात् पापयोनयः पुण्या इति विशेषणम् ।
॥ ३२-३४ ॥
}}
 
 
[[Category:Bhagavadgitatatparya]]

Latest revision as of 06:48, 13 April 2026