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| | #REDIRECT [[Nyayavivaranam#BSNV_C03_S02]] |
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| | title = द्वितीयः पादः
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| | text =
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| पश्चाददृष्टेः स्वप्नविषयस्यासत्त्वं न वाच्यम् । अशक्यकरणशक्तिमत्त्वादीश्वरस्य संस्कारेण सृष्ट्वा पुनः संस्कारमात्रतामापाद्य तस्यापि तिरोधानोपपत्तेः। जाग्रत्वमात्रस्य)जाग्रत्वप्रतीतिमात्रस्य भ्रमत्वात्(भ्रान्तित्वात्) ॥1॥
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| === पराभिध्यानादिकरणम् ===
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| | text =
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| न चाविज्ञानमात्रेण स्वप्नप्रतीत्या ज्ञानशक्त्यैव स्वप्नतिरोधानं नेशेनेति वाच्यम् । बोधे जीवस्यास्वातन्त्र्यात् । ज्ञानाज्ञानयोस्तदन्यत्वे जडत्वात् कैमुत्येनास्वातन्त्र्यात् । तत्स्वरूपत्वे तेनैव व्याख्यातत्वात् । उभयात्मकत्वे दोषद्वयापातात् । अनुभयत्वस्य व्याहतेः(अनुभयत्वे स्वव्याहतेः/अनुभयात्मकत्वे व्याहतेः) । तावन्मात्रनिमित्तत्वे मानाभावात् । सर्वस्येशहेतुत्वे मानाच्च ॥2॥
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| === देहयोगाधिकरणम् ===
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| न च कालापेक्षयैव जागरितम् । अचेतनत्वादेव कालस्य । चेतनान्तरस्याप्यस्वातन्त्र्यात् ॥3॥
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| === तदभावाधिकरणम् ===
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| | text =
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| न च परमात्मनोऽन्यत्राभावस्थाने दुःखित्वप्राप्तेर्नाडीषु सुप्तिर्न भवति उभयस्वीकारोपपत्तौ मानस्य क्लृप्त्यकारणम् (इत्यव्यवस्थिति)इत्यनवस्थितिदोषादतिप्रसङ्गात् ॥4॥
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| === प्रबोधाधिकरणम् ===
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| | text =
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| न च प्रबोधस्य पृथगपि कारणदृष्टेः क्वचित् तदेव । ‘न ऋते त्वत्क्रियते’()(न ऋते त्वत्क्रियते किञ्चनारे) इति श्रुतेस्तत्रापि ईशकृतत्वे सम्यङ्मानात् ॥5॥
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| === कर्मानुस्मृत्यधिकरणम् ===
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| न च राजादीनां पृथग्दर्शनादीशान्तरकल्पना ।‘देशकालविशेषेऽपि स्वप्नादीनां स एव हि । तिरस्कर्ता च कर्ता च न खण्डेशः स राजवत् ॥’() इति श्रुतिमानात् ॥ 6॥
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| === सम्पत्यधिकरणम् ===
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| न च मोहे ब्रह्मप्राप्तिरेव पृथगवस्थात्वादिति वाच्यम् । परिशेषमानादर्धप्राप्तित्वावगमात् ॥7॥
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| === स्थानतोप्यधिकरणम् ===
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| न च स्थानभेदाद्विष्णोरपि भेदः । ‘अयमेव सः’() । ‘नेह नानास्ति किञ्चन’() इत्यादि(इति) श्रुतिबलात् स्थानानां भेदस्तस्याभेद इति व्यवस्थोपपत्तेः ॥8॥
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| === अरूपाधिकरणम् ===
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| न च रूपवत्त्वारूपवत्त्ववचनयोः विरोधादप्रामाण्यम् । अप्राकृतरूपवत्त्वमिति व्यवस्थोपपत्तेः ॥9॥
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| === उपमाधिकरणम् ===
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| न च परमात्मना चेतनत्वन्यायसाम्येन जीवस्याप्यभेदः । अल्पगुणत्वादिविरोधात्(अत्यल्पगुणत्वादिविरोधात्) ॥10॥
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| === अम्बुवदधिकरणम् ===
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| न च सादृश्यस्य(नच सादृश्यसत्वात्) सत्त्वात् साधनं विनैव जीवस्य तादृक्त्वव्यक्तिः । अनादितः संसारस्यानिवृत्तत्वेन भावात् ॥11॥
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| === वृद्धिह्रासाधिकरणम् ===
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| न च मुक्तत्वादिगुणसाम्यात् ब्रह्मादीनां भक्त्यादिगुणसाम्यम् । ‘यथा यथाऽधिकारो विशिष्यते एवं ज्ञानं भक्तिर्बलं च विशिष्यते । मुक्तावानन्द एते च गुणा विशिष्यन्ते अत आहुर्ब्रह्मणे मुक्ता बलिं हरन्ति’() इत्यादिविशेषदृष्टेः ॥12॥
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| === प्रकृताधिकरणम् ===
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| न च संहारकर्तुरसंहारादन्यरक्षाया अयोगः । ‘स सृजति स पालयति स विनाशयति’() इत्यादि विशेषवाक्यात् । अन्नदानाद्युपपत्तेश्च ॥13॥
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| === अव्यक्तत्वाधिकरणम् ===
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| न चाव्यक्तस्वभावस्य दर्शने तर्कबाधः । अनन्तशक्तित्वात् विष्णोस्तच्छक्त्या अव्यक्तस्यापि दर्शनोपपत्तेः ॥14॥
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| === अहिकुण्डलाधिकरणम् ===
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| न च गुणानां गुणिस्वरूपत्वं विरुद्धम् । कालादिदृष्टान्तात् ॥15॥
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| === परमताधिकरणम् ===
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| न च ब्रह्मानन्दादीनामन्यथात्वात् अतच्छब्दत्वं तच्छब्दत्वे लोकोपमत्वं चेति(वेति) विलोमता । ‘अलौकिकास्तस्य शब्दास्तथाऽर्था अलौकिको ह्येष विष्णुः परत्वात् । तथापि शब्दा लौकिका अप्यमुष्मिन् प्रवर्तमाना अधिकार्थान् वदन्ति ॥’ इत्यादि श्रुतिभ्योऽलौकिकत्वावगमात् ॥16॥
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| === स्थानविशेषाधिकरणम् ===
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| |
| न च ब्रह्माद्यानन्दवैचित्र्ये(वैचित्र्येऽपि) बिम्बभूतविष्ण्वानन्दवैचित्र्यम् । आदित्यादिवदाधिक्यात् । न हि सूर्यकान्तप्रतिबिम्बस्याग्निजनकत्वशक्तिर्न जलगतस्येत्येतावता सूर्यवैचित्र्यम्(सूर्ये वैचित्र्याम्) । आधिक्यं हि तत्र निमित्तम् । सूर्यचन्द्रादिप्रतिबिम्बं विनाऽन्यत्र तथा विशेषादृष्टेः ॥ 17॥
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| === तथाऽन्यत्वाधिकरणम् ===
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| | text =
| |
| न च नानाभावात् विष्णोश्चित्तप्रतिबिम्बरूपता । आधिक्यादेव । प्रतिबिम्बे हि दोषाश्च प्रतीयन्ते । अतो हि श्रुतिः प्रतिषेधति ‘नेदं यदिदमुपासते’() इति ॥ 18॥
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| === सर्वगत्वाधिकरणम् ===
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| न च नानावतारकौतुकदर्शनात् विष्णोः क्वचिद्देशकालान्तरे कौतुकादेव सृष्ट्यादिकमकुर्वन्(सृप्त्यादि कुर्वन्) अन्यमेव सामस्त्येन नियोजयति । ‘सर्वत्र सर्वमेतस्मात्’() इति क्रीडायामपि स्वातन्त्र्यात् । ‘स्वातन्त्र्यात् क्रीडते विष्णुर्न च स्वातन्त्र्यमन्यगम् । करोति क्वपि नियता क्रीडा सृष्ट्यादिगास्य(सृष्ट्यादिकाऽस्य) च ॥ नियतक्रीडनादेव कर्ता नान्योऽस्ति कस्यचित् । अस्वतन्त्रो हि चलति चलचित्तादशक्तितः ॥ स्वतन्त्रः पूर्णशक्तिः सन् कुतोऽसौ नियतिं त्यजेत् ॥’() इति श्रुतेश्च ॥19॥
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| न च कर्मान्वयव्यतिरेकात् फलस्येश्वरः फलदातेति प्रलोभमात्रम् । तस्यैव स्वातन्त्र्यात् । ‘कर्माण्यनन्तानि यथेष्टमीशः सम्पाद्य तेषां फलमिच्छयैव । क्वचिद्ददाति क्व च नो ददाति न ह्यानन्त्यात् कर्मणां भोगनाशः । स्वातन्त्र्यं चेत् कर्मणां सर्वभोगः स्यान्न ह्येवं क्वापि तत् केनचित् स्यात् । अतोऽपि(अतो हि) स स्वेच्छया किञ्चिदेव फलं कुर्यात् विफलं प्रायशश्च । क्वचिज्ज्ञानं जनयन् भस्म कुर्यात् स्वेच्छावृत्तिस्तस्य विष्णोः सदैव ॥’ इति ब्रह्माण्डे । ‘स्वतन्त्रः ईश एवैकस्तद्वशं कर्म सर्वदा । अत ईशत्वमीशस्य न हीशोऽन्यः कथञ्चन ॥’ इति श्रुतिः(श्रुतेः) ॥ अतो प्रलोभकल्पने(प्रलोभमात्रकल्पने) श्रुतहानिरश्रुतकल्पना चेति हरिरेव फलप्रदः ॥20॥
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| |
| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे तृतीयाध्यायस्य द्वितीयः पादः ॥
| |
| }}
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| [[Category:Nyayavivaranam]]
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