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| | #REDIRECT [[Nyayavivaranam#BSNV_C02_S03]] |
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| | title = तृतीयः पादः
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| न च वियतः उत्पत्तिमत्वे अनुभूतियुक्तिबहुवाग्विरोधोऽस्ति, व्यवस्थायोगात् । अवकाशमात्रस्य अव्याकृतात्मकत्वाद् अनुत्पत्तिवचनानां तद्विषयत्वम्, उत्पत्तिवचनानाम् असितवर्ण-भूताकाश-तदभिमानिशरीरविषयत्वम्, पराधीन(विशेषवत्व)विशेषत्वमात्रविषयत्वं चेति व्यवस्था । ‘आकाशो नीलिमोदेति न प्रदेशः कथञ्चन । अभावो हि प्रदेशस्य न ह्यत्राभाव इत्यपि ॥’ इति पैङ्गिश्रुतिः(पैङ्गिश्रुतेः) ॥1॥
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| === मातरिश्वाधिकरणम् ===
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| ततोऽधिकमेतत्सर्वम् अनुभूत्यादिविरुद्धत्वं वायूत्पत्ताविति न, वायोरेव (मुख्यानुत्पत्त्युपपत्तेः)अनुत्पत्त्यनुपपत्तेः । पराधीनविशेषमात्रं(पराधीनविशेषत्वमात्रं) ह्युत्पत्तिः । तदभाव उभयोः स्वातन्त्र्यं विरुद्धमेव । सर्वोत्तमत्वानुपपत्तेः । उभयोरपि पराधीनत्वप्राप्तेश्च अन्योन्यानुरोधे, अननुरोधे तु न सर्वैश्वर्यम्। ज्ञानाविस्मृत्या वायावपि व्यवस्थेत्यतिदेशः । अनुपपत्तिस्तु तत्प्रापिका । पराधीनविशेषवत्त्वमात्रं तु अव्याकृताकाशस्य तदभिमानिप्रकृतेश्च सममेव ॥2॥
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| === असम्भवाधिकारणम् ===
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| न च सतः पराधीनविशेषवत्वं(पराधीनविषयत्वं) स्वातन्त्र्यात् ॥3॥
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| === तेजोऽधिकारणम् ===
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| न च विष्णोरेव(विष्णोः) तेजस उत्पत्तौ द्वारकारणवैयर्थ्यम्(एव) । द्वारमनुसृत्यैव विष्णोः प्रवृत्तेः ॥4॥
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| === अबधिकरणम् ===
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| न च तेजस एव अपामुत्पत्यङ्गीकारे घर्मात् स्वेदादिदृष्ट्यनुसारित्वमिति(स्वेदादिदृष्टानुसारित्वमिति) गुणाधिक्यम् । मुख्यार्थपरित्यागप्राप्तेः ॥5॥
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| न च ‘अद्भ्यो वाऽन्नमुत्पद्यते’() इत्याद्युक्तप्रसिद्धान्नाख्यान्यार्थाविरोधेन प्रसिद्धान्ननामस्वीकारे बहुवाक्यानुवर्तितेति गुणः । ‘अन्न’शब्दस्य प्रयोगबाहुल्यात् पृथिव्यामपि शक्तिमत्वात् । अधिकारादीनां निरवकाशत्वाच्च । बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैवेति (बहुवाक्यानुरोधोऽप्यत्रैव) ॥6॥
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| === पृथिव्यधिकरणम् ===
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| न च रुद्रादीनां लयकारित्वाङ्गीकारे, पितुरन्यस्य(पितुरन्यस्यैव) मारकत्वदृष्टेः लोकदृष्ट्यनुसारित्वमिति(लोकदृष्टानुसारित्वमिति) गुणः । लोकपितृवैरूप्यात् विष्णोर्यथावाक्यमङ्गीकारोपपत्तेः । अन्यथा ‘न विष्णोरन्यो वलियकृन्न विष्णोरन्यो विमुक्तिदः’() इत्यादि श्रुतिविरोधात् । रुद्रस्य तु क्वचित् संहारद्वारत्वेनैव तद्वाक्यानां सावकाशत्वात् ॥7॥
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| === तदभिध्यानाधिकरणम्/विपर्ययाधिकरणम् ===
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| न च लोकानुसारित्वम् । ‘क्रमादुत्पद्यते, क्रमात् विलीयते, क्रमेणैवोत्पत्तिः वलियश्च(क्रमेणैव ह्यस्योत्पत्तिलयौ), क्रमेणैवास्योत्पत्तिवलियौ’() इत्यादि(इत्यादि बहुश्रुत्यनुरोधश्च) लोकानुसारिबहुश्रुत्यनुरोधश्च यथोत्पत्तलिये।‘द्विविधः क्रम उद्दिष्टो व्युत्क्रमोऽनुक्रमस्तथा । सृष्टावन्यो लये चान्य इति वेदविदो विदुः॥’()इति श्रुतेः क्रमवाक्यस्य सावकाशत्वात् वैरूप्यं बहुप्रकारत्वं क्रमस्य ॥8॥
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| === अन्तराधिकरणम् ===
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| न च ‘केषाञ्चित् क्रमाल्लयः’, ‘केषाञ्चित् व्युत्क्रमाल्लय’ इत्यङ्गीकारे (लोकदृष्टानुसारित्वं)लोकदृष्ट्यनुसारादन्तरा विज्ञानमनसी व्युत्क्रमः । ‘सर्वं वा एतत् क्रमादुत्पद्यते, व्युत्क्रमाल्लीयते(क्रमाद् विलीयते)’() इति श्रुतौ सर्वस्यापि व्युत्क्रमाल्लयसङ्ग्रहात्। तल्लिङ्गस्य तु चराचरव्यपाश्रयविज्ञानादिविषयत्वेवैव सावकाशत्वात् ॥9॥
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| === आत्माधिकरणम् ===
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| न च (चेतनत्वेन)चेतनत्वसाम्यात् विष्णोरपि देहलयः । ‘सर्वे वा एते चिदात्मानो ब्रह्मंल्लयमनुप्राप्य विष्णोरुदरे संविशन्ति’() इति तस्योदरे (सर्वसङ्ग्रहणादि)सर्वसङ्ग्रहादिश्रुतिभ्यो नित्यत्वावगमात् तद्देहस्य। अश्रुतत्वाच्चान्यथा ॥10॥
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| === ज्ञाधिकरणम् ===
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| न चानादित्वात् जीवस्य पराधीनविशेषाप्राप्तिः । ‘इदं सर्वमसृजत’() इति सर्वस्मिन् गृहीतत्वात् । पराधीनविशेषवत्वेऽप्यनादित्वस्य अविरोधात् ॥11॥
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| === उत्क्रान्त्यधिकरणम् ===
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| न च सर्वदेहे(सर्वदेहस्पर्ष..) स्पर्शज्ञानाद्रसादीनां च तत्र तत्र परिज्ञानाज्जीवस्यानणुत्वम् । उत्क्रान्तिगत्यादेः । आदिशब्देन सूक्ष्मतेजोरूपेण व्याप्त्या स्पर्शादिज्ञानोपपत्तिः । अतोऽणुत्वमनणुत्वं चेति भावः ॥12॥
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| === व्यतिरेकाधिकरणम् ===
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| न च जीवस्य बहुरूपत्वशक्तावीशेन गुणसाम्यम् । ईशशक्त्यैव बहुरूपत्वादेः ॥13॥
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| === पृथगधिकरणम् ===
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| न च श्रुत्या जीवेश्वरैक्यम् । सर्वमानविरोधात् । श्रुतेः सादृश्यैक्यादिना सावकाशत्वात् । बहुमानविरोधे एकस्य दौर्बल्याच्च । (धर्मिग्राहि)धर्मिग्राहकविरोधाच्च ॥14॥
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| === यावदधिकरणम् ===
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| न चोत्पत्तिमत्वाद्विनाशित्वं जीवस्य । अनित्यत्वे तदभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः(अभीष्टमोक्षाद्यसिद्धेः) । न हि पराधीनविशेषवत्वमात्रेण विनाशित्वम्, तादृशानामेव नित्यत्वश्रुतिविरोधात् ॥15॥
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| === पुंस्त्वाधिकरणम् ===
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| न च स्वगुणाननुभूतत्यनुपपत्तेः पूर्वं(पूर्वज्ञानादीनां) ज्ञानादीनां सामस्त्येनाभावः । पूर्वमव्यक्तानां पश्चात् सुव्यक्त्युपपत्तेः ॥16॥
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| === कर्तृत्वाधिकरणम् ===
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| |
| न चेश्वरस्यैव कर्तृत्वे कल्पनालाघवम् । जीवस्याकर्तृत्वे शास्त्रवैयर्थ्यात् । तस्यापि कर्तृत्वे शास्त्रार्थसिद्धेश्च ॥17॥
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| === अंशाधिकरणम् ===
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| |
| न च नानाश्रुतेरप्रामाण्यम् । दृष्टभेदानुसारेण तासाम्(तेषाम्) अर्थोपपत्तेः । अप्रामाण्यकल्पनस्य विपरीतज्ञानमूलत्वात् ॥18॥
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| न च वैचित्र्यमनाभासत्वे कारणम् । जीवानां सामान्यतः आभासत्वेऽपि (आभासत्वे) विशेषादृष्टात् वैचित्र्योपपत्तेः ॥19॥
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| इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रनुव्याख्यान्यायविवरणे द्वितीयाध्यायस्य तृतीयः पादः ॥
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| [[Category:Nyayavivaranam]]
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