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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S08]] |
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| | chapter_num = 11
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| | title = अष्टमोऽध्यायः
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| | verse_line1 = दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः ।
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| | verse_line2 = प्रलोभितः पतन्त्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥
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| | verse_line1 = योषित्सु तल्पाभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः ।
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| | verse_line2 = प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥
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| | text =
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| 'महतां वनिताकामः पतत्यन्धे तमस्यलम् ।
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| अन्यत्र निरयं याति दुःखवान्स्याद्विपर्यये''इति धर्मसंहितायाम् ॥
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| 'मोहकारणभूतां तु मायेत्याहुर्मनीषिणः ।
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| अविद्यमानं मेत्युक्तं तज्ज्ञापयति यत्स्वयम् ॥
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| कुत्रचिज्ज्ञानरूपं सल्लाभरूपं च भण्यते ।
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| मयं प्राचुर्यमुद्दिष्टं माया स्यात्प्रचुरेत्यपि''॥ इति तन्त्रनिरुक्ते ॥
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| 'स्वतन्त्रं परमार्थाख्यं स्वतन्त्रैका हरेर्मतिः ।
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| सैव माया समुद्दिष्टा मुख्यतस्तत्स्वरूपिका ॥
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| मतिमन्मतिभेदोऽपि न विष्णोः क्वचिदिष्यते ।
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| पारमार्थ्येन नास्त्येव तदन्यत्तद्वशं यतः ॥
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| अनाद्यनन्तकालेषु विद्यमानमपि ध््राुवम् ।
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| अतो मायामयं प्राहुः सर्वं तद्वशगं यतः''॥ इति मायावैभवे ॥
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| 'स्वाधीनं सदिति प्रोक्तं पराधीनमसत्स्मृतम् ।
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| अविद्यमानमेतस्माज्जगदाहुर्विपश्चितः ॥
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| अनाद्यनन्तकालेषु विद्यमानमपि ध््राुवम् ।
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| अस्वातन्त्र्यात्तु नास्त्येवेत्येवं वाच्यं जगत्सदा ॥
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| सदा वृत्तेर्विद्यमानमिति ब््राूयाद्यदि क्वचित् ।
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| तथापि नाशवद्धीदं प्रवाहाद्ध्यस्य नित्यता ॥
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| अतो निवर्त्यमित्याहुः प्रपञ्चो ह्यस्ति यद्यपि ।
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| विष्णोरिच्छावशत्वाच्च मायामात्रमिति स्फुटम् ॥
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| परमार्थं त्वेकमेव स्वातन्त्र्याद्विष्णुमव्ययम् ।
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| यदि कल्पयतीदं स स एव विनिवर्तयेत् ॥
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| विष्णुस्तस्मात्तद्वशत्वान्नास्तीति द्वैतमुच्यते ।
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| स्वातन्त्र्येण हरौ ज्ञाते पराधीनत्वनिश्चयात् ॥
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| इत्याहुरुपदेष्टार आचार्यास्तत्त्ववेदिनः ।
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| यथैव राजन्विज्ञाते नान्योऽस्तीति स्फुटं वचः ॥
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| स्वातन्त्र्यात्पारतन्त्र्याच्च तद्भृत्यादिषु सत्स्वपि ।
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| यथैकच्छत्रवांश्चैव एकवीर इतीव च ॥
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| तथैव सर्वप्राधान्यादद्वितीयो हरिः स्मृतः ।
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| एवं मुक्ता विजानन्ति सायुज्यं प्रापिता विभोः ॥
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| अनन्तकालं पश्यन्तो जगदेतच्चराचरम् ।
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| तस्यैतस्य ह्यविज्ञानात्केवलभ््र•न्तिरूपकम् ॥
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| जगदुक्त्वा तमो यान्ति ईशितव्येशशापतः''॥ इति च ॥
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| 'पुत्रा मे यदि विद्यन्ते मरिष्यन्त्येव ते ध््राुवम् ।
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| यदि राज्यं करोत्येष नश्यत्येतदसंशयम्''॥ इति धृतराष्ट्रवचनवत् ।
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| 'प्रपञ्चो यदि विद्येत''। इत्यादि ।
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| 'यदिशब्दस्त्ववस्तुत्वे चास्वातन्त्र्ये च संशये ।
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| अवस्तुशब्दश्चाशक्ते ह्यल्पशक्तौ च कीर्त्यते''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ७,८ ॥
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| | verse_line1 = सुहृत् प््रोष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।
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| | verse_line2 = तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३४ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥
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| | text =
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| 'भगवद्भार्यतायोग्याः काश्चिदप्सरसःस्त्रियः ।
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| रमाऽऽवेशात्कदाचित्स्युस्तास्वेका पिङ्गलाऽभवत् ।
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| तदन्यासां महान्दोषो भगवद्भर्तृतास्मृतौ''॥ इति स्वाभाव्ये ॥ ३४ ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |