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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S02]] |
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| | title = द्वितीयोऽध्यायः
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| | verse_line1 = भूतानां देवचरितं दुःखाय च सुखाय च ।
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| | verse_line2 = सुखायैव हि साधूनां त्वादृशामच्युतात्मनाम् ॥ ५ ॥
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| | verse_line1 = वसुदेव उवाच– भजन्ति ये यथा देवान् देवा अपि तथैव तान् । छायेव कर्मसचिवाः साधवो दीनवत्सलाः ॥ ६ ॥
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| | text =
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| 'आत्मनो भजने बुद्धिमुत्पाद्य फलदाः सुराः ।
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| उत्तमानां जनानां तु निकृष्टानां विपर्ययः ॥
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| शुभाशुभफलानां तु कर्मणां विबुधाः सदा ।
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| प्रवर्तका यथायोग्यमृषयः करुणाः सदा ॥
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| सुखमिच्छन्ति भूतानां प्रायो दुःखासहा नृणाम् ।
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| तथापि तेभ्यः प्रवरा देवा एव हरेः प््रिायाः''इत्युद्दामसंहितायाम् ॥ ५-६ ॥
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| | verse_line1 = अविद्यमानोऽप्यवभाति हि द्वयो ध्यातुर्धिया स्वप्नमनोरथो यथा । तत्कर्म सङ्कल्पविकल्पकं मनो बुधो निदध्यादभयं ततः स्यात् ॥ ३८ ॥
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| | text =
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| 'आत्मनो देहगेहादि द्वयशब्देन भण्यते ।
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| अविद्यमानं जीवस्य प्रतिभाति तदीयवत् ॥
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| जाग््राद्वत्तु यथा स्वप्नः प्रतिभाति मनोरथः ।
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| विद्यमानवदेवैतद्देहादीशवशे स्थितम् ॥
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| विभाति स्ववशत्वेन सैषा संसृतिरुच्यते ।
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| तस्मात्तद्विषयं त्यक्तवा मनो विष्णौ निवेशयेत्''॥
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| इति हरिवंशेषु ॥ ३८ ॥
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| | verse_line1 = एवंव््रातश्च प््रिायनामकीर्त्या जातानुरागो द्रुतचित्त उच्चैः । हसत्यथो रोदिति रौति गाय- त्युन्मादवन्नृत्यति लोकबाह्यः ॥ ४० ॥
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| | verse_line1 = खं वायुमग्निं सलिलं महीं च ज्योतींषि सत्वानि दिशो द्रुमादीन् । सरित् समुद्रांश्च हरेः शरीरं यत् किञ्च भूतं प्रणमेदनन्यम् ॥ ४१ ॥
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| | text =
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| 'केचिदुन्मादवद्भक्ता बाह्यलिङ्गप्रदर्शकाः ।
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| केचिदान्तरभक्ताः स्युः केचिच्चैवोभयात्मकाः ॥
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| मुखप्रसादाद्दार्ढ्याच्च भक्तिर्ज्ञेया न चान्यतः''॥ इति वाराहे ॥
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| 'सर्वं हरेर्वशत्वेन शरीरं तस्य भण्यते ।
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| अनन्याधिपतित्वाच्च तदनन्यमुदीर्यते ॥
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| न चाप्यभेदो जगता विष्णोः पूर्णगुणस्य तु''॥ इति हरिवंशेषु ॥ ४०,४१ ॥
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| | verse_line1 = हरिरुवाच– सर्वभूतेषु यः पश्येद् भगवद्भावमात्मनः । भूतानि भगवत्यात्मन्नेष भागवतोत्तमः ॥ ४५ ॥
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| | verse_line1 = ईश्वरे तदधीनेषु बालिशेषु द्विषत्सु च । प््रोममैत्रीकृपोपेक्षा यः करोति स मध्यमः ॥ ४६ ॥
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| | verse_line1 = अर्चायामेव हरये पूजां यः श्रद्धयेहते । न तद्भक्तेषु चान्येषु स भक्तः प्राकृतः स्मृतः ॥ ४७ ॥
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| | text =
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| 'पूर्णत्वादात्मशब्दोक्तः कश्चित्सर्वनरोत्तमः ।
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| स च नारायणो नान्यः स च सर्वेषु संस्थितः ॥
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| तद्वशा इतरे सर्वे श्रीब््राह्मेशपुरःसराः ।
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| स एव तु स्वभक्तेषु स्थित्वाऽनुग््राहकारकः ॥
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| अज्ञेष्वज्ञानयन्ता च द्विषत्सु द्वेषकारकः ।
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| तत्प््रोरितास्तदन्ये तु प््रिायद्वेषादिकारिणः ॥
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| अतस्तत्प््रोरणादेव प््रोमाद्या मम जज्ञिरे ।
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| इति पश्यति यो बुध्द्या स तु भागवतोत्तमः ॥
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| सर्वाधिकं पृथग्विष्णुं क्षीरसागरवासिनम् ।
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| ज्ञात्वा तत्र प््रोमयुक्तस्तद्भक्तेषु च मैत्रयुक् ॥
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| कृपावांश्च तदज्ञेषु तद्द्वेषीणामुपेक्षकः ।
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| तद्वशत्वं न जानाति सर्वस्य जगतोऽपि तु ॥
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| तमाहुर्मध्यमं भक्तमर्चायामेव संस्थितम् ।
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| विष्णुं ज्ञात्वा तदन्यत्र नैव जानाति यः पुमान् ॥
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| तारतम्यं च तद्भक्तेर्न जानाति कथञ्चन ।
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| अवजानंश्च तद्भक्तानात्मनो भक्तिदर्पितः ॥
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| उपेक्षकोऽपि वा तेषु न स्मरेदथवापि तान् ।
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| मानुषेषु यथा कश्चित्किञ्चिदुच्चः प्रदृश्यते ॥
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| एवमेवोच्चतां विष्णोरल्पां पश्यति चान्यतः ।
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| ते तु भक्ताधमाः प्रोक्ताः स्वर्गादिफलभागिनः ॥
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| तैर्विघि्नता अधो यान्ति तद्भक्तानामुपेक्षकाः ।
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| कुर्युर्विष्णावपि द्वेषं देवा देवावमानिनः ॥
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| पूजिता विष्णुभक्तिं च नावज्ञेयास्ततः सुराः ।
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| उपेक्षकेषु देवानां भक्तिनाशं स्वयं हरिः ॥
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| करोति तेन विभ््राष्टाः संसरन्ति पुनःपुनः ।
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| अधो वा यान्ति विद्वेषात्पूज्या देवास्ततः सदा ॥
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| यस्तान्द्वेष्टि स तं द्वेष्टि यस्ताननु स चानु तम् ।
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| ऐकात्म्यमागतं विद्धि देवैस्तद्भक्तिपूरितैः ॥
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| उपेक्षकस्तु देवानां यदैव निरयोपगः ।
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| तदा तु किमु वक्तव्यमुपेक्षायां जनार्दने ॥
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| विष्णोरुपेक्षकं सर्वे विद्विषन्त्यधिकं सुराः ।
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| पतत्यवश्यं तमसि हरिणा तैश्च पातितः ॥
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| भुङ्क्त्े स्वर्गफलं नित्यं निरयं नैव गच्छति ।
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| विष्णोस्तु मध्यमो भक्तो जायते मानुषेषु च ॥
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| अस्मरन्देवता यस्तु भजते पुरुषोत्तमम् ।
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| योग्यः संस्मरते देवानयोग्यो द्वेष्टि केशवम् ॥
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| यस्तूत्तमो भागवतः स मुक्तिं परमां व््राजेत् ।
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| विष्णुना सर्वदेवैश्च मोदते स ह नित्यदा''। इति च ॥ ४५-४७ ॥
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| | verse_line1 = गृहीत्वापीन्द्रियैरर्थान् यो न द्वेष्टि न हृष्यति ।
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| | verse_line2 = विष्णोर्मायामिमां पश्यन् स वै भागवतोत्तमः ॥ ४८ ॥
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| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| | text =
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| विष्णोर्मायां विष्ण्विच्छाधीनाम् ।
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| 'विष्णोरिच्छानुसार्यैतज्ज्ञात्वा योग्यान्न चाधिकम् ।
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| हृष्यति द्वेष्टि वा यस्तु स वै भागवतोत्तमः''॥ इति ॥
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| 'सतां वृद्धिकरो धर्मस्त्वसतां ह्रासकारकः ।
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| अयं तु निश्चितो धर्मो ह्यधर्मोऽन्यो विनिश्चितः ॥
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| हर्षः सत्सु तथाऽसत्सु धर्मो धर्मविपर्ययः ।
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| तेषां वृद्धौ तथा हानौ सर्वं ज्ञेयमशेषतः ॥
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| एतदर्थं च धर्माणां मर्यादा वैदिकादिका ।
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| मूलधर्मविरुद्धा तु सा न ग््र•ह्या कथञ्चन''॥ इति च ॥ ४८ ॥
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| | verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनोधियां यो जन्माप्ययक्षुद्भयतर्षकृच्छ्रैः ।
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| | verse_line2 = संसारधर्मैरविमुह्यमानः स्मृत्या हरेर्भागवतप्रधानः ॥ ४९ ॥
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| | text =
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| 'देहेन्द्रियप्राणधियां त्रिधैव त्वभिमानिनः ।
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| तत्रोत्तमा देवतास्ताः सर्वदोषविवर्जिताः ॥
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| गुणैः सर्वैः सुसम्पन्ना विरिञ्चादोत्तरोत्तरम् ।
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| मध्यमा गुणदोषेता असुरा अवमा मताः ॥
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| ते सर्वे दोषसंयुक्ता आचित्तादुत्तरोत्तरम् ।
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| तेभ्योऽन्यो मानुषो जीवस्ताभ्यां देवासुरावपि ॥
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| जीवाभिमानिनश्चैव त्रिविधाः सम्प्रकीर्तिताः ।
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| जीवमान्युत्तमो ब््राह्मा मध्यमः स्वयमेव तु ॥
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| अधमः कलिरुद्दिष्टस्तत्र मध्यमनीचयोः ।
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| मृतिजन्मक्षुधादुःखप्रभृत्यखिलमेव तु ॥
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| नोत्तमस्य तु जीवस्य देहादेश्च कथञ्चन ।
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| जन्मादिकृतदुःखं तु देहमान्यसुरस्य ह ॥
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| सुप्त्याद्यप्ययजं दुःखमसुरेन्द्रियमानिनः ।
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| क्षुन्निमित्तं तु यद्दुःखं प्राणमान्यसुरस्य तत् ॥
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| भयतर्षादिजं दुःखं मनोमान्यसुरस्य च ।
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| केवलं त्वान्तरं दुःखं बुद्धिमान्यसुरस्य तत् ॥
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| नीचोऽस्मीति तु यद्दुःखमहंमान्यसुरस्य तत् ।
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| अतीतादिस्मृतेर्दुःखं चित्तमान्यसुरस्य च ॥
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| जीवमान्यसुरस्य स्यात्सर्वं तत्समुदायतः ।
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| एवमेव सुखं देवेषूभयं मध्यमेषु च ॥
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| असुराणामधर्मस्य वृध्या सुखमपीष्यते ।
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| देवानां नैव केनापि दुःखं प्रीतिस्तु धर्मतः ॥
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| अधर्मोऽपि प्रीतये स्यादसुराणामधोगतेः ।
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| देवानां पुण्यपापाभ्यां सुखमेवोत्तरोत्तरम् ॥
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| तेषां दुःखादिकं किञ्चिदसुरावेशतो भवेत् ।
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| प्राणस्य नासुरावेश आखणाश्मसमो हि सः ॥
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| सम्पूर्णानुग््राहाद्विष्णोः प्राणः पूर्णगुणो मतः ।
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| असुराणां सुखाद्याश्च देवावेशादुदीरिताः ॥
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| स्वतस्तु निर्गुणाः सर्वे सर्वदोषात्मका मताः ।
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| विविच्यैवं जगत्सर्वं स्वात्मानं च पृथक्स्थितम् ॥
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| सर्वतश्च पृथक्सन्तं विष्णुं सर्वोत्तमोत्तमम् ।
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| जानन्ति ये भागवतास्त उक्ता उत्तमा इति''॥ इति ब््राह्मतर्के ॥
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| देहेन्द्रिययोर्जन्माप्ययौ ॥ ४९ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = न यस्य स्वः पर इति चित्ते स्वात्मनि वाऽभिदा ।
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| | verse_line2 = सर्वभूतसमः शान्तः स वै भागवतोत्तमः ॥ ५२ ॥
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| }}
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| | text =
| |
| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे द्वितीयोऽध्यायः ॥
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| }}
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| | verse_id = BTN_C11_S02_V52
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| | id = BTN_C11_S02_V52_B1
| |
| | text =
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| चित्ते विद्यमाने । स्वात्मनि केवलात्मभावे मोक्षे च । यस्य जीवपरयोर-भेदो नास्ति ।
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| 'न क्वापि जीवं विष्णुत्वे संसृतौ मोक्ष एव च ।
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| यः पश्यति सुरादींश्च यथोत्कर्षं प्रपश्यति ।
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| स सर्वभूतसमदृग्विष्णुं सर्वोत्तमं स्मरन्''॥ इति हरिवंशेषु ॥
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| 'नैवं त्वयाऽनुमन्तव्यं दृष्टो जीवो मयेति ह ।
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| सर्वभूतगुणैर्युक्तं देवं त्वं ज्ञातुमर्हसि''॥ इति च मोक्षधर्मेषु ॥
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| 'नैवं त्वयाऽनुमन्तव्यं जीवात्माहमिति क्वचित् ।
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| सर्वैर्गुणैः सुसम्पन्नं दैवं मां ज्ञातुमर्हसि''॥ इति च वाराहे ॥ ५२ ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |