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Brahmasutra/C3/S1: Difference between revisions

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{{Adhyaya
#REDIRECT [[Brahmasutra#BS_C03_S01]]
| document_id  = BS
| chapter_num  = 3
| title        = प्रथमः पादः
}}साधनविचारोऽयमध्यायः । वैराग्यार्थे गत्यादिनिरूपणा प्रथमपादे।
 
भूतबन्धो हि बन्धः। ‘भूतबन्धस्तु संसारो मुक्तिस्तेभ्यो विमोचनम्’ इति वाराहे ।
तच्च मरणे भवति।
 
भूतानां विनिवृत्तिस्तु मरणं समुदाहृतम् ।
भूतानां सम्प्रयोगश्च जनिरित्येव पण्डितैः’ इति च भारते ॥
 
अतः किं साधनैरित्यत आह-
 
=== तदन्तराधिकरणम् ===
 
{{VerseBlock
| verse_id      = BS_C03_S01_V01
| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ तदन्तरप्रतिपत्तौरंहति सम्परिष्वक्तः प्रश्ननिरूपणाभ्याम् ॐ ॥ 01-295 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V01
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| text    =
इति तदन्तराधिकरणम् ॥ 01 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V01
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| text    =
शरीरान्तरप्रतिपत्तौ भूतसम्परिष्वक्त एव गच्छति ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V01
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| text    =
‘वेत्थ यथा पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’
‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इति प्रश्नपरिहाराभ्याम् ॥ 01 ॥
}}
 
=== त्र्यात्मकत्वाधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ त्र्यात्मकत्वात् तु भूयस्त्वात् ॐ ॥ 02-296 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
॥ इति त्र्यात्मकत्वाधिकरणम् ॥ 02 ॥
}}
 
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| text    =
अप्छब्दस्तुत्र्यात्मकत्वादुज्यते । भूयस्त्वाच्चापाम् ।‘तापापनोदो भूयस्त्वमम्भसो वृत्तयस्त्विमाः’इति च भागवते॥02॥
}}
 
=== प्राणागत्यधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
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| verse_line1  = ॐ प्राणगतेश्च ॐ ॥ 03-297 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
॥ इति प्राणागत्यधिकरणम् ॥ 03 ॥
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘यत्र वाव भूतानि तत्र करणानि नित्यानि ह वा एतानि भूतानि च करणानि च नैतानि कदाचिद्वियुज्यन्ते न च विलीयन्ते’
इति भाल्लवेयश्रुतेः प्राणगतेर्भूतान्यपि सन्ति इति सिद्धम् ॥ 03 ॥
}}
 
=== अग्न्याद्यधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
| chapter_id    = BS_C03
| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ अग्न्यादिगतिश्रुतेरिति चेन्न भाक्तत्वात् ॐ ॥ 04-298 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
॥ इति अग्न्याद्यधिकरणम् ॥ 04 ॥
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘यत्रास्य पुरुषस्य मृतस्याग्निं वागप्येति वातं प्राणः’ इत्यादिश्रुतेर्न प्राणानां जीवेन सह गतिरिति चेन्न भागतोऽग्न्यादिप्राप्तेः ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V04
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| text    =
‘पुरुषस्य मृतौ ब्रह्मन् प्राणा भागत एव तु ।अधिदैवं प्राप्नुवन्ति भागतोऽनुव्रजन्ति तम् ।पुनः शरीरसम्प्राप्तौतमेवानुविशन्ति च’इति ब्राह्मे ।
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
ब्रह्माण्डे च-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V04
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| text    =
‘मृतिकाले जहत्येनं प्राणा भूतानि पञ्च च ।
भागतो भागतस्त्वेनमनुगच्छन्ति सर्वशः’ इति ॥ 04 ॥
}}
 
=== प्रथमश्रवणाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ प्रथमेऽश्रवणादिति चेन्न ता एव ह्युपपत्तेः ॐ ॥ 05-299 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
॥ इति प्रथमश्रवणाधिकरणम् ॥ 05 ॥
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V05
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| text    =
‘तस्मिन्नेतस्मिन्नग्नौ देवाः श्रद्धां जुह्वति’ इति प्रथमाग्नौ श्रूयते न भूतानि जुह्वतीति। अतो नेति चेन्न। ता एव प्रस्तुता आपः श्रद्धारूपेण हूयन्ते ।‘इति तु पञ्चम्यामाहुतावापः पुरुषवचसो भवन्ति’ इत्युपसंहारोपपत्तेः ॥05॥
}}
 
=== अश्रुतत्वाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ अश्रुतत्वादिति चेन्नेष्टादिकारिणं प्रतीतेः ॐ ॥ 06-300 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
॥ इति अश्रुतत्वाधिकरणम् ॥ 06 ॥
}}
 
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| text    =
अग्न्यादिगतिः प्रत्यक्षतः श्रूयते। अतः प्रत्यक्षाश्रवणान्न युक्तमिति चेन्न।
}}
 
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| text    =
‘अथैनं यजमानं किं न जहाति भूतान्येव भूतैरेव गच्छति भूतैर्भुङ्ते भूतैरुत्पद्यते भूतैश्चरति भूतैर्विचरति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतौ प्रतीतेः ॥ 06 ॥
}}
 
=== भाक्ताधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ भाक्तं वाऽनात्मवित्त्वात् तथा हि दर्शयति ॐ॥ 07-301 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
‘अपाम सोमममृता अभूम’ इत्यादिश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति-
}}
 
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॥ इति भाक्ताधिकरणम् ॥ 07 ॥
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
भागतस्तदमृतत्वम् ।’नान्यः पन्था अयनाय विद्यते’ इति श्रुतेरात्मविद एव हि मुख्यम् । वाशब्दात् पारम्पर्येणात्मविदपेक्षया वा । तथा हि श्रुतिः –
}}
 
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| text    =
‘स एनमविदितो न भुनक्ति यथा वेदो वाऽननूक्तोऽन्यद्वाकर्माकृतं यदि ह वा अप्यनेवंविन्महत्पुण्यं कर्म करोति तद्धास्यान्तततः क्षीयत एवात्मानमेव लोकमुपासीत स य आत्मानमेव लोकमुपास्ते न हास्य कर्म क्षीयतेऽस्माद्द्येवात्मनो यद्यत्कामयते तत्तत् सृजते’
}}
 
{{Bhashyam
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‘अमृतो वाव सोमपो भवति यावदिन्द्रो योवन्मनुर्यावदादित्यः’।
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘कर्मणा ज्ञानमातनोति ज्ञानेनामृतीभवति अथामृतानि कर्माणि यत एनममृतत्वं नयन्ति’ इति च ॥ 07 ॥
}}
 
=== कृतात्ययाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ कृतात्ययेऽनुशयवान् दृष्टस्मृतिभ्याम् ॐ ॥ 08-302 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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कृतस्य कर्मणो भोगेन क्षयान्मुक्तिरित्यत आह-
}}
 
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॥ इति कृतात्ययाधिकरणम् ॥ 08 ॥
}}
 
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‘ततः शेषेणेमं लोकमायाति पुनः कर्म कुरुते पुनर्गच्छति पुनरागच्छति’ इति श्रुतेः –
}}
 
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‘भुक्तशेषानुशयवानिमां प्राप्य भुवं पुनः ।
कर्म कृत्वा पुनर्गच्छेत् पुनरायाति नित्यशः ॥
}}
 
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| text    =
आचतुर्दशमाद्वर्षात् कर्माणि नियमेन तु ।
दशावराणां देहानां कारणानि करोत्ययम् ॥
अतः कर्मक्षयान्मुक्तिः कुत एव भविष्यति’॥
इत्यादिस्मृतेश्च शेषवानेवायाति ॥ 08 ॥
}}
 
=== यथेताधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
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| verse_line1  = ॐ यथेतमनेवं च ॐ ॥ 09-303 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V09
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| text    =
‘यथेतमेव गच्छति यथेतमागच्छति स भुङ्क्ते स कर्म कुरुते स परिवर्तते’ इति गतिप्रकारेणागतिः प्रतीयते । अतो ब्रूते-
}}
 
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| text    =
॥इति यथेताधिकरणम् ॥ 09 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V09
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| text    =
‘धूमादभ्रमभ्रादाकाशमाकाशाच्चन्द्रलोकं यथेतमाकाशमाकाशाद्वायुं वायुर्भूत्वा धूमो भवति धोमो भूत्वाऽभ्रं भवत्यभ्रं भूत्वा मेघो भवति मेघो भूत्वा प्रवर्षति’ इति काषायणश्रुतेर्यथागतमन्यथा च॥09॥
}}
 
=== चरणाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ चरणादिति चेन्न तदुपलक्षणार्थेति कार्ष्णाजिनिः ॐ॥ 10-304 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
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| text    =
‘तद्य इह रमणीयचरणा रमणीयां योनिमापद्यन्ते कपूयचरणाः कपूयाम्’ इति श्रुतेश्चरणफलमेव गमनागमनं न यज्ञादिकृतः ।
}}
 
{{Bhashyam
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‘आचार इति सम्प्रोक्तः कर्माङ्गत्वेन शुद्धिदः ।
अशुद्धिदस्त्वानाचारश्चरणं तूभयं मतम्’ ॥
}}
 
{{Bhashyam
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इति स्मृतेरिति चेन्न, यज्ञाद्युपलक्षणार्था चरणादिश्रुतिरिति कार्ष्णाजिनिर्मन्यते ॥ 10 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ आनर्थक्यमिति चेन्न तदपेक्षत्वात् ॐ ॥ 11-305 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V11
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| text    =
तर्हि रमणीयाः कपूया इत्येव स्यात् । चरणशब्दस्यानर्थक्यमिति चेन्न। चरणापेक्षत्वाद्रमणीयत्वादेस्तज्ज्ञापनार्थत्वेनोपपत्तेः ॥ 11 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ सुकृतदुष्कृते एवेति तु बादरिः ॐ ॥ 12-306 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V12
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| text    =
॥ इति चरणाधिकरणम् ॥ 10 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V12
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| text    =
‘धर्मं चरत माऽधर्मम्’ इत्यादिप्रयोगात् सुकृतदुश्कृते एव चरणशब्दोक्ते इति बादरिर्मन्यते । तुशब्दात् स्वसिद्धान्तोऽपि स एवेति सूचयति।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V12
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| text    =
‘तुशब्दस्तुविशेषे स्यात् स्वसिद्धान्तेऽवधारणे’ इति च नाममहोदधौ ॥ 12 ॥
}}
 
=== अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ अनिष्टादिकारिणामपि च श्रुतम् ॐ ॥ 13-307 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V13
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| text    =
पुण्याकृतामेव गमनागमने नेतरेषामित्यत आह-
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V13
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| text    =
‘‘तद्यइह शुभाकृतो ये वाऽशुभकृतस्तेऽशुभमनुभूयावर्तन्ते पुनः कर्म कुर्वन्ति पुनर्गच्छन्ति पुनरागच्छन्ति’ इति भाल्लवेयश्रुतौ ॥ 13 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ संयमने त्वनुभूयेतरेषामारोहावरोहौ तद्गतिदर्शनात् ॐ ॥ 14-308 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V14
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| text    =
‘संयमनमनुभूय केषाञ्चिदारोहः केषाञ्चिदवरोहः । तुशब्दोऽवधारणे ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V14
| id      = BS_C03_S01_V14_B2
| text    =
‘‘सर्वे वा एतेऽशुभकृतः संयमने प्रपतन्ति तत्र ह ये परद्विषो गुरुद्विषः श्रुतिद्विषस्तदवमन्तारः शठा मूर्खा इति ते वै ततोऽवरुह्यतमसि प्रपतन्ति नैवैत उत्तिष्ठन्तेऽपि कर्हिचिद्वव्रं वा एतदित्याहुरथ येऽन्ये ब्रह्मद्विषः स्तेनाः सुरापा इति ते वै तदनुभूयेमं लोकमनुप्रजन्ति’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः ॥ 04 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ स्मरन्ति च ॐ ॥ 15-309 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V15
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| text    =
॥ इति अनिष्टादिकार्यधिकरणम् ॥ 11 ॥
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V15
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| text    =
‘‘गच्छन्ति पापिनः सर्वे नरकं नात्र संशयः ।
‘तत्र भुक्त्वा पतन्त्येव ये द्विषन्ति जनार्दनम् ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V15
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| text    =
‘महातमसि मग्नानां न तेषामुत्थितिः क्वचित् ।
‘इतरेषां तु पापानां व्युत्थानं विद्यतेऽपि च ।
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V15
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| text    =
‘सुखस्यानन्तरं दुःखं दुःखस्यानन्तरं सुखम् ।
‘इति सर्वत्र नियमः पञ्चकष्टे तु तत् सदा’ इत्यादि ॥ 15 ॥
}}
 
=== सप्ताधिकरणम् ===
 
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| document_id  = BS
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| verse_type    = sutra
| verse_line1  = ॐ अपि सप्त ॐ ॥ 16-310 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V16
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| text    =
॥ इति सप्ताधिकरणम् ॥ 12 ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V16
| id      = BS_C03_S01_V16_B1
| text    =
‘रौरवोऽथ महांश्चैव वह्निर्वैतरणी तथा ।
कुम्भीपाक इति प्रोक्तान्यनित्यनरकाणि तु ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V16
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| text    =
तामिस्रश्चान्धतामिस्रो द्वौ नित्यौ सम्प्रकीर्तितौ ।इति सप्तप्रधानानि बलीयस्तूत्तरोत्तरम् ।एतानि क्रमशो गत्वैवारोहोऽथावरोहणम्’ इति च भारते ॥ 16 ॥
}}
 
=== तद्व्यापाराधिकरणम् ===
 
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| verse_id      = BS_C03_S01_V17
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| verse_line1  = ॐ तत्रापि च तद्व्यापारादविरोधः ॐ ॥ 17-311 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V17
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| text    =
ईश्वरस्य नरकायुक्तेः ‘सर्वं विसृजति सर्वं विलापयति सर्वं रमयति सर्वं न रमयति सर्वं प्रवर्तयत्यन्तरस्मिन् निविष्टः’ इति कौषारवश्रुतिविरोध इत्यतो वक्ति –
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V17
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| text    =
॥ इति तद्व्यापाराधिकरणम् ॥ 13 ॥
}}
 
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| text    =
चशब्दाददुःखानुभवेन ।
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| text    =
‘स स्वर्गे स भूमौ स नरके सोऽन्धे तमसि प्रवृत्तिकृदेक एवानुविष्टो नासौ दुःखभुगीश्वरः प्रभुत्वात् सर्वं पश्यति सर्वं कारयति नासौ दुःखभुग्य एवं वेद’ इति पौत्रायणश्रुतेरविरोधः ।
}}
 
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‘नरकेऽपि वसन्नीशो नासौ दुःखभुगुच्यते ।नीचोच्चतैव दुःखादेर्भोग इत्यभिधीयते ॥नासौ नीचोच्चतां याति पश्यत्येव प्रभुत्वतः’ इति भागवततन्त्रे ॥ 17 ॥
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=== विद्याकर्माधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ विद्याकर्मणोरिति तु प्रकृतत्वात् ॐ ॥ 18-312 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
‘अथैतयोः पथोर्न कतरेण च तानीमानि क्षुद्रमिश्राण्यसकृदावर्तीनि भूतानि भवन्ति जायस्व म्रियस्वेत्येतत्तृतीयं स्थानम्’ इति गतिस्वातन्त्र्यं भूतानां प्रतीयत इत्यत आह-
}}
 
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| text    =
इति विद्याकर्माधिकरणम् ॥ 14 ॥
}}
 
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| text    =
विद्याकर्मापेक्षयैतद्वचनम् । तयोरपि प्रकृतत्वात् ।
}}
 
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| text    =
‘विद्यापथः कर्मपथो द्वौ पन्थानौ प्रकीर्तितौ ।तद्वर्जितस्त्रिधा याति तिर्यग्वा नरकं तमः’इति च भारते॥ 18 ॥
}}
 
=== महातमोऽधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ न तृतीये तथोपलब्धेः ॐ ॥ 19-313 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
‘यत्र दुःखं सुखं तत्र सर्वत्रापि प्रतीयते ।अपि नीचगतौ किञ्चित् किमु मानुषदेहिनः’ इति वचनान्महातमस्यपि सुखप्राप्तिरित्यत आह-
}}
 
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| text    =
‘अथाविद्वानकर्माऽवाग्गच्छति त्रिधा ह वाऽवाग्गतिस्तिर्यग्यातना तम इति । द्वेवाव सुखानुवृत्ते, न तमः सुखानुवृत्तं केवलं ह्येवात्र दुःखं भवति’ इति श्रुतेर्न तृतीयावाग्गतौ सुखम् ॥ 19 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ स्मर्यतेऽपि च लोके ॐ ॥ 20-314 ॥
| commentary1  = brahmasutra
}}
 
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| text    =
‘तिर्यक्षु नरके चैव सुखलेशो विधीयते ।नान्धे तमसि मग्नानां सुखलेशोऽपि कश्चन’ इति भविष्यत्पर्वणि ।
}}
 
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| text    =
लोकसिद्धं चैतत्। चशब्दाल्लोकसिद्धिरपि स्मार्तेत्याह ।
}}
 
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| text    =
‘अतिप्रिये यथा राजा न दुःखं सहते क्वचित् ।अत्यप्रिये सुखमपि तथैव परमेश्वरः’इति हि ब्राह्मे ॥ 20 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ दर्शनाच्च ॐ ॥ 21-315 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
‘नारायणप्रसादेन समिद्धज्ञानचक्षुषा । अत्यन्तदुःखसल्लीनान् निश्येषसुखवर्जितान् ॥
}}
 
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नित्यमेव तथाभूतान् विमिश्रांश्च गणान् बहून् ।
निरस्ताशेषदुःखांश्च नित्यानन्दैकभागिनः ॥
}}
 
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| text    =
अपश्यत् त्रिविधान् ब्रह्मा साक्षादेव चतुर्मुखः’
इति दर्शनवचनाच्च पाद्मे॥ 21 ॥
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| verse_line1  = ॐ तृतीये शब्दावरोधः संशोकजस्य ॐ ॥ 22-316 ॥
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तृतीये तृतीयतमस श्रवणादेव शब्दानुसारेण संशोकजमोहप्राप्तिः ॥ 22 ॥
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| verse_line1  = ॐ स्मरणाच्च ॐ ॥ 23-317 ॥
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॥ इति महातमोऽधिकरणम् (नतृतीयाधिकरणम्) ॥ 15 ॥
}}
 
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| text    =
‘महातमस्त्रिधा प्रोक्तमूर्ध्वं मध्यं तथाऽधरम् ।श्रवणादेव मूर्च्छादिरधरस्य यतो भवेत् ॥तस्मान्न विस्तरेण्यैतत् कथ्यते राजसत्तम’ इति कौर्मे ॥ 23 ॥
}}
 
=== तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ तत्स्वाभाव्यापत्तिरुपपत्तेः ॐ ॥ 24-318 ॥
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‘धूमो भूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्याद्यन्यभावः श्रूयते । स कथमित्यतो ब्रवीति-
}}
 
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॥ इति तत्स्वाभाव्याधिकरणम् ॥ 16 ॥
}}
 
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| text    =
धूमादिषु प्रविश्य तद्गतौ गतिः स्थितौ स्थितिरित्यादिरेव तद्भावापत्तिः । न ह्यन्यस्यान्यभावो युज्यते । न च तत्पदप्राप्तिः । गारुडे च-
}}
 
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धूमादिभावप्राप्तिश्च तद्गतौ गतिरेव तु ।
स्थितौ स्थितिः प्रवशश्च लघुत्वादिस्तथैव च ॥
}}
 
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न ह्यन्यस्यान्यथाभावो न च तत्पदमिष्यते ।
विद्यागम्यं पदं यस्मात् न तत्प्राप्यं हि कर्मणा॥
}}
 
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एकदेशस्वभावेन वागभेदाऽपि युज्यते ।
यथा जीवः परं ब्रह्म ब्रह्मेदं जगदित्यपि’ इति ॥ 24 ॥
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=== नातिचिरेणाधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ नातिचिरेण विशेषात् ॐ ॥ 25-319 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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बहुस्थानगमनात् कल्पान्तमप्येवं स्यादित्यत आह-
}}
 
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॥ इति नातिचिरेणाधिकरणम् (अचिरप्राप्त्यधिकरणम्) ॥ 17 ॥
}}
 
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| text    =
‘तद्य इह रमणीयचरणा अभ्याशो ह यत् ते रमणीयां योनिमापद्यन्ते’ इति विशेषान्नातिचिरेण ॥स्वर्गाल्लोकादवाक् प्राप्तो वत्सरात्पूर्वमेव तु ।मातुः शरीरमाप्नोति पर्यटन् यत्र तत्र च’ इति च नारदीये ॥ 25 ॥
}}
 
=== अन्या(धिष्ठिता)धिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ अन्याधिष्ठिते पूर्ववदभिलापात् ॐ ॥ 26-320 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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| text    =
‘त इह व्रीहियवा ओषधिवनस्पतयस्तिलमाषा इति जायन्ते’ इति श्रवणादनर्थफलत्वं यज्ञादेरित्यतो वक्ति-
}}
 
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अन्याधिष्ठिते व्रीह्यादिशरीरे प्रवेशः । न तु भोगोऽस्य । ‘धूमोभूत्वाऽभ्रं भवति’ इत्यादिपूर्वोक्तिवत् ॥
}}
 
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| text    =
‘सोऽवाग्गतः स्थावरान् प्रविश्याभोगेनैव व्रजन् स्थूलं शरीरमेति स्थूलाच्छरीराद्भोगाननुभुङ्क्ते’ इत्यभिलापात् कौषारवश्रुतौ ।
}}
 
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| verse_id = BS_C03_S01_V26
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| text    =
‘स्वर्गादवाग्गतो देही व्रीह्यादीतरदेहगः ।अभुञ्जंस्तु क्रमेणैव देहमाप्नोति कालतः’इति वाराहे ॥ 26 ॥
}}
 
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| verse_line1  = ॐ अशुद्धमिति चेन्न शब्दात् ॐ ॥ 27-321 ॥
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| text    =
॥ इति अन्या(धिष्ठिता)धिकरणम् ॥ 18 ॥
}}
 
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हिंसारूपत्वात् पापस्यापि सम्भवाद्धुःखं च भवत्विति चेन्न। शब्दविहितत्वात्॥
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‘हिंसा त्ववैदिका या तु तयाऽनर्थो ध्रुवं भवेत्।वेदोक्तया हिंसया तु नैवानर्थः कथञ्चन’ इति वाराहे॥ 27 ॥
}}
 
=== रेतोऽधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ रेतःसिग्योगोऽथ ॐ ॥ 28-322 ॥
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‘स्वर्गादवाग्गतश्चापि मातुरेवोदरं व्रजेत्’ इति वचनात्  ‘य एव गृही भवति यो वा रेतः सिञ्चति तमेवानुविशति’इति श्रुतिः कथमित्यत आह-
}}
 
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॥ इति रेतोऽधिकरणम् ॥ 19 ॥
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| text    =
‘ततो रेतस्सिचमेवानुप्रविशत्यथ मातरमथ प्रसूयते स कर्म कुरुते’ इति कौण्ठरव्यश्रुतेः पितरमेव प्रथमतो विशति। मातृप्राप्तेः पश्चादपि भाव्यत्वात् ॥ 28 ॥
}}
 
=== योन्यधिकरणम् ===
 
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| verse_line1  = ॐ योनेः शरीरम् ॐ ॥ 29-323 ॥
| commentary1  = brahmasutra
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‘देहं गर्भस्थितं क्वापि प्रविशेत् स्वर्गतो गतः’ इति वचनात् पश्चादेव प्रविशतीत्यत आह-
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| text    =
॥ इति योन्यधिकरणम् ॥ 20 ॥
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| text    =
॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमद्ब्रह्मसूत्रभाष्ये तृतीयाध्यायस्य प्रथमः पादः ॥ 03-01 ॥
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पितृशरीरान्मातृयोनिमनुप्रविश्य तत एव शरीरमाप्नोति ।
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| verse_id = BS_C03_S01_V29
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| text    =
‘दिवः स्थास्नून् गच्छति स्थास्नुभ्यः पितरं पितुर्मातरं मातुः शरीरं शरीरेण जायत इति सम्मितम् ।अथासम्मितं स्थास्नुभ्यो जायते पितुर्मातुरन्तरे वा गर्भे वा बहिर्वा’ इति पौष्यायणश्रुतेः ॥
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| text    =
‘स्थावराणि दिवः प्राप्तः स्थावरेभ्यश्च पूरुषम् ।
पुरुषात् स्त्रियमापन्नस्ततो देहं यथाक्रमम् ॥
}}
 
{{Bhashyam
| verse_id = BS_C03_S01_V29
| id      = BS_C03_S01_V29_B5
| text    =
देहेन जायते जन्तुरिति सामान्यतो जनिः ।
विशेषजननं चापि प्रोच्यमानं निबोध मे ॥
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{{Bhashyam
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| text    =
स्थास्नुष्वथापि पुरुषे प्रमादायामथापि वा ।गर्भे वा बहिरेवाथ क्वचित् स्थानान्तरेषु च’इति ब्राह्मे ॥ 29 ॥
}}
 
 
[[Category:Brahmasutra]]

Latest revision as of 06:40, 13 April 2026