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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S19]] |
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| | title = एकोनविंशोऽध्यायः
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| | verse_line1 = श्रीभगवानुवाच– यो विद्याश्रुतसम्पन्न आत्मवानानुमानिकः । मायामात्रमिदं ज्ञात्वा ज्ञानं च मयि सन्न्यसेत् ॥ १ ॥
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| | text =
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| 'त्रिगुणा प्रकृतिर्माया पश्येत्तन्मात्रकं जगत् ।
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| निर्मिमीते जगत्सर्वमतो मायेति सा स्मृता''॥ इति प्रभवे ॥
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| 'इदं ज्ञानं हरेः पूजा हरेरेवोदितं सदा ।
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| हर्यधीनं च सर्वत्रेत्येवं न्यासो हरौ स्मृतः''॥ इति च ॥ १ ॥
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| | verse_line1 = त्वय्युद्धवाऽश्रयति यस्त्रिविधो विकारो मायाऽन्तराऽऽपतति नाद्यपवर्गयोर्यत् । जन्मादयोऽस्य वद मां तव तस्य किं स्यु- राद्यन्तयोर्यदसतोऽस्ति तदेव मध्ये ॥ ७ ॥
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| | text =
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| 'अन्यस्थं निर्मितं जीवे जन्मादि हरिणा यतः ।
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| तस्मान्मायेति तत्प्राहुर्माया निर्माणमुच्यते ॥
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| न हि जीवस्य जन्मादि स्वतो नित्यस्य सम्भवेत् ।
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| सृष्टेः प्राक् प्रलये चैव यतो जन्मादि नास्य हि ॥
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| तस्मान्मध्येऽपि नास्यास्ति देहादिस्थं तु विष्णुना ।
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| कर्मभिर्निर्मितं जीवे प्रलये यन्न जीवगम् ॥
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| यन्न विद्येत हि लये यन्न विद्येत मुक्तिगे ।
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| जीवस्य न स्वभावोऽसौ प्रायेणेति विनिश्चितः''॥ इति प्रकाशिकायाम् ।
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| 'मायेत्युक्तं निर्मितं तु यतो जन्मादि निर्मितम् ।
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| देहादिगं परेशेन माया जन्मादि तेन तु''॥ इति प्रकृते ॥
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| मां प्रति वद । तस्य देहादेर्जन्मादयोऽस्य चिदानन्दरूपस्य तव स्युः किम् । अस्वतन्त्रत्वादवस्तुनो जगतः आद्यन्तयोः यज्जीवस्यास्ति तदेव तस्य स्वाभाविकम् । संसारेऽपि । अन्यदभिमाननिमित्तम् । प्रलये विद्यमानस्य कथं जन्मादि स्यादिति भावः ॥ तदा नाशाद्देहादेस्तु युज्यते । मुक्तिगमेव जीवस्य स्वाभाविकम् । किमु लयेऽप्यविद्यमानं स्वतः स्यादित्यर्थः ।
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| 'आद्यन्तयोरनुगमादाद्यन्तरहितस्य तु ।
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| आद्यन्ते भाविनो मध्ये कथमन्यादृशं वपुः''॥ इति ब््राह्मतर्के ॥
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| 'अनित्यत्वात्तु देहस्य तस्य जन्मादिकं भवेत् ।
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| मुक्तिप्रलयसम्बन्धे कथं जीवे तदिष्यते''॥ इति च ॥
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| 'अनित्यस्य गुणा मध्ये भवेयुः स्वत एव तु ।
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| न तु स्वतस्तु नित्यस्य कादाचित्कगुणैर्युतिः''॥ इति च ॥ ७ ॥
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| | verse_line1 = नवैकादश पञ्च त्रीन् भावान् भूतेषु येन वै ।
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| | verse_line2 = ईक्षेतान्वेकमप्येषु तज्ज्ञानं मम निश्चितम् ॥ १४ ॥
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| | verse_line1 = एतदेव हि विज्ञानं न तथैकेन येन यत् ।
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| | verse_line2 = स्थित्युत्पत्त्यप्यया नः स्युर्भावानां त्रिगुणात्मनाम् ॥ १५ ॥
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| | verse_line1 = आदावन्ते च मध्ये च यज्ज्ञं सृज्यं यदन्वियात् ।
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| | verse_line2 = पुनस्तत्प्रतिसङ्क्रामे यच्छिष्येत तदेव सत् ॥ १६ ॥
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| एतदेव हि विज्ञानम् । तथापि न तथैव ॥
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| 'ज्ञात्वा तत्त्वानि तेष्वीशं सर्वतत्त्वेश्वरं प्रभुम् ।
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| जानञ्ज्ञानी भवेत्स्वस्य योग्यं ध्यानं विशेषतः ।
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| पूर्वोक्त एव यो जानन्स विज्ञानी भवत्युत''॥ इति प्रभासे ॥
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| नः तत्त्वानां मध्ये येन यद्यत्र स्थित्वा च स्युः । तदेव सत् ।
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| 'सत्वं स्वातन्त्र्यमुद्दिष्टं तच्च कृष्णे न चापरे ।
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| अस्वातन्त्र्यात्तदन्येषामसत्वं विद्धि भारत''॥ इति भारते ॥१४-१६॥
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| | verse_line1 = श्रुतिः प्रत्यक्षमैतिह्यमनुमानं चतुष्टयम् ।
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| | verse_line2 = प्रमाणेष्वनवस्थानाद् विकल्पात् स विरज्यते ॥ १७ ॥
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| विकल्पात् विरुद्धकल्पनात् ॥ १७ ॥
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| | verse_line1 = धर्मो मद्भक्तिकृत् प्रोक्तो ज्ञानं चैकात्म्यदर्शनम् ।
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| | verse_line2 = गुणेष्वसङ्गो वैराग्यमैश्वर्यं चाणिमादयः ॥ २७ ॥
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| 'एकः प्रधानमुद्दिष्टो विष्णोः प्राधान्यदर्शनम् ।
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| ऐकात्म्यदर्शनं प्रोक्तं सर्वज्ञानोत्तमं च तत्''॥ इति त्रैकाल्ये ॥ २७ ॥
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| | verse_line1 = दरिद्रो यस्त्वसंतुष्टः कृपणो योऽजितेन्द्रियः ।
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| | verse_line2 = गुणेष्वसक्तधीरीशो गुणसङ्गो विपर्ययः ॥ ४५ ॥
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| | id = BTN_C11_S19_V45_author-note
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे एकोनविंशोऽध्यायः ॥
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| | verse_id = BTN_C11_S19_V45
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| | id = BTN_C11_S19_V45_B1
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| | name = Bhashyam
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| | text =
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| 'विषये दोषबुद्धिः सन्निन्द्रियाणां वशे स्थितः ।
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| कृपणः स तु सम्प्रोक्तो गुणबुद्धिर्विपर्ययः''॥ इति विवेके ॥
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| 'पुरुषार्थमतिर्यस्य विषयेष्वेव देहिनः ।
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| विपरीतः स विज्ञेयः स्वात्मनो विपरीततः''॥ इति निवृत्ते ॥
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| वित्तासन्तोषमात्राद्दरिद्रः । सर्वविषयसङ्गी विपरीतः ॥ ४५ ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |