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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C07_S01]] |
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| | title = प्रथमोऽध्यायः
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| | verse_line1 = निर्गुणोऽपि ह्यजोऽव्यक्तो भगवान् प्रकृतेः परः ।
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| | verse_line2 = स्वमायागुणमाविश्य बाध्यबाधकतां गतः ॥ ६ ॥
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| 'बाध्यादिस्थो हरिर्नित्यं बाध्यतादिगतेत्यपि ।
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| गीयते न तु बाध्यत्वादिदोषयुतत्वतः''॥ इति भविष्यत्पर्वणि ॥
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| | verse_line1 = ज्योतिरादिरिवाभाति सङ्घातान्न विविच्यते ।
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| | verse_line2 = विन्दन्त्यात्मानमात्मस्थं मथित्वा कवयोऽन्ततः ॥ ९ ॥
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| | text =
| |
| 'दधिस्थघृतवत्काष्ठे वह्निवच्च जनार्दनः ।
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| देहेन्द्रियासुजीवेभ्यो विविच्य ज्ञायते न तु''॥ इति च ॥
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| | verse_line1 = कालं चरन्तं सृजतीश आश्रयः प्रधानपुंभ्यां नरदेव सत्यकृत् । स तत्र तत्रोभयसिद्धिमाप्नुयात् लिङ्गात्मनो लिङ्गगुणाश्च सन्ति ॥ ११ ॥
| |
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| |
| प्रधानपुंभ्यां सह ॥
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| | verse_line1 = य एष राजन्नपि काल ईशिता सत्वं सुरानीकमिवैधयत्यजः । तत्प्रत्यनीकानसुरान् सुरप्रियो रजस्तमस्कान् प्रमिणोत्युरुश्रवाः ॥ १२ ॥
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| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| | text =
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| काले कालविषयेऽपीशिता । देहादिकारणत्वात् सुरानीकमिव स्थितं सत्वम् ।
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| 'स्वभावतः प्रियत्वात्तु सदा देवप्रियो हरिः ।
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| अप्रियश्चासुराणां स स्वभावात्तूभयं नृणाम् ॥
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| देशकालौ गुणांश्चैव भक्त्यादीनप्यपेक्ष्य तु ।
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| योग्यतां च तथा कर्म सम इत्यभिधीयते ॥
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| स्वतः प्रियोऽपि देवानामुत्पाद्यैव गुणानिमान् ।
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| इतरेषां तथा दोषान्सुखदुःखे ददात्यजः ॥
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| उभयं तु मनुष्याणामतः सम इतीरितः ।
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| अनादिनियताश्चैव गुणदोषाः सुरादिषु ॥
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| यथाक्रमं पुनश्चैव नियमाद्वर्धितास्तथा ।
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| विष्णुनैव ततो नित्यं विषमश्च जनार्दनः''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
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| 'न विष्णोर्विषमत्वं तु योग्यतापेक्षया क्वचित् ।
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| योग्यतायास्तन्नियत्या विषमत्वं भवेदिति''॥ इति स्कान्दे ॥
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| 'विषमत्वं तु दोषाय शुभाशुभविपर्यये ।
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| अतस्तादृशवैषम्यं ब्रह्मसूत्रे निराकृतम् ॥
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| शुभाशुभनियन्तृत्वं न दोषो गुण एव सः ।
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| अतस्तदिष्टं कृष्णस्य ब्रह्मसूत्रकृतो विभोः''॥ इति तन्त्रनिर्णये ॥
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| | verse_line1 = शपतोरसकृद् विष्णुं यद् ब्रह्म परमव्ययम् ।
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| | verse_line2 = श्वित्रो न जातो जिह्वायां नान्धं विविशतुस्तमः ॥ २० ॥
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| | name = Bhashyam
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| | text =
| |
| 'नियमाद्भुज्यते पुम्भिर्धर्माधर्मफलं मृतौ ।
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| कैश्चिदत्रापि भुज्येत तस्मान्नाधर्ममाचरेत्''॥ इति भारते ॥
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| | verse_line1 = यन्निबन्धोऽभिमानोऽयं तद्वधात् प्राणिनां वधः ।
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| | verse_line2 = तथा न यस्य कैवल्यादभिमानोऽखिलात्मनः । परस्येदमकर्तुर्हि हिंसा केनास्य कल्प्यते ॥ २६ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| }}
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| | name = Bhashyam
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| | text =
| |
| कैवल्यात् देहाद्यभावादेव । अकर्तुः तस्यान्यः कर्ता न विद्यते । इदं एषा ।
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| 'व्यत्ययोऽतिशयकुत्सनभेदेषु''इति सूत्रात् ॥
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| | verse_line1 = तस्माद् वैरानुबन्धेन निर्वैरेण भयेन वा ।
| |
| | verse_line2 = स्नेहात् कामेन वा युञ्ज््यात् कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् ॥ २७ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| }}
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| | name = Bhashyam
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| | text =
| |
| कथञ्चिन्नेक्षते पृथक् । तत्रैव मनसोऽभिनिवेशेन तदन्यं नेक्षते । वैरादीनामेकतमेनापि यो युञ्ज्यात् स नेक्षत इति स्वभावकथनं न विधिः ।
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| 'कर्मणा मनसा वाचा यो द्विष्याद्विष्णुमव्ययम् ।
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| मज्जन्ति पितरस्तस्य नरके शाश्वतीः समाः''।
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| 'तानहं द्विषतः क्रूरान्संसारेषु नराधमान् ।
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| क्षिपाम्यजस्रमशुभानासुरीष्वेव योनिषु ॥
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| आसुरीं योनिमापन्ना मूढा जन्मनि जन्मनि ।
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| मामप्राप्यैव कौन्तेय ततो यान्त्यधमां गतिम्''॥
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| 'अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।
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| परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम्''॥
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| 'मोघाशा मोघकर्माणो मोघज्ञाना विचेतसः ।
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| राक्षसीमासुरीं चैव प्रकृतिं मोहिनीं श्रिताः''॥
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| 'यदनिन्दत्पिता मे त्वामविद्वांस्तेज ऐश्वरम् ।
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| तस्मात्पिता मे पूयेत दुरन्ताद्दुस्तरादघात् ॥
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| हिरण्यकशिपुश्चापि भगवन्निन्दया तमः ।
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| विविक्षुरत्यगात् सूनोः प्रह्लादस्यानुभावतः''॥
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| 'वरतोऽपि न मुच्यन्ते द्वेषिणः शापतोऽपि तु ।
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| भक्ता नैव निपात्यन्ते धर्माधर्मैस्तथेतरैः ॥
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| अन्यावेशकृतं यत्तु तद्वराद्यैरपोह्यते ।
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| तद्विरुद्धस्वभावानामन्यथा न कथञ्चन''इत्यादेः ॥
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| यस्मादेवं कोऽप्युपद्रवो नास्ति भगवतस्तस्मादेव द्वेषादिनापि मनो योक्तुं शक्यते तत्प्रेरणया । तादृशानां एतदेव चिन्तयति च । अन्यथा आत्मनो दुःखकारणं द्वेषादिकं कथं सर्वनियामको हरिरुत्पादयेत् ॥ २७ ॥
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| | verse_line1 = यथा वैरानुबन्धेन मर्त्यस्तन्मयतामियात् ।
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| | verse_line2 = न तथा भक्तियोगेन इति मे निश्चिता मतिः ॥ २८ ॥
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| | verse_line1 = कीटः पेशस्कृता रुद्धः कुड्ये यान्तमनुस्मरन् ।
| |
| | verse_line2 = संरम्भभययोगेन विन्दते तत्सरूपताम् ॥ २९ ॥
| |
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| | verse_line1 = एवं कृष्णे भगवति मायामनुज ईश्वरे ।
| |
| | verse_line2 = वैरेण धूतपाप्मानः तमापुरनुचिन्तया ॥ ३० ॥
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| | text =
| |
| तत्रैव हेतुः । यथा वैरानुबन्धेनेति । यथा वैराभिनिवेशिनः तथा भक्त्यभि-निवेशिनो न सन्ति । तत्कथमन्यथा भक्तानेव बहून्हरिः कुर्यादिति भावः ॥
| |
| कीटः पेशस्कृतेत्यादि चैद्यादीनां भक्तियुतत्वप्रतिपादनम् । स्नेहाद्यायतननाशादिनाऽप्युपद्रवोऽस्य नास्तीति निर्वैरेणेत्याद्युक्तम् ।
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| 'ततः कनीयसा एव देवा ज्यायसा असुराः''इति श्रुतिः ।
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| तन्मयतां मनसस्तत्राभिनिवेशनम् ।
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| 'मागधाद्या यथा नित्यं द्वेषादाग्रहिणो हरौ ।
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| न तथाऽऽग्रहिणो भक्ता ऋते ब्रह्माणमव्ययम्''॥ इति हरिवंशेषु ॥
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| योगः स्नेहः । संरम्भभययुक्तस्नेहेन ।
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| 'प्रीतिः स्नेहस्तथा योगः प्रेमबन्ध इतीर्यते''। इति शब्दनिर्णये ॥
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| वैरयुक्तयाऽप्यनुचिन्तया तमापुः ।
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| 'अनुचिन्तेति तामाहुर्भक्तिपूर्वा तु या स्मृतिः''। इति च ॥
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| 'स्नेहादन्नं ददातीति स्वाकर्षणभयेऽपि च ।
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| विद्यमानेऽप्यल्पकोपे सङ्गतिस्नेहतस्तथा ॥
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| पेशस्कृद्रूपतां कीटो यथा याति तथैव तु ।
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| चैद्यादयोऽसुरावेशशाद्धरौ द्वेषयुता अपि ॥
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| निजस्वभावया भक्तया नीता हरिसरूपताम् ।
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| तथा हि करुणो विष्णुरन्यावेशाद्यदि द्विषन् ॥
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| हीयते किं ममानेन नित्यानन्द स्वरूपिणः ।
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| देहबन्धयुतानां हि द्वेषिणाऽपकृतं भवेत् ॥
| |
| मम को ह्यपराध्येत निर्दोषसुखरूपिणः ।
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| अतो मय्यपराधस्तु स्वस्मिन्नेव न मे भवेत् ॥
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| अतो यच्चासुरावेशात्कृतमेतेन दुष्कृतम् ।
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| अनादिभक्तो यस्मान्मे मोचयिष्ये ततस्त्वहम् ॥
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| इति मत्वा मोचयति चैद्यादीनपि केशवः''॥ इति ब्रह्माण्डे ॥ २८-३० ॥
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| }}
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| | verse_line1 = कामात् स्नेहाद् भयाद् द्वेषाद् यथा भक्त्येश्वरे मनः ।
| |
| | verse_line2 = आवेश्य तदघं हित्वा बहवस्तद्गतिं गताः ॥ ३१ ॥
| |
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| |
| कामादिभिरपि यथावद्भक्त्या सहैव मन आवेश्य तदघं यत्तु द्वेषादिकृतमघं यथाभूतया भक्त्या हित्वा ॥ ३१ ॥
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| | verse_line1 = गोप्यः कामाद् भयात् कंसो द्वेषाच्चैद्यादयो नृपाः ।
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| | verse_line2 = सम्बन्धाद् वृष्णयः स्नेहाद् यूयं भक्त्या वयं विभो ॥ ३२ ॥
| |
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| | text =
| |
| 'गोप्यः कामयुता भक्ताः कंसाविष्टः स्वयं भृगुः ।
| |
| ज्ञेयो भययुतो भक्तश्चैद्यादिस्था जयादयः ॥
| |
| विद्वेषसंयुता भक्ता वृष्णयो बन्धुसंयुताः ।
| |
| बहुमानस्नेहसाम्याद्देवा भक्ताः प्रकीर्तिताः ॥
| |
| स्नेहोपसर्जनादेव बहुमानान्मुनीश्वराः ।
| |
| बहुमानोऽपि देवानामृषिभ्योऽप्यधिको मतः ॥
| |
| ब्रह्मवीन्द्रेन्द्र-कामादेरितरेषां यथाक्रमम्''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = कतमोऽपि न वेनस्य पञ्चानां पुरुषं प्रति ।
| |
| | verse_line2 = तस्मात् केनाप्युपायेन मनः कृष्णे निवेशयेत् ॥ ३३ ॥
| |
| | commentary1 = bhagavatatatparyanirnaya
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| |
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| |
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| |
| कतमोऽपि भक्तियोगो न वेनस्य । तस्मात्केनापि प्रकारेण उपायेनैव मनो निवेशयेत् । नानुपायेन ।
| |
| 'उपायो भक्तिरुद्दिष्टो द्वेषाद्या अनुपायकाः''। इति शब्दनिर्णये ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = मातृष्वस्रेयो वश्चैद्यो दन्तवक्रश्च पार्थिव ।
| |
| | verse_line2 = पार्षदप्रवरौ विष्णोर्विप्रशापात् पदच्युतौ ॥ ३४ ॥
| |
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| }}
| |
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| |
| स्वतो भक्ताश्चैद्यादयोऽपि परावेशाद्द्वेषिण इत्यत्र हेतुर्मातृष्वस्रेय इत्यादि ॥ ३४ ॥
| |
| }}
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| | verse_line1 = पञ्चषड्ढायनार्भाभाः पूर्वेषामपि पूर्वजाः ।
| |
| | verse_line2 = दिग्वाससः शिशून् मत्वा द्वाःस्थौ तान् प्रत्यषेधताम् ॥३८॥
| |
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| }}
| |
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| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| द्वास्थावित्यनेनाधिकारस्थत्वमुक्तम् ।
| |
| 'अधिकारस्थिताश्चैव विमुक्ताश्च द्विधा जनाः ।
| |
| विष्णुलोकस्थितास्तेषां वरशापादियोगिनः ॥
| |
| अधिकारस्थिता मुक्तिं नियतं प्राप्नुवन्ति च ।
| |
| विमुक्त्यनन्तरं तेषां वरशापादयो न तु ॥
| |
| देहेन्द्रियासुयुक्ताश्च पूर्वं पश्चान्न तैर्युताः ।
| |
| अप्यभीमानिभिस्तेषां देवैः स्वात्मोत्तमैर्युताः''॥ इति तन्त्रसारे ॥३८॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = तं सर्वभूतात्मभूतं प्रशान्तं समदर्शनम् ।
| |
| | verse_line2 = भगवत्तेजसा स्पृष्टं नाशक्नोद्धन्तुमुद्यमैः ॥ ४४ ॥
| |
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| }}
| |
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| |
| सर्वभूतात्मनि भूतम् ॥ ४४ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_type = shloka
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| | verse_line1 = ततस्तौ राक्षसौ जातौ केशिन्यां विश्रवःसुतौ ।
| |
| | verse_line2 = रावणः कुम्भकर्णश्च सर्वलोकप्रतापिनौ ॥ ४५ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = तावद्य क्षत्रियौ जातौ मातृष्वस्रात्मजौ तव ।
| |
| | verse_line2 = अधुना शापनिर्मुक्तौ कृष्णचक्रहतांहसौ ॥ ४६ ॥
| |
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| }}
| |
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| |
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| | id = BTN_C07_S01_V46_B1
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| | name = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'हिरण्यकशिपुर्भूतममन्यत मृतौ हरिम् ।
| |
| अतो भयानको जातस्तत्र राजानमेव च ॥
| |
| मत्वा राजैव सञ्जातः कृष्णं चक्रादिलक्षणैः ।
| |
| मृतिकाले हरिं चैव मत्वा भक्त्यैव केवलम् ॥
| |
| द्वाःस्थत्वं हरिमाविश्य प्रापैव मनुजोऽपि तु''॥ इति गारुडे ॥
| |
| 'विष्णुभक्तेश्च तज्ज्ञानादन्यतो मुक्तिवाचकाः ।
| |
| विष्णोर्गुणह्रासवाचः श्रीब्रह्मादेस्तथा क्रमात् ॥
| |
| विष्ण्वादिद्वेषतश्चैव सुखवाचस्तथाऽखिलाः ।
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| मोहनार्थाः समुद्दिष्टा यथार्थद्योतकास्तथा''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ४५-४६ ॥
| |
| }}
| |
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| | verse_line1 = वैरानुबन्धतीव्रेण ध्यानेनाच्युतसाम्यताम् ।
| |
| | verse_line2 = नीतौ पुनर्हरेः पार्श्वं जग्मतुर्विष्णुपार्षदौ ॥ ४८ ॥
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| ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये सप्तमस्कन्धे प्रथमोऽध्यायः ॥
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| | name = Bhashyam
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| वैरानुबन्धः वैरयुक्ता भक्तिः ।
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| 'अनुबन्धस्तु भक्तिः स्याद्बन्धः स्नेह उदाहृत''॥ इति च ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |