|
|
| (6 intermediate revisions by the same user not shown) |
| Line 1: |
Line 1: |
| {{Adhyaya
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C11_S08]] |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | chapter_num = 11
| |
| | chapter_name = एकादशस्कन्धः
| |
| | section_id = BTN_C11_S08
| |
| | section_num = 8
| |
| | title = अष्टमोऽध्यायः
| |
| }}
| |
| == अष्टमोऽध्यायः ==
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S08_V07
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S08
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = दृष्ट्वा स्त्रियं देवमायां तद्भावैरजितेन्द्रियः ।
| |
| | verse_line2 = प्रलोभितः पतन्त्यन्धे तमस्यग्नौ पतङ्गवत् ॥ ७ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S08_V08
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S08
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = योषित्सु तल्पाभरणाम्बरादिद्रव्येषु मायारचितेषु मूढः ।
| |
| | verse_line2 = प्रलोभितात्मा ह्युपभोगबुद्ध्या पतङ्गवन्नश्यति नष्टदृष्टिः ॥ ८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S08_V08
| |
| | id = BTN_C11_S08_V08_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'महतां वनिताकामः पतत्यन्धे तमस्यलम् ।अन्यत्र निरयं याति दुःखवान्स्याद्विपर्यये''इति धर्मसंहितायाम् ॥'मोहकारणभूतां तु मायेत्याहुर्मनीषिणः ।अविद्यमानं मेत्युक्तं तज्ज्ञापयति यत्स्वयम् ॥कुत्रचिज्ज्ञानरूपं सल्लाभरूपं च भण्यते ।मयं प्राचुर्यमुद्दिष्टं माया स्यात्प्रचुरेत्यपि''॥ इति तन्त्रनिरुक्ते ॥'स्वतन्त्रं परमार्थाख्यं स्वतन्त्रैका हरेर्मतिः ।सैव माया समुद्दिष्टा मुख्यतस्तत्स्वरूपिका ॥मतिमन्मतिभेदोऽपि न विष्णोः क्वचिदिष्यते ।पारमार्थ्येन नास्त्येव तदन्यत्तद्वशं यतः ॥अनाद्यनन्तकालेषु विद्यमानमपि ध््राुवम् ।अतो मायामयं प्राहुः सर्वं तद्वशगं यतः''॥ इति मायावैभवे ॥'स्वाधीनं सदिति प्रोक्तं पराधीनमसत्स्मृतम् ।अविद्यमानमेतस्माज्जगदाहुर्विपश्चितः ॥अनाद्यनन्तकालेषु विद्यमानमपि ध््राुवम् ।अस्वातन्त्र्यात्तु नास्त्येवेत्येवं वाच्यं जगत्सदा ॥सदा वृत्तेर्विद्यमानमिति ब््राूयाद्यदि क्वचित् ।तथापि नाशवद्धीदं प्रवाहाद्ध्यस्य नित्यता ॥अतो निवर्त्यमित्याहुः प्रपञ्चो ह्यस्ति यद्यपि ।विष्णोरिच्छावशत्वाच्च मायामात्रमिति स्फुटम् ॥परमार्थं त्वेकमेव स्वातन्त्र्याद्विष्णुमव्ययम् ।यदि कल्पयतीदं स स एव विनिवर्तयेत् ॥विष्णुस्तस्मात्तद्वशत्वान्नास्तीति द्वैतमुच्यते ।स्वातन्त्र्येण हरौ ज्ञाते पराधीनत्वनिश्चयात् ॥इत्याहुरुपदेष्टार आचार्यास्तत्त्ववेदिनः ।यथैव राजन्विज्ञाते नान्योऽस्तीति स्फुटं वचः ॥स्वातन्त्र्यात्पारतन्त्र्याच्च तद्भृत्यादिषु सत्स्वपि ।यथैकच्छत्रवांश्चैव एकवीर इतीव च ॥तथैव सर्वप्राधान्यादद्वितीयो हरिः स्मृतः ।एवं मुक्ता विजानन्ति सायुज्यं प्रापिता विभोः ॥अनन्तकालं पश्यन्तो जगदेतच्चराचरम् ।तस्यैतस्य ह्यविज्ञानात्केवलभ््र•न्तिरूपकम् ॥जगदुक्त्वा तमो यान्ति ईशितव्येशशापतः''॥ इति च ॥'पुत्रा मे यदि विद्यन्ते मरिष्यन्त्येव ते ध््राुवम् ।यदि राज्यं करोत्येष नश्यत्येतदसंशयम्''॥ इति धृतराष्ट्रवचनवत् ।'प्रपञ्चो यदि विद्येत''। इत्यादि ।'यदिशब्दस्त्ववस्तुत्वे चास्वातन्त्र्ये च संशये ।अवस्तुशब्दश्चाशक्ते ह्यल्पशक्तौ च कीर्त्यते''॥ इति शब्दनिर्णये ॥ ७,८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C11_S08_V34
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C11
| |
| | section_id = BTN_C11_S08
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = सुहृत् प््रोष्ठतमो नाथ आत्मा चायं शरीरिणाम् ।
| |
| | verse_line2 = तं विक्रीयात्मनैवाहं रमेऽनेन यथा रमा ॥ ३४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये एकादशस्कन्धे अष्टमोऽध्यायः ॥}}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C11_S08_V34
| |
| | id = BTN_C11_S08_V34_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'भगवद्भार्यतायोग्याः काश्चिदप्सरसःस्त्रियः ।रमाऽऽवेशात्कदाचित्स्युस्तास्वेका पिङ्गलाऽभवत् ।तदन्यासां महान्दोषो भगवद्भर्तृतास्मृतौ''॥ इति स्वाभाव्ये ॥ ३४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| | |
| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |