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| {{Adhyaya
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C06_S17]] |
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| | title = सप्तदशोऽध्यायः
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| == सप्तदशोऽध्यायः ==
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| | verse_line1 = एषामनुध्येयपदाब्जयुग्मं
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| | verse_line2 = जगद्गुरुं मङ्गलमङ्गलं स्वयम् ।
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| | verse_line3 = यः क्षत्रबन्धुः परिभूय सूरीन्
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| | verse_line4 = प्रशास्ति धृष्टस्तदयं हि दण्ड््यः ॥ १३ ॥
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| | name = Bhashyam
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| एषां पक्षे तदवराणामनुध्येयपदाब्जयुग्मम् ।'विष्णुब्रह्मप्राणवीन्द्रांस्तद्दारानप्यृते हरः ।ध्येयो हरेः पार्षदाद्यैर्ध्यायन्हरिचतुर्मुखौ ॥प्राणमेषां तथा दारान्न स्वतन्त्रतया क्वचित्''॥ इति तन्त्रमालायाम् ॥१३॥
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| }}
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| | verse_line1 = न चास्य कश्चिद् दयितः प्रतीपो
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| | verse_line2 = न ज्ञातिबन्धुर्न परो न च स्वः ।
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| | verse_line3 = समस्य सर्वत्र निरञ्जनस्य
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| | verse_line4 = कुतोऽनुरागः कुत एव रोषः ॥ २२ ॥
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| }}
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| | text =
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| 'सेवायोग्यातिरेकेण स्वानामपि न दास्यति ।अपराधातिरेकेण नान्यस्यातः समो हरिः''॥ इति माहात्म्ये ॥ २२ ॥
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| }}
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| | verse_line1 = देहिनां देहसंयोगाद् द्वन्द्वानीश्वरलीलया ।
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| | verse_line2 = सुखं दुःखं मृतिर्जन्म शापानुग्रह एव च ॥ २९ ॥
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| | verse_type = shloka
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| | verse_line1 = अविवेककृतः पुंसो ह्यर्थभेद इहात्मनि ।
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| | verse_line2 = गुणदोषविकल्पश्च भिदेव स्वप्नकल्पिता ॥ ३० ॥
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| }}
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| | text =
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| 'यत्तद्भगवता क्लृप्तं तदेव नियतं भवेत् ।अतोऽन्येषां वरः शापो गुणदोषप्रकर्तृता ॥स्वतः प्राप्ता भेदकृतिर्वासनारूपिणो यथा ।विद्यमानस्य मनसि पुनः स्वप्नेषु दर्शनम् ॥भगवद्वशता यस्मात्सर्वेषां ज्ञेयमेव तत्''॥ इति प्रकाशसंहितायाम् ॥ ३० ॥
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| }}
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| | section_id = BTN_C06_S17
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| | verse_line1 = इति भागवतो देव्याः प्रतिशप्तुमलन्तमः ।
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| | verse_line2 = मूर्ध्ना सञ्जगृहे शापमेतावत् साधुलक्षणम् ॥ ३७ ॥
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| }}
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| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये षष्ठस्कन्धे सप्तदशोऽध्यायः ॥}}
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| | name = Bhashyam
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| | label = Bhashyam
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| | text =
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| प्रतिशप्तुमलन्तमः ।'देवा एव तदन्येभ्यः शक्ता नास्त्यत्र संशयः ।अशक्ता अपि शक्तानां शक्ताः शापादिषु स्फुटम् ॥तथाप्यशक्तैर्विहिताः शापाद्याः शक्तिमत्सु वै ।अत्यल्पाश्चाल्पकालाश्च न सम्यक्प्रभवन्ति च ॥यत्नेनापोहितुं शक्या उत्तमैस्तु न संशयः ।उत्तमेषु कृताः शापाः कर्तॄणां ज्ञानपुण्ययोः ॥निःशेषेण निहन्तारस्तदनुग्रहमन्तरा ।सदारयोर्ब्रह्मविष्ण्वोर्वरशापादयोऽखिलाः ॥तदन्येन कृताः सर्वे निष्फला एव निश्चयात् ।न चाप्यवान्तराः शापा भवन्त्येषां तु कुत्रचित् ॥वरा विष्णोः श्रियश्च स्युर्ब्रह्मणश्च यथाक्रमम् ।उत्तमैरधमानां तु वराः शापा यथोदितम् ॥सम्पूर्णफलदा एव नात्र कार्या विचारणा''॥ इति स्कान्दे ॥ ३७ ॥
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| }}
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |