|
|
| (6 intermediate revisions by the same user not shown) |
| Line 1: |
Line 1: |
| {{Adhyaya
| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C06_S09]] |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | chapter_num = 6
| |
| | chapter_name = षष्ठस्कन्धः
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | section_num = 9
| |
| | title = नवमोऽध्यायः
| |
| }}
| |
| == नवमोऽध्यायः ==
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V20
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = देवा ऊचुः–
| |
| | verse_line2 = वाय्वम्बराग्न्यप्क्षितयस्त्रिलोका
| |
| | verse_line3 = ब्रह्मादयो ये वयमुद्विजन्तः ।
| |
| | verse_line4 = हराम यस्मै बलिमन्तकोऽसौ
| |
| | verse_line5 = बिभेति यस्मादरणं ततो नः ॥ २० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V20
| |
| | id = BTN_C06_S09_V20_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'कालोऽन्तकः प्रधानं च मृत्युरव्यक्तमित्यपि ।उच्यते प्रकृतिः सूक्ष्मा श्रीर्भूर्दुर्गेति नामभिः ॥सैव ब्रह्मादिभयदा विष्णोश्च वशवर्तिनी ।अभयापि बिभेतीव तद्वशत्वादुदीर्यते''॥ इति तु माहात्म्ये ॥ २० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V23
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = पुरा स्वयम्भूरपि संयमाम्भ-
| |
| | verse_line2 = स्युदीर्णवातोर्मिरवैः कराले ।
| |
| | verse_line3 = एकोऽरविन्दात् पतितस्ततार
| |
| | verse_line4 = तस्माद् भयाद् येन स नोऽस्तु पारः ॥ २३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V23
| |
| | id = BTN_C06_S09_V23_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'यत्र वायूदपद्मादिरूपेण प्रकृतिः स्थिता ।एकस्तत्राबिभेद्ब्रह्मा विचार्य भयमत्यगात् ॥अन्तर्गतो हरिस्तस्य ध्यातो भयमपानुदत्''॥ इति च ॥'जनिष्यतां जनानां तु स्वभावानां प्रसिद्धये ।ज्ञानादिगुणपूर्णस्य ब्रह्मणोऽपि क्षणार्धगाः ॥भयादिका भवन्तीव कथं तस्मिन्स्थिरालयाः''॥ इति च ॥'भगवत्प्रीतये नित्यं ब्रह्मणो ये भयादयः ।न वृथा तस्य भावः स्यात्कश्चित्तेऽपि क्षणार्धगाः ॥अज्ञानं च चतुर्वारं द्विवारं भयमेव च ।शोकोऽपि तावान्नान्यत्र कदाचिद्ब्रह्मणो भवेत् ॥तत्रापि भगवत्प्रीत्या उन्नत्यैवास्य तद्भवेत्''॥ इति ब्रह्मतर्के ॥ २३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V24
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = य एक ईशो निजमायया नः
| |
| | verse_line2 = ससर्ज येनानुसृजाम विश्वम् ।
| |
| | verse_line3 = वयं च यस्यापि पुरः समेताः
| |
| | verse_line4 = पश्याम लिङ्गं पृथगीशमानिनः ॥ २४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V24
| |
| | id = BTN_C06_S09_V24_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| लिङ्गमेव पश्यामः ।'कदाचिदभिमानस्तु देवानामपि सन्निव ।प्रायः कालेषु नास्त्येव तारतम्येन सोऽपि तु''॥ इति च ॥ २४ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V28
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = आत्मतुल्यैः षोडशभिर्विना श्रीवत्सकौस्तुभौ ।
| |
| | verse_line2 = पर्युपासितमुन्निद्रशरदम्बुरुहेक्षणम् ॥ २८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V28
| |
| | id = BTN_C06_S09_V28_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'श्रीवत्सः प्रकृतिर्ज्ञेया ब्रह्माख्यः कौस्तुभः पुमान् ।तदतीतैः षोडशभिः स्वरूपैरप्युपास्यते''॥ इति च ।श्रीवत्सकौस्तुभौ विनाऽऽत्मतुल्यैः प्रकृतिपुरुषातीतत्वात्सप्तदशरूपाण्यपि तुल्यानीत्यर्थः । आत्मभूतैश्च तुल्यैश्च आत्मतुल्यैः ।'अपुंप्रकृत्यधीनत्वाद्वासुदेवादिका हरेः ।तुल्याश्च केशवाद्याश्च न च भिन्नाः कथञ्चन''॥ इति तन्त्रसारे ॥श्रीवत्सकौस्तुभाभ्यां तु विनाभावं प्रदर्शयेत् ।पुंप्रकृत्यात्मकाभ्यां स धत्ते नित्यं जनार्दनः ॥यदस्याभ्यामतीतत्वं यद्वशो नानयोर्हरिः ।श्रीवत्सकौस्तुभाभ्यां तु विनाभावः स एव तु''॥ इति च ॥'आत्मैव सप्तदशधा स्वयं भूत्वा जनार्दनः ।मध्यस्थावृतिरूपेण क्रीडते पुरुषोत्तमः''॥ इति च ॥ २८ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V30
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = देवा ऊचुः–
| |
| | verse_line2 = नमस्ते यज्ञवीर्याय वयसे उत ते नमः ।
| |
| | verse_line3 = नमस्ते अस्तु चक्राय नमोऽस्तु पुरुहूतये ॥ ३० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V30
| |
| | id = BTN_C06_S09_V30_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'वयः सर्वस्य वयनाद्भगवान्पुरुषोत्तमः''॥ इति च ।'मा तन्तुश्छेदि वयतो धियं मे''॥ इति श्रुतिः ॥ ३० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V31
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = यत् ते गतीनां तिसृणामीशितुः परमं पदम् ।
| |
| | verse_line2 = नार्वाचीनो विसर्गस्य धातुर्वेदितुमर्हति ॥ ३१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V31
| |
| | id = BTN_C06_S09_V31_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'देवलोकात्पितृलोकान्निरयाच्चापि यत्परम् ।तिसृभ्यः परमं स्थानं वैष्णवं विदुषां गतिः''॥ इति माहात्म्ये ॥ ३१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V33
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदिह गुणविसर्गापतितः पारतन्त्र्येण
| |
| | verse_line2 = स्वकृतकुशलाकुशलफलमुपाददाति आहोस्विदात्माराम उपशमशीलः समञ्जसदर्शन उदास्त इति ह
| |
| | verse_line3 = वाव न विदामः ।न हि विरोध उभयं भगवत्यपरिगणितगुणगण ईश्वर अनवगाह्य-माहात्म्ये
| |
| | verse_line4 = अर्वाचीनविकल्पवितर्कविचारप्रमाणाभासकुतर्कशास्त्रकलिलान्तःकरणदुरवग्रहवादिनां च
| |
| | verse_line5 = विवादानवसरे उपरतसमस्तमाया-मये केवलस्वात्ममायामन्तर्धाय को नु दुर्घट इव भवति ।
| |
| | verse_line6 = स्वरूपद्वयाभावात् समविषममतीनां मतमनुसरसि यथा रज्जुखण्डः सर्पादिधियाम् । स एव हि पुनः सर्ववस्तुषु वस्तुस्वरूपः सर्वेश्वरः सकलजगत्कारणकारणभूतः सर्वप्रत्यगात्मत्वात्
| |
| | verse_line7 = सर्वगुणाभासोपलक्षित एक एव पर्यवशेषितः ।अथ ह वाव तव
| |
| | verse_line8 = महिमामहामृतरससमुद्रविप्लुषाऽसकृल्लीढया स्व-मनसि निष्यन्दमानानवरतसुखेन
| |
| | verse_line9 = विस्मारितदृष्टश्रुतविषयसुखलेशाभासाः परमभागवता एकान्तिनो भगवति सर्वभूतप्रियसुहृदि
| |
| | verse_line10 = सर्वात्मनि निरन्तरनिर्वृतमनसः कथमु ह वा एते मधुमथन पुनः स्वार्थकुशला ह्यात्मप्रियसुहृदः
| |
| | verse_line11 = साधवस्त्वच्चरणाम्बुजानुसेवां विसृजन्ति न यत्र पुनरयं संसारपरिवर्तः ।
| |
| | verse_line12 = त्रिभुवनात्मभवन त्रिविक्रम त्रिनयन त्रिलोकमनोहरानुभाव तवैव विभूतयोऽभूवन्
| |
| | verse_line13 = दितिजदनुजादयश्चापि तेषामनुपक्रमसमयोऽयमिति स्वात्ममायया सुरनरमृगमिश्रितजलचराकृतिभिः
| |
| | verse_line14 = यथाऽ-पराधं दण्डं दधर्थावतीर्य ॥ ३३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V33
| |
| | id = BTN_C06_S09_V33_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| अथ तत्र भगवान् किं देवदत्तवदित्याक्षेपः । अचिन्त्यशक्तेरनन्तगुणस्य कुतः पारतन्त्र्यादिकमित्यभिप्रायः । उपरतसमस्तमायामये प्राकृतस्वभाववर्जिते । केवलं स्वात्ममायां निजसामर्थ्यम् । स्वरूपद्वयाभावादित्यादि समाधानम् ।'स्वतन्त्रः परतन्त्रो वा ज्ञोऽज्ञो दुःखी सुखी नु किम् ।इत्यादिसंशयः क्व स्याज्ज्ञानिनां पुरुषोत्तमे ॥तस्यानन्तगुणत्वाच्च पूर्णशक्तित्वतो हरेः ।स्वातन्त्र्यादिकमेवास्य विदो जानन्ति निश्चयात् ॥घटकत्वाद्दुर्घटस्य दुर्ज्ञेयत्वाच्च सर्वशः ।तच्छक्तेरविदो जीवं परतन्त्रं वदन्त्यमुम् ॥एवं दुर्घटया शक्त्या ज्ञाज्ञानां परमेश्वरः ।यथा रज्जुः सर्पधिया रज्जुबुध्द्यावगम्यते ॥तथा यथार्थबुध्द्या च मिथ्याबुद्ध्याऽवगम्यते ।स्वेच्छयैव महाविष्णुः फलदश्चानुसारतः''॥ इति तन्त्रभागवते ।त्रिनयनो नृसिंहरूपी ।'विष्णोर्नृसिंहनामानि त्रिनेत्रोग्रादिकानि तु''॥ इति शब्दनिर्णये ।'विविधं भावपात्रत्वात्सर्वे विष्णोर्विभूतये''॥ इति च ॥ ३३ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V35
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = हंसाय दभ्रनिलयाय निरीक्षकाय
| |
| | verse_line2 = कृष्णाय मृष्टयशसे निरुपक्रमाय ।
| |
| | verse_line3 = सत्संग्रहाय भवपान्थनिजाश्रयाय
| |
| | verse_line4 = शश्वद् वरिष्ठगतये हरये नमस्ते ॥ ३५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V35
| |
| | id = BTN_C06_S09_V35_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'निरुपक्रमो हरिर्नित्यमप्रयत्नो ह्युपक्रमेत्''॥ इति च ॥ ३५ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V39
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = न वेद कृपणः श्रेय आत्मनो गुणवस्तुदृक् ।
| |
| | verse_line2 = तस्य तानिच्छतो यच्छे यदि सोऽपि तथाविधः ॥ ३९ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V40
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = स्वयं निःश्रेयसं विद्वान् न वक्त्यज्ञाय कर्मभिः ।
| |
| | verse_line2 = न राति रोगिणोऽपथ्यं वाञ्छतोऽपि भिषग्यथा ॥ ४०॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V40
| |
| | id = BTN_C06_S09_V40_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| यदि सोऽपि तथाविधः अत्युत्तमो न भवति चेत् । युष्मत्कामो मत्प्रिय एव । अन्यथा न दद्यामिति भावः ।'विष्णोः प्रियं कामयन्ति देवा नैवाप्रियं क्वचित् ।यद्यप्रियं कामयन्ति न रातीशो हितो हि सः''॥ इति तन्त्रभागवते ॥ ३९,४० ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{VerseBlock
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V41
| |
| | document_id = BTN
| |
| | chapter_id = BTN_C06
| |
| | section_id = BTN_C06_S09
| |
| | adhikarana =
| |
| | verse_type = shloka
| |
| | verse_line1 = मघवन् यात भद्रं वो दध्यञ्चमृषिसत्तमम् ।
| |
| | verse_line2 = विद्याव्रततपःसारं गात्रं याचत मा चिरम् ॥ ४१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये षष्ठस्कन्धे नवमोऽध्यायः ॥}}
| |
| | |
| {{Commentary
| |
| | verse_id = BTN_C06_S09_V41
| |
| | id = BTN_C06_S09_V41_B1
| |
| | name = Bhashyam
| |
| | label = Bhashyam
| |
| | text =
| |
| 'समर्था अपि याचन्ते देवा मुन्यादिकान्क्वचित् ।आज्ञयैव हरेस्तेषां यशोऽर्थमपि नान्यथा''॥ इति च ॥ ४१ ॥
| |
| }}
| |
| | |
| | |
| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |