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| | #REDIRECT [[Bhagavatatatparyanirnaya#BTN_C04_S04]] |
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| == चतुर्थोऽध्यायः ==
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| | verse_line1 = यत्पादपद्मं महतां मनोऽलिभि-
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| | verse_line2 = र्निषेवितं ब्रह्मरसासवार्थिभिः ।
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| | verse_line3 = लोकस्य यद् वर्षति चाशिषोऽर्थिनः
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| | verse_line4 = तस्मै भवान् द्रुह्यति विश्वबन्धवे ॥ १५ ॥
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| ब्रह्मरसासवार्थिभिः शिष्याणां मनोऽलिभिः ।'सनकादयो रुद्रशिष्यास्तेषामन्ये तु योगिनः ।ब्रह्मशिष्यस्तथा रुद्रो ब्रह्मा नारायणस्य च''॥ इति ब्राह्मे ॥ १५ ॥
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| | verse_line1 = किं वा शिवाख्यमशिवं न विदुस्त्वदन्ये
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| | verse_line2 = ब्रह्मादयस्तमवकीर्य जटाः श्मशाने ।
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| | verse_line3 = तन्माल्यभस्मनृकपाल्यवसत्पिशाचै-
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| | verse_line4 = र्ये मूर्धभिर्दधति तच्चरणावसृष्टम् ॥ १६ ॥
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| ब्रह्मादयो ब्रह्मपुत्राः ।'सुपर्णशेषप्राणेशब्रह्मविष्णून् गिरं श्रियम् ।ऋते नमति नो रुद्रं क एव पुरुषार्थभाक्''॥ इति गारुडे ॥ १६ ॥
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| | verse_line1 = कर्म प्रवृत्तं च निवृत्तमप्युत
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| | verse_line2 = वेदे विविच्योभयलिङ्गमाश्रितम् ।
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| | verse_line3 = विरोधि तद् यौगपदेककर्तरि
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| | verse_line4 = द्वयं यथाऽऽब्रह्मणि कर्म नर्च्छति ॥ २० ॥
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| {{AuthorNote| text = ॥ इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीभागवततात्पर्यनिर्णये चतुर्थस्कन्धे चतुर्थोऽध्यायः ॥}}
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| | text =
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| आब्रह्मणि ब्रह्मग्ज्ञानिनि ।'आब्रह्मा स्थितधीर्जीवन्मुक्तश्चेत्यभिधीयते ।यस्तस्य न निवृत्तं च प्रवृत्तं कर्म चेष्यते ॥यत्तु देवाः प्रकुर्वन्ति स महानियमः स्मृतः ।स्वर्गाद्यर्थं प्रवृत्तं स्यान्निवृत्तं मुक्तये तु यत् ॥स महानियमो नाम कर्म यत्त्वाधिकारिकम् ।महतो नियमाद्विष्णोः प्रीत्या मुक्तौ सुखोन्नतिः ।केचिन्निवृत्तमित्याहुर्महानियममप्युत''॥ इति भविष्यत्पुराणे ॥'यदि देवाश्च ऋष्याद्या निन्द्यन्ते यत्र कुत्रचित् ।न तावता गुणैर्हीनाः स्थितप्रज्ञा हि ते मताः ।यथायोग्यं तु तात्पर्यं निन्दाया अन्यदेव तु''॥ इति गारुडे ॥ २० ॥
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| [[Category:Bhagavatatatparyanirnaya]] | |