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Mahabharatatatparyanirnaya/Part2: Difference between revisions

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<div class="gr-doc-title">श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णयः</div>
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__TOC__


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{{Adhyaya
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| verse_line1 = औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।रामस्य विश्वाधिपतेः सुशिष्यं चक्रे चमूपं धृतराष्ट्रपुत्रः ॥ १॥
| verse_line1 = औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।
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| verse_line2 = भीमभीष्ममुखे वीक्ष्य प्राह वासविरच्युतम् ॥ १॥
 
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| verse_line1 = कर्णोऽपि भीष्मानुमतो धनुष्मान् युद्धोद्यतोऽभूत् तदसत्कृतः पुरा ।तस्मिन् स्थितेऽनात्तधनुस्तदैव(अनात्तधनुस्तथैव) रथं समास्थाय गुरुं समन्वयात् ॥ २॥
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| verse_line1 = ‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।
 
| verse_line2 = इत्युक्तः स तथा चक्रे पार्थोऽपश्यच्च बान्धवान्(पार्थोऽपश्यत् स्वबान्धवान्) ।
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| verse_line3 = विससर्ज धनुः पापाशङ्की तत्राऽह माधवः ॥ २॥
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| verse_line1 = द्रोणो वृतो धार्तराष्ट्रेण धर्मसुतग्रहे तेन कृते प्रतिश्रवे ।ज्ञात्वा यत्ताः पाण्डवास्तं समीयुर्युद्धाय तत्राभवदुग्रयुद्धम् ॥ ३॥
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| verse_line1 = स्वधर्मो दुष्टदमनं धर्मज्ञानानुपालनम् ।
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| verse_line2 = क्षत्रियस्य तमुत्सृज्य निन्दितो यात्यधो ध्रुवम् ॥ ३॥
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| verse_line1 = पतत्रिभिस्तत्र दुधाव शात्रवान् द्रोणो धनुर्मण्डलमन्त्रनिस्सृतैः ।तमाससादाऽशु वृकोदरो नदंस्तमासदन्(नदन् समासदन्) द्रौणिकृपौ च मद्रराट् ॥ ४॥
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| verse_line1 = ‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।
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| verse_line2 = स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ ॥ ४॥ (भ.गी.१८.४६)
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| verse_line1 = स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान् ।ववार तं मद्रपतिस्तयोरभूद् रणो महांस्तत्र गदां समाददे ।शल्योऽथ भीमोऽभिययौ गदाधरस्तमेतयोरत्र(गदाधरः समेतयोः) बभूव सङ्गरः ॥ ५॥
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| verse_line1 = नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) ।
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| verse_line2 = देहस्य सर्वथा नाशादनाशाच्चेतनस्य च ॥ ५॥
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| verse_line1 = उभावजेयौ गदिनामनुत्तमावतुल्यवीर्यौ प्रवरौ बलीयसाम् ।विचेरतुश्चित्रतमं प्रपश्यतां मनोहरं तावभिनर्दमानौ ।गदाप्रपाताङ्कितवज्रगात्रौ ददर्श लोकोऽखिल एव तौ रणे ॥ ६॥
 
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| verse_line1 = सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः ।
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| verse_line2 = प्रकाशनियमौ चैव ब्रह्मेशादिक्षरस्य च ।
| verse_line1 = गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।भीमोऽपि कोपात् प्रचलत्पदः क्षितौ निधाय जानुं सहसोत्थितः क्षणात् ॥ ७॥
| verse_line3 = अक्षरप्रकृतेश्चैव मत्त एव नचान्यतः ॥ ६॥
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| verse_line1 = न मे कुतश्चित् सर्गाद्याः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।
| verse_line2 = अतः समाधिकाभावान्मम मद्वशमेव च ॥ ७॥
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| verse_line1 = ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।
| verse_line2 = अस्वातन्त्र्यान्निवृत्तौ च मामनुस्मर युद्ध्य च ॥ ८॥
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| verse_line1 = ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।
| verse_line2 = अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ९॥
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| verse_line1 = तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
| verse_line2 = भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १०॥ (भ.गी.१२.६-७)
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| verse_line1 = मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।
| verse_line2 = मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः ॥ ११॥ (भ.गी.९.४)
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| verse_line1 = (सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।
| verse_line2 = अस्पृष्टाखिलदोषैकनित्यसत्तनुरव्ययः ।
| verse_line3 = इत्युक्तो वासविः प्राह व्याप्तं ते दर्शयेश मे(व्याप्तिं मे दर्शयस्व मे) ॥ १२॥
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| verse_line1 = अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।
| verse_line2 = देशतः कालतश्चैव पूर्णं सर्वगुणैः सदा ।
| verse_line3 = दर्शयामास भगवान् यावत्यर्जुनयोग्यता ॥ १३॥
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| verse_line1 = तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।
| verse_line2 = पूर्ववद् दर्शयामास पुनश्चैनमशिक्षयत् ॥ १४॥
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| verse_line1 = ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः ।
| verse_line2 = तेनानुशिष्टः पार्थस्तु सशरं धनुराददे ॥ १५॥
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| verse_line1 = अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् ।
| verse_line2 = समितिं धार्तराष्ट्राणां ते तं सर्वे न्यवारयन् ।
| verse_line3 = ससृजुः शरवृष्टिं च भीमसेनस्य मूर्धनि ॥ १६॥
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| verse_line1 = क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि ।
| verse_line2 = इत्येवाप्रहरत्यस्मिन् शत्रुभिः शरविक्षते ॥ १७॥
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| verse_line1 = अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ।
| verse_line2 = सौभद्रप्रमुखा वीराः सर्वे पाण्डुसुतात्मजाः ॥ १८॥
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| verse_line1 = अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।
| verse_line2 = ररक्ष तान् वायुसुतो विसृजञ्छरसञ्चयान् ॥ १९॥
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| verse_line1 = तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।
| verse_line2 = भग्नास्तानथ गाङ्गेयो दिव्यास्त्रविदधारयत्(दिव्यास्त्रं व्यदधारयत्, दिव्यास्त्रविदधारयत्)) ॥ २०॥
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| verse_line1 = अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।
| verse_line2 = द्रोणपार्षतयोश्चैव शैनेयकृतवर्मणोः ॥ २१॥
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| verse_line1 = दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।
| verse_line2 = नकुलस्य विकर्णस्य कार्ष्णेयैर्दुर्मुखादिनाम् ॥ २२॥
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| verse_line1 = वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।
| verse_line2 = जिता विनैव शैनेयं सोऽजयद्धृदिकात्मजम् ॥ २३॥
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| verse_line1 = अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।
| verse_line2 = विद्राप्यमाणं स्वबलं स्थापयामास मारुतिः ॥ २४॥
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| verse_line1 = द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।
| verse_line2 = केवलं बाहुवीर्येण व्यजयद् भीमविक्रमः ।
| verse_line3 = हत्वोत्तरं मद्रराजो व्यद्रावयदनीकिनीम् ॥ २५॥
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| verse_line1 = अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।
| verse_line2 = ससौमदत्तिं सौभद्रसहायोऽर्जुन आसदत् ॥ २६॥
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| verse_line1 = सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।
| verse_line2 = द्रावयामास पाञ्चालान् पश्यतः सव्यसाचिनः ॥ २७॥
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| verse_line1 = तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।
| verse_line2 = दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा क्रुद्धः सेनामपाहरत् ॥ २८॥
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| verse_line1 = रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।
| verse_line2 = स कृष्णाद्यैः सान्त्वितश्च पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ २९॥
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| verse_line1 = एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।
| verse_line2 = कृत्वाऽपि पाण्डवैर्युद्धं तत् कर्तुमकृतोपमम् ॥ ३०॥
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| verse_line1 = कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।
| verse_line2 = यावत् त्वं योत्स्यसे तावन्न योत्स्यामीति निर्गते ॥ ३१॥
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| verse_line1 = कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।
| verse_line2 = प्रतिजज्ञेऽकरोत् तच्च पुनश्चास्त्रविदां वरः ॥ ३२॥
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| verse_line1 = सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।
| verse_line2 = स्नेहेन यन्त्रितौ तस्य गौरवाच्चान्ववर्तताम् ॥ ३३॥
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| verse_line1 = बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।
| verse_line2 = तान्यम्बरे विमानस्था ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ।
| verse_line3 = अपश्यन् देवताः सर्वा गन्धर्वाप्सरसोऽसुराः ॥ ३४॥
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| verse_line1 = धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।
| verse_line2 = चक्रे युद्धानि सुबहून्यजेयः शत्रुभी रणे ॥ ३५॥
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| verse_line1 = तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।
| verse_line2 = दृष्ट्वा चक्रं तथोद्यम्य बाहुं भीष्माय जग्मिवान् ॥ ३६॥
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| verse_line1 = तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।
| verse_line2 = प्रार्थितो रथमारूढः पुनः शङ्खमपूरयत् ॥ ३७॥
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| verse_line1 = ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।
| verse_line2 = अयत्नेन जितश्चैव फल्गुनेनाऽपगासुतः ॥ ३८॥
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| verse_line1 = अयुतानि बहून्याजौ रथानां निजघान च ।
| verse_line2 = जिताः सेनापहारं च चक्रुर्भीष्ममुखास्ततः ॥ ३९॥
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| verse_line1 = कदाचिदग्रगो भीमो भीष्मद्रोणौ विसारथी ।
| verse_line2 = कृत्वा विद्राप्य तानश्वान् भित्वा व्यूहं विवेश ह ॥ ४०॥
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| verse_line1 = पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।
| verse_line2 = यतमानौ महेष्वासौ धार्तराष्ट्रान् जघान ह ।
| verse_line3 = पञ्चविंशद्धतास्तत्र धार्तराष्ट्रा महाबलाः ॥ ४१॥
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| verse_line1 = भगदत्तद्रौणिकृपशल्यदुर्योधनादयः ।
| verse_line2 = सर्वे जिता द्राविताश्च सेना च बहुला हता ॥ ४२॥
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| verse_line1 = विरथो व्यायुधश्चैव दृढवेधविमूर्च्छितः ।
| verse_line2 = कृतो दुर्योधनः सर्वराज्ञां भीमेन पश्यताम् ॥ ४३॥
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| verse_line1 = ततोऽपहारं सैन्यस्य जिताश्चक्रुश्च कौरवाः ।
| verse_line2 = दुर्योधनो निशायां च ययौ यत्र नदीसुतः ।
| verse_line3 = पीडितो भीमबाणैश्च क्षरद्गात्रो ननाम तम् ॥ ४४॥
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| verse_line1 = उवाच हेतुना केन वयं जीवाम (क्षीयाम, जीयाम) सर्वदा ।
| verse_line2 = पाण्डवाश्च जयं नित्यं लब्ध्वा हर्षमवाप्नुवन् ॥ ४५॥
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| verse_line1 = तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः ।
| verse_line2 = विशेषतः केशवेन पालितास्तत्प्रियाः सदा ॥ ४६॥
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| verse_line1 = मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः ।
| verse_line2 = स्थिता देवास्तदाऽपश्यद् ब्रह्मैको हरिमम्बरे ॥ ४७॥
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| verse_line2 = प्रार्थयामास तेनोक्तं देवानामवदद् विभुः ॥ ४८॥
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| verse_line1 = अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।
| verse_line2 = आज्ञापयति वः सर्वान् प्रादुर्भावाय भूतले ।
| verse_line3 = स्वयं च देवकीपुत्रो भविष्यति जगत्पतिः(जगत्प्रभुः) ॥ ४९॥
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| verse_line1 = एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः ।
| verse_line2 = अभवन् पाण्डवाद्यास्ते सेन्द्राः सह मरुद्गणाः ॥ ५०॥
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| verse_line1 = स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।
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| verse_line1 = इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।
| verse_line2 = प्रातर्निर्यातयामास सेनां युद्धाय दुर्मतिः ॥ ५२॥
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| verse_line1 = दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।
| verse_line2 = भीष्ममग्रे निधायैव ययौ युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ ५३॥
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| verse_line1 = तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् ।
| verse_line2 = पाण्डवानां कुरूणां च शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ५४॥
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| verse_line1 = धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।
| verse_line2 = सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा विकर्णपूर्वानहनच्च सेनाम् ॥ ५५॥
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| verse_line1 = ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।
| verse_line2 = तं भीमसेनः सूतहीनं विधाय व्यद्रावयच्छत्रुगणाञ्छरौघैः ॥ ५६॥
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| verse_line1 = अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।
| verse_line2 = ववर्षतुः शरवर्षैरथोग्रैस्तत्राकरोद् विरथं द्रौपदिस्तम् ॥ ५७॥
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| verse_line1 = तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।
| verse_line2 = तं भीमसेनो विरथायुधं च कृत्वा बाणेनाहनज्जत्रुदेशे ॥ ५८॥
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| verse_line1 = विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।
| verse_line2 = कृपो ययौ मारुतिर्धार्तराष्ट्रीं व्यद्रावयत् पृतनां बाणपूगैः ॥ ५९॥
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| verse_line1 = अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।
| verse_line2 = रथान् रणे पञ्चविंशत्सहस्रान् निनाय वैवस्वतसादनाय ॥ ६०॥
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| verse_line1 = तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।
| verse_line2 = तमभ्ययात् सौमदत्तिस्तयोश्च सुयुद्धमासीदतिभैरवास्त्रम् ॥ ६१॥
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| verse_line1 = पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे ।
| verse_line2 = समर्पयामास शरीरदारणैः शरैरुभौ तौ विरथौ च चक्रतुः ॥ ६२॥
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| verse_line1 = अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना ।
| verse_line2 = आसादितं वीक्ष्य रथं स्वकीयमारोपयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ६३॥
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| verse_line1 = सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।
| verse_line2 = अपाद्रवद् वासविर्भीष्ममाजौ समाससादाऽशु महेन्द्रकल्पः ॥ ६४॥
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| verse_line1 = उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।
| verse_line2 = ततक्षतुर्नाकसदां समक्षं महाबलौ संयति जातदर्पौ ॥ ६५॥
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| verse_line1 = स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।
| verse_line2 = सेनामपाहृत्य ययौ निशायामासादितायामथ पाण्डवाश्च ॥ ६६॥
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| verse_line1 = ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।
| verse_line2 = सेने तदा सारथिहीनमाशु भीष्मं कृत्वा मारुतिरभ्ययात् परान् ।
| verse_line3 = निपातितास्तेन रथेभवाजिनः प्रदुद्रुवुश्चावशिष्टाः समस्ताः ॥ ६७॥
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| verse_line1 = दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।
| verse_line2 = महागजस्थो भगदत्त आगादायन् बाणं भीमसेनेऽमुचच्च(भीमसेने मुमोच) ॥ ६८॥
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| verse_line1 = तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।
| verse_line2 = घटोत्कचोऽभ्यद्रवदाशु वीरः स्वमायया हस्तिचतुष्टयस्थः ॥ ६९॥
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| verse_line1 = स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।
| verse_line2 = अमोघमन्यत्र हरेर्मरुत्सुतः पुत्रे याते न स्वयमभ्यधावत् ॥ ७०॥
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| verse_line1 = अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।
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| verse_line3 = यदा स्वपुत्रेण जितो भवेत् स किम्वात्मनेत्येव तदा प्रवेत्तुम् ॥ ७१॥
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| verse_line1 = स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।
| verse_line2 = ऋते भीमं वाऽर्जुनं नास्त्रमेष प्रमुञ्चतीत्येव हि वेद भीमः ॥ ७२॥
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| verse_line1 = चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।
| verse_line2 = नानाप्रहारैर्वितुदंश्चकार सन्दिग्धजीवौ जगतां समक्षम् ॥ ७३॥
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| verse_line1 = गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।
| verse_line2 = महाकायं भीमममुष्य पृष्ठगोपं च वाय्वात्मजमत्रसन् भृशम् ।
| verse_line3 = ते भीतभीताः पृतनापहारं कृत्वाऽपजग्मुः शिबिराय शीघ्रम् ॥ ७४॥
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| verse_line1 = दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।
| verse_line2 = तत्राऽसदन्नागसुतासमुद्भवः पार्थात्मजः शाकुनेयान् षडेकः ॥ ७५॥
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| verse_line1 = तैः प्रासहस्तैः क्षतकायोऽतिरूढकोपः स खड्गेन चकर्त तेषाम् ।
| verse_line2 = शिरांसि वीरो बलवानिरावान् भयं दधद् धार्तराष्ट्रेषु चोग्रम् ॥ ७६॥
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| verse_line1 = दृष्ट्वा तमुग्रं धृतराष्ट्रपुत्रो दिदेश रक्षोऽलम्बुसनामधेयम् ।
| verse_line2 = जह्यार्जुनिं क्षिप्रमिति स्म तच्च समासदन्नागसुतातनूजम्(नागसुतासमुद्भवम्) ॥ ७७॥
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| verse_line1 = तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं मायायुजोर्वीर्यवतोर्महाद्भुतम् ।
| verse_line2 = ससादिनोऽश्वान् स तु राक्षसोऽसृजत् ते पार्थपुत्रस्य च सादिनोऽहनन्(अहनत्) ।
| verse_line3 = ततस्त्वनन्ताकृतिमाप्तमार्जुनिं सुपर्णरूपोऽहनदाशु राक्षसः ॥ ७८॥
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| verse_line1 = हतं निशम्याऽर्जुनिमुग्रपौरुषो ननाद कोपेन वृकोदरात्मजः ।
| verse_line2 = चचाल भूर्नानदतोऽस्य रावतः ससागरागेन्द्रनगा भृशं तदा ॥ ७९॥
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| verse_line1 = अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।
| verse_line2 = पराद्रवन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाः सर्वास्तमाराथ सुयोधनो नृपः ॥ ८०॥
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| verse_line1 = स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।
| verse_line2 = हतावशेषेषु च विद्रवत्सु घटोत्कचोऽभ्याहनदाशु तं नृपम् ॥ ८१॥
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| verse_line1 = स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।
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| verse_line3 = तस्थौ कथञ्चिद् भुवि पात्यमानः पुनः शरानप्यसृजत् सुयोधने ॥ ८२॥
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| verse_line1 = चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।
| verse_line2 = द्रोणादयो वीक्ष्य रिरक्षिषन्तः सुयोधनं प्रापुरमित्रसाहाः ॥ ८३॥
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| verse_line1 = स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।
| verse_line2 = ववर्ष बाणैर्गगनं समाश्रितो घटोत्कचः स्थूलतमै सुवेगैः ॥ ८४॥
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| verse_line1 = तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।
| verse_line2 = द्रोणोऽत्र भीमप्रहितैः शरोत्तमैः सुपीडितः प्राप्तमूर्च्छः पपात ॥ ८५॥
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| verse_line1 = द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।
| verse_line2 = निवार्यमाणांस्तु वृकोदरेण घटोत्कचस्तान् प्रववर्ष सायकैः ॥ ८६॥
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| verse_line1 = तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।
| verse_line2 = भूमौ च भीमेन शरौघपीडिताः पेतुर्नेदुः प्राद्रवंश्चातिभीताः ॥ ८७॥
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| verse_line1 = सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।
| verse_line2 = घटोत्कचश्चानदतां महास्वनौ नादेन लोकानभिपूरयन्तौ ॥ ८८॥
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| verse_line1 = दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।
| verse_line2 = जयोपायं भैमसेनेरपृच्छत् स्वस्यैव स प्राह न तं व्रजेति ॥ ८९॥
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| verse_line1 = प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।
| verse_line2 = स प्राप्य हैडिम्बमयोधयद् बली स चार्दयामास सकुञ्जरं तम् ॥ ९०॥
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| verse_line1 = तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।
| verse_line2 = प्रगृह्य शूलं प्रबभञ्ज जानुमारोप्य देवा जहृषुस्तदीक्ष्य ॥ ९१॥
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| verse_line1 = तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।
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| verse_line2 = सोऽभ्यर्दिताश्वोऽथ गदां प्रगृह्य हन्तुं नृपं तं सगजं समासदत् ॥ ९३॥
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| verse_line2 = कृष्णेनास्त्रं वैष्णवं तद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) सहार्जुनेनापययौ स भीतः ॥ ९४॥
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| verse_line2 = भीष्मः सेनामपहृत्यापयातो दुर्योधनस्तं निशि चोपजग्मिवान् ॥ ९५॥
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| verse_line2 = शक्त्या हनिष्यामि परानिति स्म चक्रे च तत् कर्म तथा परेद्युः ॥ ९६॥
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| verse_line1 = युधिष्ठिरो भीष्मपराक्रमेण भीतो भीष्मं स्ववधोपायमेव ।
| verse_line2 = प्रष्टुं ययौ निशि कृष्णोऽनुजाश्च तस्यान्वयुस्तं स पितामहो यत् ॥ १०७॥
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| verse_line1 = भीमार्जुनौ शक्नुवन्तावपि स्म नर्तेऽनुज्ञां हन्तुमिमं समैच्छताम् ।
| verse_line2 = पूज्यो यतो भीष्म उदारकर्मा कृष्णोऽप्ययात्(कृष्णोऽप्यायात्) तेन हि पाण्डवार्थे ॥ १०८॥
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| verse_line1 = प्राप्यानुज्ञां भीष्मतस्ते वधाय शिखण्डिनं तद्वचसाऽग्रयायिनम् ।
| verse_line2 = कृत्वा परेद्युर्युधये विनिर्गता भीष्मं पुरस्कृत्य तथा परेऽपि(तथाऽपरेऽपि) ॥ १०९॥
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| verse_line1 = शिखण्डिनो रक्षकः फल्गुनोऽभूद् भीष्मस्य दुःशासन आस चाग्रे ।
| verse_line2 = अन्ये च सर्वे जुगुपुर्भीष्ममेव न्यवारयन् भीमसेनादयस्तान् ॥ ११०॥
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| verse_line1 = भीष्माय यान्तं युयुधानमाजौ न्यवारयद् राक्षसोऽलम्बुसोऽथ ।
| verse_line2 = तं वज्रकल्पैरतुदद् वृष्णिवीरः शरैः स मायामसृजत् तदोग्राम् ॥ १११॥
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| verse_line1 = अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।
| verse_line2 = तस्मिन् गते युयुधानो रथेन ययौ भीष्मं पार्थमन्वेव धन्वी ॥ ११२॥
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| verse_line1 = द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।
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| verse_line1 = स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।
| verse_line2 = न्यवारयत् फल्गुनं योद्धुकामं पार्थश्च देवव्रतमाससाद ॥ ११४॥
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| verse_line1 = युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।
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| verse_line1 = तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।
| verse_line2 = प्रापुर्भीष्मं द्रौपदेयाश्च सर्वे तथा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजः ॥ ११६॥
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| verse_line1 = धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।
| verse_line2 = हत्वाश्वसूतं (हताश्वसूतं) सगणं द्रावयित्वा समासदद् भीष्ममेवाऽशु वीरः ॥ ११७॥
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| verse_line1 = गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।
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| verse_line1 = स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।
| verse_line2 = भीष्मं पार्थः सायकाश्चास्य तस्मिन् ससज्जिरे पर्वतेष्वप्यसक्ताः(पर्वतेष्वप्यमुक्ताः) ॥ १२०॥
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| verse_line1 = अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।
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| verse_line1 = स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।
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| verse_line1 = धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।
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| verse_line1 = व्यासदत्तोरुविज्ञानात् सञ्जयादखिलं पिता ।
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{इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये भीष्मपातो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः}
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| verse_line1 = स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान्
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| verse_line2 = न्यवारयंस्त्वाष्ट्रमस्त्रं स तेषु व्यवासृजन्मोहनायाऽशु वीरः २०॥
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| verse_line1 = स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।जगाद दूरं समराद् विनीयतां पार्थस्ततो धर्मसुतं ग्रहीष्ये १३॥
| verse_line1 = तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।
| verse_line2 = जघ्नुस्तदा वासविस्तान् विसृज्य प्राग्ज्योतिषं हन्तुमिहाभ्यगाद् द्रुतम् २१॥
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| verse_line1 = विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।
| verse_line2 = सञ्चोदयामास (सम्बोधयामास, प्रचोदयामास) रथाय तस्य चक्रेऽपसव्यं हरिरेनमाशु २२॥
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| verse_line1 = समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।अयोधयत् तान् च तत्र गत्वा भीमो गजानीकमथात्र चावधीत् १५॥
| verse_line1 = मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।
| verse_line2 = प्राप्तुं शशाकाथ शरैः सुतीक्ष्णैरभ्यर्दयामास नृपं वासविः २३॥
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| verse_line1 = निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।प्राग्ज्योतिषो धार्तराष्ट्रार्थितस्तं समासदत् सुप्रतीकेन धन्वी १६॥
| verse_line1 = अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।
| verse_line2 = अथो चकर्तास्य धनुः स पार्थः स वैष्णवास्त्रं च तदाऽङ्कुशेऽकरोत् २४॥
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| verse_line1 = विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।सौभद्रमुख्याश्च गजं तमभ्ययुश्चिक्षेप तेषां स रथानथाम्बरे १७॥
| verse_line1 = तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।
| verse_line2 = तदंसदेशस्य तु वैजयन्ती बभूव मालाऽखिललोकभर्तुः २५॥
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| verse_line1 = शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।स्थितेषु भीमे च विभीषिताश्वान् संयम्य युद्ध्यत्यपि कृष्ण ऐक्षत् १८॥
| verse_line1 = दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।
| verse_line2 = ऊचे तमाहाऽशु जगन्निवासो मयाऽखिलं धार्यते सर्वदैव २६॥
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| verse_line1 = सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।याम्यार्जुनेनैव तदस्त्रमात्मनः स्वीकर्तुमन्येन वरादधार्यम् १९॥
| verse_line1 = न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।
| verse_line2 = स्थितोऽस्मि मोक्षप्रलयस्थितीनां सृष्टेश्च कर्ता क्रमशः स्वमूर्तिभिः ।
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| verse_line1 = इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।न्यवारयंस्त्वाष्ट्रमस्त्रं तेषु व्यवासृजन्मोहनायाऽशु वीरः २०॥
| verse_line1 = स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।
| verse_line2 = अस्त्रं मदीयं वरमस्य चादामवध्यतां यावदस्त्रं ससूनोः(स्वसूनोः, अस्त्रं च सूनोः) २८॥
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| verse_line1 = वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु ।विष्णोरभीष्टं वधमार्जुनेस्तदा विज्ञाय शक्तोऽपि नचात्यवर्तत ४१॥
| verse_line1 = व्यासस्तदा तानमितात्मवैभवो युधिष्ठिरादीन् ग्लपितानबोधयत् ।
| verse_line2 = विजित्य संशप्तकपूगमुग्रो निशागमे वासविराप साच्युतः ४९॥
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| verse_line1 = जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु ।प्रविश्य वीरः स धनञ्जयात्मजो विलोलयामास परोरुसेनाम् ४२॥
| verse_line1 = निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः
| verse_line2 = जयद्रथस्यैव वधे निशायां स्वप्नेऽनयत् तं गिरिशान्तिकं हरिः ५०॥
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| verse_line1 = स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः ।रुद्धश्चचारारिबलेष्वभीतः शिरांसि कृन्तंस्तदनुव्रतानाम् ४३॥
| verse_line1 = स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् ।
| verse_line2 = अप्यच्युतो गुरुद्वारा प्रसादकृदहं त्विति ५१॥
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| verse_line1 = स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे ।बृहद्बलं चोत्तमवीर्यकर्मा वरं रथानामयुतं च पत्रिभिः ४४॥
| verse_line1 = ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा ।
| verse_line2 = प्रापयित्वैनमेवैतत्प्रसादादस्त्रमुल्बणम् ।
| verse_line3 = चक्रे तदर्थमेवास्य रक्षां चक्रे तदात्मिकाम् ५२॥
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| verse_line1 = द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः ।सम्मन्त्र्य कर्णं पुरतो निधाय चक्रुर्विचापाश्वरथं क्षणेन ४५॥
| verse_line1 = सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः ।
| verse_line2 = योजयित्वा रथं प्रातः सोऽर्जुनो युद्धमभ्ययात् ५३॥
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| verse_line1 = कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः ।सञ्चर्मखड्गं रथचक्रमस्य प्रणुद्य हस्तस्थितमेव तस्थुः(चक्रुः) ४६॥
| verse_line1 = श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् ।
| verse_line2 = त्रातास्म्यहं सर्वथेति प्रतिज्ञां कृत्वा द्रोणो व्यूहमभेद्यमातनोत् ५४॥
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| verse_line1 = भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी ।दौःशासनिस्तौ युगपच्च मम्रतुर्गदाभिघातेन मिथोऽतिपौरुषौ ४७॥
| verse_line1 = स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः ।
| verse_line2 = पृष्ठे कर्णद्रौणिकृपैः सशल्यैर्जयद्रथं गुप्तमधात् परैश्च ५५॥
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| verse_line1 = तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः ।विजित्य सर्वानपि सैन्धवादीन् युधिष्ठिरस्यानुमते न्यषीदत् ४८॥
| verse_line1 = अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन ।
| verse_line2 = विजित्य दुर्मर्षणमग्रतोऽभ्ययाद्(दुर्मर्षणमग्रतो ययौ) द्रोणं सुधन्वा गुरुमुग्रपौरुषः ५६॥
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| verse_line1 = प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः ।
| verse_line2 = रथं मनोवेगमथानयद्धरिर्यथा शराः पेतुरमुष्य पृष्ठतः ५७॥
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| verse_line1 = सुदक्षिणं काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च ।
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| verse_line1 = स द्रौणिकर्णप्रमुखैर्धनञ्जयो युयोध ते चैनमवारयञ्छरैः ।बभूव युद्धं तदतुल्यमद्भुतं जयद्रथार्थेऽद्भुतवीर्यकर्मणाम् ७१॥
| verse_line1 = विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् ।
| verse_line2 = प्रायो रणे मारुतसूनुनैव हतप्रवीरा मृदिताः पराद्रवन् ७९॥
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| verse_line1 = पार्थे प्रविष्टे कुरुसैन्यमध्यं द्रोणोऽविशत् पाण्डवसैन्यमाशु ।स तद्रथानीकमुदारवेगैः शरैर्विधूय न्यहनच्च वीरान् ७२॥
| verse_line1 = अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् ।
| verse_line2 = स पीडितस्तेन शरैः सुतेजनैः(सुतैजसैः) क्षणाददृश्यत्वमवाप मायया ८०॥
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| verse_line1 = स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् ।प्रपातयन् वीरशिरांसि बाणैर्युधिष्ठिरं चाऽसददुग्रवीर्यः ७३॥
| verse_line1 = सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः ।
| verse_line2 = अस्त्रज्ञतामात्मनिकेशवाज्ञया सन्दर्शयन्नागतधर्मसङ्कटः ८१॥
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| verse_line1 = नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् ।निवारितस्तेन शिरः शरेण चकर्त पाञ्चालसुतस्य विप्रः ७४॥
| verse_line1 = त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः ।
| verse_line2 = ते बाणवर्यास्तददृश्यवेधिनो रक्षो विदार्याऽविविशुर्धरातलम् ८२॥
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| verse_line1 = निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् ।स शक्तिस्तेन विधाय सङ्गरं निरायुधो व्यश्वरथः कृतः क्षणात् ७५॥
| verse_line1 = तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् ।
| verse_line2 = ततस्तु भीमो द्विषतां वरूथिनीं विद्रावयामास शरैः सुमुक्तैः ८३॥
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| verse_line1 = स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः ।माद्रीसुतस्यावरजस्य यानमारुह्य वेगादपजग्मिवांस्ततः ७६॥
| verse_line1 = तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् ।
| verse_line2 = अलम्बुसं प्राप तदा घटोत्कचः परस्परं तौ रथिनावयुद्ध्यताम् ८४॥
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| verse_line1 = द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः ।समासदन् कैकयाश्चैव पञ्च समार्दयन् बाणगणैश्च सर्वशः ७७॥
| verse_line1 = घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः ।
| verse_line2 = ततस्तु तं भीमसुतो निगृह्य निपात्य भूमौ प्रददौ प्रहारम् ८५॥
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| verse_line1 = स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः ।निनाय लोकं परमर्कमण्डलं व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ७८॥
| verse_line1 = पदा शिरस्येव पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् ।
| verse_line2 = तस्मिन् हते भैमसेनिः कुरूणां व्यद्रावयद् रथवृन्दं समन्तात् ८६॥
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| verse_line1 = तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् ।
| verse_line2 = ददौ वरं तस्य हि पूर्वमच्युतः प्रीतः स्तुत्या सर्वजयं मुहूर्ते ८७॥
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| verse_line1 = स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च ।
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| verse_line2 = तद् याहि जानीहि तमद्य पार्थं यदि स्म जीवत्यसहाय एषः ९३॥(हृषीकेशतीर्थीये तु `गाण्डीवस्य' इति पठ्यते ।
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| verse_line1 = निवारयन्तं तमसह्यविक्रमं निहत्य बाणैः समरे सात्यकिः ।
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| verse_line1 = तयोरभूद् युद्धमतीव घोरं चिरं विचित्रं च महद् विभीषणम् ।
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| verse_line1 = निवारयन्तं तमसह्यविक्रमं निहत्य बाणैः समरे स सात्यकिः ।विलोडयामास(विलोलयामास) बलं कुरूणां निघ्नन् गजस्यन्दनवाजिपत्तिनः ९९॥
| verse_line1 = तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् ।
| verse_line2 = ततो विमुच्यात्र हयानपाययद्धरिस्तदा वासविरर्दयत् परान् १०७॥
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| verse_line1 = स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् ।समासदत् केशवफल्गुनौ च बली तमाराऽशु च यूपकेतुः १००॥
| verse_line1 = युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः ।
| verse_line2 = प्रचोदिते तेन रथे स्थितः पुनस्तथैव बीभत्सुररीनयोधयत् १०८॥
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| verse_line1 = शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह ।
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| verse_line1 = मया नियुक्तश्च गतः सात्यकिर्भारं तस्याधिकमेव मन्ये ।
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| verse_line1 = इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् ।
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| verse_line1 = अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् ।
| verse_line2 = रक्ष्यस्त्वमेवात्र मतो मयाद्य (ममाद्य) द्रोणो ह्ययं यतते त्वां ग्रहीतुम् ११२॥
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| verse_line1 = इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे ।
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| verse_line1 = यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी ।
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| verse_line1 = तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः ।
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| verse_line1 = भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके ।
| verse_line2 = भीतेषु सर्वनृपतिष्वमुमाप तूर्णं कर्णो विकर्णमुखरा अपि धार्तराष्ट्राः १३५॥
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| verse_line1 = तयोरभूद् युद्धमतीव रौद्रं जयैषिणोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः ।अत्यद्भुतं सन्ततबाणवर्षतमनारतं सुचिरं निर्विशेषम् १२८॥
| verse_line1 = हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः ।
| verse_line2 = घोरैः शरैः पुनरपि स्म समर्द्यमानः कर्णोऽपयानमकरोद् द्रुतमेव भीमात् १३६॥
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| verse_line1 = आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः ।
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| verse_line1 = स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे ।अभ्यागमत् तेन निवारितः शरैः क्षणेन चक्रे विरथाश्वसूतम् ।स गाढविद्धस्तु वृकोदरेण रणं विसृज्यापययौ क्षणेन १३२॥
| verse_line1 = एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः ।
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| verse_line1 = दृष्ट्वैव कृष्णविजयौ परमप्रहृष्टस्ताभ्यां निरीक्षित उत प्रतिभाषितश्च ।सञ्ज्ञां नृपस्य स ददावपि सिंहनादान् श्रुत्वा परां मुदमवाप स चाग्र्यबुद्धिः १३४॥
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| verse_line1 = तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ ।
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| verse_line1 = शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् ।
| verse_line2 = दत्त्वा स्वकीयरथमेव विरोचनस्य(विकर्तनस्य) पुत्रेण सोऽदिशदमुष्य बलं प्रदाय १६४॥
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| verse_line1 = संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) ।स वर्महीनः पार्थबाणाभितप्तो व्यपागमद् भीम आपाऽत्मयानम् १५७॥
| verse_line1 = शिष्यं त्वशक्तमिह मे प्रतियोधनाय पार्थो ह्यदादिति स सात्यकिमीक्षमाणः ।
| verse_line2 = संस्पर्धयैव युयुधे विरथं चकार तेनैव सात्यकिरमुं हरियानसंस्थः १६५॥
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| verse_line1 = कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् ।हन्यामिति प्राह यतः स कुन्त्यै यद्यप्यवध्यः स तयाऽपि भीमः १५८॥
| verse_line1 = न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् ।
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| verse_line1 = नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) ।किं तस्य शक्तिः प्रकरोति वासवी तथाऽन्यदप्यस्त्रशस्त्रं महच्च १५९॥
| verse_line1 = शस्त्रसङ्ग्रहकाले तु कुमाराणां व्रतं भवेत् ।
| verse_line2 = इत्युक्तं जामदग्न्येन धनुर्विद्यापुराकृता १६७॥
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| verse_line1 = भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत ।अभिप्रायं केशवस्य जानन् हैडिम्बमृत्यवे ।ततः कर्णोऽन्यमास्थाय रथमर्जुनमभ्ययात् १६०॥
| verse_line1 = तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् ।
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| verse_line1 = दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् ।इति भीतस्तु तां शक्तिमादायार्जुनमृत्यवे ।युद्धायायाद् रथं चापं शक्तिं चैकत्र नाकरोत् १६१॥
| verse_line1 = अनुपद्रवाय (अनुपद्रवं च) लोकस्येत्यतो भीमो व्रतं त्विदम् ।
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| verse_line1 = एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः ।बिभेति सर्वदा नीतेः कृष्णस्यामिततेजसः १६२॥
| verse_line1 = अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) ।
| verse_line2 = सुश्मश्रुं मां न कश्चिद्धि तथा ब्रूयादिति स्फुटम् ।
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| verse_line1 = निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् ।आरुह्यागाद्धि पूर्वं तु न कालं मन्यते मृतेः १६३॥
| verse_line1 = अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) ।
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| verse_line1 = प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः ।
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| verse_line1 = अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् ।
| verse_line2 = उक्तः प्रकोपनायैव तस्मादर्जुनमब्रवीत् १७३॥
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| verse_line1 = इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) ।शिरो निकृत्तं भुवि पातयेद् यस्तवास्य भूयाच्च शिरः सहस्रधा १८६॥
| verse_line1 = विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः ।
| verse_line2 = जयद्रथवधाच्चैव कुपितोऽभ्यद्रवत् परान् १९४॥
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| verse_line1 = इति स्म वध्यः पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य ।अङ्के व्यधात् तच्छिर आशु वासविः स सम्भ्रमात् तद् भुवि न्यपातयत् १८७॥
| verse_line1 = स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ
| verse_line2 = धृष्टद्युम्नं सात्यकिं द्रौपदेयान् सर्वानेकः शरवर्षैर्ववर्ष १९५॥
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| verse_line1 = ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः ।तदैव सूर्ये सकलैश्च दृष्टे हाहेति वादः सुमहानथाऽसीत् १८८॥
| verse_line1 = ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः ।
| verse_line2 = धनूंषि चित्राणि महारथानां चकार सङ्ख्ये(युद्धे) विरथौ यमौ च १९६॥
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| verse_line1 = भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् ।कुर्वन् साहाय्यं फल्गुनस्यैव तुष्टो बभूव शैनेय उतो हते रिपौ १८९॥
| verse_line1 = आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः ।
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| verse_line1 = अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः ।भीमस्य नादं सहपाञ्चजन्यघोषं श्रुत्वा निहतं सिन्धुराजम् ।ज्ञात्वा राजा धर्मसुतो मुमोद दुर्योधनश्चाऽस सुदुःखितस्तदा १९०॥
| verse_line1 = तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः ।
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| verse_line1 = ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां भीमोऽभ्यवर्तत।पार्थः कर्णमुखाञ्छिष्टान् ततोऽभज्यत तद् बलम् १९१॥
| verse_line1 = सुयोधनः कर्णमाह जहि भीममिमं युधि ।
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| verse_line1 = प्रतिज्ञा च परित्यक्ता पाण्डवस्नेहतस्त्वया ।
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| verse_line1 = इतः परं नैव रणाद् रात्रावहनि वा क्‍वचित् ।
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| verse_line1 = चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च ।
| verse_line2 = द्रौणिदुर्योधनौ तत्र विरथीकृत्य मारुतिः ।
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| verse_line2 = कर्णस्तु तं परित्यज्य सहदेवमुपाद्रवत् २२४॥
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| verse_line1 = यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति ।इति ज्ञापयितुं सा कर्णरक्षणकाङ्क्षिणा २१७॥
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| verse_line1 = ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् ।कर्णस्य पुरतः शत्रून् द्रावयामास सर्वतः २१९॥
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| verse_line2 = सा हन्यमाना रणकोविदेन न शं (नाशं) लेभे मृत्युनाऽऽर्ता प्रजेव(आर्तप्रजेव) २२७॥
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| verse_line1 = तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ।भीमः कर्णरथायैव गदां चिक्षेप वेगतः(वेगितः) ॥ २२०॥
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| verse_line1 = सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे ।अस्मिन् हते हतं सर्वं किं नः पार्थः करिष्यति २४६॥
| verse_line1 = ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः ।
| verse_line2 = तन्मा शुचस्त्वं राजेन्द्र दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ।
| verse_line3 = इत्युक्त्वा प्रययौ व्यासस्ततो युद्धमवर्तत २५४॥
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| verse_line1 = एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः ।हैडिम्बेनार्द्यमानैस्तु(च) स्वयं च भृशपीडितः ।आदत्त शक्तिं विपुलां पाकशासनसम्मताम् २४७॥
| verse_line1 = भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः ।
| verse_line2 = प्रदीपहस्ता अथ योधकाश्च सर्वेऽपि निद्रावशगा बभूवुः २५५॥
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| verse_line1 = दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः ।
| verse_line2 = इतीरिता आशिषः फल्गुनाय प्रयुज्य सर्वे सुषुपुर्यथास्थिताः २५६॥
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| verse_line1 = निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि ।तस्मिन् हते जहृषुधार्तराष्ट्रा उच्चुक्रुशुर्दुधुवुश्चाम्बराणि २४९॥
| verse_line1 = पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः ।
| verse_line2 = तत्राऽयातः सात्यकिं सोमदत्तो भूरिश्च ताभ्यां युयुधे एकः २५७॥
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| verse_line1 = तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् ।ननाद शङ्खमाधमज्जहास(शङ्खमदमञ्जहास) चोरुनिस्वनः २५०॥
| verse_line1 = हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् ।
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| verse_line1 = तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः ।हते सुतेऽग्रजेऽस्माकं वीरे किं नन्दसि प्रभो २५१॥
| verse_line1 = चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः ।
| verse_line2 = तया हतो विह्वलितो वृकोदरो जघान तं गदया सोऽपतच्च २५९॥
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| verse_line1 = तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन ।त्वदर्थं निहिता शक्तिर्विमुक्ताऽस्मिन् हि राक्षसे २५२॥
| verse_line1 = बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् ।
| verse_line2 = भीम त्वयैव हन्तव्यो रणेऽहं प्रीतिमिच्छता ।
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| verse_line1 = इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा ।
| verse_line2 = हन्यां नैवान्यथा युद्धे तत् ते शुश्रूषणं भवेत् ।
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| verse_line1 = हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) ।
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| verse_line1 = ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार ।
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| verse_line1 = अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् ।भीमसेनहतं दृष्ट्वा वासुदेवप्रचोदितः ।अश्वत्थामा हत इति प्राह राजा युधिष्ठिरः २७५॥
| verse_line1 = धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः ।
| verse_line2 = इति तं सात्यकिः क्रुद्धो गदापाणिः समभ्ययात् ।
| verse_line3 = आह्वयामास पाञ्चाल्यस्तं धृतासिरविस्मयः २८३॥
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| verse_line1 = अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् ।पुरोक्तं धर्मजायैव तेन द्रोणो युधिष्ठिरम् २७६॥
| verse_line1 = तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः ।
| verse_line2 = शमयामास पार्थं च पाञ्चाल्यस्नेहयन्त्रितः २८४॥
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| verse_line1 = ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् ।
| verse_line2 = यत्ताश्च युद्धाय समुद्यताश्च(समुत्थिताश्च) तदाऽऽगमद् द्रौणिरप्यात्तधन्वा २८५॥
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| verse_line1 = तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् ।योग्यं गुणवतो नित्यं परधर्मोपजीवनम् २७८॥
| verse_line1 = आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने ।
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| verse_line1 = नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः ।
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| verse_line1 = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।कर्णं सेनापतिं चक्रे सोऽगाद् युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ १॥
| verse_line1 = ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः
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| verse_line1 = तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।तत्रोदयाद्रिप्रतिमे प्रदृश्यते भीमो यथोद्यन् सविताऽतिनिर्मलः ॥ २॥
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| verse_line1 = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।तं वीर्यमत्तं प्रतिलभ्य भीमो निनाय मृत्योः सदनाय शीघ्रम् ॥ ३॥
| verse_line1 = तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च
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| verse_line1 = निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।विक्षोभयामास च शत्रुसैन्यं सिंहो यथैव श्वसृगालयूथम् ॥ ४॥
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| verse_line1 = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतं (अतिघोरमद्भुतं) पुरा यथा नाऽस च कस्यचित् क्‍वचित् ॥ ५॥
| verse_line1 = सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम्
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| verse_line1 = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।न चोत्तरं वाऽपि भविष्यतीदृक् कलां च सर्वाणि न षोडशीमियुः(षोडशीमयुः) ॥ ६॥
| verse_line1 = दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम्
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| verse_line1 = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।द्वयोः समाहार इह द्वयोरपि ज्ञानस्य बाह्वोश्च बलस्य सूर्जितः ॥ ७॥
| verse_line1 = नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा
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| verse_line1 = इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।निरन्तरं चक्रतुरुत्तमोजसौ दृष्ट्वैव तद् (प्रीतिमगुः)भीतिमगुर्महारथाः ॥ ८॥
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| verse_line1 = शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।(तान्यस्त्रवर्षैः)तान्यस्त्रवर्यैर्बलवानविस्मयः संशामयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ९॥
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| verse_line1 = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।तदा तु भीमस्य शरैर्भृशार्दितो द्रौणिः पपाताऽशु दृढं विचेतनः ॥ १०॥
| verse_line1 = पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु
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| verse_line1 = भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।निर्धूतयुद्धश्रम आत्तधन्वा योद्धुं गजौघं प्रति नादिताशः(प्रतिनादिताशः) ॥ ११॥
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| verse_line1 = नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।अनुद्रुत्य च वेगेन कण्ठे धनुरवासृजत् ॥ १५॥
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| verse_line1 = उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात्
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| verse_line1 = इत्युक्ते रविजो मद्रान् नितरां पर्यकुत्सयत् ।शल्योऽपि सर्वदेशेषु नीचमध्योत्तमा नराः ।सन्तीत्युक्त्वाऽस्य सारथ्यं चक्रे पार्थहितेप्सया(पार्थहितेच्छया) ॥ ३१॥
| verse_line1 = इत्युक्ते रविजो मद्रान् नितरां पर्यकुत्सयत्
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| verse_line1 = कर्णोऽथ शल्यनियतेन रथेन पार्थसेनामवाप्य विदुधाव शरैः समन्तात् ।संरक्षितो युधि सुयोधनगौतमाद्यैराचार्यजेन च महास्त्रविदां वरेण ॥ ३२॥
| verse_line1 = कर्णोऽथ शल्यनियतेन रथेन पार्थसेनामवाप्य विदुधाव शरैः समन्तात्
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| verse_line1 = तं भीमपार्षतशिनिप्रवराभिगुप्ता सा पाण्डवेयपृतनाऽभिववर्ष बाणैः ।तां सूर्यसूनुरथ बाणवरैर्विदार्य सम्प्राद्रवच्छितशरैरपि (सम्प्रार्दयच्छितशरैरपि) धर्मसूनुम् ॥ ३३॥
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| verse_line1 = कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः ।दृष्ट्वैव मारुतिरमुं भृशमातुतोद दुर्योधनं (विगतकार्मुकं)विरथकार्मुकमत्र कृत्वा ॥ ३४॥
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| verse_line1 = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य ।यस्यार्थ एष(यस्यार्थमेव) समरस्त्वमियं च सेनां तं त्वं यमस्य सदनं प्रयियासुमद्य ।भीमेन पीडितममुं परिपाहि शीघ्रं किं ते युधिष्ठिरमिमं हि मुधाऽभिपीड्य(वृथाऽभिपीड्य) ॥ ३५॥
| verse_line1 = तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य
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| verse_line1 = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् ।दृष्ट्वैव तं पवनसूनुरभि त्वियाय क्रोधाद् दिधक्षुरिव कर्णममेयधामा ॥ ३६॥
| verse_line1 = श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम्
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| verse_line1 = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् ।अन्ते कृतान्तनरसिंहतनोर्यथैव विष्णोर्हरं ग्रसत आत्तसमस्तविश्वम् ।तद्वेगतः प्रतिचचाल धरा समस्ता विद्राविता च सकला प्रतिवीरसेना ॥ ३७॥
| verse_line1 = राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम्
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| verse_line1 = वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् ।तेनाऽहतो मृतकवत् स पपात कर्णो भीमः क्षुरं च जगृहेऽभिययौ(जगृहे प्रययौ) च पद्भ्याम् ॥ ३८॥
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| verse_line1 = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव ।एवं हि वायुतनयस्य सदा प्रतिज्ञा छेत्तुं स तेन रविजस्य ससार जिह्वाम् ॥ ३९॥
| verse_line1 = निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव
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| verse_line1 = आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा ।कार्या त्वयैव पुरुहूतसुतस्य जिह्वां मा तेन पातय मरुत्सुत सूतसूनोः ॥ ४०॥
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| verse_line1 = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् ।वैकर्तनमपोवाह सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४१॥
| verse_line1 = इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट्
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| verse_line1 = अवध्यत्वात् तथाऽश्वानामभेद्यत्वाद् रथस्य च ।अतो योद्धुं समर्थोऽपि नाद्य यामि धनञ्जयम् ॥ ५९॥
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| verse_line1 = एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात्
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| verse_line1 = स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम्
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| verse_line1 = पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य
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| verse_line1 = अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् ।पाण्डोः सुतानां शरवर्षधारो दुर्योधनश्चानु ययौ तमेव ॥ ९०॥
| verse_line1 = अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम्
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| verse_line1 = न ह्यस्त्रं द्रवमाणांस्तद्धन्ति तेन सपार्षताः ।पाञ्चाला द्रौपदेयाश्च शैनेयाद्याश्च सर्वशः ॥ १०१॥
| verse_line1 = न ह्यस्त्रं द्रवमाणांस्तद्धन्ति तेन सपार्षताः
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| verse_line1 = वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम्
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| verse_line1 = त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम्
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| verse_line1 = भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः ।यो युद्ध्यते सर्ववीरैरद्यापि त्वं तु निन्दकः ॥ ११९॥
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| verse_line1 = गुरुनिन्दाऽऽत्मपूजा च न धर्माय भवेत् क्‍वचित् ।तथाऽप्यर्जुनहार्दं तत् सम्प्रकाश्य जनार्दनः ॥ १२३॥
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| verse_line1 = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)।युद्धाख्ययज्ञे सोमबुद्ध्याऽरिवक्ष ईहेति साम्ना गदया विभिन्दन् ॥ १४१॥
| verse_line1 = ‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)
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| verse_line1 = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद ।पीतः सोमो युद्धयज्ञे मयाऽद्य वध्यः पशुर्मे हरये सुयोधनः ॥ १४८॥
| verse_line1 = द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद
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| verse_line1 = इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे ।आयान्तमीक्ष्यैव तमुग्रपौरुषं दुद्राव भीतः स सुयोधनो भृशम् ॥ १४९॥
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| verse_line1 = बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव ।आयोधनं शून्यमभून्मुहूर्तं ननर्त भीमो व्याघ्रपदेन हर्षात् ॥ १५०॥
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| verse_line1 = सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य ।जहास कृष्णश्च धनञ्जयश्च शशंसतुश्चैनमतिप्रहृष्टौ ॥ १५१॥
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| verse_line1 = यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् ।दुर्योधनस्यावरजाः शरौघैरवीवृषन् भीममुदारसत्त्वम् ॥ १५२॥
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| verse_line1 = तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः ।तस्मिन् दिने विंशतिर्धार्तराष्ट्र हतास्तदन्ये समरात् प्रदुद्रुवुः ॥ १५३॥
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| verse_line1 = कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे ।निमीलिताक्षे च भयेन कर्णे कर्णात्मजो नकुलं प्रत्यधावत् ॥ १५४॥
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| verse_line1 = इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति ।उक्त्वाऽनमत् कञ्जभवं तथेति प्राहासुरान् देवताश्चाऽबभाषे ॥ १६१॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये कर्णवधो नाम सप्तविंशोऽध्यायः
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| verse_line1 = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।चापे च्छित्त्वा च यमयोर्दध्मौ शङ्खं महास्वनम् ॥ २३॥
| verse_line1 = निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः
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| verse_line1 = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु ।निर्भिद्य बाणैर्विरथं चकार पुनस्तृतीयं रथमारुरोज(आरुरोह) ॥ २५॥
| verse_line1 = आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु
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| verse_line1 = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।मर्माणि बाणैर्नितरां पुनश्च स मुष्टिमुद्यम्य जगाम धर्मजम् ॥ २६॥
| verse_line1 = आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य
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| verse_line1 = तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।श्वासमात्रावशिष्टं च मरणायैव केवलम् ॥ २७॥
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| verse_line1 = मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे
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| verse_line1 = एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे
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| verse_line1 = जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु
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| verse_line1 = यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् ।सर्वैरेकेन वा युद्धं करिष्ये न च भीर्मम ॥ ५४॥
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| verse_line1 = इत्युक्त ऊचे नहि दुर्बलैरहं योत्स्ये चतुर्भिर्भवदर्जुनादिभिः ।भीमेन योत्स्ये गदया सदा हि मे प्रिया गदा नान्यदथाऽयुधं स्पृशे ॥ ५७॥
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| verse_line1 = श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा ।राज्ञो गदायाः परिगृह्य(प्रतिगृह्य) वीरः समुत्थितो युद्धमनाः समुन्नदन् ॥ ५८॥
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| verse_line1 = अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया ।नह्येष राजा गदया रणे चरन् शक्यो विजेतुं निखिलैः सुरासुरैः ॥ ५९॥
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| verse_line1 = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् ।हन्तैनमाजौ नहि भीमतुल्यो बले क्‍वचिद् धार्तराष्ट्रः कृती च ॥ ६०॥
| verse_line1 = स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित्
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| verse_line1 = ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः ।नाभेरधस्ताद्धननं जना आहुर्गदामृधे ॥ ६१॥
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| verse_line1 = अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये ।आपद्धर्मं दर्शयितुं किञ्चिद्व्याजेन संयुतः ॥ ६२॥
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| verse_line1 = नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि ।अनापद्यापदिव च दर्शयेतां जनस्य तु ॥ ६६॥
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| verse_line1 = इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम्
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| verse_line1 = दर्शयन्तौ गदामार्गं चित्रं तौ प्रविचेरतुः (चित्रं परिविचेरतुः)
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| verse_line1 = ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ ।
| verse_line2 = (व्यधाद्) न्यधादुच्छ्रितसक्थीकस्तदा कृष्णाभ्यनुज्ञया
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| verse_line1 = नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः ।एवं प्रतिज्ञायुग्मार्थं भग्नं(भिन्न) सक्थियुगं रणे ॥ ७३॥
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| verse_line1 = कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः ।तत्प्रतिज्ञानुसारेण भीमो मूर्द्धानमक्रमीत् ।‘ऋषभम् मा समानानां’ (ऋग्वेद १०.१६६.१) इति सूक्तं ददर्श च(ह) ॥ ७४॥ (ऋषभम् मा समानानां सपत्नानां विषासहिम् । हन्तारं शत्रूणां कृधि विराजं गोपतिं गवाम् ॥)
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| verse_line1 = न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः ।देवैर्हि वञ्चयित्वैव हताः पूर्वं सुरारयः ।अतोऽयमप्यधर्मेण हतो नात्रास्ति दूषणम् ॥ ८४॥
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| verse_line1 = भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः ।को नु दुर्योधने पापे हते दोषः कथञ्चन ॥ ८५॥
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| verse_line1 = प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः ।धर्मतश्च प्रतिज्ञेयं कृतानेनानुरूपतः (तेनानुरूपतः) ॥ ८६॥
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| verse_line1 = पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् ।जगाद कृष्णं स्फुरिताधरोष्ठः क्रोधात् सुपापो धृतराष्ट्रसूनुः ।त्वयैव पापे निहिता हि पार्थाः पापाधिकस्त्वं हि सदैक एव ॥ ९३॥
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| verse_line1 = इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् ।भीष्मादिहत्याऽपि तवैव पापं यदन्वयुस्त्वामतिपापनिश्चयम् ।पापं च पापानुगतं(पापानुचरं) च हत्वा कथञ्चनाप्यस्ति नचैव पापम् ॥ ९४॥
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| verse_line1 = न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि
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| verse_line1 = निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय
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| verse_line1 = इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः
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| verse_line1 = उवाच चाहमादिष्टो विष्णुना प्रभविष्णुना ।अरक्षं पार्थशिबिरमियन्तं कालमेव तु ॥ १२५॥
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| verse_line1 = इत्युदीर्य प्रदायाऽशु सर्वा हेतीर्वृषध्वजः
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| verse_line1 = पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च
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| verse_line1 = द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम्
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| verse_line1 = खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह ।भूमौ प्रागेव संस्पर्शान्न ज्ञातस्तमसाऽमुना ।अन्यासक्ते समुत्थाय प्राद्रवद् यत्र पार्षती ॥ १४४॥
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| verse_line1 = तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि
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| verse_line1 = आद्रवन्तं पुनर्दृष्ट्वा भीमं द्रोणात्मजो रुषा ।आवृत्य युद्ध्यन् विजितोऽस्त्रं ब्रह्मशिर आददे ॥ १४९॥
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| verse_line1 = विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत्
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| verse_line1 = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् ।चिकीर्षोर्धार्तराष्ट्रस्य तन्तुं भूयः सुदुष्करम् ॥ १७४॥
| verse_line1 = जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम्
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| verse_line1 = मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः ।यथैव तेनैव नराधिरूढो गम्यस्तव स्यान्नच भूमिभागः ॥ १७५॥
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| verse_line1 = रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् ।त्वया सह स्यान्मम सङ्गमो विभो यथेष्टतः स्यान्नच मेऽत्र विघ्नः ॥ १७७॥
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| verse_line1 = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति ।चिन्तयन् प्रययौ देवं (दावं) द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः ॥ १८१॥
| verse_line1 = इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति
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| verse_line1 = दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते ।प्रतिज्ञापालनायापि प्रतिकर्तुं च तत् कृतम् ॥ २०५॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवराज्यलाभो नाम अष्टाविंशोऽध्यायः
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| verse_line1 = तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।शक्रोऽर्जुन इति श्रुत्वाऽप्येतद्धर्मे स संशयम्(ससंशयम्) ॥ ९॥
| verse_line1 = तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित्
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| verse_line1 = मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।इत्येवं शङ्कमानं तमूचतुर्विप्रयादवौ ।कृष्णौ धर्मोऽयमित्येव शास्त्रयुक्त्या पुनः पुनः ॥ १०॥
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| verse_line1 = नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।हतपक्षगतत्वेन त्वच्छङ्‍काया अगोचरः ।यतो भीष्मस्ततो याहि तमित्यूचतुरव्ययौ ॥ ११॥
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| verse_line1 = स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।भीष्मं ययौ लज्जितेऽस्मिंस्तं भीष्मायाऽह केशवः ॥ १२॥
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| verse_line1 = पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।तद्वशं सर्वमन्यच्च सर्वदेति विनिश्चयः ॥ १७॥
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| verse_line1 = साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् ।एते साधारणा धर्मा ज्ञेया भागवता इति ॥ २१॥
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| verse_line1 = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्‍वचित् ।शारीरदण्डविषये वैश्यादीनां च विप्रवत् ॥ २३॥
| verse_line1 = न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्‍वचित्
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| verse_line1 = तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।दोषेभ्यस्ते गुणाधिक्ये नैव यान्त्यधमां गतिम् ।गुणदोषसाम्ये मानुष्यं सर्वदैव पुनःपुनः ॥ ४०॥
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| verse_line1 = भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।विष्णुवैष्णववाक्येन हानिः पापस्य कर्मणः ॥ ४२॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये समस्तधर्मसङ्ग्रहो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये समस्तधर्मसङ्ग्रहो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥
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| verse_line1 = अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।ताभिर्युतो(युक्तो) दैवतैरप्यलभ्यानभुङ्‍क्त भोगान् विबुधानुगार्चितः ॥ १२॥
| verse_line1 = अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः
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| verse_line1 = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।सद्वैष्णवान् विदुषः पञ्चपञ्च सवेतनान् ग्राममनु स्वकीयान् ॥ १३॥
| verse_line1 = ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान्
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| verse_line1 = दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।तद्वृत्तमन्यैरपि विप्रवर्यैः संशोधयन् सर्वमसौ यथा व्यधात् ॥ १४॥
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| verse_line1 = नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।न विध्यवर्ती नच दुःखितोऽभून्नापूर्णवित्तश्च तदीयराष्ट्रे ॥ १५॥
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| verse_line1 = वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।संशिक्षितानां प्रथमाद् युगाच्च गुणाधिकः कलिरासीत् प्रजानाम् ॥ १६॥
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| verse_line1 = शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।तद्धीनमप्युच्चशुभं कृताद् युगाच्चक्रे कलिं मारुतिरच्युताश्रयात् ॥ १७॥
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| verse_line1 = धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।विभीषयित्वा नृपतीन् सरत्नान् पदोर्नृपस्याग्रभुवो न्यपातयत् ॥ १८॥
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| verse_line1 = दुःशासनस्याऽवसथं(अवसथे) सुभद्राचित्राङ्गदासहितोऽध्यावसंश्च ।(स)सचन्द्रिकाकान्तिरनूनबिम्बो नभस्थितश्चन्द्र इवात्यरोचत ॥ २०॥
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| verse_line1 = समस्तभृत्याश्रितवेतनानां माद्रेय आसीत् प्रथमः प्रदाता ।स दुर्मुखस्याऽवसथेऽवसच्च स मद्रराजात्मजयाऽग्र्यवर्ती ॥ २१॥
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| verse_line1 = सन्धानभेदानुगतप्रवृत्तिस्तिष्ठंश्च दुर्मर्षणशुभ्रसद्मनि ।नृपाङ्गरक्षः प्रगृहीतखड्गस्तस्यानुजो मागधकन्ययाऽऽसीत् ॥ २२॥
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| verse_line1 = सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।नैवातिक्रममेतेषां कुरु सर्वात्मना क्‍वचित् ॥ ४१॥
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| verse_line1 = यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे
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| verse_line1 = ह्रदा महान्तस्त्रिदशादियोग्याः सुयोगयुक्ता हरिचन्दनादेः ।तथाऽञ्जनालक्तकमुख्यमण्डनद्रव्याग्र्यवाप्यो मणिकाञ्चनोद्भवाः ॥ १३६॥
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| verse_line1 = यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।गन्धा रसाद्याश्च समस्तभोगा दिवीव तत्राऽसुरतीव हृद्याः ॥ १३७॥
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| verse_line1 = नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।मखानिति प्रोचुरशेषलोका दृष्ट्वा मखं तं पुरुषोत्तमेरितम् ॥ १३८॥
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| verse_line1 = स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।दिनेदिने स्वृद्धगुणो बभूव मुदावहो वत्सरपञ्चकत्रयम् ॥ १३९॥
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| verse_line1 = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।माङ्गल्यमात्रं दयिताशरीरे निधाय सर्वाभरणानि चैव ।समर्पयामासुरजे वरेण्ये व्यासे विभागाय यथोक्तमृत्विजाम् ॥ १४०॥
| verse_line1 = यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम्
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| verse_line1 = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।हृदा समस्तं हरयेऽर्पितं तैः स हि द्विजस्थोऽपि समस्तकर्ता ॥ १४१॥
| verse_line1 = प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते
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| verse_line1 = देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।त्वदीयमेतन्निखिलं वयं च नास्त्यस्मदीयं(न त्वस्मदीयं) क्‍वच किञ्चनेश ।स्वन्त्र एकोऽसि न कश्चिदन्यः सर्वत्र पूर्णोऽसि सदेति हृष्टाः ॥ १४२॥
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| verse_line1 = ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।पूर्णा हिरण्येन वयं धरायाः प्रपालने योग्यतमा इमे हि ॥ १४३॥
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| verse_line1 = पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।ऊचुस्तपो नोऽस्तु वनेऽर्पयित्वा राज्यं मखान्ते त्वयि धर्मलब्धम् ॥ १४४॥
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| verse_line1 = समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।पितामहोऽहं भवतां विशेषतो गुरुः पतिश्चैव ततो मदर्हथ ॥ १४६॥
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| verse_line1 = इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।विभज्य विप्रान् स निजं तु भागमदात् पृथायै निखिलम् प्रसन्नः ॥ १४७॥
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| verse_line1 = श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत्
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| verse_line1 = वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।फलाधिक्यं कर्मणां हि विष्णोः प्रीत्यैव नान्यथा ॥ १६६॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये यागसमाप्तिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये यागसमाप्तिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः
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| verse_line1 = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।जगाद साध्वित्यथ भूय एव धर्मे त्वरावानपि सम्बभूव ॥ ५॥
| verse_line1 = इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन्
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| verse_line1 = स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने
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| verse_line1 = तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् ।अनुजानीहि नैवास्य धर्मविघ्नकरो भव ॥ २६॥
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| verse_line1 = काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।शुभ्रां गतिमयं यायादन्यथा न कथञ्चन ॥ २७॥
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| verse_line1 = अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः ।श्राद्धाय वित्तमाकाङ्क्षन् प्रेषयामास तद्वचः ॥ २९॥
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| verse_line1 = इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः
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| verse_line1 = सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम्
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| verse_line1 = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।उपासमानेषु विचित्रवीर्यपुत्रं पृथां चैव पृथासुतेषु ॥ ५७॥
| verse_line1 = क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम्
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| verse_line1 = प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः
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| verse_line1 = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।दास्यामि तस्याद्य तदित्यमुष्मिन् भक्त्युच्छ्रयः पाण्डुसुतैः सदारैः ।वृतोऽत्र कुन्ती रविसूनुजन्ममृत्यूत्थदोषापगमं ययाचे ॥ ५९॥
| verse_line1 = तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत्
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| verse_line1 = तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव ।सम्मन्त्र्य निःशेषरणेहतानां सन्दर्शनं प्रार्थितवांस्तमीशम् ॥ ६०॥
| verse_line1 = तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव
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| verse_line1 = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव ।समागताः स्वर्गलोकात् क्षणेन दत्ता च दिव्या दृगमुष्य राज्ञः ॥ ६१॥
| verse_line1 = ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव
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| verse_line1 = ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा
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| verse_line1 = तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात् ।दृष्ट्वा स पारीक्षित आप तुष्टिं स्वतातमीशेन समाहृतं पुनः ॥ ६४॥
| verse_line1 = तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात्
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| verse_line1 = सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।चक्रे च विस्रम्भमतीव भारते पुनश्च तत्रस्थजनैः(तत्रत्यजनैः) समेतः ॥ ६५॥
| verse_line1 = सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः
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| verse_line1 = पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः
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| verse_line1 = वीटामुखं(व्रीळामुखा,व्रीडामुखं, व्रीडामुखान्) ध्यानपरा निशम्य स्वर्यातमात्मीयपितृव्यमाशु
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| verse_line1 = ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।व्यज्ञापयन् स्वलोकाप्तिमोमित्याह स चाच्युतः ॥ १३॥
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| verse_line1 = विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।पापं मां जहि देवेति याचन्तमनयद् दिवम् ॥ २१॥
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| verse_line1 = ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य ।कृष्णं स चाऽश्वेव ययौ स्वलोकं स्वतेजसा सर्वमिदं प्रकाशयन् ॥ २४॥
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| verse_line1 = क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः ।स तद् दैवकृतं ज्ञात्वा संस्मरन् पुरुषोत्तमम् ।निघ्नञ्छत्रून् गाण्डिवेन शेषं रक्षन् कुरून् ययौ(कुरूनगात्) ॥ ४४॥
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| verse_line1 = तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) ।तमेव वासिष्ठकुलोद्भवं हरिं निरीक्ष्य दुःखेन पपात पादयोः ॥ ४५॥
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| verse_line1 = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना ।संस्थाप्य चेतः पुनरेव तस्मिन् जहौ शुचः प्रायश एव धैर्यात् ॥ ४६॥
| verse_line1 = स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना
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| verse_line1 = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः ।गोविन्दैकादशीं श्रुत्वा कृत्वा सारस्वते जले ।निमज्ज्य वायोर्वचनात् त्यक्तदेहा दिवं ययुः ॥ ४७॥
| verse_line1 = स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः
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| verse_line1 = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः ।ययौ भ्रातॄनशेषं च वृत्तं तेषामवर्णयत् ॥ ५०॥
| verse_line1 = स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः
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| verse_line1 = वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) ।समयः पाण्डवानां हि तस्यैवानुगतिः परम् ॥ ५३॥
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| verse_line1 = अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता ।भोज्या रक्ष्याऽपि वा तेषामित्येव समयः पुरा ॥ ५४॥
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| verse_line1 = तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता ।कृष्णयैकत्वमापन्ना त्यक्त्वा देहं तु मानुषम् ॥ ५५॥
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| verse_line1 = अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम्
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| verse_line1 = तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् ।केनकेनापतद् देहो दोषेण न इति क्रमात् ॥ ६२॥
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| verse_line1 = अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः ।यत्किञ्चाऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।सहस्रगुणमप्येतत् त्वयि सम्भावयाम्यहम् ॥ ७४॥
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| verse_line1 = पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् ।तत्क्रमाद् (तत्कामाद्) देहपातोऽभून्न पापान्मुच्यतां यथा ॥ ७६॥
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| verse_line1 = न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन ।किन्तु कर्मक्षयादेव तथा सर्वत्र निश्चितः ॥ ७७॥
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| verse_line1 = तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) ।ययौ पुरो देवरथस्तदाऽस्यावततार ह ॥ ७८॥
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| verse_line1 = रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः ।आरोहमब्रवीन्नैतद् युक्तमित्याह सोऽपि तम् ॥ ७९॥
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| verse_line1 = नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते
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| verse_line1 = अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते
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| verse_line1 = सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये ।निःशेषसौख्योज्झितनित्यदुःखेऽवशाः(नित्यदुःखे वशाः) पतिष्यन्त्यपुनर्निवृत्ताः ॥ १०४॥
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| verse_line1 = स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् ।ददर्श भीमं च मरुत्समीपे मध्ये ज्वलन्तं मरुतां गणस्य ॥ १०७॥
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| verse_line1 = शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् ।अनन्तदुःखाप्तिसुयोग्यदैत्यैर्विद्यामवाप्तां तु न सेहिरे सुराः ॥ १३२॥
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| verse_line1 = नावाग्गतिः क्‍वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः ।प्राप्यं तमोऽन्धं त्वसुरैर्न मुक्तिः कदाचिदाप्या तदचिन्तयन् सुराः ॥ १३३॥
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| verse_line1 = ज्ञानप्रदानाय सतां तदन्यज्ञानप्रणाशाय च विष्णुनैते ।क्लृप्तास्ततस्ते सविरिञ्चशर्वा विज्ञापयामासुरुपेत्य विष्णुम् ॥ १३४॥
| verse_line1 = ज्ञानप्रदानाय सतां तदन्यज्ञानप्रणाशाय च विष्णुनैते
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| verse_line1 = क्षीरोदधेरुत्तरतीरनिष्ठितै(विष्ठितै)रभिष्टुतः सुष्टुतिभिः पुरुष्टुतः ।प्रदाय तेषामभयं रमापतिः क्षणादभूच्चारुतराकृतिः (तमाकृतिः) शिशुः ॥ १३५॥
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| verse_line1 = यस्त्रैपुराणां प्रथमोऽत्र जातः शुद्धोदनेत्येव जिनेति चोक्तः ।क्षेत्रे गयाख्येऽस्य शिशुं प्रजातं सम्प्रास्य दूरेऽत्र बभूव विष्णुः ।अजानमानाः स्वशिशुं गतं तं शिशुं हरिं वीक्ष्य निजं स्म मेनिरे ॥ १३६॥
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| verse_line1 = तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः ।तं जातमात्रं प्रहसन्तमीक्ष्य सुविस्मितैः पृष्ट उवाच विष्णुः ।बुद्धोऽहमित्येव सुनित्यबोधाज्जगाद(स नित्यबोधाज्जगाद) चैषामथ बुद्धदर्शनम् ॥ १३७॥
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| verse_line1 = तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः
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| verse_line1 = स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य ।दैत्यातिमोहाय निजं च चक्रं स्वमुक्तमाश्वेव  समग्रहीद्वशी॥ १३९॥
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| verse_line1 = क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः ।ततः स्थिरत्वेऽपि विशेषसंश्रयादुक्तं क्षणस्थायि मया समस्तम् ॥ १४३॥
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| verse_line1 = समस्तशास्त्रार्थविनिर्णयोऽयं विशेषतो भारतवर्त्मचारी(भारतमार्गवर्ती) ।ग्रन्थः कृतोऽयं जगतां जनित्रं हरिं गुरुं प्रीणयताऽमुनैव ॥ १६०॥
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| verse_line1 = विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् ।तद् ब्रह्मसूत्राणि चकार कृष्णो व्याख्या तथैषामयथा (व्याख्याऽथ तेषामयथा)कृताऽन्यैः ॥ १६१ ॥
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| verse_line1 = निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः ।जीवेश्वरैक्यं प्रवदद्भिरुग्रैर्व्याख्याय सूत्राणि चकार चाऽविः ॥ १६२॥
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| verse_line1 = व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् ।कृत्वाऽखिलान्यं पुरुषोत्तमं च हरिं वदन्तीति समर्थयित्वा ॥ १६३॥
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| verse_line1 = तनुस्तृतीया पवनस्य सेयं सद्भारतार्थप्रतिदीपनाय ।ग्रन्थं चकारेममुदीर्णविद्या यस्मिन् रमन्ते हरिपादभक्ताः ॥ १६४॥
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| verse_line1 = तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ।निर्यदीं बुध्नान् महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।यदीमनु प्रदिवो मध्व आधवे गुहासन्तं मातरिश्वा मथायति ॥ १६५॥(ऋ.१.१४१.२-३)
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| verse_line1 = इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे ।अत्रोदिता याश्च कथाः समस्ता वेदेतिहासादिविनिर्णयोक्ताः(समस्तवेदेतिहासदिविनिर्णयोक्ताः) ॥ १६६॥
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| verse_line1 = तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः ।किं चो(वो)दितैरस्य गुणैस्ततोऽन्यैर्नारायणः प्रीतिमुपैत्यतोऽलम्(प्रीतिमुपैत्यतोऽयम्) ॥ १६७॥
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इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवस्वर्गारोहणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः
इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवस्वर्गारोहणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः
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Latest revision as of 19:16, 26 April 2026

श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णयः


औं ॥ ते सेने समरारम्भे समेते सागरोपमे ।भीमभीष्ममुखे वीक्ष्य प्राह वासविरच्युतम् ॥ १॥


‘सेनयोरुभयोर्मध्ये रथं स्थापय मेऽच्युत’(भ.गी.१.२१) ।इत्युक्तः स तथा चक्रे पार्थोऽपश्यच्च बान्धवान्(पार्थोऽपश्यत् स्वबान्धवान्) ।


स्वधर्मो दुष्टदमनं धर्मज्ञानानुपालनम् ।क्षत्रियस्य तमुत्सृज्य निन्दितो यात्यधो ध्रुवम् ॥ ३॥


‘यतः प्रवृत्तिर्भूतानां येन सर्वमिदं ततम् ।स्वकर्मणा तमभ्यर्च्य सिद्धिं विन्दति मानवः’ ॥ ४॥ (भ.गी.१८.४६)


नच शोकस्त्वया कार्यो बन्धूनां निधनेच्छया (निधनेक्षया) ।देहस्य सर्वथा नाशादनाशाच्चेतनस्य च ॥ ५॥


सृष्टिस्थित्यप्ययाज्ञानबन्धमोक्षप्रवृत्तयः ।प्रकाशनियमौ चैव ब्रह्मेशादिक्षरस्य च ।


न मे कुतश्चित् सर्गाद्याः स्वातन्त्र्याद् गुणपूर्तितः ।अतः समाधिकाभावान्मम मद्वशमेव च ॥ ७॥


ज्ञात्वैषां निधनाद्यं च जीवादेरस्वतन्त्रताम् ।अस्वातन्त्र्यान्निवृत्तौ च मामनुस्मर युद्ध्य च ॥ ८॥


ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्पराः ।अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥ ९॥


तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।भवामि नचिरात् पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥ १०॥ (भ.गी.१२.६-७)


मया ततमिदं सर्वं जगदव्यक्तमूर्तिना ।मत्स्थानि सर्वभूतानि नचाहं तेष्ववस्थितः ॥ ११॥ (भ.गी.९.४)


(सम्पूर्णसत्सर्व)सुपूर्णसत्सर्वगुणदेहोऽहं सर्वदा प्रभुः ।अस्पृष्टाखिलदोषैकनित्यसत्तनुरव्ययः ।


अथ दिव्यदृशं तस्य दत्वा व्याप्तं निजं वपुः ।देशतः कालतश्चैव पूर्णं सर्वगुणैः सदा ।


तत्प्रार्थितः पुनः कृष्णस्तद्रूपं लोकमानतः ।पूर्ववद् दर्शयामास पुनश्चैनमशिक्षयत् ॥ १४॥


ज्ञानं ज्ञेयं प्रकृत्यादि(ज्ञानज्ञेयप्रकृत्यादि) ज्ञापयन् पुरुषोत्तमः ।तेनानुशिष्टः पार्थस्तु सशरं धनुराददे ॥ १५॥


अथ व्यूढेष्वनीकेषु नदन् वायुसुतोऽभ्ययात् ।समितिं धार्तराष्ट्राणां ते तं सर्वे न्यवारयन् ।


क्षिप्रं नैव प्रहर्तव्यं ज्ञातिषु प्रहरत्स्वपि ।इत्येवाप्रहरत्यस्मिन् शत्रुभिः शरविक्षते ॥ १७॥


अमुचन् धार्तराष्ट्रेषु शस्त्रवृष्टिं दुरासदाम् ।सौभद्रप्रमुखा वीराः सर्वे पाण्डुसुतात्मजाः ॥ १८॥


अपीडयंस्ताञ्छस्त्रौघैर्धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।ररक्ष तान् वायुसुतो विसृजञ्छरसञ्चयान् ॥ १९॥


तत्र भीमशरैर्नुन्ना धार्तराष्ट्राः समन्ततः ।भग्नास्तानथ गाङ्गेयो दिव्यास्त्रविदधारयत्(दिव्यास्त्रं व्यदधारयत्, दिव्यास्त्रविदधारयत्)) ॥ २०॥


अथ द्वन्द्वानि युद्धानि बभूवुर्विजिगीषताम् ।द्रोणपार्षतयोश्चैव शैनेयकृतवर्मणोः ॥ २१॥


दुःशासनेन वीरस्य माद्रेयस्य यवीयसः ।नकुलस्य विकर्णस्य कार्ष्णेयैर्दुर्मुखादिनाम् ॥ २२॥


वृत्ते द्वन्द्वमहायुद्धे तत्र धर्मजपक्षगाः ।जिता विनैव शैनेयं सोऽजयद्धृदिकात्मजम् ॥ २३॥


अथ भीष्मद्रोणमुखैर्भगदत्तादिभिस्तथा ।विद्राप्यमाणं स्वबलं स्थापयामास मारुतिः ॥ २४॥


द्रोणं च भगदत्तं च कृपं दुर्योधनं तथा ।केवलं बाहुवीर्येण व्यजयद् भीमविक्रमः ।


अथ भीष्ममुदीर्णास्त्रं द्रावयन्तं वरूथिनीम् ।ससौमदत्तिं सौभद्रसहायोऽर्जुन आसदत् ॥ २६॥


सौभद्रं तत्र विक्रान्तमतीत्य द्युसरित्सुतः ।द्रावयामास पाञ्चालान् पश्यतः सव्यसाचिनः ॥ २७॥


तस्य विक्रममालक्ष्य पार्थं तद्गौरवानुगम् ।दृष्ट्वा युधिष्ठिरो राजा क्रुद्धः सेनामपाहरत् ॥ २८॥


रात्रौ युधिष्ठिरश्चिन्तामाप्य पार्थं व्यगर्हयत् ।स कृष्णाद्यैः सान्त्वितश्च पुनर्युद्धाय निर्ययौ ॥ २९॥


एवं भीष्मो दशाहानि सेनापत्यं चकार ह ।कृत्वाऽपि पाण्डवैर्युद्धं तत् कर्तुमकृतोपमम् ॥ ३०॥


कर्णोऽर्द्धरथ इत्युक्त्वा तावद् युद्धात् प्रयापितः(प्रहापितः) ।यावत् त्वं योत्स्यसे तावन्न योत्स्यामीति निर्गते ॥ ३१॥


कर्णेऽयुतरथानां(कर्णोऽयुतरथानां च) स नित्यशो वधमाहवे ।प्रतिजज्ञेऽकरोत् तच्च पुनश्चास्त्रविदां वरः ॥ ३२॥


सुसमर्थावपि वधे तस्य भीमधनञ्जयौ ।स्नेहेन यन्त्रितौ तस्य गौरवाच्चान्ववर्तताम् ॥ ३३॥


बभूवुस्तत्र युद्धानि चित्राणि सुबहूनि च ।तान्यम्बरे विमानस्था ब्रह्मरुद्रपुरस्सराः ।


धृष्टद्युम्नो महेष्वासः प्रतिव्यूह्याऽपगासुतम् ।चक्रे युद्धानि सुबहून्यजेयः शत्रुभी रणे ॥ ३५॥


तत्रोद्दधार कृष्णोऽपि फल्गुनं मृदुयोधिनम् ।दृष्ट्वा चक्रं तथोद्यम्य बाहुं भीष्माय जग्मिवान् ॥ ३६॥


तेन स्तुतो गृहीतश्च फल्गुनेन प्रणम्य च ।प्रार्थितो रथमारूढः पुनः शङ्खमपूरयत् ॥ ३७॥


ततो भीष्मोऽर्जुनश्चैव शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।अयत्नेन जितश्चैव फल्गुनेनाऽपगासुतः ॥ ३८॥


अयुतानि बहून्याजौ रथानां निजघान च ।जिताः सेनापहारं च चक्रुर्भीष्ममुखास्ततः ॥ ३९॥


कदाचिदग्रगो भीमो भीष्मद्रोणौ विसारथी ।कृत्वा विद्राप्य तानश्वान् भित्वा व्यूहं विवेश ह ॥ ४०॥


पुनः संस्थापितरथौ विजित्यायत्नतो बली ।यतमानौ महेष्वासौ धार्तराष्ट्रान् जघान ह ।


भगदत्तद्रौणिकृपशल्यदुर्योधनादयः ।सर्वे जिता द्राविताश्च सेना च बहुला हता ॥ ४२॥


विरथो व्यायुधश्चैव दृढवेधविमूर्च्छितः ।कृतो दुर्योधनः सर्वराज्ञां भीमेन पश्यताम् ॥ ४३॥


ततोऽपहारं सैन्यस्य जिताश्चक्रुश्च कौरवाः ।दुर्योधनो निशायां च ययौ यत्र नदीसुतः ।


उवाच हेतुना केन वयं जीवाम (क्षीयाम, जीयाम) सर्वदा ।पाण्डवाश्च जयं नित्यं लब्ध्वा हर्षमवाप्नुवन् ॥ ४५॥


तमाह भीष्मस्तेऽजेया देवास्ते धरणीं गताः ।विशेषतः केशवेन पालितास्तत्प्रियाः सदा ॥ ४६॥


मानसोत्तरशैले हि पुरा ब्रह्मपुरस्सराः ।स्थिता देवास्तदाऽपश्यद् ब्रह्मैको हरिमम्बरे ॥ ४७॥


स्तुत्वा सम्पूज्य भूमेः स भारावतरणाय तम् ।प्रार्थयामास तेनोक्तं देवानामवदद् विभुः ॥ ४८॥


अयं नारायणो देवः पुर्णानन्तगुणार्णवः ।आज्ञापयति वः सर्वान् प्रादुर्भावाय भूतले ।


एवं तेन समादिष्टा धर्मवाय्वादयोऽखिलाः ।अभवन् पाण्डवाद्यास्ते सेन्द्राः सह मरुद्गणाः ॥ ५०॥


स च नारायणो देवो देवकीनन्दनोऽभवत् ।तेनैते पालिताः पार्था अजेया देवसर्गिणः ।


इत्युक्तो डम्भबुद्ध्यैव नत्वा विष्णुं ततो ययौ ।प्रातर्निर्यातयामास सेनां युद्धाय दुर्मतिः ॥ ५२॥


दिव्यौषधेन भीष्मस्य भूत्वा च निरुजस्ततः ।भीष्ममग्रे निधायैव ययौ युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ ५३॥


तत्राऽसीद् युद्धमतुलं भीमभीष्मानुयायिनाम् ।पाण्डवानां कुरूणां च शूराणामनिवर्तिनाम् ॥ ५४॥


धृष्टद्युम्नस्तत्र भीमानुयायी दुर्योधनस्यावरजैः प्रयुद्ध्यन् ।सम्मोहनास्त्रेण विमोहयित्वा विकर्णपूर्वानहनच्च सेनाम् ॥ ५५॥


ततो द्रोणस्तान् समुत्थाप्य सर्वान् विज्ञानास्त्रेणाऽसदत् पार्षतं च ।तं भीमसेनः सूतहीनं विधाय व्यद्रावयच्छत्रुगणाञ्छरौघैः ॥ ५६॥


अथाऽसदत् कृतवर्मा रथेन धृष्टद्युम्नं सोऽभ्ययात् तावुभौ च ।ववर्षतुः शरवर्षैरथोग्रैस्तत्राकरोद् विरथं द्रौपदिस्तम् ॥ ५७॥


तस्मिन् जिते रथवीरे स्वयं तं दुर्योधनः पार्षतमाससाद ।तं भीमसेनो विरथायुधं च कृत्वा बाणेनाहनज्जत्रुदेशे ॥ ५८॥


विमूर्च्छितं तं रुधिरौघमुच्चैर्वमन्तमाशु स्वरथे निधाय ।कृपो ययौ मारुतिर्धार्तराष्ट्रीं व्यद्रावयत् पृतनां बाणपूगैः ॥ ५९॥


अथेन्द्रसूनुः केशवप्रेरितेन रथेन शत्रून् विधमञ्छरौघैः ।रथान् रणे पञ्चविंशत्सहस्रान् निनाय वैवस्वतसादनाय ॥ ६०॥


तमन्वगाद् (तमन्वयात्) युयुधानः सुधन्वा विद्रावयन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाम् ।तमभ्ययात् सौमदत्तिस्तयोश्च सुयुद्धमासीदतिभैरवास्त्रम् ॥ ६१॥


पुत्रान् दशास्याऽशु निहत्य वीरः स सात्यकेः सौमदत्तिः सकाशे ।समर्पयामास शरीरदारणैः शरैरुभौ तौ विरथौ च चक्रतुः ॥ ६२॥


अथासिपाणिं युयुधानमाशु महासिहस्तेन च सौमदत्तिना ।आसादितं वीक्ष्य रथं स्वकीयमारोपयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ६३॥


सुयोधनः सौमदत्तिं स्वकीयरथे व्यवस्थाप्य च भीमसेनात् ।अपाद्रवद् वासविर्भीष्ममाजौ समाससादाऽशु महेन्द्रकल्पः ॥ ६४॥


उभौ च तावस्त्रविदां प्रबर्हौ शरैर्महाशीविषसन्निकाशैः ।ततक्षतुर्नाकसदां समक्षं महाबलौ संयति जातदर्पौ ॥ ६५॥


स्वबाहुवीर्येण जितः स भीष्मः किरीटिना लोकमहारथेन ।सेनामपाहृत्य ययौ निशायामासादितायामथ पाण्डवाश्च ॥ ६६॥


ततः परेद्युः पुनरेव भीमभीष्मौ पुरस्कृत्य समीयतुस्ते ।सेने तदा सारथिहीनमाशु भीष्मं कृत्वा मारुतिरभ्ययात् परान् ।


दुर्योधनाद्येषु पराजितेषु भीष्मद्रोणद्रौणिपुरस्सरेषु ।महागजस्थो भगदत्त आगादायन् बाणं भीमसेनेऽमुचच्च(भीमसेने मुमोच) ॥ ६८॥


तेनातिविद्धे भीमसेनेऽस्य पुत्र उद्यच्छमानं पितरं निवार्य ।घटोत्कचोऽभ्यद्रवदाशु वीरः स्वमायया हस्तिचतुष्टयस्थः ॥ ६९॥


स वैष्णवास्त्रं भगदत्तसंस्थं विज्ञाय विष्णोर्वरतो विशेषतः ।अमोघमन्यत्र हरेर्मरुत्सुतः पुत्रे याते न स्वयमभ्यधावत् ॥ ७०॥


अनुग्रहादभ्यधिकादवध्यं जानन्नपि स्वं वासुदेवस्य नित्यम् ।तद्भक्तिवैशेष्यत एव तस्य सत्यं वाक्यं कर्तुमरिं नचायात् ।


स विस्मृतास्त्रस्तु यदा भवेत तदा भीमो भगदत्तं प्रयाति ।ऋते भीमं वाऽर्जुनं नास्त्रमेष प्रमुञ्चतीत्येव हि वेद भीमः ॥ ७२॥


चतुर्गजात्मोपरिगात्मकश्च घटोत्कचः सुप्रतीकं च तं च ।नानाप्रहारैर्वितुदंश्चकार सन्दिग्धजीवौ जगतां समक्षम् ॥ ७३॥


गजार्तनादं तु निशम्य भीष्ममुखाः समापेतुरमुं च दृष्ट्वा ।महाकायं भीमममुष्य पृष्ठगोपं च वाय्वात्मजमत्रसन् भृशम् ।


दिने परे चैव पुनः समेताः परस्परं पाण्डवाः कौरवास्ते ।तत्राऽसदन्नागसुतासमुद्भवः पार्थात्मजः शाकुनेयान् षडेकः ॥ ७५॥


तैः प्रासहस्तैः क्षतकायोऽतिरूढकोपः स खड्गेन चकर्त तेषाम् ।शिरांसि वीरो बलवानिरावान् भयं दधद् धार्तराष्ट्रेषु चोग्रम् ॥ ७६॥


दृष्ट्वा तमुग्रं धृतराष्ट्रपुत्रो दिदेश रक्षोऽलम्बुसनामधेयम् ।जह्यार्जुनिं क्षिप्रमिति स्म तच्च समासदन्नागसुतातनूजम्(नागसुतासमुद्भवम्) ॥ ७७॥


तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं मायायुजोर्वीर्यवतोर्महाद्भुतम् ।ससादिनोऽश्वान् स तु राक्षसोऽसृजत् ते पार्थपुत्रस्य च सादिनोऽहनन्(अहनत्) ।


हतं निशम्याऽर्जुनिमुग्रपौरुषो ननाद कोपेन वृकोदरात्मजः ।चचाल भूर्नानदतोऽस्य रावतः ससागरागेन्द्रनगा भृशं तदा ॥ ७९॥


अलम्बुसस्तं प्रसमीक्ष्य मारुतेः सुतं बलाढ्यं भयतः पराद्रवत् ।पराद्रवन् धार्तराष्ट्रस्य सेनाः सर्वास्तमाराथ सुयोधनो नृपः ॥ ८०॥


स भीमपुत्रस्य जघान मन्त्रिणो महाबलांश्चतुरोऽन्यांस्तथैव ।हतावशेषेषु च विद्रवत्सु घटोत्कचोऽभ्याहनदाशु तं नृपम् ॥ ८१॥


स पीड्यमानो युधि तेन रक्षसा प्रवेशयामास शरं घटोत्कचे ।दृढाहतस्तेन तदा बलीयसा घटोत्कचः प्रव्यथितेन्द्रियो भृशम् ।


चिरं प्रयुद्धौ नृपराक्षसाधिपौ परस्पराजेयतमौ रणाजिरे ।द्रोणादयो वीक्ष्य रिरक्षिषन्तः सुयोधनं प्रापुरमित्रसाहाः ॥ ८३॥


स द्रोणशल्यौ गुरुपुत्रगौतमौ भूरिश्रवःकृतवर्मादिकांश्च ।ववर्ष बाणैर्गगनं समाश्रितो घटोत्कचः स्थूलतमै सुवेगैः ॥ ८४॥


तमेकग्र्यै रथिभिः परिष्कृतं निरीक्ष्य भीमोऽभ्यगमत् समस्तान् ।द्रोणोऽत्र भीमप्रहितैः शरोत्तमैः सुपीडितः प्राप्तमूर्च्छः पपात ॥ ८५॥


द्रौणिं कृपाद्यान् ससुयोधनांश्च चकार भीमो विरथान् क्षणेन ।निवार्यमाणांस्तु वृकोदरेण घटोत्कचस्तान् प्रववर्ष सायकैः ॥ ८६॥


तेनाम्बरस्थेन तरुप्रमाणैरभ्यर्दिताः कुरवः सायकौघैः ।भूमौ च भीमेन शरौघपीडिताः पेतुर्नेदुः प्राद्रवंश्चातिभीताः ॥ ८७॥


सर्वांश्च ताञ्छिबिरं प्रापयित्वा विना भीष्मं कौरवान् भीमसेनः ।घटोत्कचश्चानदतां महास्वनौ नादेन लोकानभिपूरयन्तौ ॥ ८८॥


दुर्योधनोऽथ स्वजनैः समेतः पुनः प्रायाद् रणभूमिं स भीष्मम् ।जयोपायं भैमसेनेरपृच्छत् स्वस्यैव स प्राह न तं व्रजेति ॥ ८९॥


प्राग्ज्योतिषं चैव घटोत्कचाय सम्प्रेषयामास सुरापगासुतः ।स प्राप्य हैडिम्बमयोधयद् बली स चार्दयामास सकुञ्जरं तम् ॥ ९०॥


तेनाहतः (तेनार्दितः) प्राहिणोच्छूलमस्मै वियत्यवप्लुत्य तदा घटोत्कचः ।प्रगृह्य शूलं प्रबभञ्ज जानुमारोप्य देवा जहृषुस्तदीक्ष्य ॥ ९१॥


तदा स तस्यैव पदानुगान् नृपो जघान तं मारुतिरभ्ययाद् रणे ।स प्राहिणोद् भीमसेनाय वीरो गजं तमस्तम्भयदाशु सायकैः ॥ ९२॥


संस्तम्भिते बाणवरैस्तु नागे भीमस्याश्वान् सायकैरर्दयत्(आर्दयत्) सः ।सोऽभ्यर्दिताश्वोऽथ गदां प्रगृह्य हन्तुं नृपं तं सगजं समासदत् ॥ ९३॥


स हन्तुकामेन रुषाऽभिपन्नो भीमेन राजा पुरतः पृष्ठतश्च ।कृष्णेनास्त्रं वैष्णवं तद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) सहार्जुनेनापययौ स भीतः ॥ ९४॥


तस्मिन् गते भीमसेनार्जुनाभ्यां विद्राविते राजसङ्घे समस्ते ।भीष्मः सेनामपहृत्यापयातो दुर्योधनस्तं निशि चोपजग्मिवान् ॥ ९५॥


संश्रावितः क्रूरवचः स तेन चक्रे सत्यं मृत्युभयं विहाय ।शक्त्या हनिष्यामि परानिति स्म चक्रे च तत् कर्म तथा परेद्युः ॥ ९६॥


तं शक्तितो जुगुपुर्धार्तराष्ट्रास्तेनार्दिताश्चेदिपाञ्चालमुख्याः ।पराद्रवन् भीष्मबाणोरुभीताः सिंहार्दिताः क्षुद्रमृगा इवाऽर्ताः ॥ ९७॥


संस्थाप्य तान् भीष्ममभिप्रयान्तमलम्बुसोऽवारयत् पार्थसूनुम् ।विजित्य तं केशवभागिनेयो ययौ भीष्मं धार्तराष्ट्रोऽमुमार ॥ ९८॥


तद् युद्धमासीन्नृपपार्थपुत्रयोर्विचित्रमत्यद्भुतमुग्ररूपम् ।समं चिरं तत्र धनुश्चकर्त ध्वजं च राजा सहसाऽभिमन्योः ॥ ९९॥


अथैनमुग्रैश्च शरैर्ववर्ष सूतं च तस्याऽशु जघान वीरः ।तदाऽऽसदद् भीमसेनो नृपं तं जघान चाश्वान् धृतराष्ट्रजस्य ॥ १००॥


द्रोणो द्रौणिर्भगदत्तः कृपश्च सचित्रसेना अभ्ययुर्भीमसेनम् ।सर्वांश्च तान् विमुखीकृत्य भीमः स चित्रसेनाय गदां समाददे ॥ १०१॥


तामुद्यतां वीक्ष्य(तामुद्यतामीक्ष्य) पराद्रवंस्ते स चित्रसेनश्च रथादवप्लुतः ।सञ्चूर्णितो गदया तद्रथश्च तज्जीवनेनोद्धृषिताश्च कौरवाः ॥ १०२॥


भीष्मस्तु पाञ्चालकरूशचेदिष्वहन् सहस्राणि चतुर्दशोग्रः ।रथप्रबर्हानतितिग्मतेजा विद्रावयामास परानवीनिव ॥ १०३॥


विद्राप्य सर्वामपि पाण्डुसेनां विश्राव्य लोकेषु च कीर्तिमात्मनः ।सेनामपाहृत्य ययौ निशागमे संस्तूयमानो धृतराष्ट्रपुत्रैः ॥ १०४॥


द्रोणो विराटस्य पुरो निहत्य शङ्खं सुतं तस्य विजित्य तं च ।विद्राव्य सेनामपि पाण्डवानां ययौ नदीजेन सहैव हृष्टः ॥ १०५॥


भीमार्जुनावपि शत्रून् निहत्य विद्राप्य सर्वांश्च युधि प्रवीरान् ।युधिष्ठिरेणापहृते(युधिष्ठिरेणापि हृते) स्वसैन्ये भीतेन भीष्माच्छिबिरं प्रजग्मतुः ॥ १०६॥


युधिष्ठिरो भीष्मपराक्रमेण भीतो भीष्मं स्ववधोपायमेव ।प्रष्टुं ययौ निशि कृष्णोऽनुजाश्च तस्यान्वयुस्तं स पितामहो यत् ॥ १०७॥


भीमार्जुनौ शक्नुवन्तावपि स्म नर्तेऽनुज्ञां हन्तुमिमं समैच्छताम् ।पूज्यो यतो भीष्म उदारकर्मा कृष्णोऽप्ययात्(कृष्णोऽप्यायात्) तेन हि पाण्डवार्थे ॥ १०८॥


प्राप्यानुज्ञां भीष्मतस्ते वधाय शिखण्डिनं तद्वचसाऽग्रयायिनम् ।कृत्वा परेद्युर्युधये विनिर्गता भीष्मं पुरस्कृत्य तथा परेऽपि(तथाऽपरेऽपि) ॥ १०९॥


शिखण्डिनो रक्षकः फल्गुनोऽभूद् भीष्मस्य दुःशासन आस चाग्रे ।अन्ये च सर्वे जुगुपुर्भीष्ममेव न्यवारयन् भीमसेनादयस्तान् ॥ ११०॥


भीष्माय यान्तं युयुधानमाजौ न्यवारयद् राक्षसोऽलम्बुसोऽथ ।तं वज्रकल्पैरतुदद् वृष्णिवीरः शरैः स मायामसृजत् तदोग्राम् ॥ १११॥


अस्त्रेण मायामपनुद्य वीरो व्यद्रावयद् राक्षसं सात्यकिस्तम् ।तस्मिन् गते युयुधानो रथेन ययौ भीष्मं पार्थमन्वेव धन्वी ॥ ११२॥


द्रोणो द्रौणिर्धार्तराष्ट्रश्च राजा भूरिश्रवा भगदत्तः कृपश्च ।शल्यो बाह्लीकः कृतवर्मा सुशर्मा सर्वाश्च सेना वारिता वायुजेन ॥ ११३॥


स तान् मुहुर्विरथीकृत्य वीरः प्राग्ज्योतिषं सगजं द्रावयित्वा ।न्यवारयत् फल्गुनं योद्धुकामं पार्थश्च देवव्रतमाससाद ॥ ११४॥


युधिष्ठिरं भीष्ममभिप्रयान्तं माद्रीसुताभ्यां सहितं नृवीरम् ।न्यवारयच्छकुनिः सादिनां च युतोऽयुतेनैव वराश्वगेन ॥ ११५॥


तान् सादिनोऽश्वांश्च निहत्य सर्वान् विजित्य तं शकुनिं पाण्डवास्ते ।प्रापुर्भीष्मं द्रौपदेयाश्च सर्वे तथा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजः ॥ ११६॥


धृष्टद्युम्नं भीष्ममभिप्रयान्तं न्यवारयत् सैन्धवस्तं स बाणैः ।हत्वाश्वसूतं (हताश्वसूतं) सगणं द्रावयित्वा समासदद् भीष्ममेवाऽशु वीरः ॥ ११७॥


गुप्तोऽथ पार्थेन रणे शिखण्डी भीष्मं समासाद्य शरैरताडयत् ।भीष्मः स्त्रीत्वं तस्य जानन् न तस्मै मुमोच बाणान् स तु तं तुतोद ॥ ११८॥


शिखण्डिनं वारयामास बाणैर्दुर्मर्षणोऽमर्षणविह्वलेक्षणः ।नात्येतुमेनमशकच्छिखण्डी दुःशासनः पार्थमवारयत् तदा ॥ ११९॥


स लोकवीरोऽपि दुरात्मनाऽमुना रुद्धोऽशकन्नैनमतीत्य यातुम् ।भीष्मं पार्थः सायकाश्चास्य तस्मिन् ससज्जिरे पर्वतेष्वप्यसक्ताः(पर्वतेष्वप्यमुक्ताः) ॥ १२०॥


अमर्षयुक्तौ चिरमेव वीरावयुद्ध्यतामर्जुनधार्तराष्ट्रौ ।समं तदासीन्महदद्भुतं च दिवौकसां पश्यतां भूभृतां च ॥ १२१॥


तदा विराटद्रुपदौ कुन्तिभोजं कृष्णासुतान् केकयांश्चेकितानम् ।भूरिश्रवाः (भूरिः शलः) सोमदत्तो विकर्णः सकैकया (सकेकया) वारयामासुरुच्चैः ॥ १२२॥


जित्वैव तांस्तेऽभिययुश्च भीष्मं (तदा)ततोऽर्जुनोऽतीत्य दुःशासनं च ।भीष्मं शरैरार्च्छदरिप्रमाथिभिः शिखण्डिनं धार्तराष्ट्राद् विमुच्य ॥ १२३॥


स तैः समस्तैर्बहुभिश्शस्त्रपूगैर्भृशं मर्मस्वर्दितश्चापमुक्तैः ।शरैः समस्तान् विरथांश्चकार शैनैयपाञ्चालयुधिष्ठिराद्यान् ॥ १२४॥


स चेदिपाञ्चालकरूशमुख्यान् रथोदारान् पञ्चविंशत्सहस्रान् ।सम्प्रेषयामास यमाय बाणैर्युगान्तकालेऽग्निरिव प्रवृद्धः ॥ १२५॥


निरीक्ष्य तं सूर्यमिवाऽतपन्तं सञ्चोदितो वासुदेवेन पार्थः ।चिच्छेद तत्कार्मुकं लोकवीरो रणेऽर्द्धचन्द्रेण स चान्यदाददे ॥ १२६॥


चिच्छेद तच्चैवमष्टौ धनूंषि शक्तिं च चर्मासिवरं पराणि ।धनूंषि दत्तानि नृभिर्नृपस्य सर्वाणि चिच्छेद स पाकशासनिः ॥ १२७॥


ततः शरैः सूर्यकरप्रकाशैर्विव्याध सर्वे च युधिष्ठिराद्याः ।तैरर्दितो न्यपतद् भूतले स प्राणान् दधारापि तथोत्तरायणात् ॥ १२८॥


निपापितेऽस्मिन् मारुतिर्द्रोणमुख्यान् विद्राप्य तत्राऽगमदाशु तेऽपि ।तदायुधानि प्रणिधाय वीराः पार्थाः परे चैनमुपासदन् स्म ॥ १२९॥


प्रणम्य तं तद्वचनात् समीयुस्तस्मिन् दिने शिबिराण्येव सर्वे ।परे दिने सर्व एवोपतस्थुर्भीष्मं यदूनाम्पतिना सहैव ॥ १३०॥


स पूर्वदिवसे पार्थदत्तबाणोपबर्हणः ।तदाऽपि तृट्परीतात्मा योग्यं(योग्य) पेयमयाचत ॥ १३१॥


धार्तराष्ट्रैरविज्ञातं तदभिज्ञाय(तदाभिज्ञाय) वासविः ।वारुणास्त्रेण भित्त्वा स भूमिं वारि सुगन्धि च ।


यादृश्यस्त्रज्ञता पार्थे दृष्टाऽत्र कुरुनन्दनाः ।यादृग् बाह्वोर्बलं भीमे संयुगेषु पुनः पुनः ॥ १३३॥


यादृशं चैव माहात्म्यमनन्तमजरं हरेः ।विज्ञातं सर्वलोकस्य सभायां दृष्टमेव च ॥ १३४॥


उपारमत तद् युद्धं सुखिनः सन्तु भूमिपाः ।यथोचितं विभक्तां च भुङ्ग्ध्वं भूपाः सदा भुवम् ।


व्यासदत्तोरुविज्ञानात् सञ्जयादखिलं पिता ।श्रुत्वा तदा पर्यतप्यत् पाण्डवाः कृष्णदेवताः ।


{इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये भीष्मपातो नाम पञ्चविंशोऽध्यायः}


औं ॥ अथाखिलानां पृथिवीपतीनामाचार्यमग्र्यं रथिनां सुविद्यम् ।रामस्य विश्वाधिपतेः सुशिष्यं चक्रे चमूपं धृतराष्ट्रपुत्रः ॥ १॥


कर्णोऽपि भीष्मानुमतो धनुष्मान् युद्धोद्यतोऽभूत् तदसत्कृतः पुरा ।तस्मिन् स्थितेऽनात्तधनुस्तदैव(अनात्तधनुस्तथैव) रथं समास्थाय गुरुं समन्वयात् ॥ २॥


द्रोणो वृतो धार्तराष्ट्रेण धर्मसुतग्रहे तेन कृते प्रतिश्रवे ।ज्ञात्वा यत्ताः पाण्डवास्तं समीयुर्युद्धाय तत्राभवदुग्रयुद्धम् ॥ ३॥


पतत्रिभिस्तत्र दुधाव शात्रवान् द्रोणो धनुर्मण्डलमन्त्रनिस्सृतैः ।तमाससादाऽशु वृकोदरो नदंस्तमासदन्(नदन् समासदन्) द्रौणिकृपौ च मद्रराट् ॥ ४॥


स तान् विधूयाभ्यपतद् रणेऽग्रणीर्द्रोणं तमन्वार्जुनिरभ्ययात् परान् ।ववार तं मद्रपतिस्तयोरभूद् रणो महांस्तत्र गदां समाददे ।


उभावजेयौ गदिनामनुत्तमावतुल्यवीर्यौ प्रवरौ बलीयसाम् ।विचेरतुश्चित्रतमं प्रपश्यतां मनोहरं तावभिनर्दमानौ ।


गदाभिघातेन वृकोदरस्य विचेतनः प्रापतदत्र मद्रराट् ।भीमोऽपि कोपात् प्रचलत्पदः क्षितौ निधाय जानुं सहसोत्थितः क्षणात् ॥ ७॥


विचेतनं पतितं मद्रराजं विलोक्य भीमं च तमाह्वयन्तम् ।रथं समारोप्य जनस्य पश्यतः पुरश्च भीमस्य कृपोऽपजग्मिवान् ॥ ८॥


विजित्य मद्राधिपमोजसाऽरिहा नदन् रथं प्राप्य निजं स मारुतिः ।व्यद्रावयद् बाणगणैः परेषामनीकिनीं द्रोणसमक्षमेव ॥ ९॥


विद्रावयत्याशु कुरून् वृकोदरे विधूय सौभद्रमुखान् ससात्यकीन् ।द्रोणोऽभिपेदे नृपतिं गृहीतुं तमाससादाऽशु धनञ्जयो रथी ॥ १०॥


स वासुदेवप्रयते रथे स्थितः शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ।निहत्य नागाश्वरथान् प्रवर्तयन्नदृश्यताऽश्वेव च शोणितापगाः ॥ ११॥


निहन्यमानासु किरीटिना चमूष्वारक्षिते धर्मसुते तथाऽपदः ।चमूं च भीमार्जुनबाणभग्नां द्रोणोऽपहृत्यापययौ निशागमे ॥ १२॥


स धार्तराष्ट्रेण युधिष्ठिराग्रहात् संश्रावितः क्रूरवचो निशायाम् ।जगाद दूरं समराद् विनीयतां पार्थस्ततो धर्मसुतं ग्रहीष्ये ॥ १३॥


ततः सुशर्मा सहितो महारथैः संशप्तकैर्दूरतरं प्रणेतुम् ।युद्धाय भीमानुजमाशु क्लृप्तो दुर्योधनेनोमिति सोऽप्यवादीत् ॥ १४॥


समाह्वयामासुरथार्जुनं ते प्रातर्हुताशस्य दिशं रणाय ।अयोधयत् तान् स च तत्र गत्वा भीमो गजानीकमथात्र चावधीत् ॥ १५॥


निहन्यमानेषु गजेषु (सङ्घशो)सर्वशो विद्राप्यमाणेष्वखिलेषु राजसु ।प्राग्ज्योतिषो धार्तराष्ट्रार्थितस्तं समासदत् सुप्रतीकेन धन्वी ॥ १६॥


विभीषिताः सुप्रतीकेन भीमहया न तस्थुस्तदनु स्म सात्यकिः ।सौभद्रमुख्याश्च गजं तमभ्ययुश्चिक्षेप तेषां स रथानथाम्बरे ॥ १७॥


शैनेयपूर्वेषु रथोज्झितेषु भूमाववप्लुत्य कथञ्चिदेव ।स्थितेषु भीमे च विभीषिताश्वान् संयम्य युद्ध्यत्यपि कृष्ण ऐक्षत् ॥ १८॥


सङ्क्लेशितो वैष्णवास्त्रं (विमुञ्चेत्) प्रमुञ्चेत् प्राग्ज्योतिषो भीमसेने ततोऽहम् ।याम्यार्जुनेनैव तदस्त्रमात्मनः स्वीकर्तुमन्येन वरादधार्यम् ॥ १९॥


इति स्म सञ्चिन्त्य सहार्जुनेन तत्राऽययावथ पार्थं त्रिगर्ताः ।न्यवारयंस्त्वाष्ट्रमस्त्रं स तेषु व्यवासृजन्मोहनायाऽशु वीरः ॥ २०॥


तदस्त्रवीर्येण विमोहितास्ते परस्परं कृष्णपार्थाविति स्म ।जघ्नुस्तदा वासविस्तान् विसृज्य प्राग्ज्योतिषं हन्तुमिहाभ्यगाद् द्रुतम् ॥ २१॥


विसृज्यं भीमं स च पार्थमेव ययौ गजस्कन्धगतो गजं तम् ।सञ्चोदयामास (सम्बोधयामास, प्रचोदयामास) रथाय तस्य चक्रेऽपसव्यं हरिरेनमाशु ॥ २२॥


मनोजवेनैव रथे परेण(वरेण) सम्भ्राम्यमाणे नतु तं गजः सः ।प्राप्तुं शशाकाथ शरैः सुतीक्ष्णैरभ्यर्दयामास नृपं स वासविः ॥ २३॥


अस्त्रैश्च शस्त्रैः सुचिरं नृवीरावयुद्ध्यतां तौ बलिनां प्रबर्हौ ।अथो चकर्तास्य धनुः स पार्थः स वैष्णवास्त्रं च तदाऽङ्कुशेऽकरोत् ॥ २४॥


तस्मिन्नस्त्रे तेन तदा प्रमुक्ते(प्रयुक्ते, प्रदत्ते) दधार तद् वासुदेवोऽमितौजाः ।तदंसदेशस्य तु वैजयन्ती बभूव मालाऽखिललोकभर्तुः ॥ २५॥


दृष्ट्वैव तद् धारितमच्युतेन पार्थः किमर्थं विधृतं त्वयेति ।ऊचे तमाहाऽशु जगन्निवासो मयाऽखिलं धार्यते सर्वदैव ॥ २६॥


न मादृशोऽन्योऽस्ति कुतः परो मत् सोऽहं चतुर्धा जगतो हिताय ।स्थितोऽस्मि मोक्षप्रलयस्थितीनां सृष्टेश्च कर्ता क्रमशः स्वमूर्तिभिः ।


स एव च क्रोडतनुः पुराऽहं भूमिप्रियार्थं नरकाय चादाम् ।अस्त्रं मदीयं वरमस्य चादामवध्यतां यावदस्त्रं ससूनोः(स्वसूनोः, अस्त्रं च सूनोः) ॥ २८॥


अस्त्रस्य चान्यो नतु कश्चिदस्ति योऽवध्य एतस्य कुतश्च मत्तः ।इति स्म तेनैव मया धृतं तदस्त्रं तदेनं जहि चास्त्रहीनम् ॥ २९॥


इत्युक्तमाकर्ण्य स केशवेन सम्मन्त्र्य बाणं हृदये मुमोच ।प्राग्ज्योतिषस्यापरमुत्तमं शरं गजेन्द्रकुम्भस्थल आश्वमज्जयत् ॥ ३०॥


उभौ च तौ पेततुरद्रिसन्निभौ महेन्द्रवज्राभिहताविवाऽशु ।निहत्य तौ वासविरुग्रपौरुषो मुमोद साधु स्वजनाभिपूजितः ॥ ३१॥


अथाचलं वृषकं चैव हत्वा कनीयसौ शकुनेस्तं च बाणैः ।विव्याध मायामसृजत् स तां च विज्ञानास्त्रेणाऽशु नाशाय चक्रे ॥ ३२॥


स नष्टमायः प्राद्रवत् पापकर्मा ततः पार्थः शरपूगैश्चमूं ताम् ।विद्रावयामास तदा गुरोः सुतो माहिष्मतीपतिमाजौ जघान ॥ ३३॥


तदा भीमस्तस्य निहत्य वाहान् व्यद्रावयद् धार्तराष्ट्रीं चमूं च ।भीमार्जुनाभ्यां हन्यमानां चमूं तां दृष्ट्वा द्रोणः क्षिप्रमपाजहार ॥ ३४॥


प्राग्ज्योतिषे निहतेऽथाग्रहाच्च युधिष्ठिरस्यातिविषण्णरूपः ।दुर्योधनोऽश्रावयद् दीनवाक्यान्यत्र द्रोणं सोऽपि नृपं जगाद ॥ ३५॥


पार्थे गते श्वो नृपतिं ग्रहीष्ये निहन्मि वा तत्सदृशं तदीयम् ।इति प्रतिज्ञां स विधाय भूयः प्रातर्ययौ युद्धमाकाङ्क्षमाणः ॥ ३६॥


पद्मव्यूहं व्यूह्य परैरभेद्यं वराद् विष्णोस्तस्य मन्त्रं ह्यजप्त्वा(जपित्वा) ।पार्थाश्च तं प्रापुर्ऋतेऽर्जुनेन संशप्तकैर्युयुधे सोऽपि वीरः ॥ ३७॥


पार्था व्यूहं तु तं प्राप्य नाशकन् भेत्तुमुद्यताः ।जानंश्च प्रतिभायोगात् काम्यं नैवाजपन्मनुम् ॥ ३८॥


भीमो युधिष्ठिरस्तत्र तज्ज्ञं सौभद्रमब्रवीत् ।भिन्धि व्यूहमिमं तात वयं त्वामनुयामहे ॥ ३९॥


स एवमुक्तो रथिनां प्रबर्हो विवेश भित्त्वा द्विषतां चमूं ताम् ।अन्वेव तं वायुसुतादयश्च विविक्षवः सैन्धवेनैव रुद्धाः ॥ ४०॥


वरेण रुद्रस्य निरुद्ध्यमानो जयद्रथेनात्र वृकोदरस्तु ।विष्णोरभीष्टं वधमार्जुनेस्तदा विज्ञाय शक्तोऽपि नचात्यवर्तत ॥ ४१॥


जयद्रथस्थेन वृषध्वजेन प्रयुद्ध्यमानेषु वृकोदरादिषु ।प्रविश्य वीरः स धनञ्जयात्मजो विलोलयामास परोरुसेनाम् ॥ ४२॥


स द्रोणदुर्योधनकर्णशल्यैर्द्रोण्यग्रणीभिः कृतवर्मयुक्तैः ।रुद्धश्चचारारिबलेष्वभीतः शिरांसि कृन्तंस्तदनुव्रतानाम् ॥ ४३॥


स लक्षणं राजसुतं प्रसह्य(प्रगृह्य) पितुः समीपेऽनयदाशु मृत्यवे ।बृहद्बलं चोत्तमवीर्यकर्मा वरं रथानामयुतं च पत्रिभिः ॥ ४४॥


द्रोणादयस्तं हरिकोपभीताः प्रत्यक्षतो हन्तुमशक्नुवन्तः ।सम्मन्त्र्य कर्णं पुरतो निधाय चक्रुर्विचापाश्वरथं क्षणेन ॥ ४५॥


कर्णो धनुस्तस्य कृपश्च सारथिं द्रोणो हयानाशु विधूय सायकैः ।सञ्चर्मखड्गं रथचक्रमस्य प्रणुद्य हस्तस्थितमेव तस्थुः(चक्रुः) ॥ ४६॥


भीतेषु कृष्णादथ तद्वधाय तेष्वाससादाऽशु गदायुधं गदी ।दौःशासनिस्तौ युगपच्च मम्रतुर्गदाभिघातेन मिथोऽतिपौरुषौ ॥ ४७॥


तस्मिन् हते शत्रुरवं निशम्य हर्षोद्भवं मारुतिरुग्रविक्रमः ।विजित्य सर्वानपि सैन्धवादीन् युधिष्ठिरस्यानुमते न्यषीदत् ॥ ४८॥


व्यासस्तदा तानमितात्मवैभवो युधिष्ठिरादीन् ग्लपितानबोधयत् ।विजित्य संशप्तकपूगमुग्रो निशागमे वासविराप साच्युतः ॥ ४९॥


निशम्य पुत्रस्य वधं भृशार्तः प्रतिश्रवं सोऽथ चकार वीरः ।जयद्रथस्यैव वधे निशायां स्वप्नेऽनयत् तं गिरिशान्तिकं हरिः ॥ ५०॥


स्वयमेवाखिलजगद्रक्षाद्यमितशक्तिमान् ।अप्यच्युतो गुरुद्वारा प्रसादकृदहं त्विति ॥ ५१॥


ज्ञापयन् फल्गुनस्यास्त्रगुरुं गिरिशमञ्जसा ।प्रापयित्वैनमेवैतत्प्रसादादस्त्रमुल्बणम् ।


सान्त्वयित्वा सुभद्रां च गत्वोपप्लाव्यमच्युतः ।योजयित्वा रथं प्रातः सोऽर्जुनो युद्धमभ्ययात् ॥ ५३॥


श्रुत्वा प्रतिज्ञां पुरुहूतसूनोर्दुर्योधनेनार्थितः सिन्धुराजम् ।त्रातास्म्यहं सर्वथेति प्रतिज्ञां कृत्वा द्रोणो व्यूहमभेद्यमातनोत् ॥ ५४॥


स दिव्यमग्र्यं शकटाब्जचक्रं कृत्वा स्वयं व्यूहमुखे व्यवस्थितः ।पृष्ठे कर्णद्रौणिकृपैः सशल्यैर्जयद्रथं गुप्तमधात् परैश्च ॥ ५५॥


अथार्जुनो दिव्यरथोपरिस्थितः सुरक्षितः(संरक्षितः) केशवेनाव्ययेन ।विजित्य दुर्मर्षणमग्रतोऽभ्ययाद्(दुर्मर्षणमग्रतो ययौ) द्रोणं सुधन्वा गुरुमुग्रपौरुषः ॥ ५६॥


प्रदक्षिणीकृत्य तमाश्वगात् ततः कालात्ययं त्वेव विशङ्कमानः ।रथं मनोवेगमथानयद्धरिर्यथा शराः पेतुरमुष्य पृष्ठतः ॥ ५७॥


विजित्य हार्दिक्यमथाप्रयत्नः स इन्द्रसूनुः प्रविवेश तद् बलम् ।विलोलयामास च सायकोत्तमैर्यथा गजेन्द्रो नलिनीं बलोद्धतः ॥ ५८॥


स उच्चकाशेऽतिरथो रथोत्तमे सवासुदेवो हरिणा यथेन्द्रः ।चकर्त चोग्रो द्विषतां शिरांसि शरैः शरीरान्तकरैः समन्ततः ॥ ५९॥


दृढायुमच्युतायुं च हत्वा विन्दानुविन्दकौ ।शराभ्यां प्रेषयामास(प्रापयामास) यमाय विजयो युधि ॥ ६०॥


सुदक्षिणं च काम्बोजं(काम्भोजं) निहत्याम्बष्ठमेव च ।श्रुतायुधं नदीजातं वरुणादाससाद ह ।


स तु तेन शरैस्तीक्ष्णैरर्पितो विरथं क्षणात् ।चकार पार्थस्य रथमारुह्यारिधराय ताम् ॥ ६२॥


गदां चिक्षेप सा तस्य वारुणेः शिर एव तु ।बिभेद(चिच्छेद) शतधा शीर्णमस्तिष्कः(शीर्णमस्तकः) सोऽपतद् भुवि ॥ ६३॥


अयुद्ध्यन्तं स्वगदया यदि ताडयसि स्वयम् ।तया विशीर्णमस्तिष्को मरिष्यसि न संशयः ।


इत्यब्रवीत् तं वरुणः पुरा तेन स केशवे ।अयुद्ध्यति गदाक्षेपात् तया शीर्णशिरा अभूत् ॥ ६५॥


हतेषु वीरेषु निजेषु सङ्घशो विद्रावितेष्वालुलिते च सैन्ये ।दुर्योधनो द्रोणमुपेत्य दीनमुवाच(दीन उवाच) हा पार्थ उपेक्षितस्त्वया ॥ ६६॥


इतीरितेऽभेद्यममुष्य वर्म बद्ध्वा महामन्त्रबलात् स विप्रः ।जगाद येनैव बलेन पार्थैर्विरुद्ध्यसे तेन हि याहि फल्गुनम् ॥ ६७॥


इतीरितो धार्तराष्ट्रः स चापमादाय सौवर्णरथोपरिस्थः ।जगाम पार्थं तमवारयच्च शरैरनेकैरनलप्रकाशैः ॥ ६८॥


विव्याध पार्थोऽपि तमुग्रवेगैः शरैर्न ते तस्य च वर्मभेदम् (वर्मभेदनम्)।चक्रुस्ततो वासविर्दिव्यमस्त्रं तद्वर्मभेदाय समाददे रुषा ॥ ६९॥


सन्धीयमानं तु गुरोः सुतस्तच्चिच्छेद पार्थोऽथ सुयोधनाश्वान् ।हत्वा तलेऽविद्ध्यदथैनमुग्रैर्द्रौणिः शरैः पार्थमवारयद् युधि ॥ ७०॥


स द्रौणिकर्णप्रमुखैर्धनञ्जयो युयोध ते चैनमवारयञ्छरैः ।बभूव युद्धं तदतुल्यमद्भुतं जयद्रथार्थेऽद्भुतवीर्यकर्मणाम् ॥ ७१॥


पार्थे प्रविष्टे कुरुसैन्यमध्यं द्रोणोऽविशत् पाण्डवसैन्यमाशु ।स तद्रथानीकमुदारवेगैः शरैर्विधूय न्यहनच्च वीरान् ॥ ७२॥


स वीरवर्यः स्थविरोऽपि यूनां युवेव मध्ये प्रचचार धन्विनाम् ।प्रपातयन् वीरशिरांसि बाणैर्युधिष्ठिरं चाऽसददुग्रवीर्यः ॥ ७३॥


नृपग्रहेच्छुं तमवेत्य सत्यजिन्न्यवारयद् द्रौपदिराशु वीर्यवान् ।निवारितस्तेन शिरः शरेण चकर्त पाञ्चालसुतस्य विप्रः ॥ ७४॥


निहत्य तं वीरतमं रणोत्कटं युधिष्ठिरं बाणगणैः समर्दयत् ।स शक्तिस्तेन विधाय सङ्गरं निरायुधो व्यश्वरथः कृतः क्षणात् ॥ ७५॥


स ऊर्ध्वबाहुर्भुवि संस्थितोऽपि गृहीतुमाजौ गुरुणाऽभिपन्नः ।माद्रीसुतस्यावरजस्य यानमारुह्य वेगादपजग्मिवांस्ततः ॥ ७६॥


द्रोणं ततः शैशुपालिः सपुत्रो जारासन्धिः काशिराजः सशैव्यः ।समासदन् कैकयाश्चैव पञ्च समार्दयन् बाणगणैश्च सर्वशः ॥ ७७॥


स तान् क्रमेणैव निकृत्तकन्धराञ्छरोत्तमैस्तत्र विधाय विप्रः ।निनाय लोकं परमर्कमण्डलं व्रजन्ति निर्भिद्य यमूर्ध्वरेतसः ॥ ७८॥


विधूयमाने गुरुणोरुसैन्ये पृथासुतानां पृतनाः परेषाम् ।प्रायो रणे मारुतसूनुनैव हतप्रवीरा मृदिताः पराद्रवन् ॥ ७९॥


अलम्बुसो नाम तदैव राक्षसः समासदन्मारुतिमुग्रपौरुषम् ।स पीडितस्तेन शरैः सुतेजनैः(सुतैजसैः) क्षणाददृश्यत्वमवाप मायया ॥ ८०॥


सोऽदृश्यरूपोऽनुचरानपीडयद् भीमस्य तद् वीक्ष्य चुकोप मारुतिः ।अस्त्रज्ञतामात्मनिकेशवाज्ञया सन्दर्शयन्नागतधर्मसङ्कटः ॥ ८१॥


त्वाष्ट्रास्त्रमादत्त स काम्यकर्महीनोऽपि भीमस्तत उत्थिताः शराः ।ते बाणवर्यास्तददृश्यवेधिनो रक्षो विदार्याऽविविशुर्धरातलम् ॥ ८२॥


तद्धन्यमानं प्रविहाय भीममपाद्रवद् दूरतरं सुभीतम् ।ततस्तु भीमो द्विषतां वरूथिनीं विद्रावयामास शरैः सुमुक्तैः ॥ ८३॥


तदैव कृष्णातनयाः समेता जघ्नुः शलं संयति सौमदत्तिम् ।अलम्बुसं प्राप तदा घटोत्कचः परस्परं तौ रथिनावयुद्ध्यताम् ॥ ८४॥


घटोत्कचस्तं विरथं विधाय खस्थं ख एवाभियुयोध संस्थितः ।ततस्तु तं भीमसुतो निगृह्य निपात्य भूमौ प्रददौ प्रहारम् ॥ ८५॥


पदा शिरस्येव स पिष्टमस्तको ममार मध्ये पृथिवीपतीनाम् ।तस्मिन् हते भैमसेनिः कुरूणां व्यद्रावयद् रथवृन्दं समन्तात् ॥ ८६॥


तदाऽऽसदत् कृतवर्मा रथेन सेनां पाण्डूनां शरवर्षं प्रमुञ्चन् ।ददौ वरं तस्य हि पूर्वमच्युतः प्रीतः स्तुत्या सर्वजयं मुहूर्ते ॥ ८७॥


स तेन पाञ्चालगणान् विजिग्ये यमौ च भीमस्य पुरोऽथ तं च ।विव्याध बाणेन स वासुदेववरं विजानन् न तदा समभ्ययात् ॥ ८८॥


विनैव वृष्णीन् विजये वरो यदमुष्य तेनास्य हयान् स सात्यकिः ।निहत्य बाणैरतुदत् स यानमन्यत् समास्थाय ततोऽपजग्मिवान् ॥ ८९॥


तदा हरिः पाञ्चजन्यं सुघोषमापूरयामास जयेऽभियुद्ध्यति ।कर्णादिभिर्द्रौणिमुखै रिपूणां बलप्रहाणाय परः परेभ्यः ॥ ९०॥


स पाञ्चजन्योऽच्युतवक्त्रवायुना भृशं सुपूर्णोदरनिस्सृतध्वनिः ।जगद् विरिञ्चेशसुरेन्द्रपूर्वकं प्रकम्पयामास युगात्यये यथा ॥ ९१॥


गाण्डीवघोषे च तदाऽभिभूते युधिष्ठिरो भीतभीतस्तदैत्य ।शैनेयमूचे परसैन्यमग्ने पार्थे स्वयं युद्ध्यति केशवः स्म ॥ ९२॥


न श्रूयते गाण्डीवस्याद्य घोषः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य घोषः ।तद् याहि जानीहि तमद्य पार्थं यदि स्म जीवत्यसहाय एषः ॥ ९३॥(हृषीकेशतीर्थीये तु `गाण्डीवस्य' इति पठ्यते ।


इतीरितः सात्यकिरत्र विप्रान् सम्पूज्य वित्तैः परमाशिषश्च ।जयाय तेभ्यः प्रतिगृह्य सेनामुखं ययौ भीमसेनानुयातः ॥ ९४॥


भीमस्तु सेनामुखमाशु भित्त्वा प्रावेशयद् युयुधानं चमूं ताम् ।स युद्ध्यमानो गुरुणाऽभ्युपेक्षितः सूतं निहत्य द्रावयामास चाश्वान् ॥ ९५॥


बलं विवृद्धं च तदाऽस्य सात्यकेर्विप्राशीर्भिः कृष्णवरादपि स्म ।बलस्य वृद्धिर्हि पुराऽस्य दत्ता कृष्णेन तुष्टेन दिने हि तस्मिन् ॥ ९६॥


तदा (ततो) विवृद्धोरुबलात् स सात्यकिः संस्थाप्य भीमं प्रययौ रथेन ।तं बाणवर्षैः पृतनां समन्तान्निघ्नन्तमाजौ हृदिकात्मजोऽभ्ययात् ॥ ९७॥


तयोरभूद् युद्धमतीव दारुणं तत्राकरोत् तं विरथं स सात्यकिः ।विजित्य तं सात्यकिरुग्रधन्वा ययावतीत्यैव शिरांसि यूनाम् ।


निवारयन्तं तमसह्यविक्रमं निहत्य बाणैः समरे स सात्यकिः ।विलोडयामास(विलोलयामास) बलं कुरूणां निघ्नन् गजस्यन्दनवाजिपत्तिनः ॥ ९९॥


स पार्वतेयांश्च(स पार्वतीयांश्च) शिलाभिवर्षिणो निहत्य विद्राव्य च सर्वसैनिकान् ।समासदत् केशवफल्गुनौ च बली तमाराऽशु च यूपकेतुः ॥ १००॥


तयोरभूद् युद्धमतीव घोरं चिरं विचित्रं च महद् विभीषणम् ।परस्परं तौ तुरगान् निहत्य निपात्य सूतौ धनुषी निकृत्य ।


स सौमदत्तिर्भुवि सात्यकिं रणे निपात्य केशेषु च सम्प्रगृह्य ।पदाऽस्य वक्षस्यधिरुह्य खड्गमुदग्रहीदाशु शिरोऽपहर्तुम् ॥ १०२॥


तद् वासुदेवस्तु निरीक्ष्य विश्वतश्चक्षुर्जगादाऽशु धनञ्जयं रणे ।त्रायस्व शैनेयमिति स्म सोऽपि भल्लेन चिच्छेद भुजं परस्य ॥ १०३॥


स तेन चोत्कृत्तसखड्गबाहुर्विनिन्द्य पार्थं निषसाद भूमौ ।प्रायोपविष्टः शरसंस्तरे हरिं ध्यायन् विनिन्दन्नसुरप्रवेशात् ॥ १०४॥


गतेऽसुरावेश उतातिभक्त्या ध्यायत्यमुष्मिन् गरुडध्वजं तम् ।शैनेय उत्थाय निवार्यमाणः कृष्णार्जुनाद्यैरहरच्छिरोऽस्य ॥ १०५॥


तदा स्वकीयं रथमेतदर्थं क्लृप्तं ददौ सात्यकये ससूतम् ।कृष्णोऽथ पार्थस्य हयास्तृषाऽर्दितास्तदाऽसृजद् वारुणास्त्रं स पार्थः ॥ १०६॥


तेनैव तीर्थं परमं चकार तथाऽश्वशालामपि बाणरूपाम् ।ततो विमुच्यात्र हयानपाययद्धरिस्तदा वासविरर्दयत् परान् ॥ १०७॥


युयोज कृष्णस्तुरगान् रथे पुनर्गतश्रमानुद्धृतसायकान् प्रभुः ।प्रचोदिते तेन रथे स्थितः पुनस्तथैव बीभत्सुररीनयोधयत् ॥ १०८॥


शिनिप्रवीरे तु गते युधिष्ठिरः पुनश्च चिन्ताकुलितो बभूव ह ।जगाद भीमं च न गाण्डिवध्वनिः संश्रूयते पाञ्चजन्यस्य रावः ॥ १०९॥


मया नियुक्तश्च गतः स सात्यकिर्भारं च तस्याधिकमेव मन्ये ।तत् पाहि पार्थं युयुधानमेव च त्वं भीम गत्वा यदि जीवतस्तौ ॥ ११०॥


इतीरितः प्राह वृकोदरस्तं न रक्षितं वासुदेवेन पार्थम् ।ब्रह्मेशानावपि जेतुं समर्थौ किं द्रौणिकर्णादिधनुर्भृतोऽत्र ॥ १११॥


अतो भयं नास्ति धनञ्जयस्य न सात्यकेश्चैव हरेः प्रसादात् ।रक्ष्यस्त्वमेवात्र मतो मयाद्य (ममाद्य) द्रोणो ह्ययं यतते त्वां ग्रहीतुम् ॥ ११२॥


इतीरितः प्राह युधिष्ठिरस्तं न जीवमाने युधि मां घटोत्कचे ।धृष्टद्युम्ने चास्त्रविदां वरिष्ठे द्रोणो वशं नेतुमिह प्रभुः क्‍वचित् ॥ ११३॥


यदि प्रियं कर्तुमिहेच्छसि त्वं मम प्रयाह्याशु च पार्थसात्यकी ।रक्षस्व सञ्ज्ञामपि सिंहनादात् कुरुष्व मे पार्थशैनेयदृष्टौ ॥ ११४॥


तथा हते चैव जयद्रथे मे कुरुष्व सञ्ज्ञामिति तेन भीमः ।उक्तस्तु हैडिम्बममुष्य रक्षणे व्यधाच्च सेनापतिमेव सम्यक् ॥ ११५॥


स चाऽह सेनापतिरत्र भीमं प्रयाहि तौ यत्र च केशवार्जुनौ ।न जीवमाने मयि धर्षितुं क्षमो द्रोणो नृपं मृत्युरहं च तस्य ॥ ११६॥


इति ब्रुवाणं (ब्रुवाणे) प्रणिधाय भीमः पुनः पुनस्तं नृपतिं गदाधरः ।ययौ परानीकमधिज्यधन्वा निरन्तरं प्रवमन्(प्रपतन्) बाणपूगान् ॥ ११७॥


न्यवारयत् तं शरवर्षधारो द्रोणो वचश्चेदमुवाच भीमम् ।शिष्यस्नेहाद् वासविः सात्यकिश्च मया प्रमुक्तो भृशमानतौ मयि ॥ ११८॥


स्वीया प्रतिज्ञाऽपि हि सैन्धवस्य गुप्तौ मया पार्थकृते विसृष्टा ।दास्ये न ते मार्गमहं कथञ्चित् पश्यास्त्रवीर्यं मम दिव्यमद्भुतम् ॥ ११९॥


इत्युक्तवाक्यः स गदां समाददे चिक्षेप तां द्रोणरथाय भीमः ।उवाच चाहं पितृवन्मानये त्वां सदा मृदुस्त्वां प्रति नान्यथा क्‍वचित् ॥ १२०॥


अमार्दवे पश्य च यादृशं बलं ममेति तस्याऽशु विचूर्णितो रथः ।गदाभिघातेन वृकोदरस्य ससूतवाजिध्वजयन्त्रकूबरः ॥ १२१॥


द्रोणो गदामापततीं निरीक्ष्य त्ववप्लुतो लाघवतो धरातले ।तदैव दुर्योधनयापितं रथं परं समास्थाय शरान् ववर्ष ह ॥ १२२॥


शरैस्तदीयैः परमास्त्रमन्त्रितैः प्रवृष्यमाणो जगदीरणात्मजः ।शिरो निधायाऽशु पुरो वृषो यथा तमभ्ययादेव रथादवप्लुतः ॥ १२३॥


मनोजवादेव तमाप्य भीमो रथं गृहीत्वाऽम्बर आक्षिपत् क्षणात् ।शक्तोऽप्यहं त्वां न निहन्मि गौरवादित्येव सुज्ञापयितुं(विज्ञापयितुं) तदस्य ॥ १२४॥


सवाजिसूतः स रथः क्षितौ (पतद्विचूर्णितः)पतन् विचूर्णितोऽस्माद् गुरुरप्यवप्लुतः ।तदा विशोकोऽस्य रथं समानयत् तमारुहद् भीम उदारविक्रमः ॥ १२५॥


द्रोणोऽपि दुर्योधनदत्तमन्यद् रथं समास्थाय युधिष्ठिरं ययौ ।गृहीतुकामं नृपतिं प्रयान्तं न्यवारयत् संयति वाहिनीपतिः ॥ १२६॥


विदारितां द्रोणशरैः स्वसेनां संस्थाप्य(संस्थाप्य भीमो) भूयो द्रुपदात्मजः शरैः ।द्रोणं निवार्यैव चमूं परेषां विद्रावयामास च तस्य पश्यतः ॥ १२७॥


तयोरभूद् युद्धमतीव रौद्रं जयैषिणोः पाण्डवधार्तराष्ट्रयोः ।अत्यद्भुतं सन्ततबाणवर्षतमनारतं सुचिरं निर्विशेषम् ॥ १२८॥


ततः प्रायाद् भीमसेनोऽमितौजा मृत्नञ्छरैः कौरवराजसेनाम् ।विन्दानुविन्दप्रमुखा धार्तराष्ट्रास्तमासेदुर्द्वादश वीरमुख्याः ।


हतेषु तेषु प्रवरेषु धन्विनां सत्यव्रतः पुरमित्रो जयश्च ।वृन्दारकः पौरवश्चेत्यमात्याः समासेदुर्धार्तराष्ट्रस्य भीमम् ॥ १३०॥


स तैः पृषत्कैरवकीर्यमाणः शितान् विपाठान्(सितान् विपाटान्) युगपत् समाददे ।जहार तैरेव शिरांसि तेषां हतेषु तेष्वेव परे प्रदुद्रुवुः ॥ १३१॥


स सिंहवत् क्षुद्रमृगान् समन्ततो विद्राप्य शत्रून् हृदिकात्मजं रणे ।अभ्यागमत् तेन निवारितः शरैः क्षणेन चक्रे विरथाश्वसूतम् ।


विजित्य हार्दिक्यमथाऽशु भीमो विद्रावयामास वरूथिनीं ताम् ।सम्प्रेषयन् सर्वनराश्वकुञ्जरान् (सर्वनरांश्च कुञ्जरान्) यमाय यातो हरिपार्थपार्श्वम् ॥ १३३॥


दृष्ट्वैव कृष्णविजयौ परमप्रहृष्टस्ताभ्यां निरीक्षित उत प्रतिभाषितश्च ।सञ्ज्ञां नृपस्य स ददावपि सिंहनादान् श्रुत्वा परां मुदमवाप स चाग्र्यबुद्धिः ॥ १३४॥


भीमस्य नानदत एव महास्वनेन विण्मूत्रशोणितमथो मृतिमापुरेके ।भीतेषु सर्वनृपतिष्वमुमाप तूर्णं कर्णो विकर्णमुखरा अपि धार्तराष्ट्राः ॥ १३५॥


हत्वा विकर्णमुत तत्र च चित्रसेनं सञ्चूर्णितं प्रविदधे (सञ्चूर्णितं च विदधे) रथमर्कसूनोः ।घोरैः शरैः पुनरपि स्म समर्द्यमानः कर्णोऽपयानमकरोद् द्रुतमेव भीमात् ॥ १३६॥


आश्वास्य चैव सुचिरं पुनरेव भीमं युद्धाय याति धृतराष्ट्रसुतैस्तथाऽन्यैः ।तांश्चैव तत्र विनिहत्य तथैव कर्णो व्यश्वायुधः कृत उतापययौ क्षणेन ॥ १३७॥


विकर्णचित्रसेनाद्या एवं वीरतमाः सुताः ।कर्णस्य पश्यतो भीमबाणकृत्तशिरोधराः ॥ १३८॥


निपेतुर्धृतराष्ट्रस्य रथेभ्यः पृथिवीतले ।त्रयोविंशतिरेवात्र कर्णसाहाय्यकारिणः ॥ १३९॥


एकविंशतिवारं च व्यश्वसूतरथध्वजः ।गाढमभ्यर्द्दितस्तीक्ष्णैः शरैर्भीमेन संयुगे ॥ १४०॥


प्राणसंशयमापन्नः सर्वलोकस्य पश्यतः ।रणं त्यक्त्वा प्रदुद्राव रुदन् दुःखात् पुनः पुनः ॥ १४१॥


द्वाविंशतिमयुद्धे तु रामदत्तं सुभास्वरम् ।अभेद्यं रथमारुह्य विजयं धनुरेव च ॥ १४२॥


तद्दत्तमेव सङ्गृह्य तूणौ (तूणी) चाक्षयसायकौ ।आससाद रणे भीमं कर्णो वैकर्तनो वृषा(रुषा) ॥ १४३॥


सुघोर आसीत् स तयोर्विमर्दो भीमस्य कर्णस्य च दीर्घकालम् ।आकाशमाच्छादयतोः शरौघैः परस्परं चैव सुरक्तनेत्रयोः ॥ १४४॥


ततो भीमो महाबाहुः सहजाभ्यां च संयुतम् ।त्वां तु कुण्डलवर्मभ्यां शक्नुयां हन्तुमञ्जसा ॥ १४५॥


इति ज्ञापयितुं तस्य कुण्डले कवचं तथा ।शरैरुत्कृत्य समरे पातयामास भूतले ॥ १४६॥


एवं तान्यपकृष्याहं हन्यां त्वामिति वेदयन् ।पुनश्च बहुभिस्तीक्ष्णैः शरैरेनं समर्दयत् ॥ १४७॥


ततस्तु भीमस्य बभूव बुद्धिरस्पर्धिनः सर्वजयो हि दत्तः ।अमुष्य रामेण न च स्पृधाऽयं कर्णो मया युद्ध्यति कृच्छ्रगो ह्ययम् ॥ १४८॥


तथाऽपि मे भगवानत्यनुग्रहाज्जयं ददात्यात्मवचो विहाय (वचोऽपहाय) ।मया तु मान्यं वचनं हरेः सदा तस्माद् दास्ये विवरं त्वद्य शत्रोः ॥ १४९॥


एवं स्मृत्वा तेन रन्ध्रे प्रदत्ते कर्णोऽस्त्रवीर्येण धनुर्न्यकृन्तत् ।रश्मीन् हयानां च ततो रथं स तत्याज नैजं बलमेव वेदयन् ॥ १५०॥


न मे रथाद्यैर्धनुषाऽपि कार्यमित्येव सञ्ज्ञापयितुं (स ख्यापयितुं) वृकोदरः ।खमुत्पपातोत्तमवीर्यतेजा रथं च कर्णस्य समास्थितः क्षणात् ॥ १५१॥


भीतस्तु(भीमस्तु) कर्णो रथकूबरे तदा व्यलीयताधः (व्यलीयतातः) स वृकोदरो रथात् ।अवप्लुतो ज्ञापयितुं स्वशक्तिं निरायुधत्वेऽप्यरिनिग्रहादौ ॥ १५२॥


नैच्छद् गृहीतुं(ग्रहीतुं) विनिहन्तुमेव वा रथं धनुर्वाऽस्य रणेऽपहर्तुम् ।द्रोणस्य यद्वत् पूर्वमतीव(द्रोणस्य यत्पूर्वमतीव) शक्तोऽप्यमानयद् रामवचोऽस्य भक्त्या ॥ १५३॥


सत्यां कर्तुं वासवेश्च प्रतिज्ञां सम्मानयन् वैष्णवत्वाच्च कर्णम् ।दातुं रन्ध्रं सूर्यजस्य प्रयातः शरक्षेपार्थं दुरमतिष्ठदत्र ॥ १५४॥


ततः कर्णो दूरगतं वृकोदरं सम्मानयन्तं रामवाक्यं विजानन् ।शरैरविध्यत् स च तानवारयद् गजैर्मृतैस्तांश्च चकर्त कर्णः ॥ १५५॥


व्यसून् गजान् प्रक्षिपन्तं समेत्य संस्पृश्य चापेन वचश्च दुष्टम् ।संश्रावयामास सुयोधनस्य प्रीत्यै प्रजानन्नपि तस्य वीर्यम् ॥ १५६॥


संश्रावयन्तं वचनानि रूक्षाण्यपाहनद् बाणवरैस्तदाऽर्जुनः(बाणगणैस्तदा) ।स वर्महीनः पार्थबाणाभितप्तो व्यपागमद् भीम आपाऽत्मयानम् ॥ १५७॥


कर्णो भीमे वासवीं नैव शक्तिं विमोक्तुमैच्छन्नैव बीभत्सुतोऽन्यान् ।हन्यामिति प्राह यतः स कुन्त्यै यद्यप्यवध्यः स तयाऽपि भीमः ॥ १५८॥


नारायणास्त्रं शिरसि प्रपातितं न यस्य लोमाप्यदहच्चिरस्थितम्(लोमाप्यदहरच्छिरःस्थितम्) ।किं तस्य शक्तिः प्रकरोति वासवी तथाऽन्यदप्यस्त्रशस्त्रं महच्च ॥ १५९॥


भीमः कर्णरथं प्राप्तः शक्तिं नाऽदातुमैच्छत ।अभिप्रायं केशवस्य जानन् हैडिम्बमृत्यवे ।


दिव्यं रथं धनुश्चैव कृष्णबुद्ध्योऽर्जुनो हरेत् ।इति भीतस्तु तां शक्तिमादायार्जुनमृत्यवे ।


एकं हृतं चेदन्यत् स्यादिति मत्वा भयाकुलः ।बिभेति सर्वदा नीतेः कृष्णस्यामिततेजसः ॥ १६२॥


निश्चितो मरणायैव मृतिकाले तु तं रथम् ।आरुह्यागाद्धि पूर्वं तु न कालं मन्यते मृतेः ॥ १६३॥


शक्तिं तु तद्रथगतां प्रसमीक्ष्य कृष्णः संस्थाप्य पार्थमपि सात्यकिमेव योद्धुम् ।दत्त्वा स्वकीयरथमेव विरोचनस्य(विकर्तनस्य) पुत्रेण सोऽदिशदमुष्य बलं प्रदाय ॥ १६४॥


शिष्यं त्वशक्तमिह मे प्रतियोधनाय पार्थो ह्यदादिति स सात्यकिमीक्षमाणः ।संस्पर्धयैव युयुधे विरथं चकार तेनैव सात्यकिरमुं हरियानसंस्थः ॥ १६५॥


न केशवरथे कश्चित् स्थितो याति पराजयम् ।अतश्च सात्यकिर्नाप कर्णेनात्र पराजयम् ॥ १६६॥


शस्त्रसङ्ग्रहकाले तु कुमाराणां व्रतं भवेत् ।इत्युक्तं जामदग्न्येन धनुर्विद्यापुराकृता ॥ १६७॥


तच्छत्रुवधरूपं च पूर्वासिद्धं च गूहितम् ।अविरुद्धं च धर्मस्य कार्यं रामस्य तुष्टिदम् ॥ १६८॥


अनुपद्रवाय (अनुपद्रवं च) लोकस्येत्यतो भीमो व्रतं त्विदम् ।चकार तूबरेत्युक्ते हन्यामिति रहः प्रभुः ॥ १६९॥


अनुपद्रवाय लोकस्य सुव्यञ्जच्श्मश्रुमण्डलः(सुव्यक्तश्मश्रुमण्डलः) ।सुश्मश्रुं मां न कश्चिद्धि तथा ब्रूयादिति स्फुटम् ।


अर्जुनस्यापि गाण्डीवं देहीत्युक्तो(देहीत्युक्ते) निहन्म्यहम्(निहन्मितम्) ।इति तच्च विजानाति भीम एको नचापरः ।


प्रतिज्ञां भीमसेनस्य ब्रुवतः फल्गुने(फाल्गुने) रहः ।दुर्योधनस्तु शुश्राव तां च कर्णाय सोऽब्रवीत् ॥ १७२॥


अतूबरोऽपि तेनासौ तस्मात् तूबर इत्यलम् ।उक्तः प्रकोपनायैव तस्मादर्जुनमब्रवीत् ॥ १७३॥


जानासि मत्प्रतिज्ञां त्वं त्वत्प्रतिज्ञामहं तथा ।तत्र हन्तव्यतां प्राप्तो मम वैकर्तनोऽत्रहि ॥ १७४॥


प्रतिज्ञातो वधश्चास्य त्वयाऽपि मदनुज्ञया ।अतस्त्वया मयैवाऽयं (मया वाऽयं) हन्तव्यः सूतनन्दनः ॥ १७५॥


इत्युक्तो वासविः प्राह हन्तव्योऽयं मयैव हि ।त्वदीयोऽहं यतस्तेन मत्कृतं त्वत्कृतं भवेत् ॥ १७६॥


न त्वत्कृतं मत्कृतं स्याद् गुरुर्मम यतो भवान् ।अतो मयैव हन्तव्य इत्युक्त्वा कर्णमब्रवीत् ॥ १७७॥


रूक्षा वाचः श्रावितोऽयं भीमः कृष्णस्य शृण्वतः ।यच्चाभिमन्युर्युष्माभिरेकः सम्भूय पातितः ॥ १७८॥


अतस्त्वां निहनिष्यामि त्वत्पुत्रं च तवाग्रतः ।इत्युक्तोऽन्यं रथं प्राप्य कर्ण आवीज्जयद्रथम् ॥ १७९॥


द्रौणिकर्णाभिगुप्तं तं नाशकद्धन्तुमर्जुनः ।तत्र वेगं परं चक्रे द्रौणिः पार्थनिवारणे ॥ १८०॥


नचैनमशकत् तर्तुं यत्नवानपि फल्गुनः ।तयोरासीच्चिरं युद्धं चित्रं लघु च सुष्ठु च ॥ १८१॥


तद् दृष्ट्वा भगवान् कृष्णो लोहितायति भास्करे ।अजिते द्रोणतनये त्वहते च जयद्रथे ।


तमोव्याप्ते गगने सूर्यमस्तं गतं मत्वा द्रौणिपूर्वाः समस्ताः ।विशश्रमुः सैन्धवश्चार्जुनस्य हतप्रतिज्ञस्य मुखं समैक्षत ॥ १८३॥


तदा हरेराज्ञया शक्रसूनुश्चकर्त बाणेन जयद्रथस्य ।वह्निं (अग्निं) विविक्षन्निव दर्शितः शिरस्तदा वचः प्राह जनार्दनस्तम् ॥ १८४॥


नैतच्छिरः पातय भूतले त्वमितीरितः पाशुपतास्त्रतेजसा ।दधार बाणैरनुपुङ्खपुङ्खैः पुनस्तमूचे गरुडध्वजो वचः ॥ १८५॥


इदं पितुस्तस्य करे निपात्यतां वरोऽस्य दत्तो हि पुराऽमुनाऽयम्(यत्) ।शिरो निकृत्तं भुवि पातयेद् यस्तवास्य भूयाच्च शिरः सहस्रधा ॥ १८६॥


इति स्म वध्यः स पिताऽपि(वध्योऽस्य पिताऽपि) तेनेत्युदीरिते तस्य सन्ध्याक्रियस्य ।अङ्के व्यधात् तच्छिर आशु वासविः स सम्भ्रमात् तद् भुवि च न्यपातयत् ॥ १८७॥


ततोऽभवत् तस्य शिरः सहस्रधा हरिश्च चक्रे तमसो लयं पुनः ।तदैव सूर्ये सकलैश्च दृष्टे हाहेति वादः सुमहानथाऽसीत् ॥ १८८॥


भीमस्तदा शल्यसुयोधनादीन् कृपं च जित्वा व्यनदत् सुभैरवम् ।कुर्वन् साहाय्यं फल्गुनस्यैव तुष्टो बभूव शैनेय उतो हते रिपौ ॥ १८९॥


अपूरयत् पाञ्चजन्यं च कृष्णो मुदा तदा देवदत्तं च पार्थः ।भीमस्य नादं सहपाञ्चजन्यघोषं श्रुत्वा निहतं सिन्धुराजम् ।


ततो द्रौणिमुखां(द्रौणिमुखान्) सेनां सर्वां भीमोऽभ्यवर्तत।पार्थः कर्णमुखाञ्छिष्टान् ततोऽभज्यत तद् बलम् ॥ १९१॥


शीर्णां सेनां प्रविविशुर्धृष्टद्युम्नपुरोगमाः ।ततस्तं देशमापुस्ते यत्र भीमधनञ्जयौ ॥ १९२॥


तत एकीकृताः सर्वे पाण्डवाः सहसोमकाः ।परान् विद्रावयामासुस्ते भीताः प्राद्रवन् दिशः ॥ १९३॥


विद्राप्यमाणं सैन्यं तं दृष्ट्वा दुर्योधनो नृपः ।जयद्रथवधाच्चैव कुपितोऽभ्यद्रवत् परान् ॥ १९४॥


स भीमसेनं च धनञ्जयं च युधिष्ठिरं माद्रवतीसुतौ च ।धृष्टद्युम्नं सात्यकिं द्रौपदेयान् सर्वानेकः शरवर्षैर्ववर्ष ॥ १९५॥


ते विव्यधुस्तं बहुभिः शिलीमुखैः(शिलीमुखान्) स ताननादृत्य चकर्त बाणैः ।धनूंषि चित्राणि महारथानां चकार सङ्ख्ये(युद्धे) विरथौ यमौ च ॥ १९६॥


आदाय चापानि पराणि तेऽपि दुर्योधनं ववृषुः सायकौघैः ।अचिन्तयित्वैव शरान्स एको न्यवारयत् तानखिलांश्च बाणैः ॥ १९७॥


तं गाहमानं द्विषतां बहूनां मध्ये द्रोणद्रौणिकृपप्रधानाः ।दृष्ट्वा सर्वे जुगुपुः स्वात्तचापा अनारतं बाणगणान् सृजन्तः ॥ १९८॥


सुयोधनः कर्णमाह जहि भीममिमं युधि ।स आह नैष शक्यो हि जेतुं देवैः सवासवैः ॥ १९९॥


दैवाज्जीवाम्यहं राजन् युध्यंस्तेनातिपीडितः ।अतो घटामहे शक्त्या जयो दैवसमाहितः ॥ २००॥


दुर्योधनो द्रोणमाह सैन्धवस्त्वदुपेक्षया ।पार्थेन निहतो भीमसात्यकिभ्यां च मे बलम् ॥ २०१॥


प्रतिज्ञा च परित्यक्ता पाण्डवस्नेहतस्त्वया ।इत्युक्तः कुपितो द्रोणः प्रतिज्ञामकरोत् ततः ॥ २०२॥


इतः परं नैव रणाद् रात्रावहनि वा क्‍वचित् ।गच्छेयं नैव (नच) मोक्ष्यामि वर्म बद्धं कथञ्चन ॥ २०३॥


मत्पुत्रश्च त्वया वाच्यः पाञ्चालान् नैव शेषय (शेषयेत्, शेषयेः) ।सदौहित्रानितीत्युक्त्वा(सदौहित्रानिति प्रोक्त्वा) विजगाहे निशागमे ॥ २०४॥


चमूं परेषामभ्यागाद् धृष्टद्युम्नस्तमाशु च ।द्रौणिदुर्योधनौ तत्र विरथीकृत्य मारुतिः ।


अक्षोहिण्यस्तु सप्तैव सेनयोरुभयोरपि ।हतास्तासां च भीमेन तिस्रो द्वे फल्गुनेन च ॥ २०६॥


सौभद्रसात्यकिमुखैस्तन्मध्ये षोडशांशकः(षोडशांसकैः) ।हैडिम्बपार्षतमुखैस्त्रयाच्च दशमांशकः(दशमांशतः) ॥ २०७॥


भीष्मद्रोणद्रौणिभिश्च द्वे समं निहते तदा ।तदन्यैर्मिलितैः सर्वैस्तच्चतुर्थांश एव च ॥ २०८॥


ततो रात्रौ पञ्चभिश्च पार्थाः षड्भिश्च कौरवाः ।अक्षोहिणीभिः संव्यूह्य युद्धं चक्रुः सुदारुणम् ।


स कर्णपुरतो भीमो दुष्कर्णं कर्णमेव च ।दुर्योधनस्यावरजौ निष्पिपेष पदा क्षणात् ।


निरायुधोऽहमिति मां त्वमात्थ पुरुषं वचः ।निरायुधः पदैवाहं त्वां हन्तुमशकं तदा ॥ २११॥


इति कर्णस्य तौ भीमः सञ्ज्ञया ज्ञापयन् भुवि ।पदा पिपेष कालिङ्गं मुष्टिनैव जघान ह ॥ २१२॥


मुष्टिना त्वद्वधायाहं समर्थ इति किं वदे ।तस्मान्मया रक्षितस्त्वमिति ज्ञापयितुं प्रभुः ।


केतुमांश्च पिता तस्य शक्रदेवः श्रुतायुधः ।अक्षोहिण्या सेनया च सह भीमेन पातिताः ।


कर्णानुजान् ध्रुवाद्यांश्च बहून् जघ्ने स वै निशि ।सञ्ज्ञां भीमकृतां ज्ञात्वा शक्तिं चिक्षेप चापराम् ।


इति ज्ञापयितुं तां तु ज्ञात्वा भीमः क्षणात् तदा ।खमुत्पत्य गृहीत्वा च कर्णे चिक्षेप सत्वरः ॥ २१६॥


यदि त्वया तदा मुक्ता शक्तिस्त्वां सा हनिष्यति ।इति ज्ञापयितुं सा च कर्णरक्षणकाङ्क्षिणा ॥ २१७॥


मुक्ता दक्षभुजे सा च(सोऽथ) विदार्य धरणीं तथा(तदा) ।भित्त्वा विवेश कर्णस्य दर्शयन्ती निदर्शनम् ॥ २१८॥


ततो भीमः पुनः स्वं तु रथमास्थाय चापभृत् ।कर्णस्य पुरतः शत्रून् द्रावयामास सर्वतः ॥ २१९॥


तं कर्णो वारयामास शरैः सन्नतपर्वभिः ।भीमः कर्णरथायैव गदां चिक्षेप वेगतः(वेगितः) ॥ २२०॥


स तद्गदाविघाताय स्थूणाकर्णास्त्रमासृजत् ।तेनास्त्रेण प्रतिहता सा गदा भीममाव्रजत् ॥ २२१॥


भीमो गदां समादाय कर्णस्य रथमारुहत् ।तया सञ्चूर्णयामास कर्णस्य रथकूबरम् ॥ २२२॥


एवं त्वच्चूर्णने शक्तो मत्कामात् त्वं हि जीवसि ।एवं निदर्शयित्वैव पुनः स्वं रथमाव्रजत् ॥ २२३॥


पुनः कर्णपुरः सेनां जघान बहुशो रणे ।कर्णस्तु तं परित्यज्य सहदेवमुपाद्रवत् ॥ २२४॥


स तु तं विरथीकृत्य धनुः कण्ठेऽवसज्य च ।कुत्सयामास बहुशः स तु निर्वेदमागमत् ॥ २२५॥


न हन्तुमैच्छत् तं कर्णः पृथायै स्वं वचः स्मरन् ।तं विजित्य(विसृज्य) रणे कर्णो जघ्ने पार्थवरूथिनीम् ॥ २२६॥


ततो द्रौणिर्विविधैर्बाणसङ्घैर्जघान पार्थस्य चमूं समन्ततः ।सा हन्यमाना रणकोविदेन न शं (नाशं) लेभे मृत्युनाऽऽर्ता प्रजेव(आर्तप्रजेव) ॥ २२७॥


दृष्ट्वा सेनां द्रौणिबलाभिभूतां तमाह्वयामास घटोत्कचो युधे(युधि) ।द्रौणिस्तमाहाऽलमलं न वत्स पुत्रस्तातं योधयस्वाद्य मां त्वम् ॥ २२८॥


इत्युक्त ऊचे न पिता मम त्वं सखा पितुर्यद्यपि शत्रुसंश्रयात् ।अरिश्च मेऽसीति तमाह यद्यरिं मां मन्यसे तद्वदहं करोमि ते ॥ २२९॥


इत्यूचिवाञ्छक्रधनुःप्रकाशं विष्फार्य चापं प्रकिरञ्छरौघान् ।अभ्यागमद् राक्षसमुग्रवेगः स्वसेनया सोऽपि तमभ्यवर्तत ॥ २३०॥


स रक्षसां लक्षसमावृतो बली नृभिश्च वीरैर्बहुभिः सुशिक्षितैः ।अक्षोहिणीमात्रबलेन राक्षसः सङ्क्षोभयामास गुरोः सुतं शरैः ॥ २३१॥


स तेन बाणैर्बहुभिः सुपीडितो विभिन्नगात्रः क्षतजाप्लुताङ्गः(क्षतजाभिप्लुताङ्गः) ।व्यावृत्य नेत्रे कुपितो महद् धनुर्विष्फार्य बाणै रजनीं चकार ॥ २३२॥


सोऽक्षौहिणीं तां(अक्षौहिणीं तां) क्षणमात्रतः क्षरन् महाशरांस्तानपि राक्षसान् क्षयम् ।निनाय पुत्रं च घटोत्कचस्य निष्ट्यं(निष्ठ्यं) पुरा योऽञ्जनवर्मनामकः ॥ २३३॥


निरीक्ष्य सेनां स्वसुतं च पातितं घटोत्कचो द्रोणसुतं शरेण ।विव्याध गाढं स तु विह्वलो ध्वजं समाश्रितश्चाऽशु ससञ्ज्ञकोऽभवत् ॥ २३४॥


उत्थाय बाणं यमदण्डकल्पं सन्धाय चापे प्रविकृष्य राक्षसे ।मुमोच तेनाभिहतः पपात विनष्टसञ्ज्ञः स्वरथे घटोत्कचः ॥ २३५॥


विमूर्च्छितं सारथिरस्य दूरं निनाय युद्धाज्जगतो विपश्यतः ।द्रौणिश्च सेनां निशि तैः शरोत्तमैर्व्यद्रावयत् पाण्डवसोमकानाम् ॥ २३६॥


सञ्ज्ञामवाप्याथ घटोत्कचोऽपि क्रुद्धोऽविशत् कौरवसैन्यमाशु ।विद्रावयामास स बाणवर्षैः प्रकम्पयामास महारथांस्तथा ॥ २३७॥


तदैव पार्थं प्रति योद्धुमागतं वैकर्तनं वीक्ष्य जगत्पतिर्हरिः ।घटोत्कचं प्राहिणोच्छक्तिमुग्रां तस्मिन् मोक्तुं पार्थरक्षार्थमेव ॥ २३८॥


स कर्णमाहूय युयोध तेन तस्यानु दुर्योधनपूर्वकाश्च ये ।द्रोणेन चैतान् समरे स एको निवारयामास ममर्द चाधिकम् ॥ २३९॥


ते बाध्यमाना बहुशो बलीयसा कर्णं पुरोधाय तमभ्ययोधयन् ।न विव्यथे तत्र रणे स कर्णः स्ववीर्यमास्थाय महास्त्रवेत्ता ॥ २४०॥


निवारयामास गुरोः सुतं तदा भीमस्त्रिगर्ताञ्छतमन्युनन्दनः ।अलम्बलो नाम तदैव राक्षसः समागमद्(समासदत्) भीमसुतं निहन्तुम् ॥ २४१॥


युद्ध्वा प्रगृह्यैनमथो निपात्य घटोत्कचो भूमितलेऽसिनाऽस्य ।उत्कृत्य शीर्षं तु सुयोधनेऽक्षिपद् विषेदुरत्राखिलभूमिपालाः ॥ २४२॥


अलायुधोऽथाऽगमदुग्रवीर्यो नराशनस्तं स घटोत्कचोऽभ्ययात् ।युद्ध्वा मुहूर्तं स तु तेन भूमौ निपात्य तं यज्ञपशुं चकार ॥ २४३॥


अथास्य शिर उद्धृत्य क्रोधाद् दुर्योधनोरसि ।चिक्षेप तेन सम्भ्रान्ताः सर्वे दुर्योधनादयः ॥ २४४॥


घटोत्कचबलख्यात्यै समर्थेनापि यो रणे ।न हतो भीमसेनेन हतेऽस्मिन् भैमसेनिना ॥ २४५॥


सर्वे सञ्चोदयामासुः(सम्बोधयामासुः) कर्णं शक्तिविमोक्षणे ।अस्मिन् हते हतं सर्वं किं नः पार्थः करिष्यति ॥ २४६॥


एवं सञ्चोद्यमानः(सम्बोध्यमानः) स धार्तराष्ट्रैः पुनः पुनः ।हैडिम्बेनार्द्यमानैस्तु(च) स्वयं च भृशपीडितः ।


तामम्बरस्थाय घटोत्कचाय शैलोपमायातुलविक्रमाय ।चिक्षेप मृत्यो रसनोपमामलं प्रकाशयन्तीं प्रदिशो दिशश्च ॥ २४८॥


निर्भिण्णवक्षाः(निर्भिन्नवक्षाः) स तया पपात व्यचूर्णयञ्छत्रुबलं हतोऽपि ।तस्मिन् हते जहृषुधार्तराष्ट्रा उच्चुक्रुशुर्दुधुवुश्चाम्बराणि ॥ २४९॥


तदा ननर्त केशवः समाश्लिषच्च फल्गुनम् ।ननाद शङ्खमाधमज्जहास(शङ्खमदमञ्जहास) चोरुनिस्वनः ॥ २५०॥


तमपृच्छद् गुडाकेशः किमेतदिति दुर्मनाः ।हते सुतेऽग्रजेऽस्माकं वीरे किं नन्दसि प्रभो ॥ २५१॥


तमाह भगवान् कृष्णो दिष्ट्या जीवसि फल्गुन ।त्वदर्थं निहिता शक्तिर्विमुक्ताऽस्मिन् हि राक्षसे ॥ २५२॥


ततो युधिष्ठिरो दुःखादमर्षाच्चाभ्यवर्तत ।कर्णं प्रति तमाहाथ कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ॥ २५३॥


ययाऽर्जुनो निहन्तव्यस्तयाऽसौ राक्षसो हतः ।तन्मा शुचस्त्वं राजेन्द्र दिष्ट्या जीवति फल्गुनः ।


भीमार्जुनाभ्यामिह हन्यमाने बले कुरूणामितरैश्च पाण्डवैः ।प्रदीपहस्ता अथ योधकाश्च सर्वेऽपि निद्रावशगा बभूवुः ॥ २५५॥


दृष्ट्वैव तानाह धनञ्जयस्तदा स्वप्स्यन्तु यावच्छशिनः प्रकाशः ।इतीरिता आशिषः फल्गुनाय प्रयुज्य सर्वे सुषुपुर्यथास्थिताः ॥ २५६॥


पुनश्च चन्द्रेऽभ्युदिते युधे ते समाययुः शस्त्रमहास्त्रवर्षाः ।तत्राऽयातः सात्यकिं सोमदत्तो भूरिश्च ताभ्यां युयुधे स एकः ॥ २५७॥


हतौ च तौ पेततुस्तेन भूमौ बाह्लीक एनं समरे त्वयोधयत् ।स सात्यकिं विरथीकृत्य बाणं वधाय तस्याऽशु मुमोच वीरः ॥ २५८॥


चिच्छेद तं भीमसेनस्त्रिधैव तस्मै(तस्मिञ्छतघ्नीं) शतघ्नीं प्रजहार बाह्लिकः ।तया हतो विह्वलितो वृकोदरो जघान तं गदया सोऽपतच्च ॥ २५९॥


बाह्लीकः प्रार्थयामास पूर्वं स्नेहपुरस्सरम् ।भीम त्वयैव हन्तव्यो रणेऽहं प्रीतिमिच्छता ।


इत्युक्त आह तं भीमो नितरां व्यथितस्तदा ।हन्यां नैवान्यथा युद्धे तत् ते शुश्रूषणं भवेत् ।


हते बाह्लीके कौरवा भीमसेनमभ्याजग्मुः कर्णदुर्योधनाद्याः(कर्णसुयोधनाद्याः) ।द्रौणिं पुरस्कृत्य गुरुं च पार्षतः सभ्रातृकः सात्यकिना समभ्ययात् ॥ २६२॥


संशप्तकैरेव पार्थो युयोध तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतम् ।अक्षोहिणी तत्र भीमार्जुनाभ्यां निषूदिता (निसूदिता) रात्रियुद्धे समस्ता(समन्तात्) ॥ २६३॥


ततः सूर्यश्चाभ्युदितस्तदाऽतिघोरं द्रोणः कर्म युद्धे चकार ।स पाञ्चालानां रथवृन्दं प्रविश्य जघान हस्त्यश्वरथान् नरांश्च ॥ २६४॥


विद्रावितास्तेन महारथाश्च नैवाविन्दञ्छर्म बाणान्धकारे ।युवेव वृद्धोऽपि चचार युद्धे स उग्रधन्वा परमास्त्रवेत्ता ॥ २६५॥


रथार्बुदं तेन हतं च तत्र ततः सहस्रं(तथा सहस्रं) गुणितं नराणाम् ।ततो दशांशो निहतो हयानां गजार्बुदं चैव रणोत्कटेन ॥ २६६॥


तथा विराटद्रुपदौ शराभ्यां निनाय लोकं परमाजिमध्ये ।ततो विजित्यैव गुरोः सुतादीन् धृष्टद्युम्नं भीमसेनो जुगोप ॥ २६७॥


धृष्टद्युम्नो भीमसेनाभिगुप्तो द्रोणं हन्तुं यत्नमुच्चैश्चकार ।निवारयामास गुरुः शरौघैर्धृष्टद्युम्नं सोऽपि तं सायकेन ।


धृष्टद्युम्नः सत्वरं खड्गचर्मणी आदाय तस्याऽरुरुहे रथोत्तमम् ।सञ्ज्ञामवाप्याथ गुरुः शरौघैः प्रादेशमात्रैर्व्यथयामास तं च ॥ २६९॥


स तैरतिव्यथितस्तद्रथाच्च परावृत्तः स्वं रथं चारुरोह ।सुसंरब्धौ तौ पुनरेव युद्धं सञ्चक्रतुर्वृष्टशराम्बुधारौ ॥ २७०॥


निवार्य शत्रुं स शरैर्ब्रह्मास्त्रमसृजद् द्विजः ।तेन सन्दाहयामास पाञ्चालान् सुबहून् रणे ।


भीमोऽर्जुनः सात्यकिश्च पर्यायेण गुरोः सुतम् ।दूरतो वारयामासुर्महत्या सेनया सह ॥ २७२॥


कर्णदुर्योधनादींश्च शल्यं भोजं कृपं तथा ।भीमार्जुनौ शरौघेण वारयामासतू रणे ॥ २७३॥


तत्र भीमो गजानीकं जयत्सेनं च मागधम् ।जघान सुबहूंश्चैव मागधानां रथव्रजान् ॥ २७४॥


अथ मालवराजस्य त्वश्वत्थामाभिधं गजम् ।भीमसेनहतं दृष्ट्वा वासुदेवप्रचोदितः ।


अश्वत्थामवधं श्रुत्वा नाहं योत्स्य इति स्वयम् ।पुरोक्तं धर्मजायैव तेन द्रोणो युधिष्ठिरम् ॥ २७६॥


ब्रूहि सत्यमिति प्राह सत्यमित्येव सोऽब्रवीत् ।उपांशु कुञ्जरश्चेति द्रोणोऽतो व्यथितोऽभवत् ॥ २७७॥


तस्य भीमो रथेषां(रथेषुं) च गृहीत्वा न तवेदृशम् ।योग्यं गुणवतो नित्यं परधर्मोपजीवनम् ॥ २७८॥


इत्याह खस्था मुनयश्चालमेहीति तं तदा ।ऊचुस्तदखिलं ज्ञात्वा द्रोणः शस्त्रमवासृजत् ॥ २७९॥


सन्यस्य कर्माणि तदाऽखिलानि योगारूढः परमं वासुदेवम् ।सर्वेश्वरं नित्यनिरस्तदोषं ध्यायन् मुक्त्वा देहमगात् स्वधाम ।


धृष्टद्युम्नः पाण्डवैर्वार्यमाणोऽप्यगात् खड्गं चर्म चाऽदाय तत्र ।छित्वाऽसिना तस्य शिरः पुनश्च रथं स्वकीयं त्वरया समास्थितः ।


सञ्छिन्ने द्रोणशिरसि गर्हयामास वासविः ।युधिष्ठिरं च(युधिष्ठिरश्च) पाञ्चाल्यं सात्यकिश्चापि कोपितः ॥ २८२॥


धृष्टद्युम्नस्तु तावाह कथं भूरिश्रवा हतः ।इति तं सात्यकिः क्रुद्धो गदापाणिः समभ्ययात् ।


तदा जग्राह शैनेयं भीमः कृष्णप्रचोदितः ।शमयामास पार्थं च पाञ्चाल्यस्नेहयन्त्रितः ॥ २८४॥


ते वासुदेवेन तदा सुशिक्षिताः (तदाऽनुशिक्षिताः) स्नेहं पुनः पूर्ववदापुरुत्तमम् ।यत्ताश्च युद्धाय समुद्यताश्च(समुत्थिताश्च) तदाऽऽगमद् द्रौणिरप्यात्तधन्वा ॥ २८५॥


आश्रुत्य तातं निहतं प्रतिज्ञां चकार निःशेषरिपुप्रमाथने ।नारायणास्त्रं विससर्ज कोपात् तदा भीता भीममृते समस्ताः ॥ २८६॥


युधिष्ठिरः प्राह विषण्णचेतनः शैनेयपूर्वाः प्रतियान्तु सर्वे ।सभ्रातृकोऽहं द्रौणिवरास्त्रमग्नो(भग्नो) भवेयमित्यत्र जगाद केशवः ॥ २८७॥


नमध्वमस्त्रस्य ततो विमोक्ष्यथेत्यथ प्रणेमुश्च धनञ्जयादिकाः ।सर्वे न भीमस्तदमुष्य मूर्ध्नि पपात सोऽग्नाविव संस्थितोऽग्निः ॥ २८८॥


अदह्यमाने भीमेऽपि वह्नौ वह्निरिव स्थिते ।अवेष्टयद् वारुणेन पार्थोऽत्राऽत्मप्रपत्तये ॥ २८९॥


न देहे पतितास्त्रस्य बहिर्वेष्टनतः फलम् ।तथाऽपि स्नेहवशगो वेष्टयामास फल्गुनः ॥ २९०॥


अमोघत्वं निजास्त्रस्य भीमस्यावध्यतामपि ।साधयन् सार्जुनः कृष्णो भीमस्य रथमारुहत् ॥ २९१॥


वेष्टितं वारुणास्त्रेण प्रविष्टं बाह्यतस्तदा ।सहितत्वात् केशवेन नरत्वादथ फल्गुनम् ॥ २९२॥


तदस्त्रं नादहत् ताभ्यां स्वरथादवरोपिते ।भीम आच्छिन्नहेतौ च तदस्त्रं शान्तिमागमत् ॥ २९३॥


शुद्धक्षत्रियधर्मेषु निरतो यद् वृकोदरः ।वाहनादवतीर्यान्यैः प्रणतेऽपि निरायुधैः ।


स्वधर्महानौ मित्राणां कर्तव्यं यन्निषेधनम् ।अतः सोऽन्यानपि प्राह मा गमध्वमिति स्वयम् ॥ २९५॥


नमस्कार्यमपि ह्यस्त्रं न नम्यं जीवनेच्छया ।समरे शत्रुणा मुक्तं तस्मात् तन्न चकार सः ॥ २९६॥


अस्त्राभिमानी वायुर्हि देवताऽस्य हरिः स्वयम् ।तस्माद् भीमं स्वरूपत्वान्नादहच्चाग्निमग्निवत् ॥ २९७॥


मनसैवाऽदरं चक्रे भीमोऽस्त्रे च हरौ तदा ।क्षत्रधर्मानुसारेण न ननाम च बाह्यतः ॥ २९८॥


वासुदेवः स्वकीयास्त्रं भीमं चामोघमेव तु ।साधयित्वाऽनन्तशक्तिः पुनरश्वानचोदयत् ॥ २९९॥


पुनः प्रयोक्तुमस्त्रं तत् (प्रयोक्तमस्त्रं तं) धार्तराष्ट्रोऽभ्यचोदयत्(अभ्ययाचत) ।द्रौणिर्न शक्यमित्युक्त्वा धृष्टद्युम्नं समभ्ययात् ॥ ३००॥


आयान्तमीक्ष्यैव गुरोः सुतं तं धृष्टद्युम्नं सात्यकिरन्वयाद् रणे ।उभौ च तौ सायकाभ्यामविध्यन्निपेततुस्तौ च विमूर्च्छितौ रणे ॥ ३०१॥


भीमस्याभ्यागतस्याश्वान् द्रौणिर्व्यद्रावयद् रणे ।संस्थापयति तान् भीमे ददर्श द्रौणिमर्जुनः ॥ ३०२॥


ततोऽर्जुनस्तं प्रतियोद्धुमागमद् रुक्षा वाचः श्रावयन् क्रुद्धरूपः ।तत्राऽग्नेयं द्रौणिरमुञ्चदस्त्रं तेन व्याप्ता पृतना पाण्डवानाम् ॥ ३०३॥


अक्षोहिणी निहता चात्र सेना पार्थं सयानं हरिरुज्जहार ।जीवन्तमालोक्य सुरेन्द्रनन्दनं द्रौणिः कोपात् कार्मुकं चापहाय ।


मा याहि साक्षाद् गिरिशः सुराणां कार्याय भूमौ बलवानजायथाः ।महच्च कार्यं पुनरस्ति दृष्टं तवाऽशु तच्च प्रतिपादयेति ॥ ३०५॥


तथोदितः प्रातरिति ब्रुवाणो ययौ प्रणम्याखिलवेदयोनिम् ।ययुस्तमन्वेव सुयोधनादयो दुःखानतास्ते शिबिराय भीताः ॥ ३०६॥


पार्थाश्च सर्वे मुदिता जनार्दनं परं स्तुवन्तः शिबिराय जग्मुः ।तत्रापि रात्रावमितान् हरेर्गुणाननुस्मरन्तो मुमुदुः समेताः ॥ ३०७॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये नारायणास्त्रोपशमनं नाम षड्विंशोऽध्यायः


ओं ॥ अथानुज्ञामुपादाय द्रौणेर्दुर्योधनो नृपः ।कर्णं सेनापतिं चक्रे सोऽगाद् युद्धाय दंशितः (दंसितः) ॥ १॥


तत्राभवद् युद्धमतीव दारुणं पाण्डोः सुतानां धृतराष्ट्रजैर्गजे ।तत्रोदयाद्रिप्रतिमे प्रदृश्यते भीमो यथोद्यन् सविताऽतिनिर्मलः ॥ २॥


तं कालयन्तं नृपतीन् क्षेमधूर्तिरभ्यागमत् तस्य गजं जघान च ।तं वीर्यमत्तं प्रतिलभ्य भीमो निनाय मृत्योः सदनाय शीघ्रम् ॥ ३॥


निहत्य तं मारुतिरभ्यकृन्तच्छिरांसि यूनां परपक्षपातिनाम् ।विक्षोभयामास च शत्रुसैन्यं सिंहो यथैव श्वसृगालयूथम् ॥ ४॥


सङ्क्षोभ्यमाणं तदनीकमीक्ष्य द्रौणी रथेन प्रतिजग्मिवांस्तम् ।तद् युद्धमासीदतिरौद्रमद्भुतं (अतिघोरमद्भुतं) पुरा यथा नाऽस च कस्यचित् क्‍वचित् ॥ ५॥


दृष्ट्वैव तद् देवगन्धर्वविप्रा ऊचुर्नेदृग् दृष्टपूर्वं सुयुद्धम् ।न चोत्तरं वाऽपि भविष्यतीदृक् कलां च सर्वाणि न षोडशीमियुः(षोडशीमयुः) ॥ ६॥


नैतादृशी ज्ञानसम्पद् बलं वा द्वयं कुतो वायुमृते शिवं तथा ।द्वयोः समाहार इह द्वयोरपि ज्ञानस्य बाह्वोश्च बलस्य सूर्जितः ॥ ७॥


इतीर्यमाणे विबुधैर्नरोत्तमौ दिशः समस्ता गगनं च पत्रिभिः ।निरन्तरं चक्रतुरुत्तमोजसौ दृष्ट्वैव तद् (प्रीतिमगुः)भीतिमगुर्महारथाः ॥ ८॥


शरासने मारुतिना निराकृतो द्रौणिर्महास्त्राणि मुमोच तस्मिन् ।(तान्यस्त्रवर्षैः)तान्यस्त्रवर्यैर्बलवानविस्मयः संशामयामास सुतोऽनिलस्य ॥ ९॥


पुनः शरैरेव परस्परं तावयुद्ध्यतां चित्रमलं च सुष्ठु ।तदा तु भीमस्य शरैर्भृशार्दितो द्रौणिः पपाताऽशु दृढं विचेतनः ॥ १०॥


भीमश्च विह्वलतनुः स तु किञ्चिदेव पूर्वं गते गुरुसुते प्रययौ क्षणेन ।निर्धूतयुद्धश्रम आत्तधन्वा योद्धुं गजौघं प्रति नादिताशः(प्रतिनादिताशः) ॥ ११॥


तस्मिन् गजान् मर्दयति धार्तराष्ट्रो युधिष्ठिरम् ।अगाद् युद्धाय तौ युद्धं राजानौ चक्रतुश्चिरम् ॥ १२॥


तत्र तं विरथं चक्रे सहसैव युधिष्ठिरः ।स गदामाददे गुर्वीं तं भीमोऽभ्यपतद् गदी ॥ १३॥


दृष्ट्वा कृपस्तं स्वरथमारोप्यापययौ ततः ।तदैव कर्णनकुलौ भृशं बाणैरयुद्ध्यताम् ॥ १४॥


नकुलं विरथं कृत्वा कर्णोऽथ प्रपलायिनम्(प्रपलायितम्) ।अनुद्रुत्य च वेगेन कण्ठे धनुरवासृजत् ॥ १५॥


उक्त्वा च पुरुषा(उवाच परुषा) वाचः कुन्त्या वचनगौरवात् ।जघान नैव नकुलं विसृज्य च ययौ परान् ॥ १६॥


विन्दानुविन्दावथ कैकयौ रणे समासदत् सात्यकिरुग्रविक्रमः ।तयोरमुष्याभवदुग्रवैशसं प्रवर्षतोरुत्तमसायकान् बहून् ॥ १७॥


ताभ्यां निरुद्धः सहसा जहार तत्रानुविन्दस्य शिरोऽथ विन्दः ।युयोध शैनेयमथारथावुभौ परस्परं चक्रतुरुत्तमाहवे ॥ १८॥


ततश्च चर्मासिधरौ प्रचेरतुः श्येनौ यथाऽकाशतले कृतश्रमौ ।निकृत्य चान्योन्यमुभौ च चर्मणी वरासिपाणी युगपत् समीयतुः ॥ १९॥


तत्रापहस्तेन शिरः सकुण्डलं जहार विन्दस्य मृधे स सात्यकिः ।निहत्य तौ बन्धुजनैः सुपूजितो जगाम शत्रूनपरान् प्रकम्पयन् ॥ २०॥


कृपमायान्तमीक्ष्यैव तपसां मां प्रपीडयेत् ।इति मत्वा पार्षतस्तु भीमं शरणमेयिवान् ॥ २१॥


कर्णं समन्तात् प्रतिकालयन्तं वरूथिनीमिन्द्रसुतः समभ्ययात् ।क्षणात् तमाजौ विरथं च चक्रे ततोऽपहारं स चकार चम्वाः ॥ २२॥


पराजितः संयति सूर्यसूनुः सुतेन शक्रस्य स धार्तराष्ट्रम् ।जगाद बाहुं प्रतिगृह्य पार्थो जिगाय मामन्यमनस्कमाजौ ॥ २३॥


कामं रथो मे धनुरप्यभेद्यं दत्तं भृगूणामधिपेन दिव्यम् ।यन्ता न तादृङ् मम यादृशो हरिः शल्यो यदि स्यात् त्वदरिं निहन्याम् ॥ २४॥


इतीरिते सौत्यकृते स शल्यं प्रोवाच स क्रुद्ध इवाभवत् तदा ।दुर्योधनो रथिनः सारथेस्तु व्यावर्णयन्नुत्तमतामशामयत् ॥ २५॥


बुद्ध्या बलेन ज्ञानेन धैर्याद्यैरपि योऽधिकः ।रथिनः सारथिः स स्यादर्जुनस्य यथा हरिः ।


इत्यादिवाक्यैः संशान्त इव शल्योऽस्य सारथिः ।बभूव तेन सहितः सेनां व्यूह्य रवेः सुतः ॥ २७॥


गच्छन् युद्धाय दर्पेण प्राह यो मेऽर्जुनं पुमान् ।दर्शयेत् तस्य दास्यामि प्रीतो वित्तमनर्गलम् ॥ २८॥


इति ब्रुवन्तं बहुशः प्राह शल्यः प्रहस्य च ।निवातकवचा येन हता दग्धं च खाण्डवम् ।


काकगोमायुधर्मा त्वं हंससिंहोपमं रणे ।मा याहि पार्थं मा याहि हतोऽनेन यमक्षयम् ॥ ३०॥


इत्युक्ते रविजो मद्रान् नितरां पर्यकुत्सयत् ।शल्योऽपि सर्वदेशेषु नीचमध्योत्तमा नराः ।


कर्णोऽथ शल्यनियतेन रथेन पार्थसेनामवाप्य विदुधाव शरैः समन्तात् ।संरक्षितो युधि सुयोधनगौतमाद्यैराचार्यजेन च महास्त्रविदां वरेण ॥ ३२॥


तं भीमपार्षतशिनिप्रवराभिगुप्ता सा पाण्डवेयपृतनाऽभिववर्ष बाणैः ।तां सूर्यसूनुरथ बाणवरैर्विदार्य सम्प्राद्रवच्छितशरैरपि (सम्प्रार्दयच्छितशरैरपि) धर्मसूनुम् ॥ ३३॥


कृत्वा तमाशु विरथं धनुरस्य कण्ठे सज्यं निधाय परुषा गिर आह चोच्चैः ।दृष्ट्वैव मारुतिरमुं भृशमातुतोद दुर्योधनं (विगतकार्मुकं)विरथकार्मुकमत्र कृत्वा ॥ ३४॥


तं प्राणसंशयगतं नृपतिं निरीक्ष्य कर्णं जगाद युधि मद्रपतिः प्रदर्श्य ।यस्यार्थ एष(यस्यार्थमेव) समरस्त्वमियं च सेनां तं त्वं यमस्य सदनं प्रयियासुमद्य ।


श्रुत्वाऽस्य वाक्यमतिहाय(वाक्यमपहाय) युधिष्ठिरं तं कर्णो ययौ नृपतिरक्षणतत्परोऽलम् ।दृष्ट्वैव तं पवनसूनुरभि त्वियाय क्रोधाद् दिधक्षुरिव कर्णममेयधामा ॥ ३६॥


राजावनाय शिनिपुङ्गवपार्षतौ च सन्दिश्य कर्णमभिगच्छत आस रूपम् ।अन्ते कृतान्तनरसिंहतनोर्यथैव विष्णोर्हरं ग्रसत आत्तसमस्तविश्वम् ।


वैकर्तनेन शरसञ्चयताडितः स बाणं च वज्रसदृशं प्रमुमोच तस्मिन् ।तेनाऽहतो मृतकवत् स पपात कर्णो भीमः क्षुरं च जगृहेऽभिययौ(जगृहे प्रययौ) च पद्भ्याम् ॥ ३८॥


निन्दां हरेस्तु(हरेश्च) विदधाति परोक्षगोऽपि(परोक्षतोऽपि) यस्तं प्रगृह्य करवाणि विजिह्वमेव ।एवं हि वायुतनयस्य सदा प्रतिज्ञा छेत्तुं स तेन रविजस्य ससार जिह्वाम् ॥ ३९॥


आयान्तमन्तिकममुं प्रसमीक्ष्य शल्यो नेत्याह हेतुभिरहो न मृषा प्रतिज्ञा ।कार्या त्वयैव पुरुहूतसुतस्य जिह्वां मा तेन पातय मरुत्सुत सूतसूनोः ॥ ४०॥


इत्युक्त्वा प्रमुखात्(इत्युक्त्वाऽभिमुखात्) तस्य रथेनैव तु मद्रराट् ।वैकर्तनमपोवाह सर्वलोकस्य पश्यतः ॥ ४१॥


जित्वा सूर्यसुतं भीमः कौरवाणामनीकिनीम् ।सर्वां विद्रावयामास द्रौणिदुर्योधनावृताम् ॥ ४२॥


अक्षोहिणीत्रयं तेन तदा विलुलितं क्षणात् ।तदैव गुरुपुत्रोऽयात् पाण्डवानामनीकिनीम् ॥ ४३॥


विमृद्य सकलां सेनां कृत्वा च विरथं नृपम् ।धृष्टद्युम्नं यमौ चैव सात्यकिं द्रौपदीसुतान् ।


तान् भग्नदर्पान् रणतोऽपयातानन्वेव बाणावृतमन्तरिक्षम् ।कुर्वन् ययौ धर्मराजस्तमाह किं नः स्वधर्मे निरतान् विहंसि ॥ ४५॥


क्षत्रियान् परधर्मस्थो मा हिंसीरिति चोदितः ।प्रहस्य तान् विहायैव ययौ यत्राच्युतार्जुनौ ॥ ४६॥


संशप्तकैस्तत्र संयुद्ध्यमानं समाह्वयामास सुरेशसूनुम् ।स बाणयुक्तं भुजगेन्द्रकल्पमुन्नम्य बाहुं युधये सुशूरम् ॥ ४७॥


पार्थः संशप्तकगणैः संसृष्टः समरार्थिभिः ।आहूतो द्रौणिना चैव कार्यं कृष्णमपृच्छत ।


उभौ च तावस्त्रविदां प्रधानौ महाबलौ संयति जातदर्पौ ।शरैः समस्ताः प्रदिशो दिशश्च द्रोणेन्द्रसूनू तिमिराः प्रचक्रतुः ॥ ४९॥


द्रौणिस्तदा स्यन्दनवाजिरोमस्वरोमकूपध्वजकार्मुकेभ्यः ।शरानमोघान् सततं सृजानो बबन्ध पार्थं शरपञ्जरेण ॥ ५०॥


तस्मिन् निबद्धे हरिरप्रमेयो विबोधयामास सुरेन्द्रसूनुम् ।आलिङ्गनेनास्य ददौ बलं च स उत्थितोऽस्त्राण्यमुचन्महान्ति ॥ ५१॥


निवार्य तान्यस्त्रवरैर्गुरोः सुतश्चिच्छेद च ज्यां युधि गाण्डिवस्य ।ववर्ष पार्थं च शरैरथाऽन्या ज्याऽऽसीत् तया गाण्डिवं सोऽप्ययुङ्क्त ॥ ५२॥


ततः शरेण कुपितः शितेन द्रौणिसारथेः ।शिरो जहार कौन्तेयः सारथ्यं सोऽकरोत् स्वयम् ॥ ५३॥


शरान् विसृजता तेन सारथ्यमपि कुर्वता ।शरकूटेन पार्थः स पुनर्बद्धो द्विजन्मना ॥ ५४॥


पुनरालिङ्ग्य कृष्णस्तमधाच्छत्रुविघातकम् ।बलमस्मिंस्ततः पार्थः उत्तस्थौ शरचापभृत् ।


पुनस्तस्य तुतोद(नुनोद) ज्यां द्रौणिः सन्धाय तां पुनः ।पार्थो द्रोणसुतस्याश्वरश्मींश्चिच्छेद सायकैः ॥ ५६॥


विरश्मयो हया द्रौणेः पुनः पार्थशराहताः ।अपोहुर्दूरमेतस्मात् सोऽपि संस्थाप्य तान् पुनः ।


सारथित्वात् केशवस्य ध्वजस्थत्वाद्धनूमतः ।गाण्डिवत्वात् कार्मुकस्य चेषुध्योरक्षयत्वतः ॥ ५८॥


अवध्यत्वात् तथाऽश्वानामभेद्यत्वाद् रथस्य च ।अतो योद्धुं समर्थोऽपि नाद्य यामि धनञ्जयम् ॥ ५९॥


एवं स मत्वा प्रविवेश सेनां पाण्डोः सुतानामथ तं समभ्ययात् ।पाण्ड्यस्तयोरास सुयुद्धमद्भुतं प्रवर्षतोः सायकपूगमुग्रम् ॥ ६०॥


अष्टावष्टशतान्यूहुः(अष्टावष्टगवान्यूहुः) शकटानि यदायुधम् ।अह्नस्तदष्टभागेन द्रौणिश्चिक्षेप तत्र ह ॥ ६१॥


अथ तं विरथं कृत्वा छित्वा कार्मुकमाहवे ।सकुण्डलं शिरो द्रौणिर्जहार मुकुटोज्ज्वलम्(मकुटोज्ज्वलम्) ॥ ६२॥


अथ विद्रावयामास पृतनां पाण्डवीं शरैः ।तदा जघान पार्थोऽपि दण्डधाराख्यमागधम् ॥ ६३॥


विद्राप्यमाणां पृतनां निरीक्ष्य गुरोः सुतेनाभ्यगमत् त्वरावान् ।धृष्टद्युम्नस्तं स ऊचे सुपापं हनिष्ये त्वामद्य युद्धे गुरुघ्नम् ॥ ६४॥


इत्युक्तो दर्शयामास पार्षतः खड्गमुत्तमम् ।अयं तव पितुर्हन्ता वदिष्यति तवोत्तरम् ॥ ६५॥


इत्युक्त्वा धनुरादाय ववर्ष च शरान् बहून् ।तयोः समभवद् युद्धं तुमुलं रोमहर्षणम् ॥ ६६॥


स तत्र पार्षतं द्रौणिः क्षणेन विरथायुधम् ।कृत्वाऽन्ताय शरांस्तीक्ष्णान् मुमोच न च तस्य ते ।


खड्गेन सोऽस्त्रैशस्त्रैरप्यनिर्भिन्नत्वचं तदा ।मौर्व्या ममन्थ धनुषः पातयित्वा धरातले ॥ ६८॥


आकृष्यमाणं पार्षतं दृष्ट्वा कृष्णप्रचोदितः ।पार्थो भीमश्चोभयतः शरैरभिनिजघ्नतुः ॥ ६९॥


स ताभ्यां वज्रसमितैः(वज्रसन्निभैः) शरैरभिहतो भृशम् ।विसृज्य पार्षतं स्वीयमारुरोह रथं पुनः ॥ ७०॥


जगाम च ततोऽन्यत्र पाञ्चाल्योऽपि रथं पुनः ।आरुह्यान्यं स्वात्तधन्वा कृतवर्माणमभ्ययात् ॥ ७१॥


तयोरासीत् सुतुमुलं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।तत्र नातिप्रयत्नेन पाञ्चाल्यो विरथायुधम् ।


अथ दुर्योधनो राजा माद्रेयावभ्ययाद् रथी ।ताभ्यां तस्याभवद् घोरं युद्धमद्भुतदर्शनम् ।


स्वयं युधिष्ठिरो राजा तदा तं समवारयत् ।व्यश्वसूतध्वजं चक्रे तं च दुर्योधनो रणे ॥ ७४॥


अथाऽगतं सूर्यसुतं पुनश्च जगाम भीमो रभसो(रभसा) रथेन ।दुर्योधनं चास्य समक्षमेव चकार वीरो विरथं क्षणेन ॥ ७५॥


निवार्य कर्णं च शरैरमुष्य सूनोः सुषेणस्य शिरश्चकर्त ।पपात भूमौ स पितुः समीपे यथा हतः सत्यसेनोऽमुनैव ।


हतं तमीक्ष्यैव विकर्तनात्मजः क्रोधान्वितो भीमसेनं विहाय ।ययौ प्रमृद्यैव चमूं युधिष्ठिरं रथेऽपरे स्वश्वयुते व्यवस्थितम् ॥ ७७॥


न्यवारयेतां शिनिपौत्रपार्षतौ कृष्णासुताः सोमकसङ्घयुक्ताः ।स तान् समस्तान् विरथान् विधाय युधिष्ठिरं प्राप युतं यमाभ्याम् ॥ ७८॥


निहत्य सोऽश्वान् युधि धर्मसूनोर्निरायुधौ तौ च यमौ चकार ।तानेकयानोपगतान् पुनश्च ममर्द बाणैश्च वचोभिरुग्रैः ॥ ७९॥


तदैव मोक्षाय नृपस्य भीमो दुर्योधनं विरथं संविधाय ।विव्याध मर्मस्वतितीक्ष्णसायकैस्तं दर्शयामास रवेः सुताय ॥ ८०॥


शल्यस्तदा धर्मसुतं विहाय कर्णो ययौ तत्र युधिष्ठिरोऽपि ।गत्वा शनैः शिबिरं तत्र शिश्ये कर्णो यदा राजगृध्नी जगाम ॥ ८१॥


द्रौणिः कृपश्चात्र तदैव जग्मतुस्तदा भीमो द्रौणिकर्णौ जगाम ।कृपो नृपं रथमारोपयच्च विद्धं शरैर्भीमबाहुप्रमुक्तैः ॥ ८२॥


नृपं समादाय कृपेऽपयाते भीमार्दितौ द्रौणिकर्णौ शरौघैः ।विहाय तं जग्मतुः सोमकानां चमूं शरौघैरभिपातयन्तौ ॥ ८३॥


अथात्र राजानमचक्षमाणो धनञ्जयो वासुदेवप्रणुन्नः ।अभ्याययौ पार्षतः स्वां तु सेनां कर्णाहतां वीक्ष्य कुरूनपीडयत् ॥ ८४॥


न्यवारयत् समायान्तं कपिप्रवरकेतनम् ।द्रौणिर्दुःशासनश्चैव धृष्टद्युम्नमवारयत् ॥ ८५॥


उभावतिरथौ तौ तु शस्त्रास्त्रैरभ्यवर्षताम् ।दुःशासनः पार्षतश्च कुर्वन्तौ बाणजं तमः ॥ ८६॥


तत्र दुःशासनेनाऽजौ स्तम्भितो द्रुपदात्मजः ।यतमानोऽपि निर्यत्नः कृतो युद्धे निरायुधः ॥ ८७॥


तदाऽभवद् युद्धमतीव दारुणं द्रौणेस्तनूजेन तु वज्रपाणेः ।तत्रापि बद्धः शरपञ्जरेण पार्थोऽपनुत्ताऽपि हि गाण्डिवज्या ॥ ८८॥


पार्थोऽथ कृष्णेधितबाहुवीर्यो(कृष्णैधितबाहुवीर्यो) निहत्य सूतं गुरुपुत्रकस्य ।छित्वा च रश्मींस्तुरगानमुष्य विद्रावयामास शरैः सुदूरम् ॥ ८९॥


अतीत्य पुत्रं तु गुरोः समागते पार्थे कर्णो द्रावयामास सेनाम् ।पाण्डोः सुतानां शरवर्षधारो दुर्योधनश्चानु ययौ तमेव ॥ ९०॥


कर्णमायान्तमालोक्य द्रावयन्तं निजां चमूम् ।धनुरन्यत् समादाय धृष्टद्युम्नो न्यवारयत् ॥ ९१॥


तयोरासीन्महद् युद्धं चिरं सममविश्रमम् ।तदैव सात्यकिर्वीरो दुर्योधनमवारयत् ॥ ९२॥


निवारितः सात्यकिना रणे दुर्योधनो नृपः ।निहत्य सात्यकेरश्वान् द्रौपदेश्चापमच्छिनत् ॥ ९३॥


तदन्तरैव कर्णोऽपि पार्षताश्वानपातयत्(अश्वानघातयत्) ।तयोर्विरथयोरेव भग्नं तत् पाण्डवं बलम् ॥ ९४॥


बलं स्वकीयं बहुधा विभिन्नं(विभग्नं) समीक्ष्य भीमो मृगराजकेतुः ।कृत्वा धराकम्पकमुग्रनादं रणेऽभ्ययात् कौरवराजसैन्यम् ॥ ९५॥


नादेन बाणैश्च वृकोदरेण भग्नं तदा कौरवसैन्यमाशु ।दिशो विदुद्राव सुयोधनोऽपि कृतो रणे तेन विवाहनायुधः ॥ ९६॥


दृष्ट्वैव तत् पाण्डवानां च सेना समावृत्ता क्षिप्रमवार्यविक्रमा (समागता क्षिप्रमवार्यवेगा) ।तया पुनः कौरवाणां बलं तद् भग्नं दूराद् दूरतरं प्रदुद्रुवे ॥ ९७॥


हन्यमानं दिशो यातं (पाञ्चाल्यैः)पाञ्चालैर्भीमसंश्रयात् ।दुर्योधनबलं (सुयोधनबलं) दृष्ट्वा जज्वालाऽधिरथिः(अधिरथः) क्रुधा ॥ ९८॥


सोऽमोघं रामदेवत्यमस्त्रं भार्गवसञ्ज्ञितम् ।सर्वास्त्रनाशकं दिव्यमप्रतिद्वन्द्वमाददे


तदस्त्रं वर्जयामास भीमं रामप्रसादतः ।अन्ये तु दुद्रुवुः केचिच्छिष्टाः प्रापुर्यमक्षयम् ॥ १००॥


न ह्यस्त्रं द्रवमाणांस्तद्धन्ति तेन सपार्षताः ।पाञ्चाला द्रौपदेयाश्च शैनेयाद्याश्च सर्वशः ॥ १०१॥


पलायनेनोर्वरिता अर्जुनोऽप्यस्त्रमुद्यतम् ।वीक्ष्य प्रत्यस्त्रहीनं तदप्राप्यैव रवेः सुतम् ॥ १०२॥


वासुदेवमिदं प्राह वर्जयित्वैव सूतजम् ।अन्यत्र यामि नैवास्मादस्त्राज्जीवनमन्यथा ॥ १०३॥


इत्यूचिवांसं पार्थं तं कृष्णोऽप्राप्यैव सूतजम् ।अन्येनैव पथा भीमं प्रापयामास विश्वकृत् ॥ १०४॥


तत्रार्जुनोऽवदद् भीमं याहि द्रष्टुं युधिष्ठिरम् ।प्रवृत्तिं विद्धि भूपस्य मां तु संशप्तका युधे ।


इत्यूचिवांसं तमुवाच भीमो जानन् स्वबाह्वोर्बलमप्रमेयम् ।संशप्तकान् सूतजं कौरवंश्च योत्स्येऽहमेकस्त्वमुपैहि भूपम् ॥ १०६॥


त्यक्त्वा रणं नाहमितो व्रजेयं न मां वदेत् कश्चन युद्धभीतम् ।इति ब्रुवाणं तमनन्तशक्तिः प्रीतः कृष्णः प्रशशंसाधिकेष्टम् ॥ १०७॥


ययौ युधिष्ठिरं द्रष्टुं शिबिरं सार्जुनो हरिः ।दृष्ट्वा तौ नृपतिः कर्णं हतं मत्वाऽऽशशंस ह(मत्वा शशंस ह) ॥ १०८॥


अभिवाद्य हनिष्यामीत्युक्तः पार्थेन सा क्रुधा ।भृशं विनिन्द्य बीभत्सुमाह कृष्णाय गाण्डिवम् ।


अथवा भीम एवैनं निवृत्ते त्वयि पातयेत् ।त्वं तु कुन्त्या वृथा सूतः क्लीबो मिथ्याप्रतिश्रवः ॥ ११०॥


अहं हि सूतपुत्रेण क्लिष्टो मारुतितेजसा ।जीवामीत्यग्रजेनोक्त उद्बबर्हासिमुत्तमम् ।


तमाह गाण्डिवं दातुं यो वदेत् तद्वधो मया ।प्रतिज्ञातस्ततो हन्मि नृपमित्याह तं हरिः ॥ ११२॥


सत्यस्य वचनं श्रेयः सत्यज्ञानं तु दुष्करम् ।यत्सतां हितमत्यन्तं तत् सत्यमिति निश्चयः ॥ ११३॥


धर्मस्य चरणं(धर्मस्याचरणं) श्रेयो धर्मज्ञानं तु दुष्करम्(सुदुष्करम्) ।यः सतां धारको नित्यं स धर्म इति निश्चयः ॥ ११४॥


कौशिकाख्यो ब्राह्मणो हि लीनं ग्रामजनं क्‍वचित् ।तस्करेष्वभिधायैव निरयं प्रत्यपद्यत ॥ ११५॥


कश्चिद् व्याधो मृगं हत्वा मातापितृनिमित्ततः ।भक्षार्थमभ्यगात् स्वर्गमसुरोऽसौ(आसुरोऽसौ) मृगो यतः ।


तस्मात् सद्धारको धर्म इति कृत्वा विनिश्चयम् ।मा नृपं जहि सत्यां त्वङ्कुरु वाचं तिरस्कुरु ।


त्वं नृशंसोऽकृतघ्नश्च निर्वीर्यः पुरुषंवदः ।त्वत्तः सुखं नास्ति किञ्चिन्न मां गर्हितुमर्हसि ॥ ११८॥


भीमो मां गर्हितुं योग्यो यो ह्यस्माकं सदा गतिः ।यो युद्ध्यते सर्ववीरैरद्यापि त्वं तु निन्दकः ॥ ११९॥


इत्याद्युक्त्वाऽऽत्मनाशाय विकोशं चकृवानसिम् ।पुनः कृष्णेन पृष्टः स (पृष्टः सन्) स्वाभिप्रायमुवाच सः ।


मतिपूर्वं देहहानात्(देहनाशात्) पापं महदवाप्यते ।धर्मार्थकाममोक्षाणां साधनं देहतोऽस्ति यत् ॥ १२१॥


अतो मा त्यज देहं तु कुरु चाऽत्मप्रशंसनम्(कुरुष्वात्मप्रशंसनम्) ।वधो गुरूणां त्वङ्कारः स्वप्रशंसैव चात्मनः ।


गुरुनिन्दाऽऽत्मपूजा च न धर्माय भवेत् क्‍वचित् ।तथाऽप्यर्जुनहार्दं तत् सम्प्रकाश्य जनार्दनः ॥ १२३॥


तस्य लज्जां समुत्पाद्य नाशयित्वा च तं मदम् ।नाहं वेद परं धर्मं कृष्ण एव गतिर्मम ॥ १२४॥


इति भावं समुत्पाद्य दोषान् नाशयितुं हरिः ।कारयामास तत् सर्वमर्जुनेन जगत्पतिः ॥ १२५॥


तत एवदविज्ञानात् कुपितो नृपतिर्भृशम् ।आहास्तु राजा भीमस्त्वं युवा मां जहि च स्वयम् ।


तं वासुदेवः प्रतिगृह्य हेतुमुक्त्वा सर्वं शमयामास नेता ।पार्थश्च भूपस्य पपात पादयोः क्षमापयन् सोऽपि सुप्रीतिमाप ॥ १२७॥


तौ भ्रातरौ वासुदेवप्रसादान्महापदो मुक्तिमाप्यातिहृष्टौ ।भक्त्या समस्ताधिपतिं शशंसतुस्त्वया समः को नु हरे हितो नः ॥ १२८॥


ततः प्रणम्य बीभत्सुरग्रजं परिरम्भितः ।तेनाभिनन्दितः प्रीत्या चाऽशीर्भिः प्रययौ युधे ॥ १२९॥


तं शङ्कितं कर्णजये स्विन्नगात्रं हरिस्तदा ।सङ्कीर्त्य पूर्वकर्माणि नरावेशं विशेषतः ।


भीमस्तदा शत्रुबलं समस्तं विद्रावयामास जघान चाऽजौ ।वीरान् रणायाभिमुखान् स्वयन्त्रा कुर्वंश्च वार्ता(कुर्वन् स्ववार्ता) रममाण एव ॥ १३१॥


तदाऽऽसदत् तं शकुनिः ससैन्यो दुर्योधनस्यावरजैरुपेतः ।तं भीमसेनो विरथं निरायुधं विधाय बाणैर्भुवि च न्यपातयत् ॥ १३२॥


न जघ्निवांस्तं सहदेवभागं प्रकल्पितं स्वेन तदाऽक्षगोष्ठ्या(तदाऽक्षगोष्ठ्याम्) ।तं मूर्च्छितं श्वासमात्रावशेषं(श्वासमात्रावशिष्टं) दुर्योधनः स्वरथेनापनिन्ये ॥ १३३॥


दुर्योधनस्यावरजा दशात्र प्रदुद्रुवुर्भीमसेनं विहाय ।तदाऽर्जुनं वासुदेवं च दृष्ट्वा प्रीतः श्रुत्वा धर्मराजप्रवृत्तिम् ॥ १३४॥


पुनश्च निघ्नन्तमरिप्रवीरान् विद्रावयन्तं च निजां वरूथिनीम् ।ससार दुःशासन आत्तधन्वा भीमोऽपि तं सिंह इवाभिपेदिवान् ॥ १३५॥


तं रूक्षवाचो मुहुरर्पयन्तं विधाय भीमो विरथं क्षणेन ।प्रगृह्य भूमौ विनिपात्य वक्षो विदारयामास गदाप्रहारतः ॥ १३६॥


आक्रम्य कण्ठं च पदोदरेऽस्य निविश्य पश्यन् मुखमात्तरोषः(मुखमाप्तरोषः) ।विकोशमाकाशनिभं विधाय महासिमस्योरसि सञ्चखान ॥ १३७॥


कृत्वाऽस्य वक्षस्युरुसत्तटाकं पपौ निकामं तृषितोऽमृतोपमम् ।तच्छोणिताम्भो भ्रमदक्षमेनं संस्मारयामास पुरा कृतानि ॥ १३८॥


वाक्सायकांश्चास्य पुरा समर्पितान् संस्मारयामास पुनः पुनर्भृशम् ।दन्तान्तरं न प्रविवेश तस्य रक्तं ह्यपेयं पुरुषस्य जानतः ॥ १३९॥


तथाऽपि शत्रुप्रतिभीषणाय पपाविवाऽस्वाद्य पुनःपुनर्भृशम् ।स्मरन् नृसिंहं भगवन्तमीश्वरं स मन्युसूक्तं च ददर्श भक्त्या ॥ १४०॥


‘यस्ते मन्यो'’ (ऋ.१०.८३.१) इत्यतो नारसिंहं सोमं तस्मै चाऽर्पयच्छोणिताख्यम्(प्रार्पयच्छोणिताख्यम्)।युद्धाख्ययज्ञे सोमबुद्ध्याऽरिवक्ष ईहेति साम्ना गदया विभिन्दन् ॥ १४१॥


उवाच वाचं पुरुषप्रवीरः सत्यां प्रतिज्ञां लोकमध्ये विधाय ।याः सपतयस्ता अपतयो हि जाता यासाऽपतिः(याऽऽसाऽपतिः सा) सा सपतिश्च जाता ॥ १४२॥


पश्यन्तु चित्रां परमस्य शक्तिं ये वै तिलाः षण्ढतिला बभूवुः ।एनं गृहीतं च(हि) मया यदीह कश्चित् पुमान् मोचयतु स्ववीर्यात् ॥ १४३॥


इति ब्रुवाणः पुनरेव रक्तं पपौ सुधां देववरो यथा दिवि ।पुनश्च सप्राणममुं(सप्राणमेनं) विसृज्य नदन् ननर्तारिबले निरायुधः ॥ १४४॥


प्रत्यनृत्यन् येऽस्मान् पुनर्गौरिति गौरिति ।तान् वयं प्रतिनृत्यामः पुनर्गौरिति गौरिति ॥ १४५॥


इति ब्रुवन् नृत्यमानोऽरिमध्य आस्फोटयञ्छत्रुगणानजोहवीत् ।शशाक च द्रष्टुममुं न कश्चिद् वैकर्तनद्रौणिसुयोधनादिषु ॥ १४६॥


भयाच्च कर्णस्य पपात कार्मुकं निमीलयामास तदाऽक्षिणी च ।सम्बोधितो मद्रराजेन युद्धे स्थितः कथञ्चित् स तु पार्थभागः ॥ १४७॥


द्रौणिर्विहायैनमपाजगाम(विहायैतमपाजगाम) दूरं तदा भीमसेनो जगाद ।पीतः सोमो युद्धयज्ञे मयाऽद्य वध्यः पशुर्मे हरये सुयोधनः ॥ १४८॥


इति ब्रुवन् मृतमुत्सृज्य शत्रुं दुर्योधनं चाऽशु रुषाऽभिदुद्रुवे ।आयान्तमीक्ष्यैव तमुग्रपौरुषं दुद्राव भीतः स सुयोधनो भृशम् ॥ १४९॥


बलद्वयं चापययौ विहाय भयाद् भीमं कृष्णपार्थौ विनैव ।आयोधनं शून्यमभून्मुहूर्तं ननर्त भीमो व्याघ्रपदेन हर्षात् ॥ १५०॥


सङ्कल्प्य शत्रून् गोवदेवाऽजिमध्ये शार्दूलवत् तच्चरितं निशाम्य ।जहास कृष्णश्च धनञ्जयश्च शशंसतुश्चैनमतिप्रहृष्टौ ॥ १५१॥


यदा स रङ्गः पवमानसूनुना शून्यः कृतस्तत्र महूर्तमात्रात् ।दुर्योधनस्यावरजाः शरौघैरवीवृषन् भीममुदारसत्त्वम् ॥ १५२॥


तान् मारुतिर्बाणवरैर्निकृत्तशीर्षान् यमायानयदाशु वीरः ।तस्मिन् दिने विंशतिर्धार्तराष्ट्र हतास्तदन्ये समरात् प्रदुद्रुवुः ॥ १५३॥


कर्माण्यनन्यौपयिकानि(कर्माण्यनन्यौपधिकानि) भीमे कुर्वत्येवं (भीमभीते)भीतभीतेऽरिसङ्घे ।निमीलिताक्षे च भयेन कर्णे कर्णात्मजो नकुलं प्रत्यधावत् ॥ १५४॥


माद्रीसुतो वृषसेनं शरौघैरवारयत् तं विरथं चकार ।कर्णात्मजः सोऽप्यसिचर्मपाणिस्तस्यानुगांस्त्रिसहस्रं जघान ॥ १५५॥


कर्णात्मजस्तस्य सञ्छिद्य चर्म भीमार्जुनादीनपि बाणसङ्घैः ।अवीवृषत् तस्य पार्थः शरेण ग्रीवाबाहूरून् युगपच्चकर्त ॥ १५६॥


एकेन बाणेन सुते हते स्वे वैकर्तनो वासविमभ्यधावत् ।तयोरभूद् द्वैरथयुद्धमद्भुतं सर्वास्त्रविद्वरयोरुग्ररूपम् ॥ १५७॥


पक्षग्रहास्तत्र सुरासुरास्तयोरन्ये च जीवा गगनं समाश्रिताः ।महान् विवादोऽप्यभवत् तयोः कृते तदा गिरीशोऽवददब्जयोनिम् ॥ १५८॥


सुरासुराणां भीमदुर्योधनौ द्वौ समाश्रयौ तत्प्रियौ कर्णपार्थौ ।प्राणोपमौ तेन चैतत्कृते ते सुरासुराः कर्तुमिच्छन्ति युद्धम् ।


इतीरिते वासवः पद्मयोनिं जगाद कृष्णो यत्र जयश्च तत्र ।कामो न कृष्णस्य मृषा भवेद्धि कामोऽस्य पार्थस्य जयं प्रदातुम् ॥ १६०॥


इत्यूचिवान् वासवः फल्गुनस्य जयोऽस्तु कर्णस्य वधस्तथेति ।उक्त्वाऽनमत् कञ्जभवं तथेति प्राहासुरान् देवताश्चाऽबभाषे ॥ १६१॥


न कर्णार्जुनयोरर्थे विरोधं कुरुत क्‍वचित् ।भीमदुर्योधनार्थे वा पश्यन्त्वेव च सङ्गरम् (संयुगम्) ।


ववर्षतुस्तौ च महास्त्रशस्त्रैर्भीमो रथस्थोऽवरजं जुगोप ।शैनेयपाञ्चालमुखाश्च पार्थमावार्य तस्थुः प्रसभं नदन्तः ॥ १६३॥


दुर्योधनो द्रौणिमुखाश्च कर्णं ररक्षुरावार्य तदाऽऽस युद्धम् ।तत्रार्जुनं बाणवरैः(बाणगणैः) स कर्णः सम्मर्दयामास(समर्दयामास) विशेषयन् रणे ॥ १६४॥


तदा नदन् भीमसेनो जगाद गदां समादाय समात्तरोषः ।अहं वैनं गदया पोथयामि त्वं वा जहीमं समुपात्तवीर्यः ।


समृद्धवीर्यः स तदा धनञ्जयः सुयोधनद्रौणिकृपान् सभोजान् ।साकं च बाणैर्विरथांश्चकार विव्याध तानप्यरिहा सुपुङ्खैः ॥ १६६॥


ते किञ्चिद् दूरतस्थुः पश्यन्तो युद्धमुत्तमम् ।अमानुषं तत् पार्थस्य दृष्ट्वा कर्म गुरोः सुतः ।


दृष्टं हि भीमस्य बलं त्वयाऽद्य तथैव पार्थस्य यथा जिता वयम् ।अलं विरोधेन समेत्य पाण्डवैः प्रशाधि राज्यं च मया समेतः ॥ १६८॥


धनञ्जयस्तिष्ठति वारितो मया जनार्दनो नैव विरोधमिच्छति ।वृकोदरस्तद्वचने स्थितः सदा युधिष्ठिरः शान्तमनास्तथा यमौ ॥ १६९॥


हितार्थमेतत् तव वाक्यमीरितं गृहाण मे नैव भयादुदीरितम् ।अहं ह्यवध्यो मम चैव मातुलो न शङ्कितुं मे वचनं त्वमर्हसि ॥ १७०॥


इतीरितः प्राह सुयोधनस्तं दुःशासनस्याद्य पपौ हि शोणितम् ।शार्दूलचेष्टामकरोच्च भीमो न मे कथञ्चित् तदनेन सन्धिः ॥ १७१॥


इत्युक्तो द्रौणिरासीत् स तूष्णीं कर्णधनञ्जयौ ।महास्त्रशस्त्रवर्षेण चक्रतुः खं निरन्तरम् ॥ १७२॥


आग्नेयवारुणैन्द्रादीन्येतान्यन्योन्यमृत्यवे ।ब्रह्मास्त्रमप्युभौ तत्र प्रयुज्याऽनदतां रणे ।


क्रमेण वृद्धोरुबलेन तत्र सुरेन्द्रपुत्रेण विरोचनात्मजः ।निराकृतो नागमयं शरोत्तमं ब्रह्मास्त्रयुक्तं विससर्ज वासवौ ॥ १७४॥


तं वासुदेवो रथमानमय्य मोघं चकारार्जुनतः किरीटम् ।चूर्णीकृतं तेन सुरेन्द्रसूनोर्दिव्यं ययौ(दिवं ययौ) बाणगतश्च नागः ॥ १७५॥


नमिते(नमितं) वासुदेवेन रथे पञ्चाङ्गुलं भुवि ।अपाङ्गदेशमुद्दिश्य मुक्ते नागे किरीटिनः ॥ १७६॥


भङ‍्‍क्त्वा किरीटं वियति गच्छति प्रभुणोदितः ।बाणैस्तक्षकपुत्रं तं वासविः पूर्ववैरिणम् ।


ब्रह्मास्त्रस्यातिवेगित्वं प्राप्तं कर्णेन भार्गवात् ॥ १७८॥


पुनश्च पार्थेन महास्त्रयुद्धं प्रकुर्वतः सूर्यसुतस्य चक्रम् ।रथस्य भूमिर्ग्रसति स्म शापादस्त्राणि दिव्यानि च विस्मृतिं ययुः ॥ १७९॥


उद्धर्तुकामो रथचक्रमेव पार्थं ययाचेऽवसरं प्रदातुम् ।नेत्याह कृष्णोऽञ्जलिकं सुघोरं त्रिनेत्रदत्तं जगृहे च पार्थः ॥ १८०॥


सत्येन धर्मेण च सन्नियोज्य मुमोच कर्णस्य वधाय बाणम् ।चिच्छेद तेनैव च तस्य शीर्षं सन्धित्सतो बाणवरं सुघोरम् ॥ १८१॥


अपराह्णेऽपराह्णस्य सूतजस्येन्द्रसूनुना ।छिन्नमञ्जलिकेनाऽजौ सोत्सेधमपतच्छिरः ॥ १८२॥


तस्मिन् हते दीनमुखः सुयोधनो ययौ समाहृत्य(समागत्य) बलं सशल्यः ।युधिष्ठिरः कर्णवधं निशम्य तदा समागत्य ददर्श तत्तनुम् ॥ १८३॥


शशंस कृष्णं च धनञ्जयं च भीमं च येऽन्येऽपि युधि प्रवीराः ।गत्वा च ते शिबिरं मोदमाना ऊषुः सकृष्णास्तदनुव्रताः सदा ॥ १८४॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये कर्णवधो नाम सप्तविंशोऽध्यायः


ओं ॥ प्रभातायां तु शर्वर्यां गुरुपुत्रानुमोदितः ।शल्यं सेनापतिं कृत्वा योद्धुं दुर्योधनोऽभ्ययात् ॥ १॥


तमभ्ययुः पाण्डवाश्च हृष्टा युद्धाय दंशिताः (दंसिताः) ।तत्राऽसीत् सुमहद् युद्धं पाण्डवानां परैः सह ॥ २॥


अग्रे भीमः पाण्डवानां मध्ये राजा युधिष्ठिरः ।पृष्ठे गाण्डीवधन्वाऽऽसीद् वासुदेवाभिरक्षितः ॥ ३॥


चक्ररक्षौ यमौ राज्ञो धृष्टद्युम्नश्च सात्यकिः ।नृपस्य पार्श्वयोरास्तामग्रेऽन्येषां गुरोः सुतः ॥ ४॥


मध्ये शल्यः पृष्ठतोऽभूद् भ्रातृभिश्च सुयोधनः ।चक्ररक्षौ तु शल्यस्य(तस्यास्तां) शकुनिस्तत्सुतस्तथा ।


तत्रभवन्महद् युद्धं भीमस्य द्रौणिना सह ।राज्ञः शल्येन च तथा घोररूपं भयानकम् ॥ ६॥


तत्र नातिप्रयत्नेन द्रौणिर्भीमेन सायकैः ।विरथीकृतस्तथा धर्मसूनुः शल्येन तत्क्षणात् ॥ ७॥


आससाद तदा शल्यं कपिप्रवरकेतनः ।तयोरासीन्महद् युद्धमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥ ८॥


रथमन्यं समास्थाय द्रौणिर्भीमं समभ्ययात् ।दुर्योधनश्च भीमस्य शरैरवारयद् दिशः ॥ ९॥


तावुभौ शरवर्षेण वारयामास मारुतिः ।ताभ्यां तस्याभवद् युद्धं सुघोरमतिमानुषम् ॥ १०॥


दुर्योधनस्यावरजान् द्रौपदेया युयुत्सुना ।शिखण्ड्याद्यैर्मातुलैश्च सह सर्वान् न्यवारयन् ॥ ११॥


सहदेवस्तु शकुनिमुलूकं नकुलस्तदा(तथा) ।धृष्टद्युम्नश्च हार्दिक्यं सात्यकिः कृपमेव च ।


शल्यस्तु शरसङ्घातैः पार्थस्यावारयद् दिशः ।सोऽपि विव्याध विशिखैः शल्यमाहवशोभिनम् ।


ततः शरं वज्रनिभं मद्रराजः समाददे ।तेन विव्याध बीभत्सुं हृदये स मुमोह च ॥ १४॥


उपलभ्य पुनः सञ्ज्ञां वासविः शत्रुतापनः ।चिच्छेद कार्मुकं सङ्खे मद्रराजस्य धीमतः ॥ १५॥


सोऽन्यत् कार्मुकमादाय मुमोचास्त्राणि फल्गुने ।सौरं याम्यं च पार्जन्यं तान्यैन्द्रेण जघान सः ॥ १६॥


पुनर्न्यकृन्तत् तच्चापमिन्द्रसूनुरमर्षितः ।शल्यो गदां समाधाय चिक्षेपार्जुनवक्षसि ।


प्राप्य सञ्ज्ञां पुनः पार्थः शल्यं विव्याध वक्षसि ।स विह्वलितसर्वाङ्गः शिश्रिये ध्वजमुत्तमम् ॥ १८॥


समाश्वस्तः पुनर्बाणं यमदण्डनिभं(यमदण्डोपमं) रणे ।मुमोच पार्थस्य स च निर्बिभेद स्तनान्तरम् ॥ १९॥


तेन विह्वलितः पार्थो ध्वजयष्टिं समाश्रितः ।समाश्वस्तः प्रचिच्छेद मद्रराजस्य कार्मुकम् ।


तदाऽन्यं रथमास्थाय धर्मराजः शरोत्तमैः ।चतुर्भिश्चतुरो वाहाञ्छल्यस्य निजघान ह ॥ २१॥


शल्योऽन्यं रथमास्थाय सर्वांस्ताञ्छरवृष्टिभिः ।छादयामास राजानं विरथं च चकार ह ॥ २२॥


निहत्याश्वान् सात्यकेश्च धृष्टद्युम्नस्य चाभिभूः ।चापे च्छित्त्वा च यमयोर्दध्मौ शङ्खं महास्वनम् ॥ २३॥


ततस्तु शल्यं समुदीर्यमाणं दृष्ट्वा रणे भीमसेनस्तरस्वी(भीमसेनस्तपस्वी) ।न्यवारयद् बाणवरैरनेकैश्चकार चैनं विरथं क्षणेन ॥ २४॥


आस्थाय चान्यं रथमापतन्तं पुनश्च शल्यं भृशमेव मर्मसु ।निर्भिद्य बाणैर्विरथं चकार पुनस्तृतीयं रथमारुरोज(आरुरोह) ॥ २५॥


आत्तान्यात्तान्यायुधान्यस्य भीमः सर्वाणि चिच्छेद बिभेद चास्य ।मर्माणि बाणैर्नितरां पुनश्च स मुष्टिमुद्यम्य जगाम धर्मजम् ॥ २६॥


तं भीमभिन्नमर्माणं विवर्माणं निरायुधम् ।श्वासमात्रावशिष्टं च मरणायैव केवलम् ॥ २७॥


आत्मानमभिगच्छन्तं दृष्ट्वाऽन्यं रथमास्थितः ।हन्तुकामो रणे वीरममोघां शक्तिमाददे ॥ २८॥


दिव्यास्त्रैरपि संयोज्य तां तदा धर्मनन्दनः ।सत्यधर्मफलैश्चैव चिक्षेपास्य हृदि त्वरन् ॥ २९॥


स भिन्नहृदयो भूमौ पपाताभिमुखो नृपम् ।सत्यधर्मरतः शल्य इन्द्रस्यातिथितामगात् ॥ ३०॥


मद्रराजे हते वीरे सुशर्माऽर्जुनमभ्ययात् ।संशप्तकावशिष्टैस्तमनयन्मृत्यवेऽर्जुनः ॥ ३१॥


दुर्योधनस्यावरजानवशिष्टान् वृकोदरः ।सर्वान् जघान सेनां च निश्शेषमकरोद् रणे ॥ ३२॥


उलूकं सहदेवोऽथ शकुनिं चातिपापिनम् ।जघान द्रौणिहार्दिक्यकृपान् भीमार्जुनौ ततः ॥ ३३॥


बहुशो विरथीकृत्य पीडयित्वा पुनःपुनः ।द्रावयामासतुस्ते तु भीषिता विविशुर्वनम् ॥ ३४॥


शैनेयेन गृहीतोऽथ सञ्जयोऽनन्तशक्तिना ।व्यासेन मोचितोऽथैकः पार्थान् दुर्योधनोऽभ्ययात् (दुर्योधनोऽभ्यगात्)॥ ३५॥


तेषामभूत् तस्य च घोररूपं युद्धं स बाणैर्बहुशोऽर्जुनं च ।चकार मूर्च्छाभिगतं युधिष्ठिरं यमावयत्नाद् विरथांश्चकार ॥ ३६॥


तं भीमसेनो विरथं चकार गजं समारुह्य पुनः समभ्ययात् ।पुनश्च शैनेयशिखण्डिपार्षतान् यमौ नृपं च व्यदधान्निरायुधान् ॥ ३७॥


गजे च भीमेन शरैर्निपातिते समारुहद् वाजिवरं सुनिर्भयः ।स तेन च प्रासकरो रणेऽरिहा चचार शैनैयमताडयच्च ॥ ३८॥


मुमोह तेनाभिहतः स सात्यकिर्यमावपि प्रासनिपीडितौ रथे ।निषीदतुर्धर्मसुतं प्रयान्तं समीक्ष्य भीमोऽस्य जघान वाजिनम् ॥ ३९॥


प्रासे निकृत्ते च वृकोदरेण विवाहनः सोऽपि(सोऽप ययौ) ययौ सुयोधनः ।आदाय गुर्वीं च गदां प्रयातो द्वैपायनस्योरुसरो विवेश ॥ ४०॥


एवमक्षोहिणीषट्कं भीमेन निहतं रणे ।पञ्च पार्थेन निहता अर्द्धं कालिङ्गकानृते ।


अक्षौहिणीचतुष्कं च पार्थानां द्रौणिना हतम् ।अन्यैरन्याः समस्तैश्च द्रोणकर्णमहाव्रताः ।


जयं लब्ध्वा तदत्सूच्चैः पाण्डवेषु महात्मसु ।दुर्योधनो जलस्तम्भं कृत्वा मन्त्रान् जजाप ह ॥ ४३॥


मन्त्रा दुर्वाससा दत्ता मृतसञ्जीवनप्रदाः ।जले स्थित्वा जपन् सप्तदिनैः सर्वान् मृतानपि ।


इति विद्याबलं तस्य ज्ञात्वा पाण्डुसुतास्ततः ।अन्विष्यन्तः (अन्वेषन्तः) शुश्रुवुश्च व्याधेभ्यस्तं जले स्थितम् ।


तदा जलात् समुन्मज्ज्य त्रिभिर्द्रौणिपुरस्सरैः ।मन्त्रयन्तं(मन्त्रयन्तः) स्म ददृशुस्तान् दृष्ट्वा ते प्रदुद्रुवुः ॥ ४६॥


दुर्योधनोऽविशत् तोयं दृष्ट्वा तं केशवाज्ञया ।युधिष्ठिरः सुपरुषैर्वाक्यैरेनमथाऽह्वयत् ॥ ४७॥


अमर्षितोऽसौ धृतराष्ट्रपुत्रः श्वसंस्तदा दण्डहतो यथाऽहिः ।उवाच शाठ्यात् तपसे वनाय यायां भवाञ्छासतु सर्वपृथ्वीम् ॥ ४८॥


तमाह धर्मजो राजा यस्त्वं कृष्णे समागते ।सूच्यग्रवेध्यां पृथिवीं दातुं नैच्छः कथं पुनः ॥ ४९॥


घातयित्वा सर्वपृथ्वीं भीष्मद्रोणमुखानपि ।दातुमिच्छसि सर्वान् त्वं पृथ्वीं नाद्य वयं पुनः ॥ ५०॥


अहत्वा प्रतिगृह्णामि एहि युद्धे स्थिरो भव ।न कुरूणां कुले जातो ह्यस्त्वं भीतो ह्यपोऽविशः ॥ ५१॥


इत्यादि रूक्षवचनं श्रुत्वा दुर्योधनो रुषा ।जलस्तम्भात् समुत्तस्थौ श्वसन्नाशीविषो यथा ॥ ५२॥


उवाच एक एवाहमकिरीटो विवर्मकः ।भवन्तो बहवो वर्मशिरस्त्राणयुता अपि ॥ ५३॥


यद्येवमपि मे युद्धं भवद्भिर्मन्यसे समम् ।सर्वैरेकेन वा युद्धं करिष्ये न च भीर्मम ॥ ५४॥


इत्युक्त आह धर्मात्मा वर्माद्यं च ददामि ते ।वृणीष्व प्रतिवीरं च पञ्चानां यं त्वमिच्छसि ॥ ५५॥


हत्वैकं त्वं भुङ्‍क्ष्व राज्यमन्ये याम वयं वनम् ।हते वा त्वयि तेनैव भुञ्जीमश्चाखिलां भुवम् ।


इत्युक्त ऊचे नहि दुर्बलैरहं योत्स्ये चतुर्भिर्भवदर्जुनादिभिः ।भीमेन योत्स्ये गदया सदा हि मे प्रिया गदा नान्यदथाऽयुधं स्पृशे ॥ ५७॥


श्रुत्वाऽस्य वाक्यं रभसो(रभसा) वृकोदरो गदां तदाऽध्यर्द्धभराधिकां(तदध्यर्धभराधिकां) मुदा ।राज्ञो गदायाः परिगृह्य(प्रतिगृह्य) वीरः समुत्थितो युद्धमनाः समुन्नदन् ॥ ५८॥


अथाऽह नारायण आदिदेवो युधिष्ठिरं कष्टमिदं कृतं त्वया ।नह्येष राजा गदया रणे चरन् शक्यो विजेतुं निखिलैः सुरासुरैः ॥ ५९॥


स निश्चयाद् वश्चतुरो निहन्यात् सहार्जुनान् भीमसेनः कथञ्चित् ।हन्तैनमाजौ नहि भीमतुल्यो बले क्‍वचिद् धार्तराष्ट्रः कृती च ॥ ६०॥


ऊरू भीमेन भेत्तव्यौ प्रतिज्ञां रक्षता रिपोः ।नाभेरधस्ताद्धननं जना आहुर्गदामृधे ॥ ६१॥


अधर्म इति तत् कृष्णो लोकनिन्दानिवृत्तये ।आपद्धर्मं दर्शयितुं किञ्चिद्व्याजेन संयुतः ॥ ६२॥


भीमो हन्याद् धार्तराष्ट्रमित्यूचे यद्यपि स्फुटम् ।अव्याजेनापि शक्तोऽसौ बलं निस्सीममाह च ॥ ६३॥


आह शिक्षामप्यनूनां यत्नं दुर्योधनेऽधिकम् ।नहि भीमोऽतिप्रयत्नं कुर्यादिति गुणो ह्ययम् ॥ ६४॥


प्रतिज्ञापालनं धर्मो दुष्टेषु तु विशेषतः ।इति धर्मरहस्यं तु वित्तः कृष्णवृकोदरौ ॥ ६५॥


नान्यस्ततो लोकनिन्दां व्यपनेतुमुभावपि ।अनापद्यापदिव च दर्शयेतां जनस्य तु ॥ ६६॥


ततो भीमः सर्वलोकस्य धर्मं प्रकाशयन् वाक्यमिदं जगाद ।ऊरू तवाहं (हि) च यथाप्रतिज्ञं(यथा प्रतिज्ञा) भेत्स्यामि नैवात्र विचारणीयम् ॥ ६७॥


इत्युक्तवन्तं(इति ब्रुवन्तं) प्रससार चाऽजौ दुर्योधनस्तत्र बभूव युद्धम् ।भीमस्तदाऽग्र्यप्रकृतिं विधित्सुर्मन्दः स आजौ व्यचरज्जनार्थे ॥ ६८॥


दर्शयन्तौ गदामार्गं चित्रं तौ प्रविचेरतुः (चित्रं परिविचेरतुः)।बलभद्रोऽप्याजगाम तदा तौ प्रतिवारितुम् ॥ ६९॥


वारितावपि तेनोभौ नैव युद्धं प्रमुञ्चताम्(व्यमुञ्चताम्) ।ततो ददर्श तद् युद्धं मानितः कृष्णपूर्वकैः ।


ततो(तत्र) भीमं वञ्चयितुं धार्तराष्ट्रः शिरः क्षितौ ।(व्यधाद्) न्यधादुच्छ्रितसक्थीकस्तदा कृष्णाभ्यनुज्ञया ।


प्रतिज्ञापालनार्थाय नाभेर्नोपर्यधस्तदा ।गदायुद्धस्य मर्यादां यशश्चाप्यभिरक्षितुम् ॥ ७२॥


नाधस्तान्मध्य एवासौ निजघ्ने तं वृकोदरः ।एवं प्रतिज्ञायुग्मार्थं भग्नं(भिन्न) सक्थियुगं रणे ॥ ७३॥


कृष्णं द्यूते निधेहीति यदवादीत्(यदवादि) सुयोधनः ।तत्प्रतिज्ञानुसारेण भीमो मूर्द्धानमक्रमीत् ।


तेषां पुण्यानि विद्याश्च समादायैव सर्वशः ।तांश्चकार तमोगन्तॄंस्तस्य मूर्ध्नि पदाऽऽक्रमन् ॥ ७५॥ (योगक्षेमं व आदायाहम् भूयासम् उत्तम आ वो मूर्धानम् अक्रमीम् । ऋग्वेद १०.१६६.५)


स्मारयामास कर्माणि यानि तस्य कृतानि च ।कृष्णबन्धे कृतो मन्त्र इति मूर्ध्नि पदाऽहनत् ॥ ७६॥


पुनःपुनश्च तद् वीक्ष्य चुक्रोध मुसलायुधः ।चुक्रोश नैव धर्मोऽयमित्यसावूर्ध्वबाहुकः ॥ ७७॥


पुनः क्रोधाभिताम्राक्ष(क्रोधातिताम्राक्षः) आदाय मुसलं हलम् ।अभिदुद्राव भीमं तं न चचाल वृकोदरः ॥ ७८॥


अभये संस्थिते भीमे रामं जग्राह केशवः ।आह धर्मेण निहतो भीमेनायं सुयोधनः ॥ ७९॥


न मण्डलेऽभिसारे वा नापसारे च नाभितः ।अधो हन्याद् वञ्चयन्तमधो हत्वा न दुष्यति ॥ ८०॥


कृता प्रतिज्ञा च वृकोदरेण भेत्स्ये तवोरू इति युक्तिपूर्वम्(पूर्वकम्) ।संश्रावयानेन तदेष धर्मतो जघान दुर्योधनमग्र्यकर्मा ॥ ८१॥


वासुदेववचः श्रुत्वा धर्मच्छलमिति ब्रुवन् ।रौहिणेयो जगामाऽशु स्वपुरीमेव सानुगः ॥ ८२॥


तस्मिन् गते वासुदेवं समपृच्छद् युधिष्ठिरः ।धर्मोऽयमथवाऽधर्म इति तं प्राह केशवः ॥ ८३॥


न साक्षाद् धर्मतो वध्या ये तु पापतमा नराः ।देवैर्हि वञ्चयित्वैव हताः पूर्वं सुरारयः ।


भीष्मद्रोणौ च कर्णश्च यदैवोपधिना(यथैवोपाधिना) हताः ।को नु दुर्योधने पापे हते दोषः कथञ्चन ॥ ८५॥


प्रतिज्ञापालनायापि विभेदोरू वृकोदरः ।धर्मतश्च प्रतिज्ञेयं कृतानेनानुरूपतः (तेनानुरूपतः) ॥ ८६॥


लोकतोऽपि न धर्मस्य हानिरत्र कथञ्चन ।ये भीमस्याप्रभावज्ञा आपद्धर्मं च मन्वते ॥ ८७॥


अवध्यत्वे शिववराद् गदाशिक्षाबलादपि ।जरासन्धोपमो यस्माद् धार्तराष्ट्रः सुविश्रुतः(धृतराष्ट्र इति श्रुतः) ॥ ८८॥


तस्मात् सद्धर्म एवायं भीमचीर्ण इति ब्रुवन् ।अपि संशयिनं चक्रे धर्मराजं जगत्पतिः ॥ ८९॥


भूभारक्षतिजो धर्मो मच्छुश्रूषात्मकश्च यः ।भीमस्यैव भवेत् सम्यगिति बुद्ध्या परः प्रभुः ॥ ९०॥


स्वेनैव बलभद्राय जनाय च पुनःपुनः ।श्रुत्वाऽप्युक्तं न तत्याज संशयं धर्मजो यतः ।


मुख्यं धर्मं(मुख्यधर्मं) हि भगवान् बलायाऽह जनाय च ।धर्मेणैव हतो राजा धार्तराष्ट्रः सुयोधनः ।


पुनःपुनर्धर्मत एव भीमो जघान राजानमिति ब्रुवन्तम् ।जगाद कृष्णं स्फुरिताधरोष्ठः क्रोधात् सुपापो धृतराष्ट्रसूनुः ।


इत्यूचिवांसं प्रजगाद कृष्णो न त्वत्समः पापतमः कदाचित् ।भीष्मादिहत्याऽपि तवैव पापं यदन्वयुस्त्वामतिपापनिश्चयम् ।


न पाण्डवेष्वस्ति ततो हि किञ्चित् पापं प्रयत्नाच्च निसर्गतोऽपि ।गुणाधिकास्ते मदुपाश्रयाच्च को नाम तेष्वण्वपि पापमाह ॥ ९५॥


निसर्गतः पापतमस्त्वमन्यान् धर्मस्थितान् पापपथे निधाय ।स्वयं च पापे निरतः सदैव पापात् सुपापां गतिमेव यासि ॥ ९६॥


इति ब्रुवन्तं पुनराह कृष्णं दुर्योधनः पापकृतां प्रधानः ।स्वन्तोत्तमो(गुणोत्तमो) नाम क एव मत्तः को नाम दोषोऽस्ति मया कृतोऽत्र ॥ ९७॥


इष्टं च यज्ञैश्चरितं च पूर्तैः पदं रिपूणां निहितं च मूर्ध्नि(मूर्धनि) ।मृत्युश्च सङ्ग्रामशिरस्यवाप्तो रणोन्मुखेनैव मया किमन्यत् ॥ ९८॥


इष्टा भोगा मया भुक्ताः प्राप्ता च परमा गतिः ।दुःखिनो दुःखमाप्स्यन्ति पार्थास्ते कूटयोधिनः ॥ ९९॥


चन्द्रसूर्यनिभैः(चन्द्रार्कसन्निभैः) शूरैर्धार्मिकैः सद्भिरुज्झिता ।केवला रत्नहीनेयं पाण्डवैर्भुज्यतां मही ॥ १००॥


इत्युक्तवत्येव नृपे सुरेशैः प्रसूनवृष्टिर्विहिता पपात ।तामेव बुद्धिं धृतराष्ट्रसूनोः कृत्वा दृढां पातयितुं तमोऽन्धे ॥ १०१॥


सम्भावयत आत्मानं वासुदेवं विनिन्दतः ।तत्परांश्च कथं न स्यात् तमोऽन्ते च विशेषतः ॥ १०२॥


यदैकैकमलं तत्र दुःखाधिक्यं समुच्चयात् ।इति तत् कारयित्वेश आह मोघं तवाखिलम् ॥ १०३॥


नृशंसस्य कृतघ्नस्य गुणवद्‍द्वेषिणः सदा ।यदि धर्मफलं ध्वान्तं सूर्यवत् स्यात् प्रकाशकम् ॥ १०४॥


वदन् पुनःपुनरिदं धर्मतो हत इत्यपि ।ख्यापयामास भगवान् जने निजजनेष्टदः ॥ १०५॥


प्रख्यापिते वासुदेवेन धर्मे सतां सर्वेषां हृद्यमासीत् समस्तम् ।हतं च धर्मेण नृपं व्यजानन् पापोऽयमित्येव विनिश्चितार्थाः ॥ १०६॥


युधिष्ठिरोऽपापदर्शी (अपायदर्शी) सदैव ससंशयोऽभूत् सुमनोऽभिवृष्ट्या ।स्नेहाद् द्रौणिः सञ्जयो रौहिणेयो दौर्योधनात् पापमित्येव चोचुः ॥ १०७॥


ततः कृष्णः पाण्डुपाञ्चालकैस्तैर्भृशं नदद्भिर्हृषितैः समेतः ।ययौ विरिञ्चेशसुरेन्द्रमुख्यैः सम्पूजितस्तैश्च रणाङ्गणात् स्मयन् ॥ १०८॥


ततः श्रुत्वा सञ्जयाद् दुःखतप्तं सम्बोधयिष्यन् पितरं युयुत्सुः ।कृष्णस्य राज्ञश्च मतेऽनुयातो(मतेन यातः) जगाम चान्वेव जनार्दनश्च ॥ १०९॥


धर्मयुक्तैश्च तत्त्वार्थैर्लोकवृत्तानुदर्शकैः ।वाक्यै राजानमाश्वास्य प्रायात् पार्थान् पुनर्हरिः ॥ ११०॥


कालानुसारतो दैवांश्चोपसंहर्तुमच्युतः ।ययौ सपार्थशैनेयः कुरूणां शिबिरं निशि ॥ १११॥


तदैव हार्दिक्यकृपान्वितोऽयात् सुयोधनं द्रौणिरमुं शयानम् ।प्रभग्नसक्थिं श्वसृगालभूतैः सम्भक्ष्यमाणं ददृशे श्वसन्तम् ॥ ११२॥


स दुःखशोकाभिहतो विनिन्द्य पार्थान् मया भूप किमत्र कार्यम् ।इत्याह निष्पाण्डवतां कुरुष्वेत्यमुं व्यधात् पांस्वभिषेकिणं नृपः ॥ ११३॥


उच्छिद्य सन्ततिं पाण्डोः कृत्वा स्वक्षेत्रसन्ततिम् ।तया भूरक्षणहृदा सोऽभिषिक्तस्तथेत्यगात् ॥ ११४॥


स कृष्णभीमपार्थानां भयादेव पुनर्वनम् ।कृपसात्वतसंयुक्तो विवेश गहनं रथी ॥ ११५॥


तस्य चिन्तयतो द्रोणवधं दुर्योधनस्य च ।नाऽगान्निद्रा निशीथे च ध्वाङ्क्षान् न्यग्रोधवासिनः ॥ ११६॥


हतान् सुबहुसाहस्रानेकेनातिबलेन तु ।कौशिकेन निरीक्ष्यैव प्राह तौ कृपसात्वतौ ॥ ११७॥


निदर्शनेन ह्येतेन(ह्येनेन) प्रेरितः परमात्मना ।यामि पाण्डुसुतान् हन्तुमित्युक्त्वाऽऽरुरुहे रथम् ॥ ११८॥


निवारितोऽपि ताभ्यां स प्राद्रवच्छिबिरं प्रति ।अनुजग्मतुस्तावपि तं शिबिरद्वारि चैक्षत ॥ ११९॥


उग्ररूपधरं रुद्रं स्वकीयां तनुमेव सः ।परीतं वासुदेवेन बहुकोटिस्वरूपिणा ॥ १२०॥


दृष्ट्वैव वासुदेवं तमत्रसद् गौतमीसुतः ।वासुदेवाज्ञयैवात्र स्वात्मनाऽपि सदाशिवः ॥ १२१॥


अयुद्ध्यदग्रसच्चाऽशु द्रौणेः सर्वायुधान्यपि ।अचिन्त्या हरिशक्तिर्यद्(हरिशक्तिर्हि) दृश्यन्तेऽऽत्महनोऽपि हि ॥ १२२॥


अतस्तया प्रेरितेन स्वात्मनैवाखिलेष्वपि ।आयुधेषु निगीर्णेषु द्रौणिर्यज्ञं तु मानसम् ।


यज्ञतुष्टेन(यज्ञे तुष्टेन) हरिणा प्रेरितः शङ्करः स्वयम् ।आत्मने द्रोणपुत्राय ददौ सर्वायुधानि च ॥ १२४॥


उवाच चाहमादिष्टो विष्णुना प्रभविष्णुना ।अरक्षं पार्थशिबिरमियन्तं कालमेव तु ॥ १२५॥


तदिच्छयैव निर्दिष्टो दास्ये मार्गं तवाद्य च ।आयुधानि च सर्वाणि हन्तुं(जहि) सर्वानिमान् जनान् ॥ १२६॥


इत्युदीर्य प्रदायाऽशु सर्वा हेतीर्वृषध्वजः ।तत्रैवान्तर्दधे सोऽपि प्रोवाच कृपसात्वतौ ॥ १२७॥


ये निर्यास्यन्ति शिबिराज्जहितं तांस्तु सर्वशः ।इत्युक्त्वा प्रविवेशान्तर्धन्वी खड्गी कृतान्तवत् ॥ १२८॥


पारावताश्वं स तदा शयानमुपेत्य पद्भ्यां समताडयच्च ।वक्षस्यसाववदद् वीतनिद्रो जाने भवन्तं हि गुरोस्तनूजम् ॥ १२९॥


समुत्थितं मां जहि शस्त्रपाणिं शस्त्रेण वीरोऽसि स वीरधर्मः ।लोकाश्च मे सन्त्वथ शस्त्रपूता इति ब्रुवाणं स रुषा जगाद ॥ १३०॥


न सन्ति हि ब्रह्महणां सुलोका विशेषतश्चैव गुरुद्रुहां पुनः ।न धर्मयुद्धेन वधार्हकाश्च ये त्वद्विधाः पापतमाः(पापमनाः) सुपाप ॥ १३१॥


अवश्यं भाविनं(अवश्यभाविनं) मृत्युं धृष्टद्युम्नो विचिन्त्य तम् ।तूष्णीं बभूव स्वप्नेऽपि नित्यं पश्यति तां मृतिम् ॥ १३२॥


द्रौणिं च कालरात्रिं च द्रोणपातादनन्तरम् ।विशसन्तं कृषन्तीं(कृषन्तं) च स्वप्ने पश्यति (स्वप्नेऽपश्यद्धि) पार्षतः ॥ १३३॥


समाक्षिपद् द्रोणसुतोऽस्य कण्ठे निबद्ध्य मौर्वीं धनुषोप्युरस्थः ।ममन्थ कृच्छ्रेण विहाय देहं ययौ निजस्थानमसौ च वह्निः ॥ १३४॥


ततः शिखण्डिनं हत्वा युधामन्यूत्तमोजसौ ।जनमेजयं च पाञ्चालीसुतानभिययौ ज्वलन् ॥ १३५॥


तैरुत्थितैरस्यमानः शरैः खड्गेन जघ्निवान् ।सर्वान् सव्यापसव्येन तथाऽन्यान् पाण्डवात्मजान् ।


तं तदाऽन्तर्हितः(अन्तर्हितं) शर्वः कैलासमनयत् क्षणात् ।स शर्वत्रातनामाऽऽसीदतस्तत्रैव सोऽवसत् ॥ १३७॥


पुराऽर्थितः स्वदौहित्रस्यामरत्वाय शङ्करः ।काशिराजेन तेनासौ जुगोपैनं कृपायुतः ॥ १३८॥


वासुदेवमतं ज्ञात्वा साम्राज्याय परीक्षितः ।वारयामास भूलोकं नैव याहीत्यमुं शिवः ॥ १३९॥


सामान्यतोऽपाण्डवाय द्रौणिनाऽप्यभिसन्धितम् ।तद्रूपेणैव रुद्रेण विनैनमिति चिन्तितम् ॥ १४०॥


अस्त्रं ब्रह्मशिरश्चैनं न जघानैक्यतस्तयोः ।चेकितानादिकांश्चैव जघानान्यान् स सर्वशः(जघानान्यांश्च सर्वशः) ॥ १४१॥


स चेदिपाञ्चालकरूशकाशीनन्यांश्च सर्वान् विनिहत्य वीरः ।शिशून् स्त्रियश्चैव निहन्तुमुग्रः प्रज्वालयत् तच्छिबिरं समन्तात् ॥ १४२॥


जीजीविषूंस्तत्र पलायमानान् द्वारि स्थितौ गौतमः सात्वतश्च ।निजघ्नतुः सर्वतः पार्षतस्य सूतस्त्वेकः शेषितो दैवयोगात् ॥ १४३॥


खड्गेन प्रहृतं दृष्ट्वा हार्दिक्येन पपात ह ।भूमौ प्रागेव संस्पर्शान्न ज्ञातस्तमसाऽमुना ।


तस्या अकथयत् सर्वं सा भीमायाऽह दुःखिता ।प्राद्रवद् रथमारुह्य स धन्वी गौतमीसुतम् ॥ १४५॥


तदन्तरे द्रौणिरपि प्रयातः कृष्णासुतानां मुदितः शिरांसि ।आदाय हार्दिक्यकृपानुयातो दुर्योधनं सन्निकृष्टप्रयाणम् ॥ १४६॥


दृष्ट्वा तदुक्तं च निशम्य पापस्तुष्टोऽत्यजत् साध्विति देहमाशु ।भीमार्जुनाभ्यामथ केशवाच्च भीताः पृथग् द्रौणिमुखाः प्रयाताः ॥ १४७॥


तत्रैकलं द्रोणसुतं रथेन यान्तं रथी मारुतिरन्वधावत् ।तमाद्रवन्तं प्रसमीक्ष्य भीतः पराद्रवद् द्रौणिरभिद्रुताश्वैः (द्रौणिरतिद्रुताश्वैः) ॥ १४८॥


आद्रवन्तं पुनर्दृष्ट्वा भीमं द्रोणात्मजो रुषा ।आवृत्य युद्ध्यन् विजितोऽस्त्रं ब्रह्मशिर आददे ॥ १४९॥


एतस्मिन्नन्तरे कृष्णो धर्मजेनार्जुनेन च ।तत्राऽगमत् तदस्त्रं च भीमं चाव्यर्थतां नयन् ।


विष्णुनैवोभयं यस्मात् कृतं (क्लृप्तं) भीमोऽस्त्रमेव तत् ।गायत्री तत्र मन्त्रो यद् ब्रह्मा तद्ध्यानदेवता ।


ऊचे च पार्थयोः कृष्णो यत् कृतं द्रौणिना पुरा ।स्वायुधानां याचनं चाप्यशक्तेन तदुद्धृतौ ॥ १५२॥


पृष्टेनोक्तं त्वया हीनां कृत्वा दुर्योधनाय गाम् ।दातुं त्वदायुधं मेऽद्येत्येवमुक्तेऽत्मनोदितम् ।


तदस्त्रं प्रज्वलद् दृष्ट्वाऽपाण्डवत्वविधित्सया ।धरायां द्रौणिना मुक्तं कृष्णेन प्रेरितोऽर्जुनः ॥ १५४॥


स्वस्त्यस्तु द्रोणपुत्राय भूतेभ्यो मह्यमेव च ।इति ब्रुवंस्तदेवास्त्रमस्त्रशान्त्यै व्यसर्जयत् ॥ १५५॥


अनस्त्रज्ञेषु मुक्तं तद्धन्यादस्त्रमुचं यतः ।गुरुभक्त्या ततो द्रौणेः स्वस्त्यस्त्वित्याह वासविः ॥ १५६॥


तदाऽस्त्रयोस्तु संयोगे भूतानां संहृतिर्भवेत् ।भूतानां स्वस्तिरप्यत्र काङ्क्षिता करुणात्मना ॥ १५७॥


तथाऽप्यस्त्रद्वयं युक्तं भूतानां नाशकृद् ध्रुवम् ।तस्मान्निवारयन् योगं तयोर्मध्येऽभवत् क्षणात् ।


संस्थाप्यास्त्रद्वयं दूरे तावाह पुरुषोत्तमः ।सन्ति ह्यस्त्रविदः पूर्वं प्रायश्चैतन्न तैः कृतम् ।


इत्युक्ते फल्गुनः प्राह मया मुक्तं महापदि ।शान्त्यर्थमेव च विभो क्षन्तव्यं भवता ततः ॥ १६०॥


द्रौणिरप्येवमेवाऽह तौ वेदपतिरब्रवीत् ।निवर्त्यतामस्त्रमिति शक्रसूनुस्तथाऽकरोत् ।


क्षत्रतेजा ब्रह्मचारी कौमारादपि पाण्डवः ।निवर्तने ततः शक्तो नायं द्रोणात्मजोऽपि सन् ।


निवर्तनासमर्थस्त्वं देहि नैसर्गिकं मणिम् ।जितः प्रागेव भीमेन भीमायैव महाप्रभम् ।


इत्युक्तो मूर्धजं रत्नं जरामरणनाशनम् ।क्षुत्तृट्श्रमापहं दिव्यगन्धं ध्वान्तहरं(दिव्यं गन्धध्वान्तहरं) शुभम् ॥ १६४॥


उत्कृत्य भीमाय ददौ मुक्ताः पञ्चैव पाण्डवाः ।अस्त्रादिति ततो वेदभर्ता वासविमब्रवीत् ॥ १६५॥


तात मुक्तं द्रौणिनाऽपि त्वमेवास्त्रं निवर्तय ।इत्युक्तस्तं प्रणम्याऽशु सञ्जहारार्जुनोऽपि तत् ॥ १६६॥


यादवेशोऽथ गौतम्याः सुतमाहैकसन्ततेः ।वाचा निवर्तयास्त्रं त्वमित्युक्तो द्रौणिरब्रवीत् ॥ १६७॥


पक्षपातादिच्छसि त्वं भागिनेयस्य सन्ततिम् ।तत्रैव पातयाम्यस्त्रमुत्तरागर्भकृन्तने ॥ १६८॥


वासुदेवः पुनः प्राह यदि हन्तव्य एव ते ।गर्भस्तथाऽपि नैवास्त्रं पातयास्मिन् कथञ्चन ॥ १६९॥


अभिमन्योर्मृतस्यैव देहे पातय मानद ।एवं त्वदस्त्रनिहतं गर्भमुज्जीवयाम्यहम् ॥ १७०॥


पातये गर्भ एवाहमित्यूचे गौतमीसुतः ।अथाऽह वासुदेवस्तमीषत्क्रुद्ध इव प्रभुः ॥ १७१॥


दुर्मते पश्य मे वीर्यं यत् ते शक्यं कुरुष्व तत् ।उज्जीवयाम्यहं गर्भं यततः शक्तितोऽपि ते ॥ १७२॥


सन्ततिर्वर्षसाहस्रं पाण्डवानां भवेद् भुवि ।मत्पालितां न कश्चित् तां तावद्धन्तुं क्षमः क्‍वचित् ॥ १७३॥


जानामि ते मतिं दुष्टां जिघांसोः पार्थसन्ततिम् ।चिकीर्षोर्धार्तराष्ट्रस्य तन्तुं भूयः सुदुष्करम् ॥ १७४॥


मदाज्ञया सा विफला भवित्री वाञ्छा मुमुक्षा विमुखस्य(मुमुक्षोर्विमुखस्य) विष्णोः ।यथैव तेनैव नराधिरूढो गम्यस्तव स्यान्नच भूमिभागः ॥ १७५॥


दुर्गन्धयुक्तो व्रणसञ्चिताङ्गः सदा चरः स्या विपिनेषु मन्दः ।यावद् भुवि स्यादिह पार्थतन्तुर्व्यासोऽपि तं प्राह तथेति देवः ॥ १७६॥


रूपद्वयेनापि हरेस्तथोक्तो जगाद कालीतनयं स कृष्णम् ।त्वया सह स्यान्मम सङ्गमो विभो यथेष्टतः स्यान्नच मेऽत्र विघ्नः ॥ १७७॥


इत्युक्त ओमिति प्राह भगवान् बादरायणः ।तं प्रणम्य ययौ सोऽपि स्वप्नदृष्टमनुस्मरन् ॥ १७८॥


स्वप्ने हि द्रौपदेयानां वधो दृष्टोऽत्मना निशि ।अर्जुनेन प्रतिज्ञानं द्रौपद्यै स्ववधं प्रति ॥ १७९॥


निबध्याऽनयनं चैव तेनैव शिबिरं प्रति ।मुञ्चेति द्रौपदीवाक्यं नेति भीमवचस्तथा ।


इत्यादि स्वप्नदृष्टं यत् प्रायः सत्यमभूदिति ।चिन्तयन् प्रययौ देवं (दावं) द्रौणिः शस्त्रभृतां वरः ॥ १८१॥


स कृष्णोक्तमपि प्राप्य बादरायणशिष्यताम् ।प्राप्योत्तरद्वापरे च वेदान् संविभजिष्यति ॥ १८२॥


ततः सप्तर्षिर्भूत्वा पाराशर्यप्रसादतः ।एकीभावं स्वरूपेण यास्यत्यच्युतनिष्ठया ॥ १८३॥


कृपोऽथ पाण्डवान् प्राप्य गौरवात् पूजितश्च तैः ।अभूदाचार्य एवासौ राज्ञां तत्तन्तुभाविनाम् ॥ १८४॥


बादरायणशिष्यत्वं पुनः प्राप्य भजन्नमुम् ।साकं स्वभागिनेयेन भाव्येको मुनिसप्तके ।


कृष्णायै तं मणिं(तन्मणिं) दत्वा भीमस्तां पर्यसान्त्वयत् ।विकोपा भीमवाक्येन राज्ञे सा च मणिं ददौ ॥ १८६॥


राजार्हे हि मणौ दत्ते मह्यं भीमेन लौकिकाः ।स्त्रीपक्षपातं राजा च शङ्केयुर्मारुतेरिति ॥ १८७॥


मणिं राज्ञे ददौ कृष्णा भर्तृप्रियहिते रता ।सोऽप्याबध्य मणिं मूर्ध्नि रेजे राजा गवामिव ॥ १८८॥


वेदेश्वरेणापि यदूत्तमेन कृष्णेन युक्तास्तत आशु पार्थाः ।ययुः सभार्या निजराजधानीं हत्वैव सन्तोऽन्तररीन् स्वराज्यम् ॥ १८९॥


युधिष्ठिरस्यानु विचित्रवीर्यसुतस्य पादावभिवन्दमानम् ।आकृष्य भीमं परमेश्वरोऽयो मयाकृतिं धात् पुरतो नृपस्य ॥ १९०॥


भीमाकृतिं तां स सुयोधनेन कारापितामभ्यसने गदायाः ।आश्लिष्य चूर्णीकृतवानसृग् वमन् हा तात भीमेति वदन् पपात ॥ १९१॥


तमाह कृष्णो न हतोऽद्य भीमो नच त्वयाऽन्यैरपि शक्यतेऽसौ ।हन्तुं स्वबुद्धिः प्रथिता त्वयाऽद्य पापा हि ते बुद्धिरद्यापि राजन् ॥ १९२॥


स्वबुद्धिदोषादतिपापशीलपुत्राख्यपापानि विवर्द्धयित्वा ।नीतो वशं तैः फलमद्य भुञ्जन् न क्रोधितुं चार्हसि भीमसेने ॥ १९३॥


इत्युक्ते शान्तबुद्ध्यैव राज्ञाऽऽहूतो वृकोदरः ।अभ्यवन्दत तत्पादावनुजाद्याश्च तस्य ये ॥ १९४॥


वज्राच्च दृढदेहत्वादविकारे वृकोदरे ।न दोषो विवृतोऽस्य स्यादिति कृष्णेन वञ्चितः(चिन्तितम्) ।


कुलनाशकरः पापः शापयोग्यस्तव ह्यहम् ।इत्युक्त्वैव प्रणमतो गान्धारी सुपदाङ्गुलीः ॥ १९६॥


ददर्श धर्मराजस्य पटान्तेन(पट्टान्तेन) प्रकोपिता ।तस्याः क्रोधाग्निनिर्दग्धनखः स कुनखोऽभवत् ॥ १९७॥


वन्दमानं पुनर्भीममाह सा क्रोधविह्वला ।अधर्मतः कथं भीम सुतं मे त्वं निजघ्निवान् ॥ १९८॥


इत्युक्तेऽस्याः (इत्युक्तोऽस्याः) शमयितुं क्रोधमग्रे वृकोदरः ।प्राह न प्राणसन्देहे पापं स्यात् पापिनो वधे ॥ १९९॥


इत्युक्त्वा तां पुनः प्राह प्रतिज्ञाहानिमन्तरा ।न मेऽस्ति प्राणसन्देह इति जानन् वृकोदरः ॥ २००॥


यथाप्रतिज्ञं भ्रातृव्यान् रणे मम निजघ्नुषः ।क्‍वाधर्मः क्षत्रजातेस्तु तद्धानौ जीवनं नहि ॥ २०१॥


‘पापा न शुद्धधर्मेण हन्तव्या’ इति च श्रुतिः ।‘अन्यवत् पापहननं पापयेत्याह’ इति श्रुतिः ।


निकृत्या निकृतिं हन्यान्निकृत्या नैव धार्मिकान्(धार्मिकम्) ।इति श्रुतिर्हि परमा पठ्यते पैङ्गिभिः सदा ॥ २०३॥


इत्युक्ता तं पुनः प्राह कथं ते नरशोणितम् ।पीतं नरेणैव सता न पीतमिति सोऽब्रवीत् ॥ २०४॥


दन्तान्तरं न मे प्राप शोणितं तत् सुतस्य ते ।प्रतिज्ञापालनायापि प्रतिकर्तुं च तत् कृतम् ॥ २०५॥


भीषणाय च शत्रूणां पीतवच्च प्रदर्शितम् ।(वेददृष्टः स्वधर्मोऽयं) वेददृष्टश्च धर्मोऽयमितिपापजनं प्रति ॥ २०६॥


इत्युक्तोवाच नैवान्धद्वयस्यास्य वृकोदर ।घ्नता पुत्रशतं यष्टिमात्रं चोर्वरितं त्वया ॥ २०७॥


तामाह भीमः पापिष्ठा वधयोग्यापराधिनः ।सर्वे हता इति पुनः साऽऽह येनाकृतस्तव ।


सर्वैः समेतैः कृष्णस्य बन्धनाय विनिश्चितम्(विनिश्चतः) ।अन्यानि च सुपापानि कृतान्यत्र पुराऽपिच ॥ २०९॥


वासुदेवं सभासंस्थं ब्रुवाणं धर्मसंहितम्(धर्मसंहिताम्) ।पुनःपुनरवज्ञाय यान्तं दुर्योधनं बहिः ।


नैकोऽप्यनपराधी मे स्वयं ताननुशिक्षितुम् ।असमर्था मयि क्रोधं किं करोषि निरर्थकम् ॥ २११॥


इत्युक्ता साऽभवत् तूष्णीं क्रमात् सर्वैश्च पाण्डवैः ।वन्दिता व्यासवाक्याच्च किञ्चिच्छान्ताऽथ साऽभवत् ॥ २१२॥


तस्या याश्च स्नुषाः सर्वास्ताभिः सह पुरस्कृताम् ।कृत्वा तं धृतराष्ट्रं च विदुरादींश्च सर्वशः ॥ २१३॥


पाण्डवाः प्रधनस्थानं सभार्याः पृथया सह ।कृष्णाभ्यां च ययुस्तत्र गान्धार्यास्तपसो बलम् ॥ २१४॥


जानन् पाण्डवरक्षार्थं चिकीर्षुस्तत्तपोव्ययम् ।वेदेश्वरो ददौ दिव्यं चक्षुः सत्यवतीसुतः ॥ २१५॥


तेन दृष्ट्वा प्रेतदेहान् सर्वांस्तत्र समाकुला(समाकुलान्) ।शशाप यादवेशानं त्वयाऽस्मत्कुलनाशनम् ।


इत्युक्तो भगवान् कृष्णः स्वचिकीर्षितमेव तत् ।अस्त्वेवमित्याह विभुरीश्वरोऽप्यन्यथा कृतौ ॥ २१७॥


तेन तस्यास्तपो नष्टं हीना साऽतो हि भर्तृतः ।नाशयेद्धि स्वयं विष्णुः स्वयोग्यादधिकान् गुणान् ॥ २१८॥


तत आश्लिष्य भर्तॄणां देहान् प्ररुदतीः स्त्रियः ।सर्वा दुर्योधनादीनां दर्शयामास केशवः ।


ततो देहान् प्रसिद्धानां पार्थाः समदहन् सताम् ।अन्येषां धृतराष्ट्रादीन् पुरस्कृत्यैव कांश्चन ।


स्नेहान्नृपो यमौ च स्वान् नाऽजौ तस्मिन् न्ययोजयन् (ह्ययोजयन्) ।शवाः प्रायो बहुत्वेन तत्रतत्रैव संस्थिताः ॥ २२१॥


ततो ददत्सु पानीयं गङ्गायां स्वजनस्य तु ।पृथा कर्णाय दत्तेति पार्थानाहाग्रजं च तम् ॥ २२२॥


ततो हाहेति विलपन् राजा परमदुःखितः ।शशाप सर्वनारीणां गुह्यं हृदि न तिष्ठतु ॥ २२३॥


हा मातस्तव धृत्यैव वयं सर्वे भृशं हताः ।ज्येष्ठं पितृसमं हत्वा प्रतिपत्स्याम कां गतिम् ॥ २२४॥


एवं वदन्तं कौन्तेयं वासुदेवः सनारदः ।शमयामास सद्वाक्यैर्गुणान् कर्णस्य चाब्रवीत् ॥ २२५॥


ततस्ते प्रेतकार्याणि चक्रुः सर्वेऽपि सर्वशः ।सर्वेषामधिराज्ये च स्थितोऽभूत् पाण्डवाग्रजः ॥ २२६॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवराज्यलाभो नाम अष्टाविंशोऽध्यायः


ओं ॥ यदैव कृष्णौ सकलाधिराज्ये युधिष्ठिरं यौवराज्ये च भीमम् ।विप्रैर्युतावभिषिच्याऽशिषश्च युक्ता दत्वा हर्षयामासतुस्तौ ॥ १॥


तदैव चार्वाक इति प्रसिद्धं रक्षस्त्रिदण्डी यतिरेव भूत्वा ।युधिष्ठिरं गर्हयामास विप्रास्त्वां गर्हयन्तीति सुपापशीलः ॥ २॥


श्रुत्वैव तद् दुःखितमाशु धर्मजं दृष्ट्वा विप्राः शेपुरमुं भृशार्ताः ।अगर्हितं नित्यमस्माभिरेनं यतोऽवोचो गर्हितमद्य पाप ।


भस्मीकृतेऽस्मिन् यतिवेषधारिणि युधिष्ठिरं दुःखितं वृष्णिसिंहः ।प्रोवाच नायं यतिरुग्रकर्मा सुयोधनस्यैव सखा सुपापः ॥ ४॥


रक्षोऽधमोऽयं निहतोऽद्य विप्रैस्तमा शुचः कृतकार्योऽसि राजन् ।इतीरितः शान्तमनाः स विप्रान् सन्तर्पयामास धनैश्च भक्त्या ॥ ५॥


असान्त्वयच्च बान्धवान् स्वपौरसंश्रयादिकान् ।ददौ यथेष्टतो धनं ररक्ष चानु पुर्ववत्(पुत्रवत्,चानुपूर्ववत्)) ॥ ६॥


स भीष्मद्रोणकर्णानां वधाद् दुर्योधनस्य च ।पापाशङ्की तप्यमानो राज्यत्यागे मनो दधे ॥ ७॥


सोऽनुजैः कृष्णया विप्रैरप्युक्तो धर्मशासनम्(धर्मसाधनम्) ।भीमं सम्प्रार्थयित्वैव(सम्प्रार्थयित्वैनं) न वेत्सीत्याह फल्गुनम् ॥ ८॥


तस्मिन् क्रुद्धे नृपं प्राहुर्विप्रास्त्वत्तोऽपि तत्त्ववित् ।शक्रोऽर्जुन इति श्रुत्वाऽप्येतद्धर्मे स संशयम्(ससंशयम्) ॥ ९॥


मत्स्नेहादेव सर्वेऽपि धर्मोऽयमिति वादिनः ।इत्येवं शङ्कमानं तमूचतुर्विप्रयादवौ ।


नातिनिश्चितबुद्धिं तं तदाऽपि पुरुषोत्तमौ ।हतपक्षगतत्वेन त्वच्छङ्‍काया अगोचरः ।


स ताभ्यां भ्रातृभिश्चैव मुनिभिश्च समन्वितः ।भीष्मं ययौ लज्जितेऽस्मिंस्तं भीष्मायाऽह केशवः ॥ १२॥


पृच्छेत्युक्तः स भीष्मेण पप्रच्छाखिलमञ्जसा ।तत्रोवाचाखिलान् धर्मान् कृष्णो भीष्मशरीरगः ॥ १३॥


भीष्मो ह्याह हरिं पार्था बोधनीयास्त्वयैव हि ।का शक्तिर्मम देवेशपार्थान्(देवेश पार्थान्) बोधयितुं प्रभो ॥ १४॥


इत्युक्तो भगवानाह त्वत्कीर्त्यै त्वयि संस्थितः ।प्रवक्ष्याम्यखिलान् धर्मान् सूक्ष्मं तत्त्वमपीति ह ॥ १५॥


राज्ञः प्रथमतो धर्मो भगवद्धर्मपालनम् ।तदर्थं कण्टकोद्धारो धर्मा भागवता अपि ।


पूर्णाशेषगुणो विष्णुः स्वतन्त्रश्चैक एव तु ।तद्वशं सर्वमन्यच्च सर्वदेति विनिश्चयः ॥ १७॥


देवताक्रमविज्ञानमपूजाऽन्यस्य वै हरेः ।पूजा भागवतत्वेन देवादीनां च सर्वशः ॥ १८॥


वृथा कर्माकृतिः क्‍वापि निराशीस्त्वं सदैव च(सदैव तु) ।विष्णोर्भागवतानां च प्रतीपस्याकृतिः सदा ।


प्रियं विष्णोस्तदीयानामपि सर्वं समाचरेत् ।धर्ममप्यप्रियं तेषां नैव किञ्चित् समाचरेत् ॥ २०॥


साम्ये विरोधे च बहूननुवर्तेत वैष्णवान् ।एते साधारणा धर्मा ज्ञेया भागवता इति ॥ २१॥


तत्त्वविज्ञापनं धर्मो विप्रस्य तु विशेषतः ।शारीरदण्डसन्त्यागः पुत्रभार्यादिकानृते ।


न चार्थदण्डः कर्तव्यो विप्रवैश्यादिभिः क्‍वचित् ।शारीरदण्डविषये वैश्यादीनां च विप्रवत् ॥ २३॥


यथालब्धेन वर्तेत भिक्षया वा द्विजोत्तमः ।शिष्ययाज्योपलब्धैर्वा क्षत्रधर्मेण वाऽऽपदि ॥ २४॥


महापदि विशां धर्मैः क्षत्रियः सुरविप्रयोः ।अन्यत्र सर्ववित्तेन वर्तेतैतांश्च पालयन् ॥ २५॥


विरोधिनः क्षत्रियाच्च प्रसह्यैव हरेद् धनम् ।सामादिक्रमतो धर्मान् वर्तयेद् दण्डतोऽन्ततः ।


कृषिवाणिज्यगोरक्षाकुसीदं वैश्यजीवनम् ।परिचर्यैव शूद्रस्य वृत्तिरन्ये स्वपूर्ववत् ।


हरिभक्तावनुच्चस्तु वर्णोच्चो नातिपूज्यते ।विना प्रणामं पूज्यस्तु वर्णहीनो हरिप्रियः ।


ज्ञापनं क्षत्रियाणां च धर्मो विप्राभ्यनुज्ञया ।तदभावे तु वैश्यानां शूद्रस्य परमापदि ॥ २९॥


वर्णेष्वज्ञेष्ववर्णस्तु न ज्ञानी स्यात् कथञ्चन ।इति श्रुतेरवर्णस्य ज्ञापनप्राप्तिरेव न ॥ ३०॥


ज्ञेयं सर्वं त्रिवर्णस्थः स्त्रीभिर्वेदान् विनाऽखिलम् ।स्वीयपुन्नियतिः स्त्रीणां स्वदारनियतिर्नृणाम् ॥ ३१॥


धर्मो गुणोत्तमानां तु स्मृत्यैवान्धं तमो व्रजेत् ।गुणसर्वस्वहानिः स्यादुत्तरोत्तरतोऽत्र च


वेदा अप्युत्तमस्त्रीभिः कृष्णाद्याभिरिवाखिलाःदेव्यो मुनिस्त्रियश्चैव नरादिकुलजा अपि ॥ ३३॥


उत्तमा इति विज्ञेयास्तच्छूद्रैरप्यवैदिकम् ।ज्ञेयमन्यैर्हरेर्नाम निजकर्तव्यमेव च ॥ ३४॥


सर्वथाऽन्धं तमो याति वरं सदृशमेव वा(सदृशमेव च) ।यो विष्णोर्मन्यते किञ्चिद् गुणैः कैश्चिदपि क्‍वचित् ॥ ३५॥


ब्रह्मेशानादिकमपि भेदं यो वा न मन्यते ।भेददृक् तद्गुणादौ च प्रादुर्भावगतेऽपि यः ॥ ३६॥


प्राकृतं देहमथवा(देहमथ वा) दुःखाज्ञानश्रमादिकम् ।मन्यते तारतम्यं वा तद्भक्तेष्वन्यथैव यः ॥ ३७॥


मनोवाक्तनुभिर्यो वा तस्मिन्स्तद्भक्त एव वा ।विरोधकृद् विष्ण्वधीनादन्यत् किञ्चिदपि स्मरन् ॥ ३८॥


अन्याधीनत्वविच्चास्य सर्वपूर्त्यविदेव च ।भक्तिहीनश्च ते सर्वे तमोऽन्धं यान्त्यसंशयम् ॥ ३९॥


तत्त्वे संशययुक्ता ये सर्वे ते निरयोपगाः ।दोषेभ्यस्ते गुणाधिक्ये नैव यान्त्यधमां गतिम् ।


यावद् दोषक्षयश्चोर्ध्वा गतिः(दोषक्षयश्चोर्ध्वगतिः) क्रमश एव तु ।सर्वदोषक्षये मुक्तिरात्मयोग्यानुसारतः ॥ ४१॥


भक्तिज्ञानोन्नतावेव स्वर्गश्च शुभकर्मणः ।विष्णुवैष्णववाक्येन हानिः पापस्य कर्मणः ॥ ४२॥


इत्यादि धर्मसर्वस्वं भीष्मस्थेनैव विष्णुना ।पार्थानां गदितं तच्च श्रुत्वा धर्मसुतोऽनुजान् ।


आह क्षत्ता धर्ममेव सारमर्थं च मध्यमम् ।नीचं कामं निष्फलत्वादर्थमेवार्जुनोऽब्रवीत् ॥ ४४॥


सारं स द्विविधो ज्ञेयो दैवो मानुष एव च ।दैवो विद्या हिरण्यादिर्मानुषः परिकीर्तितः ॥ ४५॥


मध्यमो धर्म एवात्र साध्यं साधनमेव च ।विद्याह्वयोऽर्थो धर्मस्य विद्ययैव च मुच्यते ॥ ४६॥


मानुषोऽर्थोऽपि विद्यायाः कारणं सुप्रयोजितः ।तुष्टोऽर्थेन गुरुर्यस्मात् कैवल्यं दातुमप्यलम् ॥ ४७॥


धर्मार्थतां विनाऽप्यर्थैस्तुष्येयुर्गुरुदेवताः ।यद्यनुद्देशितो धर्मोऽप्यर्थमेवानुसंव्रजेत् ॥ ४८॥


गुरुताऽर्थगतैव स्यात् कामोऽधस्ताद्धि निष्फलः ।यमावत्र विदां श्रेष्ठावर्जुनोक्तमनूचतुः ॥ ४९॥


अथाऽह भीमः प्रवरः सुतत्त्वदृशां समस्तानभिभाष्य हर्षात् ।स्मयन् न कामादतिरिक्तमस्ति किञ्चिच्छुभं क्कावरतां स यायात् ॥ ५०॥


काम्यं हि कामाभिधमाहुरार्याः काम्याः पुमर्थाः सह साधनैर्यत् ।अकाम्यतां यात्यपुमर्थ एव पुमर्थितत्वाद्धि पुमर्थ उक्तः ॥ ५१॥


विज्ञानभक्त्यादिकमप्यतीव सत्साधनं कामबहिष्कृतं चेत् ।न साधनं स्यात् परमोऽपि मोक्षो न साध्यतां याति विना हि कामात् ॥ ५२॥


परात्परोऽप्यादिपुमान् हरिश्च स्वस्येतरेषामपि काम्य एव ।अकामितोऽवाग्गतिमेव दद्यात् कामः पुमर्थोऽखिल एव तेन ॥ ५३॥


इच्छैव कामोऽस्तु तथाऽपि नैतामृते हि चित्त्वं घटकुड्यवत् स्यात् ।सारस्ततः सैव चिदात्मकाऽपि सा चेतना गूढतनुः सदैव ॥ ५४॥


न प्रश्नयोग्यः पृथगेव कामस्तेनैष राजन् यदि तारतम्यम् ।इच्छस्ययं ते त्रिविधो हि वेद्यो धर्मार्थयुक्तः परमो मतोऽत्र ।


तस्मात् स्वबुद्धिप्रमदाभिरेव(सुबुद्धिप्रमदाभिरेव) कामं रमेथा अनुरूपकामः ।राजन् न कामादपरं शुभं हि परो हि कामो हरिरेव येन(तेन) ॥ ५६॥


प्राज्ञः सुहृच्चन्दनसारलिप्तो विचित्रमाल्याभरणैरुपेतः ।इदं वचो व्याससमासयुक्तं सम्प्रोच्य भीमो वरराम वीरः ॥ ५७॥


प्रशस्य भीममन्यांश्च राजा मोक्षमथास्तुवत् ।स्वयुक्तेरप्रतीपत्वान्निराचक्रे न मारुतिः ॥ ५८॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये समस्तधर्मसङ्ग्रहो नाम एकोनत्रिंशोऽध्यायः ॥


ओं ॥ अथ कृष्णमनुस्मृत्य भीष्मे स्वां वसुतां गते ।कृत्वा कार्याणि सर्वाणि गङ्गामाश्वास्य दुःखिताम् ॥ १॥


आश्वासितश्च कृष्णाभ्यां धर्मजो दुःखितः पुनः ।पराशरसुतेनोक्तः कृष्णेनानन्तराधसा ॥ २॥


अपापे पापशङ्कित्वादश्वमेधैर्यजाच्युतम् ।कुरु राज्यं च धर्मेण पालयापालकाः प्रजाः ॥ ३॥


इत्युक्तः स तथा चक्रे त्यक्त्वा भोगांश्च कृत्स्नशः ।गोव्रतादिव्रतैर्युक्तः पालयामास मेदिनीम् ॥ ४॥


ददौ देयानि मुख्यानि यथाकाममखण्डितम् ।नैवार्थी विमुखः कश्चिदभूद् योग्यः कदाचन(कथञ्चन) ॥ ५॥


प्रष्टा च दाताऽखिलराजनम्यो यष्टा च धर्मात्मज एव तत्र ।बभूव पाण्डोर्गृहमावसंश्च राजाधिराजो वनितानिवृत्तः ॥ ६॥


भीमस्तु दौर्योधनमेव सद्म प्रपेदिवानूर्जितवीर्यलब्धम् ।कृष्णासहायः सुरराजयोग्यान् अभुङ्‍क्त भोगान् युवराज एव ॥ ७॥


कृष्णा च पार्थांश्चतुरो विहाय सुव्यक्तसारस्वतशुद्धभावा ।रराज राजावरजेन नित्यमनन्ययोगेन शिखेव वह्नेः ॥ ८॥


प्रीत्यैव विज्ञानयुजाऽन्यपार्थैः संवादतः परिहृता गतभाविकाले ।अपि स्वकीयं पतिमेव भीममवाप्य सा पर्यचरन्मुदैव ॥ ९॥


रराज राजावरजस्तया स द्विरूपया सोमककाशिजातया ।श्रिया भुवा चैव यथाऽब्जनाभो निहत्य सर्वान् दितिजान् पयोब्धौ ॥ १०॥


सर्वोत्तुङ्गो नामतः प्राणवायोरंशो निशायां गुरुपुत्रसूदितः ।माताऽस्य देवीति च रौहिणेयी भीमप्रियाऽऽसीद् या पुराऽस्यैव राका ॥ ११॥


अन्याश्चाऽसुर्वासुदेव्यो दिशो या आपश्च पूर्वं विंशतिरग्र्यरूपाः ।ताभिर्युतो(युक्तो) दैवतैरप्यलभ्यानभुङ्‍क्त भोगान् विबुधानुगार्चितः ॥ १२॥


ररक्ष धर्मानखिलान् हरेः स निधाय विप्राननुशास्य युक्तान् ।सद्वैष्णवान् विदुषः पञ्चपञ्च सवेतनान् ग्राममनु स्वकीयान् ॥ १३॥


दधार दण्डं तदवर्तिषु स्वयं जग्राह चान्वेव मुदाऽथ तद्गतान् ।तद्वृत्तमन्यैरपि विप्रवर्यैः संशोधयन् सर्वमसौ यथा व्यधात् ॥ १४॥


नावैष्णवः कश्चिदभूत् कुतश्चिन्नैवान्यनिष्ठो नच धर्महन्ता ।न विध्यवर्ती नच दुःखितोऽभून्नापूर्णवित्तश्च तदीयराष्ट्रे ॥ १५॥


वासिष्ठवृष्णिप्रवरौ प्रपश्यतां ताभ्यां च भीमेन मुनीश्वरैश्च ।संशिक्षितानां प्रथमाद् युगाच्च गुणाधिकः कलिरासीत् प्रजानाम् ॥ १६॥


शुभं महत् स्वल्पफलं कृते हि विपर्ययेणाशुभमेषु दोषः ।तद्धीनमप्युच्चशुभं कृताद् युगाच्चक्रे कलिं मारुतिरच्युताश्रयात् ॥ १७॥


धनञ्जयः प्रोद्यतदण्ड आसीत् सदाऽन्यचक्रेषु निजाग्रजेरितः ।विभीषयित्वा नृपतीन् सरत्नान् पदोर्नृपस्याग्रभुवो न्यपातयत् ॥ १८॥


सदैव कृष्णस्य मुखारविन्दाद् विनिस्सृतं तत्त्वविनिर्णयामृतम् ।पिबन् सुताद्याधिमसौ क्रमेण त्यजंश्च रेमेऽविरतातिभोगः ॥ १९॥


दुःशासनस्याऽवसथं(अवसथे) सुभद्राचित्राङ्गदासहितोऽध्यावसंश्च ।(स)सचन्द्रिकाकान्तिरनूनबिम्बो नभस्थितश्चन्द्र इवात्यरोचत ॥ २०॥


समस्तभृत्याश्रितवेतनानां माद्रेय आसीत् प्रथमः प्रदाता ।स दुर्मुखस्याऽवसथेऽवसच्च स मद्रराजात्मजयाऽग्र्यवर्ती ॥ २१॥


सन्धानभेदानुगतप्रवृत्तिस्तिष्ठंश्च दुर्मर्षणशुभ्रसद्मनि ।नृपाङ्गरक्षः प्रगृहीतखड्गस्तस्यानुजो मागधकन्ययाऽऽसीत् ॥ २२॥


सेनापतिः कृप आसीद् युयुत्सुः ससञ्जयो विदुरश्चाऽम्बिकेयम् ।पार्थेरिताः पर्यचरन् स्वयं च सर्वे यथा दैवतमादरेण ॥ २३॥


द्विरूपकृष्णप्रहितेषु पाण्डुषु क्षितिं प्रशासत्सु न कश्चनाऽतुरः ।नचाक्रमान्मृत्युरभून्न नार्यो विभर्तृका नो विधुरा नराश्च ॥ २४॥


शब्दादयश्चाऽसुरतीव हृद्या निकामवर्षी च सुरेश्वरोऽभूत् ।प्रजा अनास्पृष्टसमस्ततापा अनन्यभक्त्याऽच्युतमर्चयन्ति ॥ २५॥


पृथ्वी च गावः ससरस्वतीका निकामदोहा अभवन् सदैव ।अब्दाब्धिनद्यो गिरिवृक्षजङ्गमाः सर्वेऽपि रत्नप्रभवा(रत्नप्रसवा) बभूवुः ॥ २६॥


कृष्णाश्रयात् सर्वमिदं वशे ते विधाय सम्यक् परिपालयन्तः ।दिवीव देवा मुमुदुः सदैव मुनीन्द्रगन्धर्वनृपादिभिर्वृताः ॥ २७॥


समुज्ज्वला पाण्डवकीर्तिनारी पदं (विधाय)विधायासुरपक्षमूर्धसु(मूर्धनि) ।वराभये चैव सतां कराभ्यां कृष्णप्रसूता जगदण्डमावृणोत् ॥ २८॥


पातालपादां पृथिवीनितम्बामाकाशमध्यां करसन्तताशाम् ।ग्रहर्क्षताराभरनद्युवक्षसं विरिञ्चलोकस्थलसन्मुखाम्बुजाम् ॥ २९॥


विकुण्ठनाथाभयहस्तमादरान् मूर्ध्ना वहन्तीं(मूर्ध्नाऽऽवहन्तीं) वरभारताख्याम् ।निशम्य तामीक्ष्य समस्तलोकाः पवित्रिता वेदिभवामिवान्याम् ॥ ३०॥


प्रपालयत्स्वेव धरां सकृष्णेष्वद्धैव पार्थेषु कलिर्बलिश्च ।सुपापदैत्यौ क्‍वच राष्ट्रविप्लवं सञ्चक्रतुस्तच्छ्रुतमाशु पार्थैः ॥ ३१॥


नृपेण कृष्णेन च साधु चोदितो भीमस्तदा तौ सगणौ विजित्य ।बलिं प्रविद्राव्य कलिं निबद्ध्य समानयत् कृष्णनृपेन्द्रयोः(कृष्णनरेन्द्रयोः) पुरः ॥ ३२॥


पप्रच्छ तं कृष्णपुरो युधिष्ठिर उदारधीः ।कले किमिति मे राष्ट्रं विप्लावयसि दुर्मते ॥ ३३॥


इत्युक्त आह कालोऽयं दुर्योधननिपातनम् ।आरभ्य मम तत्र त्वं बलादाक्रम्य तिष्ठसि ।


तमाह राजा राज्ञां हि बलाद् राज्यं प्रवर्तते ।अपि कालभवं राष्ट्रं त्वदीयं मादृशैर्नृपैः ।


कालो वा कारणं राज्ञो राजा वा कालकारणम् ।इति ते संशयो मा भूद् राजा कालस्य कारणम् ॥ ३६॥ (महा.१२.७०.६)


तमुवाच कलिः काले मदीये त्वादृशः कुतः ।राजानं पूर्वमाविश्य विप्रांश्च स्यामहं नृप ॥ ३७॥


वासुदेवसहायेषु तेजो युष्मासु मे नहि ।क्‍व राजाऽसावृते युष्मान् यो मया नाभिभूयते ॥ ३८॥


मदीयकाले भूपाल विप्रदेव(वेद)विरोधिनि ।मद्दृष्टिपाते(याते) क्‍व गुणाः क्‍व वेदाः क्‍व सुयुक्तयः(क्‍व च सूक्तयः) ॥ ३९॥


जगाद नृपतिः सत्यं कले वक्ष्यनृतोऽपि सन् ।मोचये त्वार्तवचनाद् यदाऽस्मत्सन्ततेः परम् ।


सीमाधिर्बहुवाक्यं च तुलामाने च मे करः ।नैवातिक्रममेतेषां कुरु सर्वात्मना क्‍वचित् ॥ ४१॥


तमाह भगवान् कृष्णो यावत् पाण्डवसन्ततिः ।तावन्न ते भवेच्छक्तिः प्रवृत्तस्यापि भूतले ॥ ४२॥


पाण्डवेभ्यः परं यावत् क्षेमकः क्रमवर्द्धिता ।क्षेमकात् परतः पूर्तिं शक्तिस्ते यास्यति ध्रुवम् ॥ ४३॥


न द्रष्टव्यं भूतलं ते कुत एव स्पृशेर्भुवम् ।यावत् पार्था अहं चात्र ततो भुवि पदं कुरु ॥ ४४॥


इत्युक्तो वासुदेवेन मोचितो धर्मजेन च ।तान् प्रणम्य ययौ पारे समुद्रस्याऽश्रयद् गुहाम् ।


एवं पार्थान् प्रतिष्ठाप्य शक्रप्रस्थे तु सार्जुनः ।क्रीडन् दिव्याः कथाः प्राह पुत्रशोकापनुत्तये ।


वाणी प्राणो वासुदेव इत्येतैरखिलं ततम् ।सर्वोत्तमत्वमेतेषां सर्वमेतद्वशे जगत् ।


इत्थं हरेर्वशे सर्वं गुणपूर्णश्च(सर्वगुणपूर्णश्च) स प्रभुः ।एक एव नचान्योऽस्ति प्राणोच्चा तदधो रमा ॥ ४८॥


स हुताश इति प्रोक्तो(हुताशन इति प्रोक्तो) हुतमत्त्यखिलं यतः ।वाक्प्राणमध्यगो नित्यं धारयत्यखिलं जगत् ।


एतस्यानादिसद्भक्ता मुक्तियोग्या हि ते स्मृताः ।अनादिद्वेषिणो येऽस्मिन्स्तमोयोग्याः सुपापिनः ॥ ५०॥


मिश्रा मध्या इति ज्ञेयाः संसारपरिवर्तिनः ।एवं जीवास्त्रिधा प्रोक्ता भवन्त्येते नचान्यथा ॥ ५१॥


तारतम्यं च विज्ञेयं लिङ्गैर्दैहिकमानसैः ।विष्णोर्लिङ्गानुसारित्वत् तारतम्यात् तदीक्षणम् ॥ ५२॥


विष्णोस्तदनुगानां च प्रीतिकृद् धर्म ईरितः ।अधर्मोऽन्य इयं निष्ठा प्रलापः किं करिष्यति ।


कथञ्चित् तानवस्थाप्य सुदूरानुगतान् प्रभुः ।सुभद्रासहितः प्रायाद् यानेन द्वारकां पुरीम् ॥ ५४॥


समाधिविरतोदङ्कपरिपृष्टः पथि प्रभुः ।हतं दुर्योधनं प्राह सभ्रातृसुतसैनिकम् ॥ ५५॥


तं शिष्यवधकोपेन शप्तुमात्मानमुद्यतम् ।केशवोऽशमयद् वाक्यैर्विश्वरूपं प्रदर्श्य च ॥ ५६॥


मद्भक्तो नितरामेष मदाराधनतत्परः ।मामवज्ञाय निरयं माऽनुत्थानं व्रजेदिति ॥ ५७॥


कृपया वासुदेवेन बोधितः शान्तमानसः ।पश्चात्तापाभितप्तात्मा तमेव शरणं ययौ ॥ ५८॥


तस्मै देवोऽभयं दत्त्वा प्रेषयिष्येऽमृतं तव ।दातुं शक्रमिति प्रोक्त्वा ययौ द्वारवतीं प्रभुः ॥ ५९॥


अथाऽदिदेश देवेशं वासुदेवोऽमृतं मुनेः ।देहीति वञ्चयिष्यामीत्याह सोऽपि क्षमापयन् ॥ ६०॥


ओमित्युक्तो भगवता तत्स्नेहात् स शचीपतिः ।सुजुगुप्सितमातङ्गवेषो भूत्वा मुनिं ययौ ॥ ६१॥


मूत्रस्रोतसि सौधञ्च निधाय कलशं वशी ।मूत्रयन्निव तं प्राह वासुदेवः सुधामिमाम् ।


स मूत्रमिति मत्वा तं याहीत्येवाऽह भत्सयन् ।वञ्चयित्वैव तं शक्रो ययौ प्रीतः स्वमालयम् ॥ ६३॥


असाधारणमन्नं हि देवानाममृतं सदा ।अन्यपीतिस्ततस्तस्य देवानां परमाप्रिया ॥ ६४॥


आत्मदत्तप्रसादाच्च स्वापराधात् प्रचालिते ।उदङ्के वासुदेवस्तु युक्तिमित्येव मन्यते ॥ ६५॥


स्वपुरीं प्राप्य यदुभिः पूजितः शूरसूनवे ।वृत्तान्तं कथयामास केशवो यदुसंसदि ॥ ६६॥


वधमन्तरितं सूनोः सात्वतेशेन सात्वती ।प्रणम्य कथयेत्यूचे तत आह जनार्दनः ॥ ६७॥


ततः सुदुःखिताः शूरपुत्राद्या अभिमन्यवे ।श्राद्धदानानि बहुशश्चक्रुः केशवसंयुताः ॥ ६८॥


निवसत्यत्र विश्वेशे धर्मपुत्रः क्रतूत्तमम् ।अश्वमेधमनुष्ठातुं नाविन्दद् वित्तमञ्जसा ॥ ६९॥


हतशेषात् क्षत्रसङ्घात् करं नैच्छद् दयापरः ।नच मध्यमकल्पेन यष्टुं तस्य मनो गतम् ॥ ७०॥


विज्ञाय नित्यविज्ञातनिखिलो बादरायणः ।आविर्भूतो हिमवतः शृङ्गं यत्राभिसङ्गतम् ॥ ७१॥


मेरुशृङ्गेण यत्रैव विष्णुः स्वात्मानमव्ययम् ।लोकस्य सङ्ग्रहायेजे कर्मबन्धोज्झितोऽपि सन् ॥ ७२॥


शङ्कराद्याः सुरा यत्र मरुत्तश्चेजिरे हरिम् ।दानवो वृषपर्वा च तत्रास्ति धनमक्षयम् ॥ ७३॥


तच्छङ्करशरीरस्थं जामदग्न्यं हरिं परम् ।इष्ट्वैवानुज्ञया तस्य स्वीकृत्य यज तेन च ।


धनस्य देवता विष्णुर्जामदग्न्योऽखिलेश्वरः ।स शङ्करशरीरस्थो यज्ञोच्छिष्टधनाधिपः ॥ ७५॥


तेनैव विष्णुना दत्तमर्जुनायास्त्रमुत्तमम् ।कार्याण्यन्यानि चास्माकं कृतान्येतेन विष्णुना ॥ ७६॥


स ब्रह्मरुद्रशक्रादिपददाताऽखिलप्रदः ।स्वतन्त्रः परतन्त्रांस्तानावर्तयति चेच्छया ॥ ७७॥


प्रियोऽस्माकं प्रियास्तस्य सर्वदैव वयं नृप ।अतस्तदभ्यनुज्ञातधनेनैव यजामहे ॥ ७८॥


सोऽयं पितामहोऽस्माकं व्यासस्तन्नः प्रदास्यति ।इत्युक्त्वा तं पुरस्कृत्य कृष्णद्वैपायनं ययुः ॥ ७९॥


धनं कृष्णः समादाय(स आदाय) समन्ताच्छतयोजनम् ।ददौ तेषां तेऽपि चोहुर्हस्त्यश्वोष्ट्रनरादिभिः ॥ ८०॥


युधिष्ठिरमृते सर्वे भीमसेनपुरोगमाः ।यज्ञार्थमूहिरे भूरि स्वर्णमुद्यद्रविप्रभम् ॥ ८१॥


तदैव वासुदेवोऽपि सभार्यः स सुभद्रया ।आगच्छन् हस्तिनपुरं पथ्युदङ्केन पूजितः ॥ ८२॥


तत्कामवर्षिणो मेघांस्तस्य दत्वोदकार्थिनः ।सफलं स्ववरं कृत्वा जगाम गजसाह्वयम् ॥ ८३॥


आसन्नेष्वेव पार्थेषु व्यासे च पुरुषोत्तमे ।प्रविवेश पुरं कृष्णस्तदाऽसूतोत्तरा मृतम् ॥ ८४॥


द्रौण्यस्त्रसूदितं बालं दृष्ट्वा कुन्त्यादिकाः स्त्रियः ।शरण्यं शरणं जग्मुर्वासुदेवं जगत्पतिम् ॥ ८५॥


प्रत्यक्षमात्मना गर्भे रक्षितं प्रसवे हतम् ।पुनरुज्जीवयामास केशवः पार्थतन्तवे ॥ ८६॥


तदैव विविशुः पार्था सकृष्णाः सधनोच्चयाः(सधनोच्छ्रयाः) ।सर्वे मुमुदिरे दृष्ट्वा पौत्रं केशवरक्षितम् ॥ ८७॥


ददौ दानानि बहुशो धर्मपुत्रो युधिष्ठिरः ।पौत्रजन्मनि हृष्टात्मा वासुदेवं ननाम च ॥ ८८॥


कुन्तीकृष्णासुभद्राभिर्वैराट्याऽन्याभिरेव च ।पाण्डवैः पुरुषैश्चान्यैः संस्तुतः प्रणतो हरिः ॥ ८९॥


ततः कृष्णाभ्यनुज्ञाता पाराशर्यसदस्यकाः ।आरेभिरेऽश्वमेधं ते मुनिभिर्ब्रह्मवादिभिः ॥ ९०॥


सर्वयज्ञात्मकं तेषामश्वमेधं जगत्पतिः ।कारयामास भगवान् कृष्णद्वैपायनः स्वयम् ॥ ९१॥


साधनानि तु सर्वाणि शालां चैव हिरण्मयीम् ।पवमानसुतश्चक्रे कृष्णद्वैपायनेरितः ॥ ९२॥


अथानुमन्त्रितोत्सृष्टं पुरोहितपुरस्कृतम् ।तुरङ्गं (तुरगं) कृष्णसारङ्गमनुवव्राज वासविः ॥ ९३॥


स जित्वा रुन्धतः सर्वान् नृपतीञ्छस्त्रतेजसा ।चारयामास सर्वेषु राष्ट्रेष्वविजितोऽरिभिः ॥ ९४॥


युधिष्ठिराज्ञया तेन न कश्चिन्निहतस्तदा ।आहूताश्च नृपास्तेन यज्ञार्थं प्रीयताऽखिलाः ॥ ९५॥


मळलूरं (मणलूरं) क्रमात् प्राप्तस्तत्रैनं बभ्रुवाहनः ।अभ्ययादर्घ्यपाद्याद्यैस्तमाह विजयः सुतम् ॥ ९६॥


योद्धुकामोऽर्घ्यमादाय त्वयाऽद्याभिगतो ह्यहम् ।न प्रीये पौरुषं धिक् ते यन्मेध्याश्वो न वारितः ॥ ९७॥


तदाऽपि(तथाऽपि) पितृभक्त्यैनमयुद्ध्यन्तमुलूपिका ।प्राह युद्ध्यस्व यत् प्रीत्यै(तत् प्रीत्यै) गुरोः कार्यमसंशयम् ।


इत्युक्तो युयुधे पित्रा बलं सर्वं प्रदर्शयन् ।अर्जुनस्तु सुतस्नेहान्मन्दं योधयति स्मयन् ॥ ९९॥


स तु सर्वायुधक्षेपेऽप्यविकारं धनञ्जयम् ।दृष्ट्वा बाल्यात् परीक्षायै मन्त्रपूतं महाशरम् ।


मूर्च्छितं तं गुरुं दृष्ट्वा तद्भक्त्या भृशदुःखितः ।प्रायोपविष्टस्तन्माता विललापातिदुःखिता ॥ १०१॥


विजगर्ह तदोलूपीं धिग् जगत्त्रयपूजितम् ।अजीघनो मे भर्तारं पुत्रेणैवाविजानता ॥ १०२॥


लोकवीरं पतिं हित्वा(हत्वा) न मे कार्यं सुतेन च ।पतिलोकमहं यास्ये तृप्ता भव कलिप्रिये ॥ १०३॥


इत्युक्त्वा मरणायैव तां विनिश्चितमानसाम् ।धरायां विलुठन्तीं च दृष्ट्वा भुजगनन्दिनी ॥ १०४॥


नागलोकात् समादाय विशल्यकरणीं क्षणात् ।उत्थापयामास पतिं त्रिलोकातिरथं तया ॥ १०५॥


प्रहस्योवाच च तदा श्रुतं वाक्यं पुरा मया ।सुरलोके सुरैः प्रोक्तं भीष्माद्या नातिधर्मतः ॥ १०६॥


यद्धतास्तेन दोषेण पार्थस्तेनातिवेदनाम् ।रणे व्रजेदिति न तत् परतः स्यादिति ह्यहम् ।


देवानामेव सङ्कल्पान्मूर्च्छितश्चार्जुनोऽभवत् ।भुक्तदोषफलश्चायं पुनर्भोक्ष्यति नान्यतः ॥ १०८॥


अन्येन पातितस्त्यास्य यशो नश्येत् त्रिलोकगम् ।नार्जुनस्य यशो नश्येदिति दैवैरिदं कृतम् ॥ १०९॥


इत्युक्तः प्रीतिमापेदे पुत्रभार्यायुतोऽर्जुनः ।यज्ञार्थं तावथाऽहूय पूजितः प्रययौ ततः ॥ ११०॥


द्वारकायाः समीपस्थं प्रद्युम्नाद्याः सुता हरेः ।प्रसह्याश्वमपाजह्रुराह्वयन्तोऽर्जुनं युधे ॥ १११॥


सुभद्राहरणं मार्ष्टुं नीतेऽश्वे तैर्धनञ्जयः ।गौरवाद् वासुदेवस्य मातुलस्य च केवलम् ॥ ११२॥


मातुलायाब्रवीदश्वं हृतं पौत्रैरबन्धुवत् ।स निर्भत्स्य कुमारांस्तान् मेध्यमश्वममोचयत् ॥ ११३॥


मातुलं स प्रणम्याथ यज्ञार्थं तान् निमन्त्र्य च ।गच्छन् गजाह्वयं दूतमग्रतोऽयापयन्नृपे(यातयन्नृपे) ॥ ११४॥


सकृष्णः सहसोदर्यः श्रुत्वाऽसौ प्राप्तमर्जुनम् ।प्रीतो बाष्पाभिपूर्णाक्षो(बाष्पातिपूर्णाक्षो) भ्रातृस्नेहादभाषत ॥ ११५॥


वासुदेव न पश्यामि दुर्लक्षणमथार्जुने ।केन दुर्लक्षणेनायं बहुदुःखी प्रवासगः ॥ ११६॥


पृष्टस्तं केशवः प्राह भ्राता ते दीर्घपिण्डकः(पिण्डिकः) ।तेनायं दुःखबहुल इत्युक्त्वा पुनरेव च ।


समस्तलक्षणाभिज्ञाः कृष्णः सत्या वृकोदरः ।कृष्णा च पञ्चमो नास्ति विद्या शुद्धेयमञ्जसा ॥ ११८॥


प्रसङ्गात् प्राप्तुमिच्छेत् तां विद्याशीलो युधिष्ठिरः ।इति लोभात् तु पाञ्चाली वासुदेवं न्यवारयत् ॥ ११९॥


तद्गौरवाद् वासुदेवो नोत्तरं प्रत्यभाषत ।विस्मारयामास च तं पब्रुवाणः कथान्तरम् ॥ १२०॥


उदरस्य किञ्चिदाधिक्यं वृषणाधिक्यमेव च ।सव्यबाहोस्तथाऽऽधिक्यं दुर्लक्षणमथार्जुने(अतोऽर्जुने,अथोऽर्जुने) ॥ १२१॥


नैवोक्तं वासुदेवेन दृश्यमानमपि स्फुटम् ।ज्ञानानन्दह्रासकरा ह्येते दोषाः सनातनाः (सदातनाः) ॥ १२२॥


समस्तजीवराशौ यद् दुर्लक्षणविवर्जितौ ।पूर्णचित्सुखशक्त्यादेर्योग्यौ कृष्णा च मारुतिः ॥ १२३॥


अनादिदुःखहीनत्वे सुखाधिक्ये च लक्षणम् ।रुग्मिणीसत्यभामादिरूपायाः श्रिय एव तु ॥ १२४॥


मुख्यं ततोऽपि(ततोऽति) मुख्यं तु स्वान्तन्त्र्यादेरशेषतः ।गुणराशेः परं लिङ्गं नित्यं व्यासादिरूपिणः ।


साश्वेऽर्जुने यज्ञवाटं प्रविष्टेऽस्य सहोदराः ।पूजिताः पूजयामासुर्मुदिताः सहकेशवाः ॥ १२६॥


ततः स यज्ञो यदुवीररक्षितो व्यासोपदिष्टो मुनिभिः प्रवर्तितः ।अशोभतालं सकलैर्नृपैश्च समागतैर्विप्रवरैश्च जुष्टः ॥ १२७॥


स कृष्णयुग्मेन च भार्गवेण त्रिधा विभक्तेन परेण पुंसा ।अधिष्ठितोऽशोभत विश्वमेतद् विश्वादिरूपेण यथैव तेन ॥ १२८॥


यथा विरिञ्चस्य पुराऽऽस यज्ञो यथैव शक्रस्य शतक्रतुत्वे ।तथैव सोऽभूद् विधिशर्वशक्रपूर्वैः सुरैराविरलङ्कृतोऽधिकम् ॥ १२९॥


न देवगन्धर्वमुनिस्वधर्ममर्त्यादिकेष्वास स योऽत्र नाऽस(सम्भ्रमः) ।स्वलङ्कृतैर्नाकिजनैः सकान्तैररूरुचन्नाकवदेतदोकः(दोघः) ॥ १३०॥


तत्रैव तत्त्वानि ससंशयानि निस्संशयान्यासुरलं विवादे ।परस्परोत्थे हरिणा त्रिरूपिणा संस्थापितान्यग्र्यवचोभिरुच्चैः ॥ १३१॥


प्रगीतगन्धर्ववरः प्रनृत्तसदप्सराः सन्ततवादिविप्रः ।विवेचयद्देवनृपौघ एको रराज राजाऽखिलसत्क्रतूनाम् ॥ १३२॥


समस्तदेव्यः सहवासुदेव्यः स्वलङ्कृताः फुल्लमुखारविन्दाः ।विचेरुरत्रैव(विरेजुरत्रैव) सहाप्सरोभिर्निषेदुरप्यच्युतसत्कथारमाः ॥ १३३॥


न वै मुमुक्षुर्न बभूषुरत्र न वै विवित्सुश्च कुतो बुभुक्षुः ।असत्यकामा अभवन् कुतश्चित् प्रदातरि प्राज्ञवरेऽनिलात्मजे ॥ १३४॥


दिनेदिने तत्र महान्नपर्वताः सभक्षसारा रसवन्त ऊर्जिताः ।नद्यः पयः सर्पिरजस्रपूर्णाः समाक्षिकाद्या अपि पायसह्रदाः ॥ १३५॥


ह्रदा महान्तस्त्रिदशादियोग्याः सुयोगयुक्ता हरिचन्दनादेः ।तथाऽञ्जनालक्तकमुख्यमण्डनद्रव्याग्र्यवाप्यो मणिकाञ्चनोद्भवाः ॥ १३६॥


यथेष्टपानाशनभोगशिष्टाः सहस्रशो मारुतिना तु कारिताः ।गन्धा रसाद्याश्च समस्तभोगा दिवीव तत्राऽसुरतीव हृद्याः ॥ १३७॥


नैतादृशः कश्चन भूतपूर्वो मखो विना रामविरिञ्चवज्रिणाम् ।मखानिति प्रोचुरशेषलोका दृष्ट्वा मखं तं पुरुषोत्तमेरितम् ॥ १३८॥


स एवमद्धा हरिदैवतः क्रतुः पञ्चाश्वमेधात्मक उच्चकल्पः ।दिनेदिने स्वृद्धगुणो बभूव मुदावहो वत्सरपञ्चकत्रयम् ॥ १३९॥


यज्ञावसाने निखिलाश्च पाण्डवाः कृष्णा च पृथ्वीमखिलां सवित्ताम् ।माङ्गल्यमात्रं दयिताशरीरे निधाय सर्वाभरणानि चैव ।


प्रियो विभागो यदमुष्य विष्णोरतो विभागार्थमिवाऽर्पयंस्ते ।हृदा समस्तं हरयेऽर्पितं तैः स हि द्विजस्थोऽपि समस्तकर्ता ॥ १४१॥


देहेन्द्रियप्राणमनांसि चेतनैः सहैव तस्मा अतिसृज्य नेमुः ।त्वदीयमेतन्निखिलं वयं च नास्त्यस्मदीयं(न त्वस्मदीयं) क्‍वच किञ्चनेश ।


ततो विभक्ते मुनयोऽवदंस्ते प्रत्यर्पयामो वयमेषु राज्यम् ।पूर्णा हिरण्येन वयं धरायाः प्रपालने योग्यतमा इमे हि ॥ १४३॥


पार्थाः सभार्या द्विजवाक्यमेतन्निशम्य कृष्णाय पुनः प्रणम्य ।ऊचुस्तपो नोऽस्तु वनेऽर्पयित्वा राज्यं मखान्ते त्वयि धर्मलब्धम् ॥ १४४॥


इतीरितः प्राह स बादरायणो मुनीश्वरैरप्यभियाचितः प्रभुः ।हिरण्यमेव स्वमिदं मुनीनां मदाज्ञया भूङ्ग्ध्वमशेषराज्यम् ॥ १४५॥


समर्पितं मे फलवच्च तत् स्यात् पुनर्ग्रहो नैव च दोषकारी ।पितामहोऽहं भवतां विशेषतो गुरुः पतिश्चैव ततो मदर्हथ ॥ १४६॥


इतीरितास्ते प्रतिपद्य राज्यं ददुर्हिरण्यं निखिलं च तस्मै ।विभज्य विप्रान् स निजं तु भागमदात् पृथायै निखिलम् प्रसन्नः ॥ १४७॥


सभार्यकाणां वररत्नभूषणान्यशेषतः पुत्रभुवां प्रदाय ।पृथक्पृथग् योग्यवरांस्तथैभ्यः प्रादात् प्रभुस्ते मुदिताः प्रणेमुः ॥ १४८॥


तद् यज्ञपञ्चकमजस्त्रिगुणां स एभ्यः सद्दक्षिणां क्रतुपतिर्निखिलामवाप्य ।चक्रेऽश्वमेधत्रयमेकमेकं तेषां हरिर्बहुसुवर्णकनामधेयम् ॥ १४९॥


सकृष्णेष्वथ पार्थेषु सुस्नातावभृथेष्वलम् ।पञ्चेन्द्रवद् विराजत्सु स्तूयमानेष्वृषीश्वरैः ॥ १५०॥


स्तूयमाने च तद्यज्ञे क्रोधो नकुलतां गतः ।कृत्वोग्रगर्जनं यज्ञं तांश्च यज्ञकृतोऽखिलान् ॥ १५१॥


गर्हयन्नूचिवानित्थं भार्यापुत्रस्नुषायुतः ।सक्तुप्रस्थमदाद् विप्र उञ्छवृत्तिः सुभक्तितः ॥ १५२॥


धर्मायातिथये तस्य कलां नार्हति षोडशीम् ।यज्ञोऽयमिति हेतुं च विप्रैः पृष्टोऽभ्यभाषत ॥ १५३॥


अतिथेस्तस्य पादोदक्लिन्नः पार्श्वो हिरण्मयः ।एको ममाभूदपरः सर्वतीर्थादिकेष्वपि ॥ १५४॥


मज्जतोऽवभृथेष्वद्धा यज्ञानामत्र चाऽदरात् ।नाभूदित्यथ तत्तत्त्ववेदिभिर्मुनिपुङ्गवैः ॥ १५५॥


कृष्णेन च तमोऽन्धं तं प्रापयद्भिः स्मिते कृते ।अदर्शनं जगामाऽशु तमः प्राप च कालतः ।


कृष्णस्य पाण्डवानां च मखादेश्च गुणान् बहून् ।वदन्तो भर्त्सयाञ्चक्रुस्तन्मतज्ञा(तं मतज्ञाः) मधुद्विषः ॥ १५७॥


श्राद्धार्थं हि पयः पूर्वं (जामदग्नेः)जमदग्नेरदूषयत् ।नाकुलेनैव रूपेण क्रोधस्तं पितरोऽशपन् ॥ १५८॥


भव त्वं नकुलस्तावद् यावद् धर्मादिकान् सुरान् ।क्षेप्स्यसीति तमो घोरं भूयः पापेन यात्वयम् ।


यद्यप्यल्पधनत्यक्तं वित्तं बहुफलं भवेत् ।तथाऽप्यनन्तफलदाः कर्तुरेव महागुणाः ॥ १६०॥


सतां प्रीतिश्च तत्रापि सद्वरो हरिरेव हि ।पार्थेभ्योऽभ्यधिकः कर्ता समो वा को गुणैर्भवेत् ॥ १६१॥


सतां च प्रवरो विष्णुः सद्भिर्मुनिवरैर्युतः ।प्रत्यक्षतः कारयति पार्थैः प्रियतमैश्च तैः ।


पठन्ति पैङ्गिनश्चैतान् मन्त्रानन्वर्थकानिह ।अवैष्णवकृतं कर्म सर्वमन्तवदुच्यते ।


वैष्णवेष्वपि मर्त्यैर्यत् कृतं शतगुणं ततः ।गान्धर्वं कर्म तस्माच्च मुनिभिः पितृभिस्ततः ॥ १६४॥


देवशक्रशिवब्रह्मकृतं तस्मात् क्रमेण च ।शतोत्तरमिति ज्ञेयं नान्यद् ब्रह्मकृतोपमम् ॥ १६५॥


वैष्णवत्वं क्रमात् वृद्धं (क्रमोद्वृद्धं) ब्रह्मान्तं जीवराशिषु ।फलाधिक्यं कर्मणां हि विष्णोः प्रीत्यैव नान्यथा ॥ १६६॥


इति तेन न पार्थानां कर्मणाऽन्यत् समं क्‍वचित् ।गुणैर्ज्ञानादिभिर्वाऽपि तस्मात् क्रोधः स तामसः ।


अथ पृष्टो वासुदेवः सुरविप्रादिसंसदि ।युधिष्ठिरेण संहृष्टो जगादाशेषतः प्रभुः ॥ १६८॥


ते च श्रुत्वाऽखिलान् धर्मान् भक्त्या परमया युताः ।पूजयन्तो जगन्नाथमापुश्च परमां मुदम् ॥ १६९॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये यागसमाप्तिर्नाम त्रिंशोऽध्यायः


ओं ॥ यज्ञेश्वरेणाभियुतेषु भक्त्या महीं प्रशासत्सु पृथासुतेषु ।यियक्षुरागान्निशि विप्रवर्यो युधिष्ठिरं वित्तमभीप्समानः ॥ १॥


प्रातर्ददानीति नृपस्य वाक्यं निशम्य विप्रस्त्वरितो मखार्थे ।भीमं ययाचे स नृपोक्तमाशु निशम्य चादान्निजहस्तभूषणम् ॥ २॥


अनर्घमग्निप्रतिमं(अनर्घ्यमग्निप्रतिमं) विचित्ररत्नान्वितं(रत्नाञ्चितं) विप्रवरस्तदाप्य ।ययौ कृतार्थोऽथ च (नन्दिरावं)नन्दिघोषमकारयद् वायुसूनुस्तदैव ॥ ३॥


अकालजं तं तु निशम्य राजा पप्रच्छ दूतैस्तमुवाच भीमः ।यन्मर्त्यदेहोऽपि विनिश्चितायुरभून्नृपस्तेन ममाऽस हर्षः ॥ ४॥


इतीरितोऽसौ नृपतिस्त्वरेत धर्मार्थमित्यस्य मतं प्रपूजयन् ।जगाद साध्वित्यथ भूय एव धर्मे त्वरावानपि सम्बभूव ॥ ५॥


अथाम्बिकेयं विषयेषु सक्तं दुस्सङ्गदुष्टं कृतभूरिदोषम् ।समस्तराजाप्ययहेतुभूतं विचार्य (निचाय्य) तं मारुतिरन्वकम्पत ॥ ६॥


अकुर्वतस्तीक्ष्णतपः कुतश्चिन्नैवास्य(कुतश्चिन्नैव स्वलोकाप्ति)लोकाप्तिरमुष्य भूयात् ।रागाधिकोऽयं न तपश्च कुर्यादित्यस्य वैराग्यकराणि चक्रे ॥ ७॥


आज्ञां परैरस्य निहन्ति सोदरैर्वधूजनैरप्यतिपूजितेऽस्मिन् ।स निष्टनत्येवमपीतरैः स्वैः सुपूजितो(सम्पूजितो) नाऽस तदा विरागः ॥ ८॥


सर्वे हि पार्थास्तमृते सभार्या वैचित्रवीर्यं परमादरेण ।पर्येव चक्रुः सततं सभार्यं कृष्णा च न स्यात् तनयार्तिमानिति ॥ ९॥


स प्रीयमाणो नितरां च तेषु नैवाधिकं प्रीयते भीमसेने ।स्मरन् सुतांस्तेन हतान् समस्तानपि प्रभावं परमस्य जानन् ॥ १०॥


तस्यापनेतुं विषयेषु सक्तिं द्वेषं तथैवाऽत्मनि भीमसेनः ।जगाद माद्रीसुतयोः समक्षमास्फोट्य संशृण्वत एव तस्य ॥ ११॥


ताविमौ मे भुजौ वृत्तौ पीनौ चन्दनरूषितौ ।ययोरन्तरमासाद्य जरढस्य सुता हताः ॥ १२॥


यमौ तदन्वमोदेतां तत्स्नेहाद् गौरवादपि ।नैव तत् कृष्णया ज्ञातं पृथया च सपुत्रया ॥ १३॥


तच्छ्रुत्वोत्पन्ननिर्वेदं क्षत्ता ज्येष्ठस्य वर्द्धयन् ।उवाच जीविताशा ते ननु राजन् गरीयसी (महीयसी) ॥ १४॥


अहो महीयसी(गरीयसी) जन्तोर्जीविताशा यथा(यया) भवान्।भीमापवर्जितं पिण्डमादत्से गृहपालवत् ॥ १५॥


नचापराधो भीमस्य ब्रुवतस्त्वामिदं वचः ।अग्निर्निसृष्टो दत्तश्च गरो दाराश्च दूषिताः ।


अलमासज्जतस्तेऽद्य निर्वेदकरमीरितम् ।उपकाराय भीमेन तव द्वेषं त्यजात्र तत् ॥ १७॥


विमुच्य द्वेषकामौ त्वं वने तीर्थनिषेवकः ।तपसाऽऽराधय हरिं ततः पूतो भविष्यसि ॥ १८॥


इत्युक्तो द्वेषमुत्सृज्य भीमे निर्वेदमागतः ।अनुज्ञां तपसे प्राप्तुमुपवासपरोऽभवत् ॥ १९॥


अनश्नन्तं चतुर्थेऽह्नि धृतराष्ट्रं युधिष्ठिरः ।ज्ञात्वा सम्प्रार्थयामास भोजनार्थं पुनःपुनः ॥ २०॥


अनुज्ञां वनवासाय त्वत्तः प्राप्यैव सर्वथा ।भोक्ष्येऽन्यथा नेति वदन् धृतराष्ट्रः श्रमान्वितः ।


शन्तमेन(श्रान्तमेनं) करेणाथ धर्मजस्तं मृदु स्पृशन् ।शनैः सञ्ज्ञामगमयदब्रवीच्च सुदुःखितः ॥ २२॥


पुरस्कृत्य युयुत्सुं त्वं कुरु राज्यमकण्टकम् ।वयमेव त्वदर्थाय कुर्मः सर्वे तपो वने ॥ २३॥


नेत्याह धृतराष्ट्रस्तं कुलधर्मो हि नो वने ।अन्ते देहपरित्यागस्तन्माऽनुज्ञातुमर्हसि ॥ २४॥


तयोर्विवदतोरेवं कृष्णद्वैपायनः प्रभुः ।सर्वज्ञः सर्वकर्तेश आविर्भूतोऽब्रवीन्नृपम् ॥ २५॥


तपसाऽशेषदोषाणां क्षयकाममिमं नृपम् ।अनुजानीहि नैवास्य धर्मविघ्नकरो भव ॥ २६॥


काले निर्वेदमापन्नस्तपसा दग्धकिल्बिषः ।शुभ्रां गतिमयं यायादन्यथा न कथञ्चन ॥ २७॥


इत्युक्तो धर्मराजस्तमनुजज्ञे स चाशितः ।शिक्षयामास सद्धर्मान् नीतिं च विदुषेऽप्यलम् ।


अनुज्ञाय गृहं प्राप्ते धर्मजे विदुरं पुनः ।श्राद्धाय वित्तमाकाङ्क्षन् प्रेषयामास तद्वचः ॥ २९॥


श्रुत्वा युधिष्ठिरो भीममाह दातव्यमद्य नः ।पुत्रपौत्राप्तबन्धूनां श्राद्धेच्छोर्वित्तमञ्जसा ॥ ३०॥


तमाह भीमः पापानां विमुखानां मधुद्विषः ।पारलौकिकसाहाय्यं न कार्यमितरार्थतः ।


तज्ज्ञात्वा ददतां दोषो भवेदिति विचिन्तयन् ।कष्टात् कष्टतरं यान्तु सर्वे दुर्योधनादयः ॥ ३२॥


भीष्मादीनां वयं श्राद्धकर्तारस्तेन किं ततः ।कानीनत्वात्तु कर्णस्य सहास्माभिः पृथैव हि ।


इत्युक्तवन्तं नृपतिरर्जुनश्चोचतुः पुनः ।यियासोर्याचमानाय निजबाहुबलार्जितम् ।


इत्युक्तमपि नेत्येव ब्रुवाणं शुद्धधार्मिकम् ।अप्रीत्या जोषमास्वेति प्रोच्योवाच युधिष्ठिरः ॥ ३५॥


कोशतो यद् बहिर्वित्तं दानभोगादिकारणम् ।मम सन्निहितं सर्वं तत् पित्रे चार्पितं (पित्रेऽद्यार्पितं) मया ॥ ३६॥


एवमेवार्जुनोऽप्याह विदुरं पुनरूचतुः ।मुख्यधर्मरते भीमे न पिता क्रोद्धुमर्हति ॥ ३७॥


इत्युक्तो वित्तमादाय गत्वा क्षत्ताऽग्रजेऽब्रवीत्।युधिष्ठिरार्जुनौ भक्तिं नितरां त्वयि चक्रतुः ॥ ३८॥


नातिहृष्टस्त्वदाज्ञायां भीमस्तन्मा क्रुधोऽत्र च।शुद्धे क्षत्रियधर्मे हि(शुद्धक्षत्रियधर्मेषु) नितरोऽयं वृकोदरः ॥ ३९॥


नृपार्जुनौ धर्मरतावपि लोककृपापरौ।अजातकोपस्तच्छ्रुत्वा धृतराष्ट्रः प्रशान्तधीः ॥ ४०॥


कृत्वा श्राद्धानि सर्वेषां महादानान्यनारतम् ।दशरात्रं ददौ शुद्धमनसा निर्ऋणत्वधीः ॥ ४१ ॥


सर्वं समर्प्य गोविन्दे पार्थेभ्योऽन्येभ्य एव च ।स्वजनेभ्यः समादाय स्रवन्नेत्रेभ्य उच्चधीः ।


धर्मतो रक्षिता यूयमस्मत्पूर्वैर्महात्मभिः ।नचाहं परमस्नेहाद् युष्माभिः सुकृपालुभिः ।


इष्टं च यज्ञैः पूर्तैश्च चरितं युष्मदाश्रयात् ।पुत्रस्तु मम पापात्मा सर्वक्षत्रविनाशकः ।


सौभ्रात्रं येन सन्त्यज्य पाण्डवेषु महात्मसु ।कृतं विरूपं सुमहत् कुर्याद् यन्नापरः क्‍वचित् ॥ ४५॥


अप्रियाणि च कृष्णस्य सुबहून्याचरत् कुधीः ।प्रायस्तेनापि मन्देन न युष्मास्वप्यप्रियं(युष्मास्वप्यशिवं,न युष्मास्वशिवं,न युष्मासु शिवं) कृतम् ॥ ४६॥


भ्रातरोऽस्य च सर्वेऽपि तच्छीलमनुवर्तिनः ।हताश्च स्वेन पापेन ससुतामात्यबान्धवाः ॥ ४7॥


सोऽहं वयोगतश्चैव पुत्राधिभिरभिप्लुतः(पुत्रादिभिरभिप्लुतः) ।तत्सम्बन्धकृतं(तत्सम्बन्धात्कृतं) पापं स्वकृतं चाप्यपेशलम्(चात्यपेशलम्) ।


तत्र मामनुजानीध्वं कृपया मित्रवत्सलाः ।मत्प्रियार्थमपि स्नेहः पाण्डवेषु महात्मसु ॥ ४९॥


क्रियमाणोऽपि कर्तव्यो भूय एव सदाऽचलः ।ते हि मे पुत्रकाः सन्त इहामुत्र च सौख्यदाः ॥ ५०॥


इत्युक्तैः स्वगुणानुच्चैः कीर्तयद्भिः सुदुःखितैः ।पर्यश्रुनयनैः कृच्छ्रात् पौरजानपदैश्चिरात् ।


सञ्जयो विदुरश्चैनं सभार्यमनुजग्मतुः ।अनुवव्राज तं कुन्ती वनाय कृतनिश्चया ॥ ५२॥


वार्यमाणाऽपि तनयैः सभार्यैर्भृशदुःखितैः ।संस्थाप्य तान् सुकृच्छ्रेण ययौ साऽन्वेव तं नृपम् ॥ ५३॥


संन्दर्शितपथो राजा कुन्तीविदुरसञ्जयैः ।गान्धारीसहितः प्राप कुरुक्षेत्रं जगद्गुरोः ।


त्रिवत्सरेणास्य (त्रिवत्सरादस्य) निजस्य लोकस्याऽप्तिं सभार्यस्य जगाद तत्र ।ब्रह्माङ्कजस्तेन भृशं प्रतीतो व्यासोपदिष्टं व्यचरत् तपोऽग्र्यम् ॥ ५५॥


सक्षत्तृगान्धारिपृथे ससञ्जये तपोभिराराधयति प्रभुं हरिम् ।वैचित्रवीर्येऽत्र सदारबन्धुभृत्यास्तु पार्था दृशये समाययुः ॥ ५६॥


क्षत्तैकतामत्र युधिष्ठिरेण प्राप्तोऽथ भार्यासहितं ससञ्जयम् ।उपासमानेषु विचित्रवीर्यपुत्रं पृथां चैव पृथासुतेषु ॥ ५७॥


प्रादुर्बभूवामितशक्ति(प्रादुर्बभूवामृतशक्ति)तेजोज्ञानाद्भुतैश्वर्यसुखादिरूपः ।व्यासो हरिस्तत्र समीक्ष्य सर्वे सम्पूजयामासुरुदग्र्यभक्त्या(सम्पूजयामासुरुदग्रभक्त्या) ॥ ५८॥


तैः पूजितस्तत्र निषण्ण आह यद्यद् यदिष्टं प्रवदन्तु तत्तत् ।दास्यामि तस्याद्य तदित्यमुष्मिन् भक्त्युच्छ्रयः पाण्डुसुतैः सदारैः ।


तेषां प्रदत्तेष्वभिवाञ्छितेषु वैचित्रवीर्यः सह भार्ययैव ।सम्मन्त्र्य निःशेषरणेहतानां सन्दर्शनं प्रार्थितवांस्तमीशम् ॥ ६०॥


ततस्तु ते सत्यवतीसुतस्य सर्वेश्वरस्याऽज्ञया सर्व एव ।समागताः स्वर्गलोकात् क्षणेन दत्ता च दिव्या दृगमुष्य राज्ञः ॥ ६१॥


ऊषुश्च रात्रिं परमाज्ञयैव सर्वे स्वभार्यासहिता(सर्वेऽपि भार्यासहिता) यथा पुरा ।तृप्तः(तृप्ताः) सदारो नृपतिश्च तत्र सर्वेऽपि दृष्ट्वा महदद्भुतं(परमाद्भुतं) तत् ॥ ६२॥


अथाऽज्ञयैवास्य परस्य सर्वाः स्त्रियो निजेशैः सहिता ययुः स्वः (स्वम्) ।विनोत्तरां तां तु कथां निशम्य पारीक्षितोऽयाचत तातदृष्टिम् ॥ ६३॥


तं चाऽनयामास तदैव कृष्णो ह्यचिन्त्यशक्तिः स विकुण्ठलोकात् ।दृष्ट्वा स पारीक्षित आप तुष्टिं स्वतातमीशेन समाहृतं पुनः ॥ ६४॥


सम्पूज्य तं कृष्णमपीशवन्द्यं क्षमापयामास परीक्षिदात्मजः ।चक्रे च विस्रम्भमतीव भारते पुनश्च तत्रस्थजनैः(तत्रत्यजनैः) समेतः ॥ ६५॥


पार्थाः पुनः प्राप्य पुरं स्वकीयं धर्मेण पृथ्वीं परिपालयन्तः ।भोगानरागा अजुषन्त(भोगानारागादषुजन्त) योग्यान् युक्ता जगद्धातरि वासुदेवे ॥ ६६॥


वर्षत्रयान्ते त्मसमाहिताग्निं (त्यक्त्वाऽग्निभिः)त्यक्ताग्निभिस्तैर्वनमालिहद्भिः ।ते शुश्रुवुर्धृतराष्ट्रं सभार्यं सहैव कुन्त्या परिदग्धदेहम् ॥ ६७॥


वीटामुखं(व्रीळामुखा,व्रीडामुखं, व्रीडामुखान्) ध्यानपरा निशम्य स्वर्यातमात्मीयपितृव्यमाशु ।समेत्य भर्त्रा प्रतिपूज्यमानां कुन्तीं च तप्ता विदधुः क्रियाश्च ॥ ६८॥


ते विष्णुभक्त्या परिपूतकर्मभिर्ज्ञानेन चान्ते तमनुस्मरन्तः ।पार्थैः सुपुत्रैः (कुकृतौर्ध्वकर्मभिः)सुकृतोर्ध्वकर्मभिर्वृद्धिं सुखस्याऽपुरनप्ययां(अनव्ययाम्) शुभाः(शुभाम्) ॥ ६९॥


(गावल्गणिः)गावद्गणिर्व्याससकाशमेत्य शुश्रूषया तस्य पुनर्निजां गतिम् ।प्रपेदिवान् पाण्डुसुताश्च कृष्णं प्रतीक्षमाणाः पृथिवीमशासन् ॥ ७०॥


अष्टादशाब्दाः पृथिवीं समस्तां प्रशासतामेवमगुर्महात्मनाम् ।अरिक्तधर्मार्थसुखोत्तमानामनुज्झितानन्तपदस्मृतीनाम् ॥ ७१॥


{इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवराज्यपालनं(धृतराष्ट्रादिस्वर्गप्राप्तिः,धृतराष्ट्रस्वर्गारोहणं) नाम एकत्रिंशोऽध्यायः


OM ॥ ततः कुरुक्षेत्रमवाप्य कृष्णो दीक्षां प्रपेदे द्विषडब्दसत्रे ।स एव च व्यासभृगूद्वहात्मा चक्रेऽत्र सादस्यमजोऽप्रमेयः ॥ १॥


तत्रर्त्विजो दक्षभृगुप्रधानाः पार्था यदूनां प्रवरैः समेताः ।ब्रह्मेशशक्रप्रमुखाः सुराश्च चक्रुः सुसाचिव्यमनन्तदासाः ॥ २॥


सर्वे च जीवा वसुधातलस्था येऽन्येऽन्तरिक्षद्युमुखोत्तरेषु ।वसन्ति नारायणपादसंश्रयास्ते चात्र सर्वे मुमुदुः सनागाः ॥ ३॥


सुनिर्णयस्तत्त्वविनिर्णयार्थिनां तत्त्वस्य चाभूदिह वादशीलिनाम् ।मिथो विवादात् सुरभूसुराणां वाक्याद्धरेर्व्यासभृगूद्वहात्मनः ॥ ४॥


धर्मार्थकामानखिलानवापुस्तदर्थिनो मुक्तिमपीह कृष्णात् ।यथेष्टपानाशनवाससो जना विचेरुरत्रा(विरेजुरत्रा)मरमानवादयः ॥ ५॥


क्षेत्रं तदासीद्धरिलोकसम्मितं(तदाऽसीद्धरिलोकसम्मितं) यदीयुरत्राखिलसज्जना युतिम् ।नानाप्तकामाश्च ततो बभूवुर्निर्यत्नदृश्यश्च यतोऽत्र केशवः ॥ ६॥


द्वादशाब्दं महासत्रमेवमेतादृशं हरिः ।समाप्यावभृथस्नातः पूजयित्वाऽखिलान् जनान् ॥ ७॥


अनुजज्ञे क्रमेणैव वत्सरेण समागतान् ।स्वकुलं सञ्जिहीर्षुः(सञ्जहीर्षुः) स विप्रशापमजीजनत् ॥ ८॥


उपदिश्य परं ज्ञानमुद्धवायामुमाश्रमम् ।बदर्याख्यं प्रापयित्वा सप्तमाब्दं शतोत्तरम् ।


समारब्धं कलियुगं यदा दुर्योधनोऽपतत् ।षट्‍त्रिंशाब्दं पुनः कृष्णः कृतमेवान्ववर्तयत् ॥ १०॥


कृतादपि विशेषोऽयं यत् पुण्यस्याधिकं फलम् ।अल्पमेव च पापस्य कालात् कृष्णाज्ञया तथा ॥ ११॥


एवं सुधार्मिके लोके हरिभक्तिपरायणे ।नष्टेषु कलिलिङ्गेषु युगवृत्तिमभीप्सवः ॥ १२॥


ब्रह्मरुद्रादयो देवाः स्तुत्वा केशवमव्ययम् ।व्यज्ञापयन् स्वलोकाप्तिमोमित्याह स चाच्युतः ॥ १३॥


प्राचुर्ये सज्जनस्य स्यान्न कलेर्वृद्धिरञ्जसा ।इति स्वकुलसंहृत्यै प्रभासमनयत् प्रभुः ॥ १४॥


पुण्यक्षेत्रेऽपि न मृतिः स्वगृहे त्वतिधर्मदा(स्वगृहेऽप्यतिधर्मदा) ।गत्यैवाल्पमपि क्षेत्रं स्यान्महत्फलमित्यजः ॥ १५॥


प्रकाशयितुमेवैनान् प्रभासाय कुशस्थलात् ।नीत्वा दानादि(दानादिसद्धर्मान्)सद्धर्मांस्तैरकारयदच्युतः ॥ १६॥


ते ततः शापदोषेण कृष्णेनैव विमोहिताः ।मैरेयमत्ता अन्योन्यं निपात्य स्वां तनुं गताः ।


ततः परेशोऽगणितानुभावः स्वसारथिं पाण्डवानां सकाशम् ।स्वलोकयानप्रतिबोधनाय(स्वलोकयानप्रतिवेदनाय) स्वस्यानु चैषां त्वरयाऽभ्ययातयत् ॥ १८॥


अथाऽसतः पिप्पलमूल ईशितुरूरुस्थितं पादतलं सुताम्रम् ।दृष्ट्वा जरा नाम ससर्ज शल्यं भक्तोऽप्यलं रोहितं शङ्कमानः ॥ १९॥


अच्छेद्याभेद्यदेहस्य शल्ये पादमुपस्थिते ।समीपमागतो व्याधो दृष्ट्वा भीतोऽपतद् भुवि ॥ २०॥


विप्रवाक्यं मानयानः कारयित्वाऽमुना हरिः ।पापं मां जहि देवेति याचन्तमनयद् दिवम् ॥ २१॥


पादप्रहारदोषेण तं भृगुं व्याधतां गतम् ।पश्चात्तापेन भक्त्या च सुप्रीतस्तच्छरीरिणम् ।


नीचा योनिर्नीचनीच(नीचां योनिं नीचनीचकर्मा) कर्माऽप्तं नीचकर्मतः ।अदुष्टत्वात्तु मनसो भक्तिलोपो नचाप्यभूत् ।


ततो विरिञ्चेशपुरन्दराद्याः पुनः स्तुवन्तोऽभिययुः प्रणम्य ।कृष्णं स चाऽश्वेव ययौ स्वलोकं स्वतेजसा सर्वमिदं प्रकाशयन् ॥ २४॥


गोपालमन्त्रं भजतां फलप्रदस्त्वेकेन रूपेण स भुव्यदृश्यः ।तस्थौ द्वितीयेन च सूर्यमण्डले तृतीयमासीच्छिवपूजितं वपुः ॥ २५॥


सम्पूजितं ब्रह्मलोके चतुर्थं कञ्जोद्भवेनाथ परं स्वधाम ।समाप्नुवानं वपुरस्य पञ्चमं भक्त्याऽन्वयुर्देववराः स्वशक्त्या ॥ २६॥


तत्तेजसा ते प्रतिमुष्टदृष्टयः पुरुष्टुताद्या अमितोरुदीधितेः ।यावत् स्वगम्यं त्वनुगम्य तस्थुर्निमीलिताक्षा विहतोर्ध्वचाराः ॥ २७॥


वीन्द्रेशशेषानुगतः स्वयम्भूर्धाम प्रविष्टं तमजं प्रणम्य ।वीन्द्रादिकैरप्ययुतः स्वपित्राऽऽश्लिष्टो रहश्चाकथयत् तथाऽस्तौत् ॥ २८॥


स पूर्वरूपेण समाप्य चैक्यं विभज्य चेच्छानुसृतोऽथ रेमे ।हरिः श्रिया ब्रह्ममुखैश्च मुक्तैः सम्पूज्यमानोऽमितसद्गुणात्मा ॥ २९॥


ब्रह्माऽपि शर्वादियुतः स्वलोकं प्राप्तः पुनस्तत्र गतं च कृष्णम् ।रेमेऽभिपश्यन् प्रतिपूजयंस्तं सुराश्च सर्वे रविबिम्बसंस्थम् ॥ ३०॥


यतो न दर्शिता भ्रान्तिः प्रादुर्भावेष्वपि क्‍वचित् ।देहत्यागानुसारेण (देहेत्यागानुकारेण) हरिणा तदिहाच्युतः ॥ ३१॥


मोहयित्वाऽसुरानन्धं तमः प्रापयितुं प्रभुः ।चिदानन्दैकदेहोऽपि त्यक्तं देहमिवापरम् ।


दारुकोक्त्या समायातः पार्थस्तमदहत् तदा ।रौहिणेयादिकानां च शरीराणि प्रधानतः ।


तथैव जनमोहाय प्राप्य वह्नावदृश्यताम् ।रुक्मिण्यगाद्धरेः पार्श्वं सत्या कृत्वा तपस्तथा ॥ ३४॥


चिदानन्दैकदेहे हि(चिदानन्दैकदेहेऽपि) द्विरूपे इव ते यतः ।एकैवातः कृष्णवत् ते दुष्टान् मोहयतस्तथा ॥ ३५॥


अन्या महामहिष्यस्तु त्यक्त्वा देहं हुताशने ।काश्चित् काश्चित्तु तपसा(काश्चित् काश्चित् तपस्तप्त्वा) त्यक्तदेहा हरिं ययुः ॥ ३६॥


रौहिणेयादिकानां च भार्या वह्निमुखे तनुम् ।त्यक्त्वा स्वभर्तॄनेवाऽपुः सर्वा एव पतिव्रताः ॥ ३७॥


वसुदेवः पार्थमुखाच्छ्रुत्वा तद्योगमास्थितः ।त्यक्त्वा देहं कश्यपत्वं प्राप कृष्णानुरागतः ॥ ३८॥


तस्यार्जुनोऽश्वमेधाग्नावन्त्यकर्माकरोत् तदा ।त्यक्तदेहास्तस्य भार्या वह्नौ प्रापुस्तमेव च ॥ ३९॥


स्त्रियो बालांस्तथाऽऽदाय धनं चैव धनञ्जयः ।विनिर्ययौ द्वारवत्यास्तां जग्रास(जग्राह) च सागरः ॥ ४० ॥


स्त्रीबालसहिते पार्थ एकस्मिन् पथि गच्छति ।शापात् सुपापा आभीराः स्त्रीजनान् जह्रुरुद्धताः ॥ ४१॥


यास्ताः षोडशसाहस्रवनिताः शतसंयुताः ।कृष्णशापान्म्लेच्छवशं ययुर्दर्पनिमित्ततः ॥ ४२॥


ह्रियमाणे धने चैव वनितासु च वासविः ।युयुत्सुर्गाण्डिवं सज्यं(सज्जं) कृच्छ्रेणैव चकार ह ॥ ४३॥


क्षीणास्तस्य शरा दैवान्नास्त्राणि स्मृतिमाययुः ।स तद् दैवकृतं ज्ञात्वा संस्मरन् पुरुषोत्तमम् ।


तदा कुरुक्षेत्रगतं जगद्गुरुं सुपूर्णविज्ञानबलाब्धिसत्सुखम्(बलर्द्धिसत्सुखम्) ।तमेव वासिष्ठकुलोद्भवं हरिं निरीक्ष्य दुःखेन पपात पादयोः ॥ ४५॥


स तेन पुंसां प्रवरेण हेतुभिः सम्बोधितोऽज्ञानतमोंऽशुमालिना ।संस्थाप्य चेतः पुनरेव तस्मिन् जहौ शुचः प्रायश एव धैर्यात् ॥ ४६॥


स्त्रियो म्लेच्छहृताः कृष्णप्रेषिताद्(कृष्णप्रेरिताद्) दाल्भ्यतः पुनः ।गोविन्दैकादशीं श्रुत्वा कृत्वा सारस्वते जले ।


अर्जुनस्तु कुरुक्षेत्रे हार्दिक्ययुयुधानयोः ।सुतौ सारस्वते चैव देशे राज्येऽभ्यषेचयत् ॥ ४८॥


अनिरुद्धसुतं वज्रं प्रियं कृष्णस्य सद्गुणम् ।सशूरसेनेन्द्रप्रस्थराजानमकरोद् वशी ॥ ४९॥


स्त्रीबालांश्च धनं चैव तस्मिन् संस्थाप्य फल्गुनः ।ययौ भ्रातॄनशेषं च वृत्तं तेषामवर्णयत् ॥ ५०॥


ते चावियोगसमयं स्मरन्तो मुरवैरिणः(मुरवैरिणा) ।अभ्यषिञ्चन् भागवतं माहाराज्ये परीक्षितम् ॥ ५१॥


स्त्रीहारिणां च म्लेच्छानां वधायैनमयोजयन् ।कृतं च तेन तत् कर्म वोढ्रा पैतामहीं(पैतामहं) धुरम् ।


वासुदेवपदा स्पृष्टभूकण्टकसमुद्धृतिः(समुद्धतिः) ।समयः पाण्डवानां हि तस्यैवानुगतिः परम् ॥ ५३॥


अनुव्रजद्भिर्विश्वेशं नास्माभिर्भूस्तदुज्झिता ।भोज्या रक्ष्याऽपि वा तेषामित्येव समयः पुरा ॥ ५४॥


तत्र काली भीमभार्या वैष्णवं योगमास्थिता ।कृष्णयैकत्वमापन्ना त्यक्त्वा देहं तु मानुषम् ॥ ५५॥


सुभद्राद्यास्तु या भार्याः पार्थानां तु तदाज्ञया ।युयुत्सुश्चात्र शिक्षार्थं पौत्रस्यैवावसत् (पौत्रस्यैवावसन्) पुरे ॥ ५६॥


सन्त्यज्य राजचिह्नानि (राज्यचिह्नानि) वैष्णवं योगमास्थिताः ।वीराध्वानं ययुः सर्वे कृष्णया सह पाण्डवाः ॥ ५७॥


प्रागुदीचीं दिशं पूर्वं ययुस्तत्रार्जुनो धनुः ।नात्यजल्लोभतस्तं तु(लोभतस्तत्तु) समुद्रमुप पावकः ।


प्रातिभाव्यं तु वरुणे निस्तीर्याग्निरदृश्यताम् ।ययौ तेऽपि ययुः क्षिप्रं प्लवन्तः सप्तवारिधीन् ॥ ५९॥


अहोभिः सप्तभिर्योगं समारूढाः प्रदक्षिणम् ।कृत्वा क्‍वचिदसज्जन्त आसेदुर्गन्धमादनम् ।


द्रौपदीसहदेवादिपञ्चानां तत्र मारुतिः ।सदेहनाकानिच्छुत्वाद् देहप्रपतनं हि तत् ॥ ६१॥


तेषामिहेति याथार्थ्यं जानन् पप्रच्छ धर्मजम् ।केनकेनापतद् देहो दोषेण न इति क्रमात् ॥ ६२॥


मृतिकाले हि यो यस्य दोषं वक्त्यृणमोचनम् ।तस्मात् स्यादुक्तदोषस्येत्याह यच्छ्रुतिरेव तत् ।


सोऽपीच्छापतितान् देहानजानञ्छुद्धकर्मणाम् ।अपश्यन् कारणं प्राह दोषान् स्यादेवमित्यपि ।


स्वच्छन्दमृत्यवो योगाद् देहानुत्सृज्य पाण्डवाः ।कृष्णा चाऽपुः परं स्थानं यन्न यान्त्यपि देवताः ।


ऋणान्युन्मुच्य(ऋणात् प्रमुच्य) दोषोक्त्या स्वानां भीमः स्वकां तनुम् ।तत्याज परमं ध्यायन्नाप च स्थानमुत्तमम् ।


भीमादृते हि चतुर्षु पक्षपातस्तु वासवौ ।योग्य एवेति कृष्णाया न दोषः स्यात् कथञ्चन ॥ ६७॥


नीतिरूपे वीर्यबले महान्त्येषां यतः क्रमात् ।प्राणत्वाद् भोगशक्तिश्च नहि दोषाय मारुतेः ॥ ६८॥


यथास्वरूपविज्ञानमात्मन्यपि न दोषकृत् ।इति व्यासस्मृतेरेषामुक्तदोषोद्भवः कथम् ॥ ६९॥


कदाचिदतिमानोऽपि त्रयाणामेषु जायते ।तथाऽपि तत्फलं नैतत् तारतम्यं हि मुक्तिगम्(तारतम्यं विमुक्तिगम्) ।


प्रारब्धकर्मनाशे (आरब्धकर्मनाशे) हि पतेद् देहोऽप्यपापिनः ।युधिष्ठिरोऽपि हि स्वर्गं बुभुजे नैव तत्तनुः ॥ ७१॥


अतिमानादयो दोषाः कुत एव हि मारुतेः ।अनादिकालतः सर्वदोषहीना गुणाधिकाः ॥ ७२॥


सर्वजीवगणेभ्यो ये ते हि(समस्तजीवराशिभ्यस्ते हि) वायुत्वमाप्नुयुः ।ऋजवो नाम ये देवा देवानामपि देवताः ॥ ७३॥


अभावं ह्यतिमानादेर्भीमस्याऽह च केशवः ।यत्किञ्चाऽत्मनि कल्याणं सम्भावयसि पाण्डव ।


इति तस्माद् यथा युद्धे धर्महानिममन्यत ।एवमत्राप्यधर्मेण देहपातं नृपोऽब्रवीत् ॥ ७५॥


पूज्येभ्यः(पूर्वेभ्यः) पूर्वमेवैषां देहपातमभीप्सताम् ।तत्क्रमाद् (तत्कामाद्) देहपातोऽभून्न पापान्मुच्यतां यथा ॥ ७६॥


न हि पापफलं मुक्तौ(पापफलान्मुक्तौ देहपातः कथञ्चन ।किन्तु कर्मक्षयादेव तथा सर्वत्र निश्चितः ॥ ७७॥


तेषु स्वलोकान् प्राप्तेषु धर्मजः श्वाऽत्मना सह(स्वात्मना सह) ।ययौ पुरो देवरथस्तदाऽस्यावततार ह ॥ ७८॥


रथमारुहेति कथितो रथिना पुरतः शुनः ।आरोहमब्रवीन्नैतद् युक्तमित्याह सोऽपि तम् ॥ ७९॥


नाऽरुहेयं विना श्वानमिति तेन स्थिरोदिते ।स्वरूपं दर्शयामास धर्मो ह्याप्तः स्वरूपताम् (श्वरूपताम्) ॥ ८०॥


आनृशंस्यपरत्वेन कीर्तिमेवाऽत्मनो वृषः ।ख्यापयामास कौन्तेयरूपिणो धर्मसूक्तिभिः ॥ ८१॥


ततः(यतः) स रथमारुह्य लोकानामुत्तरोत्तरम् ।अतिक्रम्याखिलान् राज्ञो जगाम श्रीपतिप्रियः ॥ ८२॥


सर्वेषामुत्तरं लोकमैन्द्रं प्राप्येदमेव ते ।स्थानमित्युदितो देवैर्दुर्योधनमवैक्षत ॥ ८३॥


सभ्रातृकं ज्वलन्तं च सर्वेषामुपरि स्थितम् ।तं दृष्ट्वा परमक्रुद्धो निमील्य नयने शुभे ॥ ८४॥


भ्रातरो मे क्‍व कृष्णा च सकर्णाः(कर्णाद्याः) क्‍व च बान्धवाः ।धृष्टद्युम्नादयः पुत्रा हैडिम्बाद्याश्च सर्वशः ॥ ८५॥


यादवश्चेति पप्रच्छ देवांस्ते च तमब्रुवन् ।किं ते तैः स्वकृतं कर्म भुज्यतेऽत्र नचापरैः ॥ ८६॥


इत्युक्त आह पापोऽयं पृथिवीक्षयकारकः ।सर्वातिशङ्की मित्रध्रुङ् नारायणपराङ्‍मुखः ॥ ८७॥


नास्तिकोऽतिशठः क्रूरो द्वेष्टा विष्णोश्च तद्भुवाम् ।कथं दुर्योधनः स्थानं सर्वोत्तममवाप्तवान् ॥ ८८॥


कथं च सर्वधर्मज्ञा नारायणपरायणाः ।संस्थिताः परमे धर्मे दृश्यन्तेऽत्र न मत्प्रियाः ॥ ८९॥


यत्र सन्तस्तु ते सन्ति तत्र स्थातव्यमेव मे ।निरयेऽपि नचात्रापि नानेन सह पापिना ॥ ९०॥


अस्य वीरतमस्येदं धार्तराष्ट्रस्य युज्यते ।इत्युक्त्वा देवता दूतं स्वानां सन्दर्शनार्थिनः ।


दुर्गन्धेन सुकृच्छ्रेण तमसा प्रावृतेन च ।गत्वैव कियतीं भूमिं तद्दुर्गन्धासहो नृपः ।


क्षणं तिष्ठ महाराज सन्निधानबलात् तव ।वेदना नो न महतीत्येतच्छ्रुत्वा युधिष्ठिरः ॥ ९३॥


के यूयमिति पप्रच्छ दीनध्वनिविशङ्कितः ।भीमोऽहमर्जुनः कर्ण इत्याद्युक्तमिवाशृणोत् ॥ ९४॥


श्रुत्वा तत् कृपयाऽऽविष्टः शोकामर्षसमन्वितः ।आह दूतं यथेष्टं त्वं गच्छ नाहमितो व्रजे ॥ ९५॥


नच स्वर्गेण मे कार्यं त्यक्त्वा स्वजनमीदृशम् ।इत्युक्तः प्रययौ दूतस्तस्थावत्र युधिष्ठिरः ॥ ९६॥


ततोऽत्र देवाः पुरुहूतपूर्वकाः समाययुः स्नेहवशाद् युधिष्ठिरे ।तेष्वागतेष्वेव न तत्र वाचो दीना न दुर्गन्धतमोऽप्यपश्यत्(दुर्गन्धतमोऽप्यदृश्यत) ।


आहात्र धर्मः पुनरात्मसद्यशः(परमात्मसद्यशः) प्रकाशयन् पाण्डुसुताभिधं स्वम् ।धर्माद् विशिष्टा हि सदाऽनृशंसता दृष्टा च सा त्वय्यधिका त्रिशो मया ॥ ९८॥


शक्रोऽप्युवाचैनमिदं मृषा ते प्रदर्शितं द्रोणकृते मृषागिरः ।कृच्छ्रादिदं ते कथितं न चातिविस्रम्भ आसीत् तव कृष्णवाक्ये ।


ब्रह्मापरोक्ष्येऽपि विकर्म सूचकं प्रारब्धपापस्य विषाशनं यथा ।पश्यात्र भीमप्रमुखान् सुखस्थान् सम्पूज्यमानांस्त्रिदशैः सुरूपान्॥ १००॥


कुतः परब्रह्मदृशां सुशुद्धसत्कर्मणां कृष्णपरायणानाम् ।परेण योगेन विसृष्टतन्वां दुःखं भवेद् देववराधिपानाम् ॥ १०१॥


एते हि देवप्रवराः पृथिव्यां जाता भुवो भारजिहीर्षुमीशम् ।प्रतोष्य तद्भावितबुद्धिकर्मभिः पुनश्च तेनैव सहाऽपिरे दिवम् ॥ १०२॥


न ते नृपाद्यापि हि मानुषो गतो भावस्ततो द्वेष्टि सुयोधनादीन् ।निमज्ज्य तद् विष्णुपदोदकेऽत्र विसृज्य देहं भज देवभावम् ॥ १०३॥


सुयोधनाद्या(दुर्योधनाद्या) यदिमे सुपापा आरब्धकर्मक्षयमाप्य नित्ये ।निःशेषसौख्योज्झितनित्यदुःखेऽवशाः(नित्यदुःखे वशाः) पतिष्यन्त्यपुनर्निवृत्ताः ॥ १०४॥


देवांशजा ये तु समस्तशस्ते स्वमूलरूपं समवाप्य काले ।स्वतारतम्यानुसृतां विमुक्तिं प्राप्स्यन्ति नात्रापि विचार्यमस्ति ॥ १०५॥


इत्युक्त आश्वेव निमज्ज्य गङ्गां धर्मात्मजस्तत्र विसृज्य(धर्मात्मजस्तं प्रविसृज्य) देहम् ।सद्यो बभौ दैवमवाप्य(दैवतमाप्य) कायं विसृष्टरोषादिसमस्तदोषः ॥ १०६॥


स तु प्रपश्यन् स्वजनं समस्तं स्वमूलरूपातिसमीपसंस्थम् ।ददर्श भीमं च मरुत्समीपे मध्ये ज्वलन्तं मरुतां गणस्य ॥ १०७॥


ददर्श कृष्णामपि तत्समीपे श्रिया ज्वलन्तीं समतीत्य चान्याः ।स्प्रष्टुं च संस्कारवशादियेष निषिध्य तं प्राह सुराधिराजः ॥ १०८॥


एषा हि साक्षाज्जगतां प्रियस्य प्राणात्मनो जीववरेश्वरस्य ।प्राणप्रिया श्रीरिति नाम यस्याः शमात्मकेऽस्मिन् रमते सदैषा ॥ १०९॥


युष्मच्चतुर्देहगतस्य वायोर्वायुप्रिया भीमतनोस्तथैव ।भोगाय सृष्टा पुरुषोत्तमेन युष्मत्प्रियार्थं भवतां च दारैः ॥ ११०॥


प्रीतिस्ततो ह्यभ्यधिका(ह्यत्यधिका) बभूव भीमस्य चास्यास्तदनु स्म पार्थे ।ततो भवत्स्वेव यथाक्रमेण गुणानुसारेण समीरणस्य ॥ १११॥


इयं(इदा,एषा) हि सा शुद्धतनुः प्रजाता शच्यादियोगापगताग्र्यदेहा ।यूयं च सर्वे मरुतो विशेषसंयोगहीनाः स्वशरीरसंस्थाः ॥ ११२॥


स्पर्शेऽपि नास्याः पवमानपत्न्याः सुपूतताऽलं भवतामिदानीम् ।नचोत्तरत्रापि भवेत् कथञ्चिद् दिवौकसां मानुषदेहिनो(जन्मनो) यथा ॥ ११३॥


इतीरितं तं प्रतिसन्निवृत्तं विनाशयन् मानुषवासनां स्वयम् ।समाश्लिषच्छुद्धतनुः स्तनोत्थो धर्मो हरेः सोऽभवदाशु तत्समः ॥ ११४॥


ततस्तु पार्था अखिलाः स्वमूलरूपैः सहैवाऽविविशुर्मुदाऽन्विताः ।स्वीयानि धामानि(सद्मानि) ततोऽप्यनूनभोगाः सदारा न्यवसंश्च तत्र ॥ ११५॥


तत्रापि कृष्णेन समागमोऽभूत् पुरेव तेषामतितत्पराणाम् ।चिक्रीड एभिः सहितस्तथैव कृष्णोऽपि तद्वत् सरथोऽर्जुनेन ॥ ११६॥


अन्ये च(तु) देवांशभवाः समस्ताः स्वमूलरूपैक्यमवापुराशु ।कर्मक्षयादेव सुरेतरास्तु(सुरेतरास्ते) पुण्यक्षयं प्राप्य भुवि प्रजाताः ॥ ११७॥


चतुःसहस्रं त्रिशतोत्तरं ते(त्रिशतोत्तरं गते) संवत्सराणामनुभूय दिव्यान् ।भोगान् नरत्वेऽपि सदेश्वरोऽहमसज्जगच्चेति धियाऽऽप्नुवंस्तमः ॥ ११८॥


दुःखेऽपि तेषामिह तारतम्यं कलेः परं दुःखमिहाखिलाच्च ।यथा विरिञ्चस्य सुखं परं स्यान्मुक्तौ हरिद्वेषकृतो विशेषः ॥ ११९॥


केचित् पिशाचासुरराक्षसत्वमवाप्य विष्णोरपि तत्पराणाम् ।द्वेषात् तमोऽन्धं त्वरया समाप्नुयुर्देवाः स्वकाले निजयोग्यमुक्तिम् ॥ १२०॥


चतुःसहस्रे त्रिशतोत्तरे गते संवत्सराणां तु कलौ पृथिव्याम् ।जातः पुनर्विप्रतनुः स भीमो दैत्यैर्निगूढं हरितत्त्वमाह ॥ १२१॥


तदैव कृष्णाऽपि भुवि प्रजाता प्रीत्यै हरेरन्धतमस्यपातयत् ।महासुरान् विष्णुपरार्जुनाद्या कृते प्रजाता हरितोषणाय ।


वायुत्वमाप्तः स हनूमदंशो ब्राह्मं पदं प्राप्य वृकोदरश्च ।वागीश्वरीत्वं (वागीश्वरत्वं) गतयैव कृष्णया सहैव मुक्तिं गमिताऽखिलोत्तमाम् ॥ १२३॥


भुवि द्युलोके च विरिञ्चतायां मुक्तौ च ताभ्यामधिकं समस्तात् ।सन्तोष्यते पूर्णगुणो रमेशः सदैव नित्योर्जिततद्रतिभ्याम्(नित्योदितसद्रतिभ्याम्) ॥ १२४॥


‘भूषन् न योऽधि बभ्रूषु नम्नते’(ऋग्वेद १.१४०.६)(भुषन्न योऽधि बभ्रूषु नम्नते) ‘बळित्था तद्वपुषे धायि दर्शतं’(१.१४१.१) ।‘तां सु ते कीर्तिम् मघवन् महित्वा’(१०.५४.१) इत्यादिसूक्तानि च तत्प्रमाणम् ॥ १२५॥


अन्यानि वाक्यानि च वैदिकानि सपञ्चरात्रोक्तिपुराणकानि ।पृष्टश्च भीष्मोऽत्र युधिष्ठिरेणैतन्मोक्षधर्मेष्वपि किञ्चिदाह ॥ १२६॥


एवं प्रयातेषु सकेशवेषु स्वानेव लोकान् यदुपाण्डवेषु ।परीक्षिदाद्यास्तु तदन्वयोत्था व्यासानुशिष्टाः पृथिवीमरक्षन् ॥ १२७॥


तैः क्षेमकान्तैरिह भारतादिशास्त्राणि शृण्वद्भिरशेषविद्भिः ।व्यासप्रभावाच्च कलौ च धर्मो ज्ञानं च सुत्रातमगान्न(सूत्रार्थमगान्न) नाशम् ॥ १२७॥


संवत्सराणां तु सहस्रके गते प्राप्तेषु विद्यामखिलेषु सत्सु ।दग्धा पुरा ये त्रिपुरं घ्नतैव(त्रिपुरघ्नतैव) रुद्रेण जाताः पृथिवीतले ते ॥ १२९॥


अदर्शनं सर्वमुनीन्द्रवृन्दैः सहैव सज्ज्ञानमहानिधाने (निदाने) ।व्यासे प्रयातेऽपि सुतत्त्वविद्या तत्सम्प्रदायादपि तैरवाप्ता ॥ १३०॥


उत्सादितत्वात्तु दुरागमानां तत्सम्प्रदायस्य च नाशितत्वात् ।प्रसारितत्वाच्च सदागमानां पापा अपि ज्ञानमवापुरेतत् ॥ १३१॥


शुना पुरोडाशमिवावलीढं वेदश्रुतिं चा(वा)ऽन्त्यजनैरवाप्ताम् ।अनन्तदुःखाप्तिसुयोग्यदैत्यैर्विद्यामवाप्तां तु न सेहिरे सुराः ॥ १३२॥


नावाग्गतिः क्‍वापि सुवेदिनां भवेत् प्राप्यं सुखं नित्यमवश्यमेभिः ।प्राप्यं तमोऽन्धं त्वसुरैर्न मुक्तिः कदाचिदाप्या तदचिन्तयन् सुराः ॥ १३३॥


ज्ञानप्रदानाय सतां तदन्यज्ञानप्रणाशाय च विष्णुनैते ।क्लृप्तास्ततस्ते सविरिञ्चशर्वा विज्ञापयामासुरुपेत्य विष्णुम् ॥ १३४॥


क्षीरोदधेरुत्तरतीरनिष्ठितै(विष्ठितै)रभिष्टुतः सुष्टुतिभिः पुरुष्टुतः ।प्रदाय तेषामभयं रमापतिः क्षणादभूच्चारुतराकृतिः (तमाकृतिः) शिशुः ॥ १३५॥


यस्त्रैपुराणां प्रथमोऽत्र जातः शुद्धोदनेत्येव जिनेति चोक्तः ।क्षेत्रे गयाख्येऽस्य शिशुं प्रजातं सम्प्रास्य दूरेऽत्र बभूव विष्णुः ।


तेषां तदा वैदिककर्म वीक्ष्य सम्प्राहसत् तद्वपुषैव केशवः ।तं जातमात्रं प्रहसन्तमीक्ष्य सुविस्मितैः पृष्ट उवाच विष्णुः ।


तथाऽप्यविश्वासमवेक्ष्य तेषां सस्मार देवानखिलान् जनार्दनः ।विज्ञाय ते तस्य मनोगतं निजान् प्रचिक्षिपुर्हेतिगणानमुष्मिन् ॥ १३८॥


स जातमात्रः शिवपूर्वकाणां शूलादिहेतीरखिला निगीर्य ।दैत्यातिमोहाय निजं च चक्रं स्वमुक्तमाश्वेव समग्रहीद्वशी॥ १३९॥


तदासनत्वेन विधाय तस्मिन् समास्थितं देवगणाः प्रणम्य ।जग्मुः स्वधामानि वचांसि तस्य (चास्य) स्वीचक्रुराश्वेव जिनादिदैत्याः ॥ १४०॥


ते ज्ञानधर्मावपहाय पापा विमोहिता देववरेण(दैववरेण) सर्वे ।जग्मुस्तमोऽन्धं क्षणिकं समस्तं ज्ञानं नसच्चेति दृढं स्मरन्तः ॥ १४१॥


नारायणोऽप्याप्य(नारायणः प्राप्य) सुरेन्द्रवृन्दं वृत्तं च तेषामखिलं(तेषां निखिलं) निगद्य ।पृष्टश्च तैराह निजं हृदिस्थं बौद्धागमार्थं सृतिबन्धमोचनम् ॥ १४२॥


क्षणादयं क्षणिकास्तद्विशेषा यतः प्रयान्त्येव निसर्गतोऽखिलाः ।ततः स्थिरत्वेऽपि विशेषसंश्रयादुक्तं क्षणस्थायि मया समस्तम् ॥ १४३॥


तद्वान् विशेषश्च यतो न भिन्नो सदा स्वनिर्वाहकशक्तियुक्तौ ।अतः क्षणस्थायि समस्तमेतत् स्थिरात्मकं चेति हि नास्ति भेदः ॥ १४४॥


ज्ञोऽहं सदैकः परमो मयैतत् सदाऽननीयं हि यतोऽस्वतन्त्रम् ।ज्ञानात्मकं विश्वमतो मयोक्तं जडस्वरूपं च किमु स्म चेतनम् ॥ १४५॥


शंशीलकोऽहं यत एव चोच्चः शूनामकस्तद्धि मया निधेयम्(विधेयम्) ।शून्याभिधं दोषविरुद्धरूपो दोषोज्झितोऽन्यस्त्वखिलादनामा ।


इत्यादि बोद्धव्यमिदं समस्तं मयोदितं क्‍वापि न हेयमस्ति ।इत्यादि देवान् प्रतिबोधयंश्च देवैः सहोवास स बुद्धदेवः ।


ततस्तु बुद्धोदितपक्षसंस्थो जिनोऽपि चक्रे मतमन्यदेव ।बौद्धेन जैनेन मतेन चैव दैत्यांशकाः प्रीतिमगुः समस्ताः ॥ १४८॥


प्रशान्तविद्येत्यभिधं तथाऽन्यद् बुद्धोक्तशास्त्रं त्रिदशा अवाप्य ।तोषं ययुर्वेदसमस्तसारं यामाश्रितानामचिरेण मुक्तिः ॥ १४९॥


अन्ये मनुष्या अपि भारताद्यं सत्सम्प्रदायं परिगृह्य विष्णुम् ।यजन्त आपुः परमां गतिं तन्न सेहिरे क्रोधवशादिदैत्याः ॥ १५०॥


शैवं तपस्ते विपुलं विधाय जगद्विमोहोर्जितशक्तिमस्मात् ।प्राप्य प्रजाता भुवि मोहनं च चक्रुः कुतर्कैरभिदां वदन्तः ॥ १५१॥


तेषां प्रपाताय सतां च मुक्त्यै(विमुक्त्यै) जन्माऽस भीमस्य यदुक्तमत्र ।दुर्गा पुनर्विप्रकुलेऽवतीर्णा हनिष्यति व्रातमथासुराणाम् ॥ १५२॥


ततः कलेरन्तमवाप्य धर्मज्ञानादिकल्याणगुणप्रहीने ।लोके विरिञ्चत्रिपुरघ्नशक्रपूर्वाः पयोब्धिं त्रिदशाः प्रजग्मुः ॥ १५३॥


नारायणस्तैः स्तुतिपूर्वमर्थितो भवाय लोकस्य स शम्भलाख्ये ।ग्रामे मुनेर्विष्णुयशोऽभिधस्य गृहे बभूवाऽविरचिन्त्यशक्तिः ॥ १५४॥


कलेस्तु कात्कारत(काल्कारत) एव कल्की ज्ञानं कलं कं सुखमेव तद्वान् ।कल्कीति वा तेन समस्तदस्युविनाशनं तेन दिनाद् व्यधायि ॥ १५५॥


अधर्मवृत्तं विमुखं हरेश्च निहत्य निःशेषजनं तुरङ्गी ।संस्थापयामास स धर्मकेतुं(सेतुं) ज्ञानं स्वभक्तिं च निजप्रजासु ॥ १५६॥


इत्याद्यनन्तानि हरेरुदारकर्माणि रूपाणि च सद्गुणाश्च ।नित्यव्यपेताखिलदोषकस्य ब्रह्मेत्यनन्तेति च नाम येन ॥ १५७॥


आनन्दतीर्थाख्यमुनिः सुपूर्णप्रज्ञाभिधो ग्रन्थमिमं चकार ।नारायणेनाभिहितो बदर्यां तस्यैव शिष्यो जगदेकभर्तुः ॥ १५८॥


यस्तत्प्रसादादखिलांश्च वेदान् सपञ्चरात्रान् सरहस्यसङ्ग्रहान् ।वेदेतिहासांश्च पुराणयुक्तान् यथावदन्या अपि सर्वविद्याः ॥ १५९॥


समस्तशास्त्रार्थविनिर्णयोऽयं विशेषतो भारतवर्त्मचारी(भारतमार्गवर्ती) ।ग्रन्थः कृतोऽयं जगतां जनित्रं हरिं गुरुं प्रीणयताऽमुनैव ॥ १६०॥


विनिर्णयो नास्त्यमुना विना यद् विप्रस्थितानामिव सर्ववाचाम् ।तद् ब्रह्मसूत्राणि चकार कृष्णो व्याख्या तथैषामयथा (व्याख्याऽथ तेषामयथा)कृताऽन्यैः ॥ १६१ ॥


निगूहितं यत् पुरुषोत्तमत्वं सूत्रोक्तमप्यत्र महासुरेन्द्रैः ।जीवेश्वरैक्यं प्रवदद्भिरुग्रैर्व्याख्याय सूत्राणि चकार चाऽविः ॥ १६२॥


व्यासाज्ञया भाष्यवरं विधाय पृथक्पृथक् चोपनिषत्सुभाष्यम् ।कृत्वाऽखिलान्यं पुरुषोत्तमं च हरिं वदन्तीति समर्थयित्वा ॥ १६३॥


तनुस्तृतीया पवनस्य सेयं सद्भारतार्थप्रतिदीपनाय ।ग्रन्थं चकारेममुदीर्णविद्या यस्मिन् रमन्ते हरिपादभक्ताः ॥ १६४॥


तृतीयमस्य वृषभस्य दोहसे दशप्रमतिं जनयन्त योषणः ।निर्यदीं बुध्नान् महिषस्य वर्पस ईशानासः शवसा क्रन्त सूरयः ।


इत्यादिवाक्योक्तमिदं समस्तं तथा पुराणेषु च पञ्चरात्रे ।अत्रोदिता याश्च कथाः समस्ता वेदेतिहासादिविनिर्णयोक्ताः(समस्तवेदेतिहासदिविनिर्णयोक्ताः) ॥ १६६॥


तस्मादयं ग्रन्थवरोऽखिलोरुधर्मादिमोक्षान्तपुमर्थहेतुः ।किं चो(वो)दितैरस्य गुणैस्ततोऽन्यैर्नारायणः प्रीतिमुपैत्यतोऽलम्(प्रीतिमुपैत्यतोऽयम्) ॥ १६७॥


यस्य त्रीण्युदितानि वेदवचने रूपाणि दिव्यान्यलंबट् तद्दर्शतमित्थमेव निहितं देवस्य भर्गो महत् ।


यः सर्वगुणसम्पूर्णः सर्वदोषविवर्जितः ।प्रीयतां प्रीत एवालं विष्णुर्मे परमः सुहृत् ॥ १६९॥


इति श्रीमदानन्दतीर्थभगवत्पादाचार्यविरचिते श्रीमहाभारततात्पर्यनिर्णये पाण्डवस्वर्गारोहणं नाम द्वात्रिंशोऽध्यायः